दहेज निषेध अधिनियम, 1961 : यह भारत का प्राथमिक कानून है जो दहेज लेने या देने को प्रतिबंधित करता है।
धारा 3: दहेज लेने या देने पर न्यूनतम 5 वर्ष की कैद और ₹15,000 या दहेज के मूल्य के बराबर (जो भी अधिक हो) जुर्माने का प्रावधान है।
धारा 4: दहेज की मांग करने पर 6 महीने से 2 साल तक की जेल हो सकती है।
1961 के अधिनियम के अनुसार, शादी के समय बिना किसी मांग के दिए गए “उपहार” (Presents) तब तक अवैध नहीं माने जाते जब तक उनकी सूची लिखित रूप में न रखी जाए और वे देने वाले की वित्तीय क्षमता के भीतर हों।
दहेज निषेध नियम (1985) के अनुसार, शादी में मिलने वाले सभी उपहारों की एक लिखित लिस्ट बनाना अनिवार्य है।
इस लिस्ट में उपहार का विवरण, उसकी अनुमानित कीमत और देने वाले का नाम होना चाहिए।
इस लिस्ट पर दूल्हा और दुल्हन दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) – पूर्व IPC:
धारा 80 (BNS) / धारा 304B (IPC): ‘दहेज मृत्यु’ (Dowry Death)। यदि विवाह के 7 वर्ष के भीतर महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होती है और यह साबित होता है कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था।
धारा 85/86 (BNS) / धारा 498A (IPC): पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (Cruelty) के खिलाफ सुरक्षा।
स्त्रीधन (Stridhan): विवाह के समय महिला को स्वेच्छा से दिए गए उपहार (गहने, नकद आदि) केवल उसी की संपत्ति होते हैं। दहेज कानून इन पर लागू नहीं होता, लेकिन पति या ससुराल वाले इन्हें जबरन नहीं रख सकते।
दहेज प्रतिषेध अधिकारी: राज्य सरकारें हर जिले में इन अधिकारियों की नियुक्ति करती हैं जिनका काम कानून का पालन सुनिश्चित करना है।
सामाजिक और सांख्यिकी तथ्य (NCRB डेटा)
भारत में हर साल लगभग 7,000 से 8,000 दहेज हत्याएं (Dowry Deaths) दर्ज की जाती हैं।
औसतन, भारत में हर 1 घंटे में एक महिला की मौत दहेज से संबंधित कारणों से होती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इन मामलों की संख्या राष्ट्रीय स्तर पर काफी अधिक रहती है।