भारत के व्यापार की संरचना एवं भुगतान संतुलन की समस्या
1. भारत के विदेशी व्यापार की संरचना (Structure of India’s Foreign Trade)
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना से तात्पर्य उसके आयात और निर्यात की प्रकृति, संरचना, दिशा और संघटन से है। स्वतंत्रता के बाद से इसकी प्रकृति और दिशा में उल्लेखनीय परिवर्तन आए हैं।
क) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- ब्रिटिश काल: भारत एक कच्चे माल (कपास, रेशम, चाय, जूट) का निर्यातक और तैयार माल (वस्त्र, मशीनें) का आयातक था। व्यापार मुख्य रूप से ब्रिटेन तक सीमित था।
- स्वतंत्रता के बाद: आयात-प्रतिस्थापन और औद्योगीकरण की नीतियों के तहत, पूंजीगत सामान, मशीनरी और तेल के आयात में वृद्धि हुई। निर्यात में पारंपरिक वस्तुओं का वर्चस्व रहा।
- 1991 के उदारीकरण के बाद: व्यापार में विविधता आई। निर्यात में इंजीनियरिंग सामान, दवाएं, रसायन और सेवाओं का हिस्सा बढ़ा। आयात में विविधता के साथ-साथ चीन और दक्षिण पूर्व एशिया पर निर्भरता बढ़ी।
ख) वर्तमान निर्यात संरचना (Composition of Exports):
- इंजीनियरिंग सामान: मोटर वाहन, मशीनरी, लोहा-इस्पात।
- पेट्रोलियम उत्पाद: रिफाइंड तेल (भारत एक प्रमुख रिफाइनिंग हब बना है)।
- रसायन एवं दवाएं (फार्मास्यूटिकल्स): भारत ‘दुनिया की फार्मेसी’ बनकर उभरा है।
- गहने एवं रत्न: हीरे की कटाई-पॉलिशिंग और सोने के गहनों का निर्यात।
- सेवा निर्यात: सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और IT-Enabled Services (ITES) भारत के निर्यात राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं।
- कृषि उत्पाद: चावल, मसाले, बासमती चावल, मांस।
ग) वर्तमान आयात संरचना (Composition of Imports):
- कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद: भारत की आयात बिल में सबसे बड़ा घटक, जो व्यापार घाटे का प्रमुख कारण है।
- इलेक्ट्रॉनिक सामान: इलेक्ट्रॉनिक चिप्स, कंप्यूटर, सेल फोन आदि, मुख्य रूप से चीन और अन्य देशों से।
- सोना: घरेलू मांग के कारण सोने का आयात एक बड़ा व्यय है।
- पूंजीगत सामान (Capital Goods): मशीनरी, इलेक्ट्रिक उपकरण।
- उर्वरक और रसायन: कृषि और उद्योग के लिए।
- कोयला: बिजली संयंत्रों और उद्योगों के लिए ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु।
घ) व्यापार संरचना की चुनौतियाँ:
- आयात पर अत्यधिक निर्भरता: ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूंजीगत सामान के आयात पर निर्भरता व्यापार घाटे को जन्म देती है।
- निर्यात में निम्न मूल्य वर्धन: अभी भी कई उत्पादों में मूल्य वर्धन कम है (जैसे कच्चे माल का निर्यात और फिर तैयार माल का आयात)।
- वैश्विक मांग पर निर्भरता: वैश्विक मंदी का सीधा प्रभाव निर्यात पर पड़ता है।
- अनुकूल व्यापार समझौतों का अभाव: FTA आदि का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सका है।
2. भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP)
भुगतान संतुलन एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष) में किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच होने वाले सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित विवरण है। इसे तीन मुख्य खातों में बांटा गया है:
क) चालू खाता (Current Account):
यह वस्तुओं ( merchandise) और सेवाओं (services) के आयात-निर्यात तथा एकतरफा हस्तांतरण (जैसे, प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया धन – Remittances) का लेखा-जोखा है।
- व्यापार संतुलन: केवल वस्तुओं के निर्यात और आयात का अंतर। यदि आयात > निर्यात, तो व्यापार घाटा।
- चालू खाता संतुलन: व्यापार संतुलन + सेवाओं का निवल निर्यात + निवल प्राथमिक आय (निवेश आय) + निवल द्वितीयक आय (रिमिटेंस)।
- भारत के संदर्भ में: सेवा निर्यात और रिमिटेंस के कारण चालू खाते का घाटा, व्यापार घाटे से कम होता है।
ख) पूंजी खाता (Capital Account):
यह वित्तीय परिसंपत्तियों में लेन-देन को दर्शाता है। इसमें विदेशी निवेश (FDI और FPI), ऋण, विदेशी मुद्रा भंडार में परिवर्तन आदि शामिल हैं।
- पूंजी खाता अधिशेष: देश में पूंजी का अंतर्वाह (Inflow) होना (जैसे, FDI/FPI का आना, विदेशी ऋण मिलना)।
- पूंजी खाता घाटा: देश से पूंजी का बहिर्वाह (Outflow) होना।
ग) आरक्षित परिसंपत्तियों में शुद्ध परिवर्तन (Changes in Foreign Exchange Reserves):
चालू खाता और पूंजी खाते के कुल योग के बराबर होता है, लेकिन विपरीत चिन्ह के साथ।
- यदि (चालू खाता + पूंजी खाता) का योग धनात्मक है, तो विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है।
- यदि (चालू खाता + पूंजी खाता) का योग ऋणात्मक है, तो विदेशी मुद्रा भंडार घटता है।
BoP सदैव संतुलित रहता है। घाटे या अधिशेष का अर्थ विदेशी मुद्रा भंडार में कमी या वृद्धि से होता है।
3. भुगतान संतुलन की समस्या (The BoP Problem)
भारत के संदर्भ में ‘भुगतान संतुलन की समस्या’ से तात्पर्य आवर्ती चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit – CAD) और इस घाटे को पूरा करने के लिए पूंजी के अंतर्वाह पर निर्भरता से उत्पन्न चुनौतियों से है।
क) समस्या के कारण:
- व्यापार घाटा: उच्च आयात बिल (विशेषकर तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स) और निर्यात की तुलना में तेजी से बढ़ता आयात।
- अदृश्य आय पर निर्भरता: CAD को कम करने के लिए भारत सेवा निर्यात और रिमिटेंस पर निर्भर है। यदि इनमें मंदी आती है, तो समस्या गंभीर हो सकती है।
- वैश्विक कारक: अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भारत के CAD को सीधे प्रभावित करती है।
- पूंजी अंतर्वाह की अस्थिरता: चालू खाते के घाटे को पाटने के लिए आवश्यक पूंजी (FDI, FPI) वैश्विक स्थितियों पर निर्भर है। FPI (‘गर्म पैसा’) अत्यंत अस्थिर होता है और वैश्विक जोखिम-भावना के अनुसार तेजी से बहिर्वाह हो सकता है।
- रुपये के मूल्य में अस्थिरता: CAD के कारण रुपये पर मूल्यह्रास का दबाव बना रहता है, जिससे आयात और महंगा हो जाता है और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
ख) ऐतिहासिक उदाहरण: 1991 का BoP संकट
यह भारत के सामने आई सबसे गंभीर भुगतान संतुलन की समस्या थी।
- कारण: खाड़ी युद्ध के कारण तेल कीमतों में वृद्धि, भारतीय प्रवासियों की वापसी, निर्यात में मंदी, और विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट (लगभग दिवालियापन की स्थिति)।
- परिणाम: भारत को IMF से emergency loan लेना पड़ा और इसके बदले में आर्थिक सुधारों (1991 की नई आर्थिक नीति) की शुरुआत करनी पड़ी।
ग) समस्या के समाधान के उपाय:
- निर्यात बढ़ाना: ‘Make in India’ और ‘Production Linked Incentive (PLI)’ जैसी योजनाओं के माध्यम से निर्यात क्षमता बढ़ाना।
- आयात घटाना: आयात प्रतिस्थापन, विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में (नवीनकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा) और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रोत्साहन।
- विदेशी निवेश को आकर्षित करना: FDI नियमों में उदारीकरण करके स्थिर और दीर्घकालिक पूंजी अंतर्वाह को बढ़ावा देना।
- रुपये की अंतर्राष्ट्रीयकरण: व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में निपटाने (Rupee Trade) को बढ़ावा देना तथा विदेशी मुद्रा भंडार पर निर्भरता कम करना।
- विदेशी मुद्रा भंडार का निर्माण: एक मजबूत फॉरेक्स रिज़र्व BoP संकट के झटकों को सहन करने की क्षमता प्रदान करता है।
निष्कर्ष
भारत के व्यापार की संरचना में हुए सकारात्मक बदलावों (सेवा निर्यात में मजबूती) के बावजूद, चालू खाते का घाटा एक संरचनात्मक चुनौती बना हुआ है। यह समस्या मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू विनिर्माण क्षमता से जुड़ी हुई है। एक स्थिर और टिकाऊ भुगतान संतुलन सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, जिसमें निर्यात-उन्मुख विनिर्माण को मजबूत करना, आयात निर्भरता कम करना और विदेशी निवेश के स्थिर स्रोतों को आकर्षित करना शामिल है।
