जनसंख्या: पर्यावरण और विकास – एक समग्र विश्लेषण

जनसंख्या, पर्यावरण और विकास के बीच का अंतर्संबंध आधुनिक विश्व की सबसे जटिल और महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है। यह त्रिकोण वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर नीति निर्माण का एक प्रमुख आधार है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहाँ आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है, इस विषय का अध्ययन विशेष रूप से प्रासंगिक है।

जनसंख्या व विकास और पर्यावरण पर इसका प्रभाव

जनसंख्या में वृद्धि का सीधा और गहरा प्रभाव पर्यावरण और विकास के संसाधनों पर पड़ता है। इस संबंध को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

1. संसाधनों पर दबाव

  • प्राकृतिक संसाधन: बढ़ती जनसंख्या के कारण जल, वन, भूमि और खनिज जैसे संसाधनों की अत्यधिक माँग होती है, जिससे उनका दोहन और क्षरण तेजी से होता है।
  • खाद्य सुरक्षा: अधिक लोगों के भरण-पोषण के लिए कृषि योग्य भूमि का विस्तार, रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक use और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ती है, जिससे भूमि की उर्वरता कम होती है और जल संसाधन दबाव में आते हैं।
  • ऊर्जा की माँग: औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और जीवन स्तर में सुधार के साथ ऊर्जा की खपत बढ़ती है, जिससे जीवाश्म ईंधन का दहन बढ़ता है और वायु प्रदूषण तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

2. पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि

  • वायु प्रदूषण: वाहनों, उद्योगों और घरेलू ऊर्जा उपयोग से निकलने वाले उत्सर्जन में वृद्धि।
  • जल प्रदूषण: घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह (रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक) के कारण जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे की मात्रा में भारी वृद्धि, जिसके निस्तारण की चुनौती उत्पन्न होती है।

3. पारिस्थितिक अवक्रमण

  • वनों की कटाई: कृषि भूमि, आवास और अवसंरचना के विस्तार के लिए वनों का सफाया, जिससे जैव विविधता का नुकसान और भू-अपरदन बढ़ता है।
  • भूमि क्षरण: अतिक्रमण, अति-चराई और गलत कृषि पद्धतियों के कारण भूमि की गुणवत्ता में गिरावट।
  • जलवायु परिवर्तन: बढ़ती जनसंख्या द्वारा संसाधनों के उपभोग से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसें वैश्विक तापन को बढ़ावा दे रही हैं।

जनसंख्या व विकास का अंतर्संबंध

जनसंख्या और विकास के बीच का रिश्ता द्वि-आयामी है:

1. जनसंख्या वृद्धि: विकास में बाधक

  • पूँजी का विभाजन: उच्च जनसंख्या वृद्धि दर के कारण सीमित संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा केवल जनसंख्या के भरण-पोषण (जैसे- खाद्य, स्वास्थ्य, बुनियादी शिक्षा) पर खर्च हो जाता है, न कि उत्पादक निवेश (जैसे- अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, उच्च शिक्षा) पर।
  • बेरोजगारी और गरीबी: श्रम बल में तीव्र वृद्धि के कारण रोजगार के अवसर सृजित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है, जिससे गरीबी का चक्र बना रहता है।
  • सामाजिक अवसंरचना पर भार: स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा प्रणाली, आवास और यातायात जैसी सुविधाएँ अतिभारित हो जाती हैं।

2. जनसंख्या लाभांश: विकास में सहायक

भारत जैसे देशों में ‘युवा जनसंख्या’ एक अवसर के रूप में देखी जाती है। जनसंख्या लाभांश तब प्राप्त होता है जब:

  • कामकाजी आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या का अनुपात अधिक हो।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास में निवेश करके इस युवा शक्ति को उत्पादक श्रमशक्ति में परिवर्तित किया जाए।
  • रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित किए जाएँ।

एक स्वस्थ, शिक्षित और कुशल जनसंख्या ही नवाचार, उत्पादकता और आर्थिक विकास की इंजन होती है।

टिकाऊ विकास की ओर मार्ग

जनसंख्या, पर्यावरण और विकास के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक सतत् और समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • जनसंख्या स्थिरीकरण: स्वैच्छिक और सूचना-आधारित परिवार नियोजन कार्यक्रमों, महिला शिक्षा और सशक्तिकरण पर जोर देना।
  • टिकाऊ कृषि: जैविक खेती, जल संरक्षण तकनीकों और कम पानी में फसल उगाने वाली किस्मों को बढ़ावा देना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा: सौर, पवन और जल ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में निवेश को बढ़ावा देना।
  • हरित अवसंरचना और प्रौद्योगिकी: ऊर्जा-कुशल तकनीक, सार्वजनिक परिवहन और waste-to-energy जैसी पद्धतियों को अपनाना।
  • पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता: संरक्षण और सतत् उपभोग की मानसिकता का विकास करना।
  • कानून और नीति: पर्यावरण संरक्षण से संबंधित कानूनों (जैसे- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम) का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

जनसंख्या को केवल एक समस्या के रूप में देखना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। वास्तविक चुनौती जनसंख्या के आकार नहीं, बल्कि उसके उपभोग के प्रतिमान, संसाधनों के वितरण और प्रौद्योगिकी के उपयोग की है। एक समावेशी, न्यायसंगत और पर्यावरण-अनुकूल विकास मॉडल अपनाकर ही जनसंख्या के दबाव को एक अवसर में बदला जा सकता है और विकास एवं पर्यावरण संरक्षण के बीच एक स्थायी संतुलन स्थापित किया जा सकता है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ ग्रह सुनिश्चित करेगा।

JPSC MAINS PAPER 3/Geography Chapter – 18