महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु संघर्ष
19वीं सदी का भारत सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का काल था। इस दौरान समाज के पिछड़ेपन, कुरीतियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध एक नई चेतना का उदय हुआ, जिसका केंद्रबिंदु था – स्त्रियों की दयनीय सामाजिक स्थिति में सुधार। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा उत्पीड़न, नारी शिक्षा का अभाव जैसी समस्याओं के समाधान हेतु समाज सुधारकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
1. सती प्रथा का उन्मूलन
- पृष्ठभूमि: सती प्रथा एक क्रूर और अमानवीय प्रथा थी, जिसमें पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी को जबरन या सामाजिक दबाव में उसी चिता पर जलाकर मार दिया जाता था। यह प्रथा धार्मिक अनुष्ठान के रूप में प्रचलित थी।
- सुधारकों का योगदान: राजा राममोहन राय ने इस प्रथा के खिलाफ सबसे पहले और सबसे मजबूत आवाज उठाई। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर सिद्ध किया कि हिंदू शास्त्रों में सती होने का कोई आदेश नहीं है। उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से जनमत तैयार किया।
- कानूनी हस्तक्षेप: राजा राममोहन राय के निरंतर प्रयासों और तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक के सहयोग से, 4 दिसंबर, 1829 को ‘बंगाल सती विनियमन अधिनियम, XVII’ पारित हुआ, जिसने सती प्रथा को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध घोषित कर दिया।
2. विधवा विवाह अधिनियम
- पृष्ठभूमि: समाज में विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें समाज में अपमानजनक जीवन जीना पड़ता था, सिर मुंडवाना पड़ता था और उनके पुनर्विवाह पर सख्त पाबंदी थी। बाल विवाह के चलते कम उम्र की विधवाएं अपना पूरा जीवन कष्ट में बिताती थीं।
- सुधारकों का योगदान: ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में तार्किक और शास्त्रीय आधार प्रस्तुत किए। उनके अथक प्रयासों से 1856 में ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, XV’ पारित हुआ, जिसने विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की।
- महत्व: यह अधिनियम एक क्रांतिकारी कदम था जिसने महिलाओं को एक नई गरिमा और जीवन जीने का अधिकार दिया। विद्यासागर ने स्वयं अपने बेटे का विवाह एक विधवा से करके समाज को एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
3. सहमति विधेयक (वयस्कता अधिनियम)
- पृष्ठभूमि: बाल विवाह एक और गंभीर सामाजिक बुराई थी। लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर दिया जाता था, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता था।
- सुधारकों का योगदान: इस मुद्दे पर बहुजन समाज के संस्थापक महर्षि धोंडो केशव कर्वे और अन्य सुधारकों ने आवाज उठाई।
- कानूनी हस्तक्षेप: सरकार ने 1891 में ‘सहमति अधिनियम’ (Age of Consent Act) पारित किया। इसने विवाह के लिए लड़कियों की न्यूनतम आयु 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी। यह अधिनियम बालिका वधुओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
4. महिला शिक्षा पर दबाव
- पृष्ठभूमि: उस时代 में, महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर नगण्य थे। यह माना जाता था कि शिक्षा महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है और इससे समाज में अराजकता फैलेगी।
- सुधारकों का योगदान:
- ज्योतिबा फुले: उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर 1848</strong में पुणे में भारत की पहली लड़कियों के स्कूल की स्थापना की। सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।
- ईश्वरचंद्र विद्यासागर: उन्होंने बंगाल में कई बालिका विद्यालयों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- दयानंद सरस्वती: आर्य समाज ने महिला शिक्षा को बढ़ावा देने और सभी के लिए शिक्षा की वकालत की।
- सर सैयद अहमद खान: उन्होंने अलीगढ़ आंदोलन के तहत मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया।
- परिणाम: इन सुधारकों के प्रयासों से महिला शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी और धीरे-धीरे लड़कियों के लिए स्कूल खुलने शुरू हुए, जिसने आगे चलकर महिला सशक्तिकरण की नींव रखी।
निष्कर्ष
महिलाओं की स्थिति में सुधार के ये संघर्ष न केवल कानूनी परिवर्तन थे, बल्कि भारतीय समाज के सोच में एक मौलिक परिवर्तन के प्रतीक थे। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले जैसे सुधारकों ने घोर विरोध और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करते हुए महिलाओं के मानवाधिकारों और गरिमा की रक्षा के लिए अथक प्रयास किए। इन आंदोलनों ने एक आधुनिक, प्रगतिशील और समतामूलक भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
