अनुच्छेद
भाग-I (अनुच्छेद 1 से 4) : संघ और उसका राज्य क्षेत्र
- 1. संघ का नाम और राज्यक्षेत्र इकाइयाँ।
- अनुच्छेद 2: नए राज्यों (विदेशी क्षेत्र) का प्रवेश और स्थापना
- यह अनुच्छेद संसद को दो प्रकार की शक्तियाँ देता है:
- ऐसे राज्यों को संघ में शामिल करना जो पहले से अस्तित्व में हैं लेकिन भारत का हिस्सा नहीं हैं – ।
- नए राज्यों की स्थापना करना जो पहले अस्तित्व में नहीं थे।
- नोट: यह उन क्षेत्रों के लिए है जो अभी भारतीय संघ का हिस्सा नहीं हैं (जैसे 1974-75 में सिक्किम का विलय)।
- यह अनुच्छेद संसद को दो प्रकार की शक्तियाँ देता है:
- अनुच्छेद 2A: (निरसित/Repealed)
- इसे 36वें संविधान संशोधन (1975) द्वारा हटा दिया गया था।
- यह मूल रूप से सिक्किम को ‘सह-राज्य‘ (Associate State) का दर्जा देने के लिए जोड़ा गया था, लेकिन जब सिक्किम पूर्ण राज्य बन गया, तो इसकी जरूरत नहीं रही।
- अनुच्छेद 3: राज्यों का पुनर्गठन (आंतरिक परिवर्तन)
- यह अनुच्छेद संसद को भारत के भीतर के राज्यों के भूगोल को बदलने की शक्ति देता है। संसद साधारण बहुमत से:
- किसी राज्य से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके या दो राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।
- किसी भी राज्य के क्षेत्र (Area) को बढ़ा या घटा सकती है।
- किसी भी राज्य की सीमाओं (Boundaries) में परिवर्तन कर सकती है।
- किसी भी राज्य के नाम को बदल सकती है।
- किसी राज्य से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके या दो राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड का बनना, या उड़ीसा का नाम बदलकर ओडिशा करना।
- यह अनुच्छेद संसद को भारत के भीतर के राज्यों के भूगोल को बदलने की शक्ति देता है। संसद साधारण बहुमत से:
- अनुच्छेद 4: अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत बनाई गई विधियाँ
- अनुच्छेद 2 या 3 के तहत किया गया कोई भी बदलाव (जैसे नए राज्य का गठन) पहली अनुसूची (राज्यों के नाम) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा में सीटों का बंटवारा) में भी बदलाव लाएगा।
- सबसे महत्वपूर्ण बात: इन परिवर्तनों को अनुच्छेद 368 के तहत ‘संविधान संशोधन’ नहीं माना जाएगा। यानी इन्हें संसद में साधारण बहुमत (Simple Majority) से पास किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 2 या 3 के तहत किया गया कोई भी बदलाव (जैसे नए राज्य का गठन) पहली अनुसूची (राज्यों के नाम) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा में सीटों का बंटवारा) में भी बदलाव लाएगा।
| अनुच्छेद | मुख्य विषय | सरल भाषा में मतलब |
| अनुच्छेद 1 | संघ का नाम और क्षेत्र | देश का नाम ‘भारत’ है और यह राज्यों का समूह है। |
| अनुच्छेद 2 | बाहरी राज्यों का प्रवेश | विदेशी क्षेत्र को भारत का राज्य बनाना। |
| अनुच्छेद 3 | आंतरिक पुनर्गठन | भारत के मौजूदा राज्यों की सीमा या नाम बदलना। |
| अनुच्छेद 4 | संशोधन की प्रक्रिया | इन बदलावों के लिए साधारण कानून ही काफी है। |
नागरिकता
- 5. संविधान के आरम्भ के समय नागरिकता।
- 6. पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार।
- 7. पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार।
- 8. भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता के अधिकार।
- 9. एक विदेशी राज्य की स्वैच्छिक नागरिकता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का नागरिक न होना।
- 10. नागरिकता के अधिकारों का बना रहना।
- 11. कानून के द्वारा नागरिकता के अधिकार को विनियमित करने की संसद की शक्ति।
मूलभूत अधिकार
- भाग-III (अनुच्छेद 12 से 35) में मूल अधिकारों (Fundamental Rights) का वर्णन किया गया है।
- इन्हें भारत का ‘मैग्नाकार्टा’ भी कहा जाता है।
- अनुच्छेद 12: ‘राज्य’ (State) की परिभाषा।
- इसमें सरकार, संसद, नगरपालिकाएँ और अन्य सरकारी संस्थाएँ शामिल हैं।
- अनुच्छेद 13: मूल अधिकारों से असंगत विधियाँ।
- यदि कोई कानून मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसे शून्य (Void) माना जाएगा।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 – 18)
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण।
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 16: लोक नियोजन (Sarkari Naukri) के विषयों में अवसर की समानता।
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability) – छुआछूत का निषेध।
- अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत (सेना और विद्या संबंधी सम्मान को छोड़कर)।
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 – 22)
- अनुच्छेद 19: इसके तहत 6 प्रकार की स्वतंत्रताएँ दी गई हैं:
- बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी।
- शांतिपूर्वक सभा करने की आजादी।
- संघ/संगठन बनाने की आजादी।
- भारत में कहीं भी घूमने की आजादी।
- कहीं भी बसने या रहने की आजादी।
- कोई भी व्यापार या पेशा चुनने की आजादी।
- अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण।
- अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (Right to Life)।
- अनुच्छेद 21(A): 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा।
- अनुच्छेद 22: कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण।
- अनुच्छेद 19: इसके तहत 6 प्रकार की स्वतंत्रताएँ दी गई हैं:
- शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 – 24)
- अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और जबरन श्रम (Begar) पर रोक।
- अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन पर रोक।
- धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28)
- अनुच्छेद 25: किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 27: किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर (Tax) न देने की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 28: शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता।
- संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 – 30)
- अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण (भाषा, लिपि और संस्कृति)।
- अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार।
- 31. (निरसित)।
- अनुच्छेद 31 (संपत्ति का अधिकार) को 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा मूल अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत एक ‘कानूनी अधिकार’ बना दिया गया है।
- 31A. संपदाओं इत्यादि के अर्जन हेतु उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति।
- 31B. कुछ सुनिश्चित अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण।
- 31C. कुछ सुनिश्चित निर्देशक सिद्धान्तों को प्रभावी बनाने के लिए बनाये गये कानूनों की व्यावृत्ति।
- 31D. (निरसित)।
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
- अनुच्छेद 32: इसे डॉ. अंबेडकर ने ‘संविधान की आत्मा और हृदय‘ कहा था। इसके तहत मूल अधिकारों के उल्लंघन पर नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। कोर्ट 5 तरह की ‘रिट’ (Writs) जारी करता है:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
- परमादेश (Mandamus)
- प्रतिषेध (Prohibition)
- उत्प्रेषण (Certiorari)
- अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)
- अनुच्छेद 32: इसे डॉ. अंबेडकर ने ‘संविधान की आत्मा और हृदय‘ कहा था। इसके तहत मूल अधिकारों के उल्लंघन पर नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। कोर्ट 5 तरह की ‘रिट’ (Writs) जारी करता है:
- 32A. (निरसित)।
- 33. सशस्त्र बलों इत्यादि के सम्बन्ध में मूलभूत अधिकारों को उपान्तरित करने की संसद की शक्ति।
- 34. किसी भी क्षेत्र में सैनिक कानून के लागू होने पर मूलभूत अधिकारों पर प्रतिबन्ध।
- 35. मूलभूत अधिकारों के कुछ प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए विधायन।
राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्त
- भाग-IV (अनुच्छेद 36 से 51) में ‘राज्य के नीति-निर्देशक तत्व’ (Directive Principles of State Policy – DPSP) का वर्णन है। इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है।
- इनका मुख्य उद्देश्य भारत में एक ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की स्थापना करना है।
- अनुच्छेद 36 (परिभाषा): यहाँ ‘राज्य’ की वही परिभाषा है जो अनुच्छेद 12 में दी गई है।
- अनुच्छेद 37 (लागू होना):
- ये तत्व अदालत द्वारा प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं हैं
- इनके उल्लंघन पर आप कोर्ट नहीं जा सकते।
- लेकिन ये देश के शासन में ‘मूलभूत’ हैं और कानून बनाते समय इनका ध्यान रखना राज्य का कर्तव्य है।
- अनुच्छेद 38 (लोक कल्याण): राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जहाँ सभी को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिल सके और असमानता कम हो।
- अनुच्छेद 39 (नीतिगत सिद्धांत):
- सभी को आजीविका के साधन मिलें
- संसाधनों का उचित वितरण हो
- ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ मिले।
- अनुच्छेद 39A (निःशुल्क कानूनी सहायता):
- गरीबों को मुफ्त कानूनी मदद देना ताकि न्याय से कोई वंचित न रहे।
- अनुच्छेद 40. ग्राम पंचायतों का गठन
- अनुच्छेद 41 (काम और शिक्षा): बुढ़ापे, बीमारी या बेरोजगारी की स्थिति में राज्य से सहायता, काम और शिक्षा पाने का अधिकार।
- अनुच्छेद 42 (मानवीय दशाएँ): काम करने की जगह पर माहौल अच्छा हो और महिलाओं को प्रसूति सहायता (Matrimony Relief) मिले।
- अनुच्छेद 43 (निर्वाह मजदूरी): मजदूरों को कम से कम इतनी मजदूरी मिले कि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
- अनुच्छेद 43A (श्रमिक भागीदारी): उद्योगों के मैनेजमेंट में मजदूरों को भी शामिल किया जाए।
- अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता – UCC)
- पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा नागरिक कानून (शादी, गोद लेना, विरासत आदि के लिए) लागू करने का प्रयास।
- अनुच्छेद 45 (बचपन की देखभाल): 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की शिक्षा और देखभाल का प्रावधान।
- अनुच्छेद 46 (SC/ST संरक्षण): अनुसूचित जाति, जनजाति और कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
- अनुच्छेद 47 (स्वास्थ्य और पोषण): लोगों के खान-पान (Nutrition) के स्तर को सुधारना और नशीली दवाओं/शराब पर प्रतिबंध लगाना।
- अनुच्छेद 48 (कृषि और पशुपालन): खेती और पशुपालन को आधुनिक बनाना और दुधारू पशुओं (जैसे गाय) की हत्या पर रोक लगाना।
- अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण): पर्यावरण की रक्षा, वनों और वन्यजीवों का संरक्षण करना।
- अनुच्छेद 49 (स्मारक संरक्षण): राष्ट्रीय महत्व के किलों, स्मारकों और वस्तुओं की सुरक्षा करना।
- अनुच्छेद 50 (पृथक्करण): न्यायपालिका (Judiciary) को कार्यपालिका (Executive) से अलग रखना ताकि न्याय निष्पक्ष हो।
- अनुच्छेद 51 (अंतर्राष्ट्रीय शांति): भारत दुनिया में शांति, सुरक्षा और देशों के बीच अच्छे संबंधों को बढ़ावा देगा।
मूलभूत कर्तव्य
- 51A. मूलभूत कर्तव्य।
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति
- 52. भारत का राष्ट्रपति।
- 53. संघ की कार्यपालिका शक्ति।
- 54. राष्ट्रपति का चुनाव।
- 55. राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका।
- 56. राष्ट्रपति की पदावधि।
- 57. पुनः निर्वाचन के लिए पात्रता।
- 58. राष्ट्रपति के रूप में चुनाव हेतु अर्हताएँ।
- 59. राष्ट्रपति पद के लिए शर्ते।
- 60. राष्ट्रपति द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान।
- 61. राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया।
- 62. राष्ट्रपति पद की रिक्तता को भरने के लिए निर्वाचन की समयावधि और आकस्मिक रिक्ति की दशा में पद को भरने वाले व्यक्ति का कार्यकाल।
- 63. भारत का उपराष्ट्रपति।
- 64. उपराष्ट्रपति का राज्यसभा का पदेन सभापति होना।
- 65. राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन।
- 66. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन।
- 67. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल।
- 68. उपराष्ट्रपति के रिक्त पद को भरने के लिए चुनाव की अवधि और आकस्मिक रिक्तता की स्थिति में निर्वाचित होने वाले व्यक्ति का कार्यकाल।
- 69. उपराष्ट्रपति द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान।
- 70. अन्य आकस्मिक परिस्थितियों में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन।
- 71. एक राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से जुड़े मामले।
- 72. क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति शक्ति।
- 73. संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार।
मंत्रि-परिषद्
- 74. राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्।
- 75. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध।
- 76. भारत का महान्यायवादी।
- 77. भारत सरकार के कार्य का संचालन।
- 78. राष्ट्रपति को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में प्रधान मंत्री के कर्तव्य।
अनुच्छेद
संसद
- 79. संसद का गठन।
- 80. राज्य सभा की संरचना।
- 81. लोक सभा की सरचना।
- 82. प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुन:समायोजन।
- 83. संसद के सदनों की अवधि।
- 84. संसद की सदस्यता के लिए अर्हता।
- 85. संसद के सत्र, सत्रवसान और विघटन।
- 86. संदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राष्ट्रपति का अधिकार।
- 87. राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण।
- 88. सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार।
- 89. राज्यसभा का सभापति और उपसभापति।
- 90. उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
- 91. सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापनि के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति ।
- 92. जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
- 93. लोक सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
- 94. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
- 95. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति।
- 96. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
- 97. सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के – वेतन और भत्ते।
- 98. संसद का सचिवालय।
- 99. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।
- 100. सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति।
- 101. स्थानों का रिक्त होना।
- 102. सदस्यता के लिए निरर्हताएँ।
- 103. सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों पर विनिश्चय।
- 104. अनुच्छेद 99 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति।
- 105. संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार आदि।
- 106. सदस्यों के वेतन और भत्ते।
- 107. विधेयकों के पुरःस्थापन और पारित किए जाने के सम्बन्ध में उपबंध।
- 108. कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
- 109. धन विधेयकों के सम्बन्ध में विशेष प्रक्रिया।
- 110. “धन विधेयक” की परिभाषा।
- 111. विधेयकों पर अनुमति।
- 112. वार्षिक वित्तीय विवरण।
- 113. संसद में प्राक्कलनों के सम्बन्ध में प्रक्रिया।
- 114. विनियोग विधेयक।
- 115. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान।
- 116. लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान।
- 117. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध।
- 118. प्रक्रिया के नियम
- 119. संसद में वित्तीय कार्य सम्बन्धी प्रक्रियाविधि द्वारा विनियमन।
- 120. संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा।
- 121. संसद में चर्चा पर निर्बधन।
- 122. न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना।
- 123. संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
- 124. उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन।
- 125. न्यायाधीशों के वेतन आदि।
- 126. कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति।
- 127. तदर्थ न्यायधीशों की नियुक्ति।
- 128. उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति।
- 129. उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।
- 130. उच्चतम न्यायालय का स्थान।
- 131. उच्चतम न्यायालय में आरम्भिक अधिकारिता।
- 131A. (निरसित)।
- 132. कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता।
- 133. उच्च न्यायालयों से सिविल विषयों से सम्बन्धित अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता।
- 134. दांडिक विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता।
- 134A. उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण-पत्र।
- 135. विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता
- और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होना।
- 136. अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत।
- 137. निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकन।
- 138. उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि।
- 139. कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना।
- 140. कुछ मामलों का. अंतरण।
- 141. उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियाँ।
- 142. उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश।
- 143. उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
- 144. सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य किया जाना।
- 144A. (निरसित)।
- 145. न्यायालय के नियम आदि।
- 146. उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय।
- 147. निर्वचन।
भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक
- 148. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक।
- 149. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य और शक्तियाँ।
- 150. संघ और राज्यों के लेखाओं का प्रारूप।
- 151. संपरीक्षा प्रतिवेदन।
राज्यपाल
- भाग-VI (अनुच्छेद 152 से 162) में राज्य कार्यपालिका, विशेषकर राज्यपाल (Governor) के पद और शक्तियों का विवरण दिया गया है।
- जिस प्रकार केंद्र में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख होते हैं, उसी प्रकार राज्य में राज्यपाल की भूमिका होती है।
- अनुच्छेद 152: राज्य की परिभाषा
- यहाँ ‘राज्य’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया गया है। भाग-VI के प्रयोजनों के लिए, इसमें वे राज्य शामिल हैं जो पहली अनुसूची में निर्दिष्ट हैं (जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के हटने के बाद अब यह सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है)।
- अनुच्छेद 153: राज्यों के राज्यपाल
- प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
- विशेष: 7वें संविधान संशोधन (1956) के अनुसार, एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 154: राज्य की कार्यपालिका शक्ति
- राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होंगी।
- वह इनका प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेगा।
- अनुच्छेद 155: राज्यपाल की नियुक्ति
- राज्यपाल का चुनाव नहीं होता;
- उनकी नियुक्ति सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- अनुच्छेद 156: राज्यपाल की पदावधि (कार्यकाल)
- राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करता है।
- सामान्यतः इनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, लेकिन इन्हें राष्ट्रपति कभी भी हटा सकते हैं।
- अनुच्छेद 157: राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएँ (Eligibility)
- केवल दो मुख्य शर्तें हैं:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
- अनुच्छेद 158: पद के लिए शर्तें
- वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए।
- वह किसी ‘लाभ के पद’ (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।
- उनके कार्यकाल के दौरान उनकी उपलब्धियों और भत्तों को कम नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 159: शपथ (Oath)
- राज्यपाल को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) के मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
- अनुच्छेद 160: आकस्मिकताओं में कृत्यों का निर्वहन
- ऐसी कोई परिस्थिति (जैसे राज्यपाल का अचानक निधन), जिसका संविधान में जिक्र न हो, उसमें राष्ट्रपति राज्यपाल के कार्यों के लिए विशेष प्रावधान कर सकते हैं।
- अनुच्छेद 161: क्षमादान की शक्ति
- लागू: राज्य के कानूनों के तहत अपराध
- वह सजा को निलंबन (Suspend), परिहार (Remit) या लघुकरण (Commute) कर सकता है।
- अंतर: राज्यपाल मृत्युदंड (Death Penalty) को पूरी तरह माफ नहीं कर सकता (यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है)।
- अनुच्छेद 162: राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
- राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक है जिन पर राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार है (राज्य सूची और समवर्ती सूची)।
- लेकिन → समवर्ती सूची में , केंद्र की शक्ति प्राथमिक (override)
- राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक है जिन पर राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार है (राज्य सूची और समवर्ती सूची)।
मंत्रि-परिषद्
- 163. राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्।
- 164. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध।
- 165. राज्य का महाधिवक्ता।
- 166. राज्य की सरकार के कार्य का संचालन।
- 167. राज्यपाल को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य।
राज्य का विधान-मंडल
- 168.राज्यों के विधान-मंडलों का गठन।
- 169.राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन।
- 170.विधान सभाओं की संरचना।
- 171. विधान परिषदों की संरचना।
- 172. राज्यों के विधान-मंडलों की अवधि।
- 173. राज्य के विधान-मंडल की सदस्यता की अर्हता।
- 174. राज्य के विधान-मंडल के सत्र, सत्रवसान और विघटन।
- 175. सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार।
- 176. राज्यपाल का विशेष अभिभाषण।
- 177. सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार।
- 178. विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
- 179. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
- 180. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति।
- 181. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।
- 182. विधान परिषद् का सभापति और उपसभापति।
- 183. सभापति और उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
- 184. सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति ।
- 185. जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।
- 186. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा सभापति और उपसभापित के वेतन और भत्ते।
- 187. राज्य के विधान-मंडल का सचिवालय।
- 188. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।
- 189. सदनों में मतदान, रिक्तियों के हेतु हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति ओर गणपूर्ति।
- 190. स्थानों का रिक्त होना।
- 191. सदस्यता की निरर्हताएँ।
- 192. सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों पर विनिश्चय।
- 193. अनुच्छेद 188 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति।
- 194. विधान-मंडलों के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार, आदि।
- 195. सदस्यों के वेतन और भत्ते।
- 196. विधेयकों के पुर:स्थापन और पारित किए जाने के सम्बन्ध में उपबंध।
- 197. धन विधेयकों से भिन्न विधेयकों के बारे में विधान परिषद् की शक्तियों का निर्बधन। 198. “धन विधेयक” की परिभाषा।।
- 199. धन विधेयकों के सम्बन्ध में विशेष प्रक्रिया।
- 200. विधेयकों पर अनुमति।
- 201. विचार के लिए आरक्षित विधेयक।
- 202. वार्षिक वित्तीय विवरण।
- 203. विधान-मंडल में प्राक्कलनों के सम्बन्ध में प्रक्रिया।
- 204. विनियोग विधेयक।
- 205. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान।
- 206. लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान।
- 207. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध।
- 208. प्रक्रिया के नियम।
- 209. राज्य के विधान-मंडल में वित्तीय सम्बन्धी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन।
- 210. विधान-मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा।
- 211. विधान-मंडल में चर्चा का निर्बधन।
- 212. न्यायालयों द्वारा विधान-मंडल की कार्यवाहियों की जाँच न किया जाना।
- 213. विधान-मंडल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापति करने की राज्यपाल की शक्ति।
अनुच्छेद
राज्यों के उच्च न्यायालय
- 214. राज्यों के लिए उच्च न्यायालय।
- 215. उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना।
- 216. उच्च न्यायालयों का गठन।
- 217. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्ते।
- 218. उच्चतम न्यायालय से सम्बन्धित कुछ उपबंधों का उच्च न्यायालयों को लागू होना।
- 219. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।
- 220. स्थायी न्यायाधीश रहने के लिए पश्चात् विधि-व्यवसाय पर निर्बधन।
- 221. न्यायाधीशों के वेतन आदि।
- 222. किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायलाय से दूसरे उच्च न्यायालय को अंतरण।।
- 223. कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति।
- 224A. उच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति।
- 225. विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता।
- 226A. (निरसित)।
- 227. सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति।
- 228. कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण। ।
- 228A. (निरसित)।
- 229. उच्च न्यायालयों के अधिकारी और सेवक तथा व्यय।
- 230. उच्च न्यायालयों की अधिकारिता का संघ राज्यक्षेत्रों पर विचार।
- 231. दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना।
- 232. (निरसित)।
अधीनस्थ न्यायालय
- 233. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति।
- 233A. कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों का और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों आदि का विधिमान्यकरण।
- 234. न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती।
- 235. अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण।
- 236. निर्वचन।
- 237. कुछ वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय के उपबंधों का लागू होना।
- 238. (निरसित)।
संघ राज्यक्षेत्र
- 239. संघ राज्यक्षेत्रों का प्रशासन।
- 239A. कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए स्थानीय विधानमंडलों या मंत्रिपरिषदों का या दोनों का सृजन।
- 239B. विधानमंडल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की प्रशासक की शक्ति।
- 240. कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की राष्ट्रपति की शक्ति।
- 241. संघ राज्यक्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय।
- 242. (निरसित)।
पंचायतें
- 243. परिभाषा।
- 243A. ग्राम सभा।
- 243B. पंचायतों का संविधान।
- 243C. पंचायतों का संघटन।
- 243D. स्थानों का आरक्षण।
- 243E. पंचायतों का कार्यकाल इत्यादि।
- 243F सदस्यता हेतु अपात्रताएँ।
- 243G पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व।
- 243H. पंचायतों की करारोपण की शक्तियाँ एवं निधियाँ।
- 243I. वित्तीय स्थिति की समीक्षा हेतु वित्त आयोग का गठन।
- 243J. पंचायतों के लेखे का परीक्षण।
- 243K. पंचायतों के लिए चुनाव।
- 243L. संघीय प्रदेशों में अनुप्रयोग।
- 243M. कुछ सुनिश्चित क्षेत्रों में लागू न होने वाला भाग।
- 243N. मौजूदा कानूनों एवं पंचायतों की निरन्तरता।
- 243O. चुनावी मामलों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप का निषेध।
नगर निकाय
- 243P. परिभाषा।
- 243Q. नगर निकायों का संविधान।
- 243R. नगर निकायों का संघटन।
- 243S. वार्ड समितियों इत्यादि का संविधान और संघटन।
- 243T. स्थानों का आरक्षण
- 243U. नगर निकायों का कार्यकाल इत्यादि।
- 243V. सदस्यता हेतु अपात्रताएँ।
- 243W. नगर निकायों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व।
- 243X. नगर निकायों के करारोपण की शक्तियाँ और निधियाँ।
- 243Y. वित्त आयोग।
- 243Z. नगर निकायों का लेखा परीक्षण।
- 243ZA. नगर निकायों हेतु चुनाव।
- 243ZB. संघीय प्रदेशों में अनुप्रयोग।
- 243ZC. कुछ सुनिश्चित क्षेत्रों में लागू न होने वाला भाग।
- 243ZD. जिला नियोजन हेतु समितियाँ।
- 243ZE. महानगर नियोजन हेतु समितियाँ।
- 243ZF. मौजूदा कानूनों एवं नगर निकायों की निरन्तरता।
- 243ZG चुनावी मामलों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप का निषेध।
अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र
- 244. अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन।
- 244A. असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला एक स्वशासी राज्य बनाना और उसके लिए स्थानीय विधानमंडल या मंत्रिपरिषद का या दोनों का सृजन।
संघ और राज्यों के बीच संबंध
- 245. संसद द्वारा और राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों का विस्तार।
- 246. संसद द्वारा और राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनाई गई विधियों की विषय-वस्तु।
- 247. कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना का उपबंध करने की संसद की शक्ति।
- 248. अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ।
- 249. राज्य सूची में के विषय के सम्बन्ध में राष्ट्रीय हित में विधि बनाने की संसद की शक्ति।
- 250. यदि आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्य सूची में/के विषय के संबंध में विधि बनाने की संसद की शक्ति।
- 251. संसद द्वारा अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 250 के अधीन बनायी गयी विधियों और राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनायी गई विधियों में असंगति।
- 252. दो या अधिक राज्यों के लिए उनकी सहमति में विधि बनाने की संसद की शक्ति और ऐसी विधि का किसी अन्य राज्य द्वारा अंगीकार किया जाना।
- 253. अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान।
- 254. संसद द्वारा बनयी गयी विधियों और राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनायी गई विधियों में असंगति।
- 255. सिफारिशों और पूर्व मंजूरी के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया के विषय मानना।
अनुच्छेद
प्रशासनिक सम्बन्ध
- भाग-XI ( अनुच्छेद 256 से 263 तक ) में केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंधों (Administrative Relations) का वर्णन किया गया है।
- 256. राज्यों की और संघ की बाध्यता।
- प्रत्येक राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करेगा कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित हो।
- केंद्र सरकार राज्यों को इस संबंध में आवश्यक निर्देश (Directions) दे सकती है।
- 257. राज्यों पर संघ का नियंत्रण
- कुछ विशेष स्थितियों में केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है, जैसे:
- राष्ट्रीय या सैन्य महत्व के संचार साधनों का रखरखाव।
- राज्य के भीतर रेलवे की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- कुछ विशेष स्थितियों में केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है, जैसे:
- 257A. (निरसित)।
- अनुच्छेद 258: राज्यों को शक्ति देने की संघ की शक्ति
- राष्ट्रपति, राज्य सरकार की सहमति से, केंद्र के किसी कार्य को उस राज्य सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकते हैं।
- अनुच्छेद 258A: संघ को कार्य सौंपने की राज्यों की शक्ति
- राज्य का राज्यपाल, केंद्र सरकार की सहमति से, राज्य के किसी कार्य को केंद्र सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकता है।
- 259. (निरसित)।
- अनुच्छेद 260: भारत के बाहर के क्षेत्रों के लिए संघ की शक्ति
- भारत सरकार किसी विदेशी क्षेत्र की सरकार के साथ समझौता करके उस क्षेत्र के प्रशासनिक, विधायी या न्यायिक कार्यों की जिम्मेदारी ले सकती है।
- अनुच्छेद 261: सार्वजनिक कार्य और न्यायिक कार्यवाहियाँ
- पूरे भारत में संघ और प्रत्येक राज्य के सार्वजनिक अधिनियमों, रिकॉर्ड्स और न्यायिक फैसलों को “पूर्ण विश्वास और साख” (Full Faith and Credit) दी जाएगी।
- यानी एक राज्य का अदालती फैसला दूसरे राज्य में भी मान्य होगा।
- अनुच्छेद 262: नदी जल विवाद
- संसद को अधिकार देता है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों के बीच नदियों या नदी-घाटियों के पानी के बंटवारे से संबंधित विवादों के समाधान के लिए कानून बनाए।
- इसके तहत संसद ने ‘नदी बोर्ड अधिनियम‘ और ‘अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम‘ बनाए हैं।
- अनुच्छेद 263: अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council)
- राज्यों के बीच समन्वय और सहयोग बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति एक अंतर-राज्य परिषद का गठन कर सकते हैं।
- यह परिषद राज्यों के बीच विवादों की जांच करती है और उन पर सलाह देती है।
वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद
- 264. निर्वचन।
- 265. विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना।
- 266. भारत और राज्यों की संचित निधियाँ और लोक लेखे।
- 267. आकस्मिकता निधि।
- 268. संघ द्वारा उद्गृहीत किए जाने वाले किन्तु राज्यों द्वारा संगृहीत और विनियोजित किए जाने वाले शुल्क।
- 269. संघ द्वारा उद्गृहीत और संगृहीत किंतु राज्यों को सौंपे जाने वाले कर।
- 270. संघ द्वारा उद्गृहीत और संगृहीत तथा संघ और राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर। 271. कुछ शुल्कों और करों पर संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार।
- 272. कर जो संघ द्वारा उद्गृहीत और संगृहीत किए जाते हैं तथा जो संघ और राज्यों के बीच वितरित किए जा सकेंगे।
- 273. जूट पर जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के स्थान पर अनुदान।
- 274. ऐसे कराधान पर जिसमें राज्य हितबद्ध है, प्रभाव डालने वाले विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश की अपेक्षा।
- 275. कुछ राज्यों को संघ से अनुदान।
- 276. वृत्तियों, व्यापारों, आजीविकाओं और नियोजनों पर कर।
- 277. व्यावृत्ति।
- 278. (निरसित)।
- 279. “शुद्ध आगम” आदि की गणना।
- 280. वित्त आयोग।
- 281. वित्त आयोग की सिफारिशें।
- 282. संघ या राज्य द्वारा अपने राजस्व से किए जाने वाले व्यय।
- 283. संचित निधियों, आकस्मिकता निधियों और लोक लेखाओं में जमा धनराशियों की अभिरक्षा आदि।
- 284. लोक सेवकों और न्यायालयों द्वारा प्राप्त वादकर्ताओं की जमाराशियों और अन्य धनराशियों की अभिरक्षा।
- 285. संघ की सम्पत्ति को राज्य के करों से छूट।
- 286. माल के क्रय या विक्रय पर कर के अधिरोपण के बारे में निर्बधन।
- 287. विद्युत पर करों से छूट।
- 288. जल या विद्युत के सम्बन्ध में राज्यों द्वारा कराधान से कुछ दशाओं में छूट।
- 289. राज्यों की संपत्ति और आय को संघ के कराधान से छूट।
- 290. कुछ व्ययों और पेंशनों के संबंध में समायोजन।
- 290A. कुछ देवस्वम् निधियों को वार्षिक संदाय।
- 291. (निरसित)।
- 292. भारत सरकार द्वारा उधार लेना।
- 293. राज्यों द्वारा उधार लेना।
संपत्ति,संविदाएँ,अधिकार,दायित्व,बाध्यताएंऔर वाद
- 294. कुछ दशाओं में संपत्ति, आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं का उत्तराधिकार। 295. अन्य दशाओं में संपत्ति, आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं का उत्तराधिकार।
- 296. राजगामी या व्यपगत या स्वामीविहीन होने से प्रोद्भूत संपत्ति।
- 297. राज्यक्षेत्रीय सागर-खंड या महाद्वीपीय मग्नतट भूमि में स्थित मुल्यवान चीजों और अनन्य आर्थिक क्षेत्र के संपत्ति स्रोतों का संघ में निहित होना।
- 298. व्यापार करने आदि की शक्ति।
- 299. संविदाएं।
- 300. वाद और कार्यवाहियां।
संपत्ति का अधिकार
- 300A. विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना।
भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम
- 301. व्यापार, वाणिज्य और समागम की सवतंत्रता।
- 302. व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बधन अधिरोपित करने की संसद की शक्ति।
- 303. व्यापार और वाणिज्य के संबंध में संघ और राज्यों की विधायी शक्तियों पर निर्बधन।
- 304. राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बधन।
- 305. विद्यमान विधियों और राज्य के एकाधिकार का उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति।
- 306. (निरसित)।
- 307. अनुच्छेद 301 से अनुच्छेद 304 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए प्राधिकारी की नियुक्ति।
संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं
- 308. निर्वचन।
- 309. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्ते।
- 310. संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि।
- 311. संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना।
- 312. अखिल भारतीय सेवाएं।
- 312A. कुछ सेवाओं के अधिकारियों की सेवा की शर्तों में परिवर्तन करने या उन्हें प्रतिसंहृत करने की संसद की शक्ति।
- 313. संक्रमणकालीन उपबंध।
- 314. (निरसित)।
लोक सेवा आयोग
- 315. संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग।
- 316. सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि।
- 317. लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना।
- 318. आयोग के सदस्यों और कर्मचारीवृंद की सेवा की शर्तों के बारे में विनियम बनाने की शक्ति। 319. आयोग के सदस्यों द्वारा ऐसे सदस्य न रहने पर पद धारण करने के संबंध में प्रतिषेध।
- 320. लोक सेवा आयोगों के कृत्य।
- 321. लोक सेवा आयोगों के कृत्यों का विस्तार करने की शक्ति।
- 322. लोक सेवा आयोगों के व्यय।
- 323. लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन।
अधिकरण
- 323A. प्रशासनिक अधिकरण।
- 323B. अन्य विषयों के लिए अधिकरण।
निर्वाचन : भाग – XV (अनुच्छेद 324 से 329)
- अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ
- भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक निर्वाचन आयोग (Election Commission) होगा।
- भारतीय निर्वाचन आयोग (स्थापना: 25 जनवरी 1950)
- कार्य:
- चुनाव की तैयारी
- मतदाता सूची का निरीक्ष
- चुनाव के संचालन का पूरा नियंत्रण और निर्देशन
- यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद (लोकसभा/राज्यसभा) और राज्य विधानमंडलों के चुनाव कराता है।
- भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक निर्वाचन आयोग (Election Commission) होगा।
- अनुच्छेद 325: धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध
- किसी भी व्यक्ति को केवल उसके धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर वोटर लिस्ट (निर्वाचक नामावली) से बाहर नहीं किया जा सकता।
- साथ ही, कोई व्यक्ति इन आधारों पर किसी ‘विशेष’ या अलग वोटर लिस्ट में शामिल होने का दावा भी नहीं कर सकता।
- अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।
- नियम: भारत का हर नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष (पहले 21 थी) या उससे अधिक है, उसे वोट देने का अधिकार है, बशर्ते वह मानसिक रूप से अस्वस्थ या अपराधी न घोषित किया गया हो।
- वोट देने की आयु: 18 वर्ष (61वें संशोधन द्वारा 1989 में लागू)
- अनुच्छेद 327: संसद की शक्ति
- संसद के पास यह अधिकार है कि वह चुनाव से संबंधित कानून बना सके।
- जैसे:
- मतदाता सूची तैयार करना
- निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation)
- चुनाव के सुचारू संचालन के लिए अन्य नियम
- संसद के पास यह अधिकार है कि वह चुनाव से संबंधित कानून बना सके।
- अनुच्छेद 328: राज्य विधानमंडल की शक्ति
- यदि किसी चुनाव संबंधी मामले पर संसद ने कोई कानून नहीं बनाया है, तो राज्य विधानमंडल अपने राज्य के चुनावों के लिए नियम/उपबंध बना सकता है।
- अनुच्छेद 329: न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक
- निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या सीटों के आवंटन से संबंधित कानूनों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- चुनाव के परिणामों को केवल एक ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है, सीधे तौर पर न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं करता।
- अनुच्छेद 329A: (निरसित/Repealed)
- इसे 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया था।
- यह प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों के संबंध में विशेष प्रावधान करता था।
कुछ वर्गों के संबध में विशेष उपबंध
- भाग-XVI (अनुच्छेद 330 से 342) में “कुछ वर्गों के संबंध में विशेष प्रावधान” (Special Provisions Relating to Certain Classes) दिए गए हैं।
- उद्देश्य – समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व और सुरक्षा प्रदान करना
- अनुच्छेद 330:
- लोकसभा में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण।
- यह जनसंख्या के अनुपात में तय किया जाता है।
- अनुच्छेद 331:
- लोकसभा में Anglo-Indian समुदाय का प्रतिनिधित्व।
- यदि राष्ट्रपति को लगे कि इस समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वे 2 सदस्यों को मनोनीत कर सकते थे।
- वर्तमान स्थिति: 104वें संविधान संशोधन (2019) द्वारा इसे अब समाप्त कर दिया गया है।
- अनुच्छेद 332:
- राज्यों की विधानसभाओं में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण।
- अनुच्छेद 333:
- राज्यों की विधानसभाओं में Anglo-Indian समुदाय का प्रतिनिधित्व (राज्यपाल द्वारा 1 सदस्य का मनोनयन)।
- वर्तमान स्थिति: इसे भी 104वें संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया है।
- अनुच्छेद 334:
- इसमें आरक्षण की समय सीमा दी गई है।
- मूल संविधान में यह 10 वर्ष के लिए था, जिसे समय-समय पर बढ़ाया गया।
- वर्तमान में SC/ST आरक्षण को 2030 तक बढ़ा दिया गया है।
- अनुच्छेद 335: सरकारी सेवाओं और पदों पर नियुक्ति के समय SC और ST के दावों का ध्यान रखा जाएगा
- अनुच्छेद 336: आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए कुछ विशेष सेवाओं (जैसे रेलवे, सीमा शुल्क) में शुरुआती कुछ वर्षों तक विशेष आरक्षण का प्रावधान था।
- अनुच्छेद 337: आंग्ल-भारतीय समुदाय के शिक्षण संस्थानों के लिए विशेष अनुदान (Grants) का प्रावधान (जो अब प्रभावी नहीं है)।
- अनुच्छेद 338: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for SC)।
- अनुच्छेद 338A: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for ST)।
- अनुच्छेद 338B: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for BC) – इसे 102वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 338A: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for ST)।
- अनुच्छेद 339: अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और ST के कल्याण के लिए केंद्र सरकार का राज्यों पर नियंत्रण।
- अनुच्छेद 340: पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC Commission) की नियुक्ति।
- राष्ट्रपति सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच के लिए एक आयोग बना सकते हैं (जैसे मंडल आयोग)।
- अनुच्छेद 341: राष्ट्रपति किसी जाति को ‘अनुसूचित जाति‘ (SC) घोषित कर सकते हैं (संबंधित राज्य के राज्यपाल की सलाह पर)।
- अनुच्छेद 342: राष्ट्रपति किसी समुदाय को ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) घोषित कर सकते हैं।
राजभाषा
- 343. संघ की राजभाषा।
- 344. राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति।
प्रादेशिक भाषाएं
- 345. राज्य की राजभाषा व राजभाषाएं।
- 346. एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा।
- 347. किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध।
- 348. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा।
- 349. भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया।
- 350. व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा।
- 350A. प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं।
- 350B. भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी।
- 351. हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश।
आपात संबंध
- 352. आपात की उद्घोषणा।
- 353. आपात की उद्घोषणा का प्रभाव।
- 354. जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है तब राजस्वों के वितरण संबंध उपबंधों का लागू होना।
- 355. ब्राह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्य की संरक्षा करने का संघ का कर्तव्य।
- 356. राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध।
- 357. अनुच्छेद 356 के अधीन की गई उद्घोषणा के अधीन विधायी शक्तियों का प्रयोग।
- 358. आपात के दौरान अनुच्छेद 19 के उपबंधों का निलंबन।
- 359. आपात के दौरान भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के लिए प्रवर्तन का निलंबन।
- 359A. (निरसित)।
- 360. वित्तीय आपात के बारे में उपबंध।
प्रकीर्ण
- 361. राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण।
- 361A. संसद और राज्यों के विधानमंडलों की कार्यवाहियों के प्रकाशन का संरक्षण।
- 362. (निरसित)।
- 363. कुछ संधियों, करारों आदि में उत्पन्न विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन।
- 363A. देशी राज्यों के शासकों को दी गयी मान्यता की समाप्ति और निजी थैलियों का अंत।
- 364. महापत्तनों और विमानक्षेत्रों के बारे में विशेष उपबंध।
- 365. संघ द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करने में या उनको प्रभावी करने में असफलता का प्रभाव।
- 366. परिभाषाएं।
- 367. निर्वचन।
संविधान का संशोधन
- अनुच्छेद 368 (भाग-XX) संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करता है।
- दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है।
- संशोधन विधेयक लोकसभा / राज्यसभा किसी में भी पेश हो सकता है
- राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं
- राष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से assent देना होता है (24वाँ संशोधन, 1971)
- राष्ट्रपति वापस नहीं भेज सकते
- Joint Sitting का प्रावधान नहीं
- अनुच्छेद 368 मुख्य रूप से दो प्रकार के संशोधनों का उल्लेख करता है:
- विशेष बहुमत (Special Majority): सदन की कुल सदस्यता का बहुमत।
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत।
- उदाहरण: मूल अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व आदि।
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत।
- विशेष बहुमत + आधे राज्यों की सहमति: जब संशोधन ‘संघीय ढांचे’ (Federal Structure) को प्रभावित करता है।
- संसद का विशेष बहुमत + कम से कम 50% राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से पारित होना अनिवार्य है।
- उदाहरण: राष्ट्रपति का चुनाव, केंद्र-राज्य संबंध, सातवीं अनुसूची, स्वयं अनुच्छेद 368।
- संसद का विशेष बहुमत + कम से कम 50% राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से पारित होना अनिवार्य है।
- विशेष बहुमत (Special Majority): सदन की कुल सदस्यता का बहुमत।
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केशवानंद भारती मामला (1973): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है, लेकिन वह संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।
अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध
- 369. राज्य सूची में कुछ विषयों के संबंध में विधि बनाने की संसद की इस प्रकार अस्थायी शक्ति मानो वे समवर्ती सूची के विषय हों।
- 370. जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध।
- 371. महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371A. नागालैंड राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371B. असम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371C. मणिपुर राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371D. आंध्र प्रदेश राज्य के संबंध में विशेष उपबंध। ।
- 371E. आंध्र प्रदेश में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना। ।
- 371F सिक्किम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371G मिजोरम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371H. अरुणाचल प्रदेश राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 371I. ‘गोवा राज्य के संबंध में विशेष उपबंध।
- 372. विद्यमान विधियों का प्रवृत्त बने रहना और उनका अनुकूलन।
- 372A. विधियों का अनुकलन करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
- 373. निवारक निरोध में रखे गए व्यक्तियों के संबंध में कुछ दशाओं में आदेश करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
- 374. फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों के और फेडरल न्यायालय में या सपरिषद् हिज मजेस्टी के समक्ष लंबित कार्यवाहियों के बारे में उपबंध।
- 375. संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्य करते रहना।
- 376. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के बारे में उपबंध।
- 377. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के बारे में उपबंध।
- 378. लोक सेवा आयोगों के बारे में उपबंध।
- 378A. आंध्र प्रदेश विधानसभा की अवधि के बारे में विशेष उपबंध।
- 379-391. (निरसित)।
- 392. कठिनाइयों को दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति।
संक्षिप्त नाम,प्रारंभ, हिन्दी में प्राधिकृत पाठ और निरसन
- 393. संक्षिप्त नाम।
- 394. प्रारंभ।
- 394A. हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ।
- 395. निरसन।
