वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र के सुधार (Financial and Banking Sector Reforms)
1991 की आर्थिक संकट ने भारत में व्यापक आर्थिक सुधारों की नींव रखी। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण थे वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र के सुधार, जिनका उद्देश्य देश की वित्तीय प्रणाली को अधिक प्रतिस्पर्धी, कुशल और स्थिर बनाना था। ये सुधार मुख्यतः नरसिम्हम समिति की सिफारिशों (1991 एवं 1998) पर आधारित थे।
सुधारों के प्रमुख उद्देश्य:
- वित्तीय दमन (Financial Repression) को समाप्त करना।
- बैंकिंग प्रणाली की लाभकारिता और दक्षता में सुधार करना।
- वित्तीय बाजारों को उदार बनाना और उनकी गहराई बढ़ाना।
- वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देना।
- वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए नियामक ढांचे को मजबूत करना।
प्रमुख सुधारात्मक उपाय:
1. ब्याज दरों का उदारीकरण (Liberalization of Interest Rates):
- बचत जमा (Savings Deposit) और सावधि जमा (Term Deposit) पर से ब्याज दरों का नियंत्रण हटाया गया, जिससे बैंक बाजार की शक्तियों के आधार पर दरें तय कर सकें।
- बेंचमार्क प्लेटिंग रेट (BPLR) system को बदलकर बेस रेट (Base Rate) और बाद में मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) और अब ए externally बेंचमार्क्ड लेंडिंग रेट (EBLR) प्रणाली लागू की गई।
2. सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) और नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में कमी:
- SLR (जो 1991 में 38.5% था) और CRR (15% तक) को धीरे-धीरे कम किया गया ताकि बैंकों के पास उधार देने के लिए अधिक धनराशि उपलब्ध हो। वर्तमान में SLR 18% और CRR 4.5% है।
- इससे बैंकों की उधार देने की क्षमता (credit creation) में वृद्धि हुई।
3. प्राइवेट क्षेत्र के बैंकों को प्रवेश:
- बैंकिंग क्षेत्र में एकाधिकार समाप्त करने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिए गए (जैसे- आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक)।
- भुगतान बैंक (Payments Bank) और लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks) की स्थापना की अवधारणा शुरू की गई।
4. प्राथमिकता वाले क्षेत्रों हेतु ऋण (Priority Sector Lending – PSL):
- PSL के दायरे को संशोधित और विस्तारित किया गया ताकि कृषि, एमएसएमई, निर्यात, सामाजिक अवसंरचना और कमजोर वर्गों को पर्याप्त ऋण मिल सके।
5. गैर-निष्पादित आस्तियों (NPAs) का प्रबंधन:
- NPA की समस्या से निपटने के लिए दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 एक मील का पत्थर साबित हुई।
- संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (ARCs) और ऋण सुधार ट्रस्टों (DARTs) की स्थापना की गई।
- त्वरित ऋण सुधार के लिए संजीवनी (S4A) और स्ट्रेस्ड एसेट्स की बिक्री के लिए दिशानिर्देश (SASF) जैसी योजनाएं लाई गईं।
6. तकनीकी नवाचार और डिजिटलीकरण:
- कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (CBS) के माध्यम से बैंक शाखाओं का डिजिटलीकरण किया गया।
- ई-बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस), IMPS, AEPS आदि को बढ़ावा दिया गया।
- जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) ट्रिनिटी ने वित्तीय समावेशन को गति दी।
7. नियामक सुधार:
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की निगरानी भूमिका को मजबूत किया गया।
- बेसल-III मानदंडों को लागू करके बैंकों की पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy) में सुधार किया गया।
- वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (FSDC) की स्थापना विभिन्न नियामकों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए की गई।
सुधारों के प्रभाव/परिणाम:
- सकारात्मक: बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और दक्षता में वृद्धि, वित्तीय बाजारों का विस्तार, ऋण की better availability, और वित्तीय समावेशन में सुधार।
- चुनौतियाँ: NPA का उच्च स्तर (विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में), कुछ बैंकों की पूंजी की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण वितरण में असमानता, और साइबर सुरक्षा जोखिम।
आगे की राह:
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पूंजीकरण और समेकन (Consolidation) जारी रखना।
- फintech और डिजिटल बैंकिंग को नियंत्रित करने वाले नियमों को मजबूत करना।
- MSMEs और कृषि क्षेत्र के लिए ऋण की सुगमता सुनिश्चित करना।
- वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय स्थिरता बनाए रखना।
निष्कर्षतः, ये सुधार भारत की वित्तीय प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने की दिशा में एक सतत प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मजबूत, समावेशी और स्थिर आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना है।
आर्थिक सुधार और ग्रामीण बैंकिंग का ग्रामीण साख पर प्रभाव
परिचय
1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) ने भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। इन सुधारों का एक प्रमुख लक्ष्य वित्तीय क्षेत्र का सुदृढ़ीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक इसकी पहुंच को बढ़ाना था। ग्रामीण साख (Rural Credit) कृषि और गैर-कृषि गतिविधियों के लिए ऋण की उपलब्धता को दर्शाता है, जो ग्रामीण आजीविका और विकास का आधार है। आर्थिक सुधारों और ग्रामीण बैंकिंग के विस्तार ने इस ग्रामीण साख के परिदृश्य को जटिल और बहुआयामी तरीके से बदल दिया है।
आर्थिक सुधारों से पूर्व की स्थिति: सकारात्मक पहलू
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- सामाजिक बैंकिंग (1969-1991): 14 प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकों पर ग्रामीण और कमजोर वर्गों तक पहुंच बनाने का दबाव था।
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- प्राथमिकता वाले क्षेत्र की ऋण नीति (PSL): बैंकों के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वे अपने कुल ऋण का एक निश्चित हिस्सा (40%) कृषि और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को दें।
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- विस्तार: ग्रामीण शाखाओं का तेजी से विस्तार हुआ, जिससे औपचारिक वित्तीय संस्थानों तक पहुंच बढ़ी और साहूकारों पर निर्भरता कम हुई।
आर्थिक सुधारों के बाद के परिवर्तन
1991 के सुधारों ने बैंकिंग क्षेत्र पर लाभप्रदता और कुशलता पर जोर दिया, जिसके ग्रामीण साख पर मिश्रित प्रभाव पड़े।
1. सकारात्मक प्रभाव (Positive Impact)
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- वित्तीय समावेशन का उदय: सुधारों ने तकनीक और नवाचार को बढ़ावा दिया। इससे किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), मोबाइल बैंकिंग, और बैंकिंग कॉर्रेस्पोंडेंट (BC) मॉडल जैसी योजनाएं शुरू हुईं, जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच और सुविधा बढ़ाई।
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- सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFIs) और छोटे वित्त बैंकों (SFBs) का प्रसार: निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी, जिससे सूक्ष्म-ऋण और छोटे ऋणों की उपलब्धता में वृद्धि हुई। ये संस्थान ग्रामीण उद्यमियों, विशेषकर महिलाओं, को ऋण उपलब्ध कराने में सक्षम हुए।
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- प्रौद्योगिकीय एकीकरण: CBS (Core Banking Solution), AEPS (Aadhaar Enabled Payment System), और UPI ने ग्रामीण शाखाओं को देश की मुख्य वित्तीय प्रणाली से जोड़ा, लेन-देन को तेज और पारदर्शी बनाया।
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- विविधीकरण: ऋण अब केवल फसल ऋण तक सीमित नहीं रहा। पशुपालन, मत्स्य पालन, ग्रामीण स्टार्ट-अप, और गैर-कृषि गतिविधियों के लिए भी ऋण उपलब्ध होने लगे।
2. नकारात्मक प्रभाव एवं चुनौतियाँ (Negative Impact & Challenges)
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- व्यावसायिकरण का दबाव: लाभप्रदता पर बढ़े फोकस के कारण कई बैंकों ने ग्रामीण शाखाओं को ‘अलाभकारी’ मानना शुरू कर दिया, जिससे कुछ शाखाओं का समेकन (consolidation) हुआ और ग्रामीण ऋण देने में रुचि कम हुई।
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- ऋणों का दुरुपयोग और NPA समस्या: कभी-कभी बिना उचित जांच के बड़े ऋण दिए गए, जिसके चलते कृषि ऋणों में गैर-निष्पादित आस्तियाँ (NPAs) बढ़ीं। इसने बैंकों को जोखिम भरे ग्राहकों को ऋण देने से हतोत्साहित किया।
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- छोटे और सीमांत किसानों की उपेक्षा: बैंक बड़े और संपन्न किसानों को ऋण देने को प्राथमिकता देने लगे, जबकि छोटे किसानों को仍然 गैर-संस्थागत स्रोतों (साहूकारों) पर निर्भर रहना पड़ा, जहाँ ब्याज दरें बहुत ऊँची हैं।
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- डिजिटल विभाजन: डिजिटल बैंकिंग के युग में, डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट की कम पहुंच और भाषाई बाधाओं ने वृद्ध और कम पढ़े-लिखे लोगों को वित्तीय सेवाओं से दूर रखा।
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- जागरूकता की कमी: सरकारी योजनाओं और ऋण माफी की राजनीति ने कभी-कभी ऋण संस्कृति को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।
सरकारी पहलें और भविष्य की राह
इन चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार और RBI ने कई पहल की हैं:
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- प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): बैंक खातों तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना।
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- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को ऋण उपलब्ध कराना।
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- KCC का विस्तार: किसान क्रेडिट कार्ड योजना का पशुपालक और मछुआरों तक विस्तार।
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- इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम (ISS): किसानों को सस्ते दरों पर ऋण उपलब्ध कराना।
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- FPOs को बढ़ावा: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को ऋण देना आसान बनाना ताकि छोटे किसानों का समूह के रूप में ऋण ले सकें।
निष्कर्ष
आर्थिक सुधारों और ग्रामीण बैंकिंग के विस्तार ने ग्रामीण साख के परिदृश्य को एकरूपता से बहुलता की ओर बदल दिया है। एक ओर जहाँ इसने औपचारिक ऋण तक पहुँच, तकनीकी एकीकरण और वित्तीय उत्पादों के विविधीकरण को बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर व्यावसायिक दबाव और NPA की समस्या ने नई चुनौतियाँ पैदा की हैं। भविष्य की राह सतत् वित्तीय समावेशन पर निर्भर करती है, जहाँ लाभप्रदता और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि वास्तव में जरूरतमंद छोटे किसान और ग्रामीण उद्यमी सस्ती और पर्याप्त साख का लाभ उठा सकें।
वित्तीय संस्थाएं एवं वित्तीय समावेशन
यह लेख भारत की प्रमुख वित्तीय संस्थाओं, उनकी भूमिका और वित्तीय समावेशन में उनके योगदान पर एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करता है।
वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion)
अर्थ: वित्तीय समावेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वित्तीय उत्पादों और सेवाओं की पहुंच कम लागत और स्थायी तरीके से समाज के वंचित और निम्न आय वर्ग के लोगों तक सुनिश्चित की जाती है।
महत्व: यह आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, सामाजिक सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मुख्य घटक: बैंक खाता, ऋण सुविधा, बीमा, पेंशन और निवेश के अवसरों तक पहुंच।
स्वयं सहायता समूह (Self Help Group – SHG)
परिचय: स्वयं सहायता समूह (SHG) एक अनौपचारिक संगठन है जो सामान्य सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों (विशेषकर महिलाओं) का एक समूह होता है, जो अपनी बचत को एक सामान्य कोष में जमा करते हैं और अपनी जरूरतों के अनुसार समूह के सदस्यों को छोटे ऋण प्रदान करते हैं।
प्रभाव तथ भूमिका:
- सामूहिक जिम्मेदारी: इसमें सामूहिक गारंटी की अवधारणा काम करती है, जिससे बैंक गरीब और अनपढ़ लोगों को भी बिना किसी संपार्श्विक (Collateral) के ऋण देने को तैयार होते हैं।
- महिला सशक्तिकरण: SHG ने लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने और उन्हें सामाजिक-आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- गरीबी उन्मूलन: यह ग्रामीण गरीबों, विशेष रूप से भूमिहीनों, छोटे किसानों और ग्रामीण कारीगरों तक ऋण की पहुंच सुनिश्चित करता है।
- बचत की आदत: लोगों में नियमित बचत की आदत विकसित करता है।
- एजेंसी का सिद्धांत: SHG, बैंकों और उधारकर्ताओं के बीच एक ‘मध्यस्थ’ (Intermediary) के रूप में कार्य करता है, जिससे लेन-देन की लागत कम होती है।
सूक्ष्म वित्त (Microfinance)
अवधारणा: सूक्ष्म वित्त, वित्तीय सेवाओं (जैसे ऋण, बचत, बीमा, भुगतान सेवाएं) का प्रावधान है जो निम्न आय वर्ग के उद्यमियों और छोटे व्यवसाय owners को लक्षित करता है, जिनकी पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच नहीं है।
प्रभाव तथ भूमिका:
- ऋण की पहुंच: यह संपार्श्विक की कमी को दूर करता है और छोटे ऋण (Micro-Credit) प्रदान करके आय सृजन गतिविधियों को बढ़ावा देता है।
- आर्थिक गतिविधि: ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे पैमाने की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
- SHG से संबंध: सूक्ष्म वित्त संस्थाएं (MFIs) अक्सर SHG को ऋण प्रदान करके कार्य करती हैं, जिससे पूंजी का प्रवाह तेज होता है।
- आलोचना: कभी-कभी उच्च ब्याज दरों और कर्ज के जाल (Debt Trap) की आशंका के लिए भी आलोचना की जाती है।
नाबार्ड (NABARD)
परिचय: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (National Bank for Agriculture and Rural Development – NABARD) की स्थापना 1982 में ग्रामीण भारत के कृषि और आर्थिक विकास के लिए एक शीर्ष संस्था के रूप में की गई थी।
प्रभाव तथ भूमिका:
- विकास का संचालक: यह कृषि, लघु उद्योग, कुटीर और ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प आदि के लिए ऋण का प्रमुख पुनर्वित्त (Refinance) संस्थान है।
- एसएचजी-बैंक लिंकेज कार्यक्रम: NABARD ने 1992 में इस कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसने औपचारिक बैंकिंग प्रणाली को SHG से जोड़ा। यह भारत में वित्तीय समावेशन की एक मील का पत्थर था।
- ग्रामीण अवसंरचना विकास कोष (RIDF): राज्य सरकारों को अवसंरचना परियोजनाओं के लिए ऋण उपलब्ध कराता है।
- पर्यवेक्षण: ग्रामीण सहकारी बैंकों (RCB) और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) के लिए प्रमुख पर्यवेक्षी भूमिका निभाता है।
- किसान क्रेडिट कार्ड: इसकी शुरुआत को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Bank – RRB)
परिचय: RRB की स्थापना 1975 के आरआरबी अधिनियम के तहत विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इनकी स्थापना प्रायोजक बैंक (Sponsor Bank), केंद्र सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त स्वामित्व में होती है।
प्रभाव तथ भूमिका:
- स्थानीय महत्व: ये बैंक स्थानीय जरूरतों और भाषा को बेहतर ढंग से समझते हैं।
- शाखा विस्तार: दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में शाखाएं खोलकर बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाई है।
- प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण (PSL): कृषि, ग्रामीण ऋण और छोटे उद्यमों को ऋण देने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
- कम लागत: इनका परिचालन खर्च अन्य बैंकों की तुलना में कम होता है।
अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Scheduled Commercial Bank)
परिचय: ये वे बैंक हैं जो RBI अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल हैं और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों का पालन करते हैं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक आदि शामिल हैं।
प्रभाव तथ भूमिका:
- वित्तीय प्रणाली की रीढ़: देश की अर्थव्यवस्था में पूंजी के प्रवाह का मुख्य चैनल हैं।
- प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण (PSL): RBI के निर्देशानुसार, इन बैंकों को अपने कुल ऋण का एक निश्चित प्रतिशत (40%) कृषि, एमएसएमई आदि जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में देना अनिवार्य है। यह वित्तीय समावेशन का एक बड़ा स्तंभ है।
- राष्ट्रीय मिशनों के कार्यान्वयन: जन धन योजना, मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं को लागू करने में मुख्य भूमिका।
- व्यापक नेटवर्क: शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में इनका सबसे बड़ा शाखा नेटवर्क है।
ग्रामीण सहकारी बैंक (Rural Cooperative Bank)
परिचय: सहकारी बैंकिंग संरचना तीन स्तरीय है – राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Banks – SCB) जिला स्तर पर, केंद्रीय सहकारी बैंक (District Central Cooperative Banks – DCCB) और ग्राम स्तर पर प्राथमिक कृषि साख समितियाँ (Primary Agricultural Credit Societies – PACS)।
प्रभाव तथ भूमिका:
- स्थानीय संसाधनों का जुटाव: ये स्थानीय बचतों को एकत्रित करते हैं और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही ऋण के रूप में वितरित करते हैं।
- कृषि ऋण का प्रवाह: अल्पकालिक और मध्यम अवधि के कृषि ऋण के वितरण में यह संरचना अग्रणी भूमिका निभाती है।
- सदस्य-केंद्रित: इनका स्वामित्व उनके सदस्यों के पास होता है और लाभ कमाना इनका प्राथमिक उद्देश्य नहीं होता।
- चुनौतियाँ: इनका सामना प्रबंधन की कमजोरी, एनपीए की उच्च दर और तकनीकी पिछड़ेपन जैसी चुनौतियों से है।
निष्कर्ष तथ सामन्वय
वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को प्राप्त करने में इन सभी संस्थाओं की भूमिका पूरक (Complementary) है। जहां NABARD पुनर्वित्त और नीति निर्माण में अग्रणी है, वहीं RRB और सहकारी बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदगी का आधार हैं। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक पूंजी और व्यापक नेटवर्क प्रदान करते हैं, जबकि SHG और सूक्ष्म वित्त संस्थाएं अंतिम छोर (Last Mile) तक पहुंचने का कार्य करती हैं। यह एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र (Integrated Ecosystem) है जो सामूहिक रूप से देश के सामाजिक-आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है।
