Updated on 21/05/26 by Maananjay MahatoShare on WhatsApp

भारत में औद्योगिक नीति (Industrial Policy) का इतिहास देश के आर्थिक विकास की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता के बाद 1948, 1956, 1977 और 1980 में कई नीतियां आईं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे युगांतरकारी और मुख्य परिवर्तन 24 जुलाई 1991 को घोषित “नई औद्योगिक नीति” (New Industrial Policy, 1991) के माध्यम से आया। इसने भारत को ‘लाइसेंस राज’ के कड़े नियंत्रणों से मुक्त कर LPG (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) के रास्ते पर आगे बढ़ाया।

  • औद्योगिक नीति में किए गए मुख्य परिवर्तनों और उनके व्यापक प्रभावों का विवरण नीचे दिया गया है:
    • प्रथम चरण: समाजवादी झुकाव की नीतियाँ (1948-1990)- इस चरण की नीतियाँ मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल और ‘अनुज्ञप्ति-परमिट राज’ (Licence-Permit Raj) पर केंद्रित थीं।

    औद्योगिक नीति (Industrial Policy)  1948

    • 6 अप्रैल 1948 को तत्कालीन केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा देश की पहली ‘औद्योगिक नीति संकल्प, 1948‘ (Industrial Policy Resolution, 1948) की घोषणा की गई थी।
    • स्वतंत्रता के तुरंत बाद आई यह नीति ऐतिहासिक थी क्योंकि इसने भारत के आर्थिक ढांचे की नींव रखी और पहली बार आधिकारिक तौर पर “मिश्रित अर्थव्यवस्था” (Mixed Economy) के मॉडल को स्वीकार किया, जहां सार्वजनिक (सरकारी) और निजी क्षेत्र दोनों को साथ मिलकर काम करना था। नीति की मुख्य विशेषताओं और इसके महत्व को नीचे विस्तार से समझाया गया है:
    • 1. उद्योगों का चार श्रेणियों में वर्गीकरण (Classification of Industries)- इस नीति के तहत भारतीय उद्योगों को उनकी संवेदनशीलता और रणनीतिक महत्व के आधार पर चार मुख्य भागों में बांटा गया था:
    श्रेणी उद्योग का प्रकार नियंत्रण/स्वामित्व मुख्य उदाहरण
    प्रथम श्रेणी पूर्ण सरकारी एकाधिकार 100% केंद्र सरकार के अधीन। निजी क्षेत्र का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित। अस्त्र-शस्त्र (Arms & Ammunition), परमाणु ऊर्जा, और रेल परिवहन।
    द्वितीय श्रेणी नियंत्रित सरकारी क्षेत्र इस क्षेत्र में नए उद्योग लगाने का अधिकार केवल सरकार (राज्य/केंद्र) को था। मौजूदा निजी उद्योगों को 10 वर्ष तक चलने की अनुमति थी, जिसके बाद समीक्षा होनी थी। कोयला, लोहा और इस्पात, विमान निर्माण, जहाज निर्माण, टेलीफोन/तार, और खनिज तेल।
    तृतीय श्रेणी नियंत्रित निजी क्षेत्र ये उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुले थे, लेकिन राष्ट्रीय हित में इन पर सरकार का कड़ा नियमन और नियंत्रण (Regulation) लागू था। ऑटोमोबाइल, ट्रैक्टर, भारी रसायन, मशीन टूल्स, सूती वस्त्र, सीमेंट, चीनी, और कागज।
    चतुर्थ श्रेणी मुक्त निजी क्षेत्र इस श्रेणी के शेष सभी उद्योग निजी उद्यमों और सहकारी समितियों के लिए पूरी तरह खुले छोड़ दिए गए थे। उपभोक्ता वस्तुएं और अन्य स्थानीय छोटे उद्योग।
    • 2. नीति के मुख्य उद्देश्य एवं विशेषताएं
      • कुटीर एवं लघु उद्योगों (Cottage & Small Scale Industries) को बढ़ावा: नीति में स्थानीय रोजगार और संसाधनों के सही उपयोग के लिए छोटे उद्योगों को बहुत महत्वपूर्ण माना गया। सरकार ने इन्हें सुरक्षा और वित्तीय सहायता देने का संकल्प लिया।
      • श्रम-प्रबंधन संबंध (Labor-Management Relations): औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए श्रमिकों को उचित मजदूरी, बेहतर कार्यदशाएं और प्रबंधन में भागीदारी देने की बात कही गई ताकि हड़तालों के कारण उत्पादन प्रभावित न हो।
      • विदेशी पूंजी (Foreign Capital) पर दृष्टिकोण: नीति में यह स्पष्ट किया गया कि देश के विकास के लिए विदेशी निवेश और तकनीक का स्वागत है, लेकिन उसका अंतिम नियंत्रण और स्वामित्व भारतीय हाथों में ही रहना चाहिए।
    • 3. इस नीति का महत्व और प्रभाव (Significance & Critical Analysis)
      • मिश्रित अर्थव्यवस्था की शुरुआत: इस नीति ने पूंजीवाद (Capitalism) और समाजवाद (Socialism) के बीच का रास्ता चुना। इसने देश को निजी उद्यमियों की क्षमता का लाभ उठाने का मौका भी दिया और महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सरकार के पास सुरक्षित भी रखा।
      • भविष्य की नीतियों का आधार: इसी नीति के व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर आगे चलकर ‘उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951’ (IDRA, 1951) पारित हुआ, जिसने भारत में लाइसेंसिंग प्रणाली (License Raj) की कानूनी शुरुआत की।
      • सीमाएं: यद्यपि यह नीति एक बेहतरीन शुरुआत थी, लेकिन सरकार के पास उस समय संसाधनों और पूंजी की भारी कमी थी, जिसके कारण ‘द्वितीय श्रेणी’ के उद्योगों में सरकारी निवेश उम्मीद के मुताबिक तेजी से नहीं हो पाया। इसी कमी को दूर करने के लिए बाद में 1956 की नई औद्योगिक नीति लाई गई, जिसमें समाजवाद की तरफ झुकाव और अधिक बढ़ गया।
      • संक्षेप में:
        • 1948 की औद्योगिक नीति विभाजन की विभीषिका और संसाधनों की कमी से जूझ रहे नए भारत को आर्थिक स्थिरता देने का एक व्यावहारिक प्रयास था। इसने निजी क्षेत्र के मन में राष्ट्रीयकरण (Nationalization) के डर को कम किया और सरकारी निवेश के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया।
        • इस नीति और इसके बाद आए बदलावों (विशेषकर 1956 की नीति) के तुलनात्मक अध्ययन को और बेहतर तरीके से समझने के लिए आप भारत की औद्योगिक नीतियां: 1948 से वर्तमान तक का यह वीडियो देख सकते हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से काफी उपयोगी है।

    औद्योगिक नीति (Industrial Policy) 1956

    • 30 अप्रैल 1956 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की दूसरी ‘औद्योगिक नीति संकल्प, 1956’ (Industrial Policy Resolution, 1956) की घोषणा की गई थी।
    • 1948 की नीति के बाद यह दूसरी सबसे महत्वपूर्ण नीति थी।
    • इसे “भारत का आर्थिक संविधान” (Economic Constitution of India) भी कहा जाता है।
    • 1954 में संसद द्वारा “समाज के समाजवादी ढांचे” (Socialist Pattern of Society) को देश का मुख्य लक्ष्य स्वीकार किए जाने के बाद, उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण को और अधिक मजबूत करने के लिए यह नीति लाई गई थी।
    • यह नीति भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योजना (Second Five Year Plan) का मुख्य आधार बनी, जिसे ‘महलनोबिस मॉडल‘ भी कहा जाता है।
    • इस नीति की मुख्य विशेषताओं और इसके प्रभावों को नीचे विस्तार से समझाया गया है:
      • 1. उद्योगों का तीन अनुसूचियों में वर्गीकरण (Three-Fold Classification) – 1948 की चार श्रेणियों के स्थान पर, इस नीति में उद्योगों को तीन स्पष्ट अनुसूचियों (Schedules) में विभाजित किया गया:
    अनुसूची नियंत्रण/स्वामित्व उद्योगों की संख्या मुख्य उदाहरण
    अनुसूची ‘A’ (Schedule A) पूर्ण सरकारी एकाधिकार (निजी क्षेत्र का नया प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित) 17 उद्योग अस्त्र-शस्त्रादि, परमाणु ऊर्जा, लोहा और इस्पात, भारी मशीनरी, कोयला, खनिज तेल, विमानन, रेलवे और दूरसंचार।
    अनुसूची ‘B’ (Schedule B) मिश्रित क्षेत्र (सरकार नए उद्योग लगाएगी, लेकिन निजी क्षेत्र पूरक भूमिका निभा सकता है) 12 उद्योग एल्युमिनियम, अन्य खनन उद्योग, मशीन टूल्स, मिश्र धातु, रासायनिक उद्योग, एंटीबायोटिक्स और उर्वरक।
    अनुसूची ‘C’ (Schedule C) निजी क्षेत्र (शेष सभी उद्योग निजी उद्यमों के लिए खुले थे, लेकिन सरकारी नियमन के अधीन) अन्य सभी उद्योग उपभोक्ता वस्तुएं, कपड़ा, रेडीमेड उत्पाद आदि।
    • 2. नीति की मुख्य विशेषताएं एवं रणनीतियां
      • लाइसेंस राज (License Raj) की शुरुआत: यद्यपि अनुसूची ‘C’ के उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुले थे, लेकिन उन पर नियंत्रण रखने के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रणाली को बेहद कड़ा कर दिया गया। नई फैक्ट्री खोलने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने या नए उत्पाद बनाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य हो गया।
      • कुटीर एवं लघु उद्योगों (MSMEs) को संरक्षण: बड़े उद्योगों से बचाने के लिए लघु उद्योगों को करों में छूट (Tax Concessions) दी गई और कुछ विशेष उत्पादों के निर्माण को केवल छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित (Reserve) कर दिया गया।
      • क्षेत्रीय असमानता को कम करना: पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगिक विकास के लिए सरकार ने विशेष प्रावधान किए। यदि कोई उद्यमी पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाता था, तो उसे आसानी से लाइसेंस, सस्ती बिजली और टैक्स में भारी छूट दी जाती थी।
      • तकनीकी और प्रबंधकीय जनशक्ति: देश में भारी उद्योगों को चलाने के लिए कुशल इंजीनियरों और प्रबंधकों की आवश्यकता थी। इसके लिए देश में आईआईटी (IITs) और प्रबंधन संस्थानों (IIMs) की स्थापना की रूपरेखा को बल मिला।
    • 3. इस नीति का महत्व और प्रभाव (Significance & Critical Analysis)
    • सकारात्मक प्रभाव (Successes)
      • बुनियादी ढांचे का निर्माण: इसी नीति के तहत भारत में भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र (Steel Plants) और सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमों (जैसे BHEL, ONGC) की स्थापना हुई, जिन्होंने देश के औद्योगिक आधार को मजबूत किया।
      • आत्मनिर्भरता की ओर कदम: भारत भारी मशीनरी और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम हुई।
    • नकारात्मक प्रभाव या सीमाएं (Drawbacks)
      • लाइसेंस राज और लालफीताशाही (Bureaucracy): लाइसेंसिंग की कड़क शर्तों के कारण भ्रष्टाचार और लालफीताशाही बढ़ी। निजी उद्यमियों को एक छोटा सा उद्योग लगाने या विस्तार करने के लिए भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे, जिससे औद्योगिक विकास की गति धीमी (जिसे ‘हिंदू विकास दर’ भी कहा गया) हो गई।
      • निजी निवेश की अनदेखी: प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण भारतीय उद्योगों में आधुनिक तकनीक और वैश्विक गुणवत्ता का अभाव हो गया, जिसका खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ा।
    • निष्कर्ष: 1956 की औद्योगिक नीति ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने और एक मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। हालांकि, समय के साथ इसके अत्यधिक कड़े नियंत्रण (लाइसेंस राज) अर्थव्यवस्था के लिए बोझ बनने लगे, जिसे अंततः 1991 के आर्थिक सुधारों के दौरान बदला गया।

    औद्योगिक नीति (Industrial Policy) 1977

    • 23 दिसंबर 1977 को केंद्र की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस द्वारा संसद में नई ‘औद्योगिक नीति, 1977’ की घोषणा की गई थी।
    • 1956 की नीति के ठीक 21 साल बाद आई इस नीति का मुख्य उद्देश्य आर्थिक सत्ता के केंद्रीकरण (Centralization) को रोकना और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों, कुटीर एवं लघु उद्योगों (Small Scale Industries) को भारतीय अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाना था।
    • यह नीति पूरी तरह से गांधीवादी आर्थिक विचारधारा (Gandhian Economic Philosophy) और विकेंद्रीकरण पर आधारित थी।
    • इस नीति के मुख्य नीतिगत बदलावों और उनके प्रभावों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
    • 1. नीति की मुख्य विशेषताएं और परिवर्तन (Key Features)
      • 1977 की नीति ने विकास के ‘नेहरूवादी भारी उद्योग मॉडल’ से हटकर एक नया दृष्टिकोण अपनाया:
    • लघु उद्योगों का नया वर्गीकरण: छोटे उद्योगों को अधिक प्रभावी सहायता देने के लिए इन्हें तीन मुख्य उप-श्रेणियों में विभाजित किया गया:
      • कुटीर एवं घरेलू उद्योग (Cottage & Household Industries): जो मुख्य रूप से कारीगरों और परिवारों द्वारा चलाए जाते थे और जिनमें स्वरोजगार की अधिक संभावना थी।
      • सूक्ष्म या लघु क्षेत्र (Tiny Sector): ऐसे उद्योग जिनमें मशीनों और संयंत्रों (Plant & Machinery) में निवेश की वित्तीय सीमा ₹1 लाख से कम थी।
      • लघु उद्योग (Small Scale Industries): जिनमें निवेश की सीमा ₹10 लाख तक निर्धारित की गई।
    • आरक्षित उत्पादों की संख्या में भारी वृद्धि: बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए लघु उद्योगों के लिए आरक्षित (Reserved) उत्पादों की संख्या को 180 से बढ़ाकर सीधे 504 कर दिया गया। यानी इन 504 वस्तुओं का निर्माण केवल छोटे और कुटीर उद्योग ही कर सकते थे।
      • जिला उद्योग केंद्रों (District Industries Centers – DIC) की स्थापना: यह इस नीति का सबसे क्रांतिकारी कदम था। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे उद्यमियों को एक ही छत के नीचे सभी प्रकार की मंजूरी, ऋण, कच्चा माल और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए प्रत्येक जिले में DIC की स्थापना की रूपरेखा तैयार की गई।
      • बड़े कॉर्पोरेट घरानों पर कड़े प्रतिबंध: एकाधिकार (Monopoly) को रोकने के लिए बड़े औद्योगिक घरानों के विस्तार पर कड़े नियम लागू किए गए। उन्हें अपनी विस्तार योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता के लिए सरकारी बैंकों के बजाय अपने स्वयं के आंतरिक संसाधनों का उपयोग करने को कहा गया।
      • विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) पर कड़ा रुख: विदेशी निवेश के प्रति यह नीति बेहद सख्त थी। विदेशी कंपनियों के लिए ‘फेरा’ (FERA – Foreign Exchange Regulation Act) के नियमों को कड़ा किया गया। इसी नीति के कड़े प्रावधानों के कारण कोका-कोला (Coca-Cola) और आईबीएम (IBM) जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उस समय भारत छोड़कर जाना पड़ा था।
    • 2. नीति का महत्व और प्रभाव (Significance & Impact)
    • सकारात्मक प्रभाव (Advantages)
      • रोजगार और विकेंद्रीकरण: ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में छोटे-छोटे उद्योग स्थापित होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े और शहरों की ओर पलायन पर कुछ हद तक रोक लगी।
      • DIC नेटवर्क: जिला उद्योग केंद्रों की स्थापना ने भविष्य के लिए एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा तैयार किया, जो आज भी भारत में एमएसएमई (MSME) क्षेत्र की रीढ़ माना जाता है।
    • सीमाएं और विफलताएं (Drawbacks)
      • तकनीकी पिछड़ापन: बड़े उद्योगों और विदेशी तकनीक पर कड़े प्रतिबंधों के कारण भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में आधुनिक तकनीक का अभाव हो गया, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता वैश्विक स्तर की नहीं बन पाई।
      • पूंजी की कमी: केवल छोटे उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण देश में बुनियादी ढांचे (जैसे- भारी मशीनरी, बिजली, इस्पात) के विकास की गति धीमी हो गई।
      • राजनैतिक अस्थिरता: जनता पार्टी की सरकार के जल्द गिर जाने के कारण यह नीति लंबे समय तक पूरी तरह लागू नहीं रह सकी और 1980 में कांग्रेस की वापसी के साथ ही एक बार फिर औद्योगिक प्राथमिकताओं को बदला गया।
    • निष्कर्ष: 1977 की औद्योगिक नीति भारत के आर्थिक इतिहास में ‘पूंजी-प्रधान’ विकास से ‘श्रम-प्रधान’ विकास की ओर मुड़ने का एक साहसिक और नीतिगत प्रयास था। भले ही यह दीर्घकालिक रूप से पूरी तरह सफल नहीं रही, लेकिन इसने देश के कुटीर और लघु उद्योगों को एक नई पहचान और सुरक्षा प्रदान की।

    औद्योगिक नीति (Industrial Policy) 1980

    • 23 जुलाई 1980 को केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस (आई) सरकार द्वारा नई ‘औद्योगिक नीति, 1980’ की घोषणा की गई थी।
    • 1977 की जनता पार्टी सरकार द्वारा लाई गई नीति के ठीक तीन साल बाद आई इस नीति का मुख्य उद्देश्य आर्थिक प्राथमिकताओं को फिर से संतुलित करना था। 1977 की नीति ने जहां केवल लघु और कुटीर उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया था, वहीं 1980 की नीति ने लघु और बड़े उद्योगों को एक-दूसरे का पूरक (Complementary) मानते हुए एक संतुलित औद्योगिक ढांचे की वकालत की। इस नीति को 1991 के बड़े आर्थिक सुधारों (LPG) की “शुरुआती नींव या अग्रदूत” भी माना जाता है।
    • इस नीति के मुख्य नीतिगत बदलावों और उनके प्रभावों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
    • 1. नीति की मुख्य विशेषताएं और परिवर्तन (Key Features) – 1980 की नीति ने भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए:
    • लघु और बड़े उद्योगों का एकीकरण: नीति में यह स्पष्ट किया गया कि छोटे और बड़े उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। बड़े उद्योगों के साथ “एंसिलरी उद्योगों” (Ancillary Industries – सहायक या कलपुर्जे बनाने वाले छोटे उद्योग) को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई गई, ताकि बड़े उद्योगों के आसपास छोटे उद्योगों का एक जाल तैयार हो सके।
    • निवेश सीमाओं में वृद्धि (Upgradation of Investment Limits): मुद्रास्फीति (महंगाई) और आधुनिक तकनीकों की लागत को देखते हुए लघु और सहायक उद्योगों के लिए निवेश की वित्तीय सीमाओं को बढ़ा दिया गया:
      • लघु उद्योग (Small Scale Industries): निवेश सीमा ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख की गई।
      • सहायक उद्योग (Ancillary Units): निवेश सीमा ₹15 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख की गई।
      • सूक्ष्म क्षेत्र (Tiny Sector): निवेश सीमा ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख की गई।
    • क्षमता का नियमितीकरण (Regularization of Excess Capacity): पहले के कड़े नियमों के तहत यदि कोई कंपनी अपनी स्वीकृत क्षमता से अधिक उत्पादन करती थी, तो उसे दंडित किया जाता था। 1980 की नीति में घरेलू बाजार में कमी को दूर करने और निर्यात बढ़ाने के लिए कंपनियों द्वारा बनाई गई ‘अतिरिक्त उत्पादन क्षमता’ को कुछ शर्तों के साथ वैध (Regularize) कर दिया गया।
    • बीमार उद्योगों (Sick Industries) पर सख्त रुख: जो सरकारी या निजी कारखाने लगातार घाटे में चल रहे थे (जिन्हें बीमार उद्योग कहा जाता है), उनके प्रति सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। सरकार ने स्पष्ट किया कि वह केवल रोजगार बचाने के नाम पर हर अक्षम और घाटे में चल रही यूनिट का राष्ट्रीयकरण (टेकओवर) नहीं करेगी। इसके बजाय उनके प्रबंधन को सुधारने या उन्हें बंद करने की दिशा में विचार किया गया।
    • आधुनिकीकरण और तकनीकी अपग्रेडेशन: देश के पुराने पड़ चुके उद्योगों (जैसे कपड़ा और चीनी उद्योग) में आधुनिक मशीनों और कंप्यूटर आधारित प्रणालियों को शामिल करने के लिए रियायतें और वित्तीय प्रोत्साहन देने की शुरुआत की गई।
    • 2. नीति का महत्व और प्रभाव (Significance & Impact)
    • सकारात्मक प्रभाव (Advantages)
      • उत्पादन और उत्पादकता में सुधार: अतिरिक्त क्षमता को वैध करने और आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने से उद्योगों की कार्यकुशलता बढ़ी और देश में औद्योगिक उत्पादन की दर में सुधार हुआ।
      • आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत: इस नीति ने लाइसेंस राज की कड़ाई को धीरे-धीरे कम करना शुरू किया। 1980 के दशक के मध्य में (विशेषकर 1985 में राजीव गांधी सरकार के समय) जो सुधार हुए, उनकी वैचारिक शुरुआत इसी नीति से हुई थी।
    • सीमाएं (Drawbacks)
      • लाइसेंसिंग का मूल ढांचा बरकरार: यद्यपि नियमों में थोड़ी ढील दी गई, लेकिन अनिवार्य लाइसेंसिंग, कीमतों पर सरकारी नियंत्रण और विदेशी निवेश पर प्रतिबंधों का मूल ढांचा अभी भी काफी हद तक कड़ा बना रहा।
      • वित्तीय संकट की ओर कदम: उद्योगों को आधुनिक बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच देश पर विदेशी कर्ज बढ़ता गया, जिसने आगे चलकर 1991 के भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) की पृष्ठभूमि तैयार की।
    • निष्कर्ष: 1980 की औद्योगिक नीति 1970 के दशक की आर्थिक कड़वाहट और राजनैतिक अस्थिरता के बाद भारतीय उद्योगों को फिर से पटरी पर लाने का एक व्यावहारिक प्रयास थी। इसने समाजवादी नियंत्रणों को पूरी तरह छोड़े बिना, बाजार की वास्तविकताओं को स्वीकार करना शुरू किया।

     औद्योगिक नीति (Industrial Policy) 1991

    • 24 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा देश की सबसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी ‘नई औद्योगिक नीति, 1991’ (New Industrial Policy, 1991) की घोषणा की गई थी।
    • यह केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं था, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरी तरह से कायाकल्प था। इस नीति ने भारत को दशकों पुराने ‘लाइसेंस राज’ और बंद अर्थव्यवस्था (Closed Economy) के जाल से बाहर निकाला और LPG यानी उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization) के एक नए युग की शुरुआत की।
    • 1. 1991 की नीति लाने के मुख्य कारण (Background)- भारत को यह नीति एक बड़े आर्थिक संकट के समय लानी पड़ी थी:
      • भुगतान संतुलन का संकट (BoP Crisis): 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि उससे केवल दो सप्ताह का आयात ही किया जा सकता था।
      • खाड़ी युद्ध (Gulf War): तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं और विदेशों से भारतीयों द्वारा भेजा जाने वाला पैसा कम हो गया था।
      • सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) की विफलता: अधिकांश सरकारी कंपनियां भारी घाटे में चल रही थीं और उन पर लालफीताशाही (Bureaucracy) का कब्जा था।
      • अंतर्राष्ट्रीय दबाव: संकट से उबरने के लिए जब भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से ऋण मांगा, तो उन्होंने शर्त रखी कि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोलने होंगे।
    • 2. नीति में किए गए 5 बड़े और मुख्य परिवर्तन (Key Reforms)- 1991 की नीति ने स्वतंत्रता के बाद से चले आ रहे आर्थिक नियमों को पूरी तरह से पलट दिया:
    • क) औद्योगिक लाइसेंसिंग का उन्मूलन (Abolition of Industrial Licensing)
      • दशकों पुराने ‘लाइसेंस राज’ को लगभग समाप्त कर दिया गया। नई फैक्ट्री खोलने या क्षमता बढ़ाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की मजबूरी खत्म हो गई। केवल 6 संवेदनशील और रणनीतिक उद्योगों को छोड़कर (जैसे- रक्षा उपकरण, अल्कोहल, तंबाकू, खतरनाक रसायन, औद्योगिक विस्फोटक और इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस) बाकी सभी उद्योगों के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म कर दी गई। (नोट: वर्तमान में यह घटकर केवल 4-5 रह गए हैं)।
    • ख) सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में भारी कमी (Contraction of Public Sector)
      • 1956 की नीति में जो 17 उद्योग केवल सरकार के लिए आरक्षित (Reserve) थे, उनकी संख्या को 1991 में घटाकर केवल 8 कर दिया गया। निजी क्षेत्र को उन क्षेत्रों में भी निवेश की अनुमति मिल गई जो पहले केवल सरकार के पास थे। (वर्तमान में यह केवल परमाणु ऊर्जा और रेलवे परिचालन तक ही सीमित है)।
    • ग) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की खुली छूट
    • विदेशी कंपनियों और पूंजी का भारत में स्वागत किया गया। कई उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में विदेशी निवेशकों को 51% से लेकर 100% तक की हिस्सेदारी (Equity) की अनुमति बिना किसी विशेष सरकारी मंजूरी के (स्वचालित मार्ग – Automatic Route से) दे दी गई। विदेशी तकनीक के आयात को भी आसान बनाया गया।
    • घ) MRTP सीमा की समाप्ति (Abolition of MRTP Limit)
      • पहले एकाधिकार नियंत्रण अधिनियम (MRTP Act) के तहत जिन बड़ी कंपनियों की संपत्ति ₹100 करोड़ से अधिक थी, उन्हें नए निवेश या विस्तार के लिए सरकार से विशेष मंजूरी लेनी पड़ती थी। 1991 में इस वित्तीय सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया, जिससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर बड़ा बनने (Scale Up) की आजादी मिली।
    • ङ) विनिवेश की शुरुआत (Disinvestment)
      • सरकार ने घाटे में चल रही और गैर-रणनीतिक सरकारी कंपनियों (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी को निजी क्षेत्र और आम जनता को बेचना शुरू किया। इसका उद्देश्य इन कंपनियों में निजी प्रबंधन लाकर इनकी कार्यकुशलता को बढ़ाना था।
    • 3. इस नीति का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Impact Analysis)- 1991 के सुधारों के बाद भारत की विकास यात्रा दो भागों (1991 से पहले और 1991 के बाद) में बंट गई:
    • सकारात्मक प्रभाव (The Successes)
      • जीडीपी (GDP) विकास दर में उछाल: कड़े प्रतिबंध हटने से भारत की आर्थिक विकास दर 3-4% (जिसे हिंदू विकास दर कहा जाता था) से बढ़कर 6% से 8% के वार्षिक स्तर पर पहुंच गई।
      • विदेशी मुद्रा भंडार में रिकॉर्ड वृद्धि: भारत का विदेशी मुद्रा संकट हमेशा के लिए समाप्त हो गया। विदेशी निवेश (FDI) और संस्थागत निवेश (FII) का भारत में तांता लग गया।
      • उपभोक्ताओं के लिए क्रांति: बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से आम उपभोक्ताओं को कारों, मोबाइल फोन, टीवी और अन्य घरेलू सामानों के बेहतरीन विकल्प और सस्ती कीमतें मिलने लगीं।
      • आईटी और सेवा क्षेत्र का उदय: इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर काम करने की आजादी मिली, जिससे भारत दुनिया का IT और आउटसोर्सिंग हब बन गया।
    • नकारात्मक या चुनौतीपूर्ण प्रभाव (The Challenges)
      • रोजगारविहीन विकास (Jobless Growth): उद्योगों ने उत्पादन बढ़ाने के लिए श्रम (Labour) के बजाय आधुनिक मशीनों और ऑटोमेशन पर जोर दिया, जिससे उस अनुपात में रोजगार पैदा नहीं हुए।
      • लघु उद्योगों को नुकसान: बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के आने से देश के कई छोटे और पारंपरिक कुटीर उद्योग प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाए और बंद हो गए।
      • क्षेत्रीय असमानता: विदेशी और घरेलू निवेश केवल उन्हीं राज्यों में गया जहां बुनियादी ढांचा पहले से मजबूत था (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात), जिससे पिछड़े राज्य और पीछे छूट गए।
    • निष्कर्ष: 1991 की औद्योगिक नीति भारत के आर्थिक इतिहास का टर्निंग पॉइंट (Turning Point) है। इसी नीति के कारण आज भारत दुनिया की शीर्ष 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में खड़ा है। यद्यपि इसने अमीर और गरीब के बीच की खाई और क्षेत्रीय असमानता जैसी कुछ नई चुनौतियां भी पैदा कीं, लेकिन इसने भारत को एक आधुनिक और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।

    हाल के पहलू और भविष्य की दिशा

    • मेक इन इंडिया (2014): भारत को वैश्विक विनिर्माण हब बनाने की पहल।
    • स्टार्ट-अप इंडिया और स्टैंड-अप इंडिया: उद्यमशीलता और नवाचार को बढ़ावा।
    • उत्पादन संबंधित प्रोत्साहन (PLI) योजना: निर्माताओं को Incentive देकर घरेलू और निर्यात-उन्मुख उत्पादन को बढ़ावा देना।
    • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर।
    • एम्स फॉर माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs): छोटे और मध्यम उद्यमों को सशक्त बनाना।

    निष्कर्ष

    • 1991 के आर्थिक सुधार भारतीय औद्योगिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुए हैं। इन्होंने एक संरक्षित, अवरुद्ध अर्थव्यवस्था को एक गतिशील, प्रतिस्पर्धी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदल दिया। हालाँकि, इसने नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं, जैसे कि असमानता, पर्यावरणीय चिंताएँ और संतुलित क्षेत्रीय विकास की आवश्यकता। भविष्य का मार्ग एक समावेशी और टिकाऊ औद्योगिक विकास मॉडल अपनाने में निहित है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Self-Reliant India) की दृष्टि से प्रेरित हो और साथ ही वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकृत रहे।

    औद्योगिक नीतियों का देश के औद्योगिक विकास पर प्रभाव

    • भारत की विभिन्न औद्योगिक नीतियों (1948 से लेकर 1991 और उसके बाद के सुधारों तक) का देश के औद्योगिक विकास (Industrial Development) पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा है। इन नीतियों ने समय-समय पर भारतीय उद्योगों के स्वरूप, उनकी उत्पादन क्षमता और वैश्विक स्तर पर उनकी स्थिति को तय किया है।
    •  औद्योगिक नीतियों के कारण भारत के औद्योगिक विकास पर पड़े मुख्य प्रभावों को हम दो बड़े चरणों में समझ सकते हैं:
      • 1991 से पहले का चरण (नियंत्रित विकास)
      • 1991 के बाद का चरण (उदार एवं तीव्र विकास)।
    • 1. 1991 से पूर्व की नीतियों का प्रभाव (सकारात्मक एवं नकारात्मक)
    • 1948, 1956, 1977 और 1980 की औद्योगिक नीतियों का ध्यान मुख्य रूप से आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक क्षेत्र (Government Sector) पर था।
    • सकारात्मक प्रभाव: मजबूत बुनियादी ढांचे का निर्माण
      • भारी और बुनियादी उद्योगों की स्थापना: 1956 की नीति के कारण देश में लोहा और इस्पात (Steel), भारी मशीनरी, रसायन, विमानन और पेट्रोलियम जैसे बुनियादी उद्योगों की मजबूत नींव पड़ी। भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे बड़े इस्पात संयंत्र इसी दौर की देन हैं।
      • आत्मनिर्भरता और रक्षा उत्पादन: भारत बुनियादी वस्तुओं और रक्षा उपकरणों के निर्माण में काफी हद तक आत्मनिर्भर बना, जिससे दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता कम हुई।
      • `लघु एवं कुटीर उद्योगों का संरक्षण: 1977 की नीति के तहत सैकड़ों उत्पादों को छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित करने और जिला उद्योग केंद्रों (DIC) की स्थापना से ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिला।
    • नकारात्मक प्रभाव: विकास की धीमी गति (लाइसेंस राज के नुकसान)
      • प्रतिस्पर्धा और आधुनिक तकनीक का अभाव: अत्यधिक कड़े सरकारी नियंत्रणों (लाइसेंस राज) के कारण घरेलू बाजार में निजी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई। कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भी सालों तक अनुमति का इंतजार करना पड़ता था, जिससे उद्योगों में आधुनिक तकनीक और नवाचार (Innovation) रुक गया।
      • सार्वजनिक क्षेत्र का घाटा (Sick Industries): प्रतिस्पर्धा न होने और अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (PSUs) भारी घाटे में चले गए, जो देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए।
      • औद्योगिक विकास दर का धीमा होना: कड़े नियमों के कारण भारत की औद्योगिक विकास दर बेहद सुस्त रही, जिसे अर्थशास्त्रियों ने मज़ाक में ‘हिंदू विकास दर’ (करीब 3.5%) का नाम दिया था।
    • 2. 1991 की नई औद्योगिक नीति का प्रभाव (क्रांतिकारी बदलाव)
      • 1991 में जब उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) को अपनाया गया, तो इसने औद्योगिक विकास की पूरी दिशा ही बदल दी।
    • सकारात्मक प्रभाव: वैश्विक पहचान और तीव्र वृद्धि
      • औद्योगिक उत्पादन में रिकॉर्ड तेजी: लाइसेंसिंग प्रणाली खत्म होने और व्यावसायिक स्वतंत्रता मिलने से विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा क्षेत्र में निजी निवेश की बाढ़ आ गई, जिससे औद्योगिक विकास दर में भारी उछाल आया।
      • विदेशी निवेश (FDI) और अत्याधुनिक तकनीक का आगमन: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रास्ते खुलने से वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियां (जैसे हुंडई, सैमसंग, सुजुकी आदि) भारत आईं। इससे न केवल देश में पूंजी आई, बल्कि वैश्विक स्तर की तकनीक और प्रबंधन के तरीके भी भारत पहुंचे।
      • वैश्विक स्तर पर भारतीय कंपनियों का उदय: MRTP एक्ट की सीमाएं हटने से भारतीय कॉर्पोरेट घरानों (जैसे टाटा, रिलायंस, आदित्य बिड़ला, महिंद्रा) को बड़ा होने का मौका मिला और उन्होंने विदेशों में भी कंपनियों का अधिग्रहण शुरू किया।
      • सेवा उन्मुख उद्योगों (IT & Telecom) का विस्फोट: नई नीति ने सूचना प्रौद्योगिकी (IT), सॉफ्टवेयर विकास और दूरसंचार (Telecom) जैसे नए जमाने के उद्योगों के लिए रास्ते खोले, जिससे भारत दुनिया का ‘बैक ऑफिस’ और प्रमुख आईटी हब बनकर उभरा।
    • नकारात्मक प्रभाव एवं नई चुनौतियां
      • रोजगारविहीन विकास (Jobless Growth): आधुनिक उद्योगों ने उत्पादन बढ़ाने के लिए श्रम (Labour) के बजाय ऑटोमेशन और आधुनिक मशीनों पर अधिक ध्यान दिया। इसके कारण औद्योगिक उत्पादन (Production) तो बढ़ा, लेकिन उस अनुपात में नए रोजगार (Jobs) पैदा नहीं हुए।
      • पारंपरिक और छोटे उद्योगों पर संकट: विदेशी और बड़े कॉर्पोरेट उत्पादों के बाजार में आने से देश के कई पारंपरिक लघु, कुटीर और हथकरघा उद्योग प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाए और बंद होने की कगार पर पहुंच गए।
      • क्षेत्रीय असंतुलन (Regional Imbalance): निजी और विदेशी निवेशकों ने केवल उन्हीं राज्यों या शहरों में कारखाने लगाए जहां बिजली, सड़क और बंदरगाह जैसे बुनियादी ढांचे पहले से मजबूत थे (जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक)। इसके विपरीत बिहार, ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य औद्योगिक विकास की इस दौड़ में काफी पीछे छूट गए।
    • 3. वर्तमान परिदृश्य और भविष्य की दिशा (2020 के बाद का दशक)
      • 1991 के बाद भी औद्योगिक नीतियों में लगातार सुधार किए जा रहे हैं। आज के समय में भारत सरकार का ध्यान “मेक इन इंडिया” (Make in India), “आत्मनिर्भर भारत” और PLI (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) योजनाओं पर है।
      • वर्तमान नीति का फोकस: अब सरकार केवल उदारीकरण पर नहीं, बल्कि भारत को दुनिया का एक बड़ा ‘ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब’ (Global Manufacturing Hub) बनाने पर ध्यान दे रही है। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक्स (जैसे मोबाइल निर्माण), सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) जैसे भविष्य के उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है, ताकि 1991 के ‘रोजगारविहीन विकास’ की कमी को दूर करके बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किए जा सकें।
    • निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो शुरुआती औद्योगिक नीतियों ने भारत को एक मजबूत औद्योगिक आधार (Industrial Base) दिया, तो 1991 और उसके बाद की नीतियों ने उद्योगों को पंख दिए जिससे वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती औद्योगिक ताकतों में से एक है, हालांकि क्षेत्रीय असमानता को दूर करना और विनिर्माण में अधिक से अधिक रोजगार सृजित करना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।

    JPSC MAINS PAPER 5/Chapter – 28