भारत का बनावट एवं उच्चावच: हिमालय और प्रायद्वीपीय अपवाह प्रणाली

यूपीएससी सिविल सेवा (मुख्य) परीक्षा हेतु विवरणात्मक टिप्पणी

भारत की भौतिक संरचना को मुख्यतः तीन विभागों में बाँटा जा सकता है: 1) हिमालय पर्वतमाला, 2) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान, और 3) प्रायद्वीपीय पठार। इसकी अपवाह प्रणाली इन्हीं भौतिक लक्षणों से गहराई से प्रभावित है।

1. भारत की भूवैज्ञानिक बनावट (Geological Structure)

    • प्रायद्वीपीय भारत: यह भू-भाग प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा है। इसे ‘भारतीय प्रायद्वीपीय शील्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक स्थिर भूखंड (Stable Craton) है जो अत्यंत प्राचीन आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों (Igneous and Metamorphic rocks) से बना है।

    • हिमालय पर्वतमाला: हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत (Young Fold Mountains) है, जिसका निर्माण टेथिस सागर के अवसादों के संचयन एवं भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने के परिणामस्वरूप हुआ। इसकी उत्पत्ति अल्पाइन पर्वत निर्माण काल (Alpine Orogeny) में हुई मानी जाती है।

    • उत्तरी मैदान: यह एक अधिविपरीत मैदान (Aggradational Plain) है, जिसका निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के जमाव से हुआ है। यह गहरे जलोढ़ निक्षेपों से ढका एक विशाल अगाध क्षेत्र (Deep Basin) है।

2. भारत के उच्चावच (Relief) के प्रमुख विभाग

क) हिमालय पर्वतमाला

    • विशेषताएँ: यह चाप की आकृति (Arc-shaped) में पश्चिम-पूर्व दिशा में फैला हुआ है। यह भारत की उत्तरी सीमा पर एक प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) का कार्य करता है।

    • उच्चावचीय विभाजन:
        • वृहत् हिमालय (Great Himalayas/Himadri): सबसे उत्तरी एवं सबसे ऊँची शृंखला। इसमें विश्व के सर्वोच्च शिखर स्थित हैं।
        • मध्य हिमालय या लघु हिमालय (Himachal): हिमाद्री के दक्षिण में स्थित। इसी क्षेत्र में प्रमुख पर्वतीय स्थल (जैसे- शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग) स्थित हैं।
        • शिवालिक शृंखला (Outer Himalayas/Siwaliks): हिमालय की सबसे बाहरी एवं नवीनतम शृंखला। इनकी ऊँचाई सबसे कम है। इनके及 दक्षिण में ‘तराई’ का क्षेत्र है।

ख) प्रायद्वीपीय पठार

    • विशेषताएँ: प्राचीन, स्थिर एवं खंडित भू-भाग। त्रिभुजाकार आकृति जिसका आधार उत्तर में और शीर्ष दक्षिण की ओर है।

    • उच्चावचीय विभाजन:
        • मध्य उच्च भूमि (Central Highlands): विंध्य, सतपुड़ा, मालवा का पठार आदि। यमुना नदी के पश्चिम का भाग।
        • दक्कन का पठार (Deccan Plateau): नर्मदा नदी के दक्षिण का विशाल पठार। यह लावा निर्मित (Basaltic) चट्टानों से बना है। इसके पूर्वी及 पश्चिमी किनारे पर क्रमशः पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट स्थित हैं।
        • तटीय मैदान (Coastal Plains): पूर्वी घाट及 पश्चिमी घाट के及 बीच में विस्तृत संकुचित मैदान। पश्चिमी तटीय मैदान संकरा है, जबकि पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षाकृत चौड़ा है।

3. हिमालय की अपवाह प्रणाली

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ अनवरत (Perennial) हैं, क्योंकि इन्हें जल की आपूर्ति हिमखंडों के पिघलने及 वर्षा दोनों से होती है।

    • सिंधु नदी तंत्र: सिंधु及 उसकी सहायक नदियाँ (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलज)। यह एक अंतर्वाही (Inland) अपवाह तंत्र है जो अरब सागर में गिरता है।

    • गंगा नदी तंत्र: गंगा及 उसकी सहायक नदियाँ (यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, आदि)। यह विश्व के सबसे उपजाऊ मैदान का निर्माण करता है及 बंगाल की खाड़ी में गिरता है।

    • ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र: ब्रह्मपुत्र (तिब्बत में सांग्पो) हिमालय के उत्तर及 दक्षिण दोनों ओर से निकलने वाली नदियों से जल प्राप्त करता है। यह गंगा के साथ मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बनाता है。

4. प्रायद्वीपीय अपवाह प्रणाली

प्रायद्वीपीय नदियाँ अनवरत (Seasonal) नहीं हैं, क्योंकि इनका प्रवाह मुख्यतः वर्षा पर निर्भर करता है। ये नदियाँ अधिक प्राचीन हैं, अपनी घाटियों में अधिक कटाव कर चुकी हैं及 परिपक्व अवस्था में हैं।

    • बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ: (पूर्व की ओर प्रवाहित)
        • महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी: ये नदियाँ डेल्टा का निर्माण करती हैं।
        • दक्षिण की ओर प्रवाहित: वे नदियाँ जो सीधे पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं (जैसे- दामोदर, ब्राह्मणी, आदि)।

    • अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ: (पश्चिम की ओर प्रवाहित)
        • नर्मदा, ताप्ती: ये रिफ्ट घाटियों (दोष घाटियों) में बहती हैं及 ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं। ये पूर्वी घाट及 पश्चिमी घाट के बीच की संरचनात्मक द्रोणी में प्रवाहित होती हैं।
        • साबरमती, माही, आदि: ये छोटी及 तीव्रगामी नदियाँ हैं जो गुजरात के मैदान में बहती हैं。

    • अंतर्वाही अपवाह: राजस्थान की कुछ नदियाँ (जैसे- घग्गर, लूनी) जो समुद्र तक नहीं पहुँच पाती及 रेगिस्तान में लुप्त हो जाती हैं।

5. हिमालय及 प्रायद्वीपीय नदियों में अंतर

आधार हिमालयी नदियाँ प्रायद्वीपीय नदियाँ
उद्गम हिमालय पर्वत (हिमनद) प्रायद्वीपीय पठार
प्रवाह अनवरत (वर्षभर) अनवरत (वर्षा-निर्भर)
आयु युवा प्रौढ़/वृद्ध
ढाल तीव्र, तेज़ बहाव मंद, धीमा बहाव
विसर्प अधिक मात्रा में नगण्य
निक्षेपण विशाल डेल्टा निर्माण छोटे डेल्टा/ज्वारनदमुख
घाटी गहरी, V-आकार उथली, चौड़ी

निष्कर्ष: भारत का भौतिक स्वरूप及其 अपवाह तंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। हिमालय ने उत्तरी मैदान के निर्माण के लिए अवसाद प्रदान किए, जबकि प्रायद्वीपीय पठार नदियों के लिए एक स्थिर आधार प्रदान करता है। इन दोनों की अंतःक्रिया से ही भारत की विविध及 उपजाऊ भू-आकृतियों का सृजन हुआ है, जो देश की अर्थव्यवस्था及 सभ्यता का आधार है।

JPSC MAINS PAPER 3/Geography Chapter – 11