भारत का विभाजन तथा इसके परिणाम
भारत का विभाजन (Partition of India) 1947 की वह त्रासद घटना है जिसने देश के भूगोल, समाज, अर्थव्यवस्था और मानसिकता को गहराई से प्रभावित किया। यह विभाजन ब्रिटिश भारत को धार्मिक आधार पर दो स्वतंत्र राष्ट्रों – भारत (हिंदू बहुल) और पाकिस्तान (मुस्लिम बहुल) में विभक्त करने की प्रक्रिया थी, जिसके परिणामस्वरूप एक बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा, स्थानांतरण और पुनर्वास की समस्या उत्पन्न हुई।
विभाजन के कारण
- ब्रिटिश साम्राज्य की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति: अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट पैदा की।
- मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) की मांग: मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और उनके लिए एक साथ रहना असंभव है।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद: कैबिनेट मिशन योजना (1946) जैसे समझौते विफल हो गए, जिससे विभाजन अपरिहार्य हो गया।
- सांप्रदायिक दंगे (1946-47): कोलकाता, नोआखाली और बिहार में भीषण सांप्रदायिक दंगों ने स्थिति को और विकट बना दिया, जिससे एक अलग राष्ट्र की मांग और प्रबल हुई।
- ब्रिटिश सरकार की जल्दबाजी: तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने शीघ्रता से सत्ता हस्तांतरण का निर्णय लिया, जिसके कारण विभाजन की प्रक्रिया अत्यंत खराब ढंग से और खूनखराबे के साथ संपन्न हुई।
विभाजन की प्रक्रिया: रेडक्लिफ रेखा
विभाजन की सीमा रेखा निर्धारित करने का दायित्व एक ब्रिटिश वकील, सर सिरिल रेडक्लिफ को दिया गया, जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा (रेडक्लिफ रेखा) निर्धारित की। इस रेखा ने बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी बंगाल (भारत) में तथा पंजाब को पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) और पूर्वी पंजाब (भारत) में बांट दिया। यह निर्धारण अत्यंत शीघ्रता और गोपनीयता से किया गया, जिसके कारण अनेक समस्याएं उत्पन्न हुईं।
विभाजन के तात्कालिक एवं दीर्घकालिक परिणाम
1. जनसांख्यिकीय उथल-पुथल एवं शरणार्थी समस्या
- विस्थापन का इतिहास में सबसे बड़ा उदाहरण: अनुमानित 1.4 करोड़ से 1.8 करोड़ लोग विस्थापित हुए।
- सांप्रदायिक हिंसा: दोनों तरफ भयानक सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें लगभग 5 से 10 लाख लोग मारे गए।
- शरणार्थियों का पुनर्वास: भारत सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी पंजाब, सिंध आदि से आए लाखों शरणार्थियों को बसाना और उन्हें रोजगार देना था। दिल्ली, बॉम्बे, कोलकाता जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर शरणार्थी बस्तियां बनीं।
2. आर्थिक परिणाम
- कृषि उत्पादक क्षेत्रों का विभाजन: सिंचित भूमि और कृषि योग्य उपजाऊ भूमि का बंटवारा हुआ।
- उद्योगों पर प्रभाव: जूट और सूती वस्त्र उद्योग प्रभावित हुए, क्योंकि जूट का उत्पादन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में होता था, लेकिन कारखाने भारत (मुख्यतः कोलकाता) में थे।
- जल संसाधनों पर विवाद: पंजाब के नहरों के पानी के बंटवारे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ।
3. सामाजिक-सांस्कृतिक परिणाम
- सांप्रदायिक सौहार्द में कमी: विभाजन की त्रासदी ने हिंदू और मुसलमानों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी।
- सांस्कृतिक विभाजन: पंजाबी और बंगाली संस्कृति, जो सदियों से एक साझा और मिश्रित संस्कृति थी, दो हिस्सों में बंट गई।
- महिलाओं पर अत्याचार: दोनों तरफ की हजारों महिलाओं का अपहरण, उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन करवाया गया, जिसने एक गहरा सदमा पैदा किया।
4. राजनीतिक परिणाम
- दो राष्ट्रों का उदय: 14-15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो नए राष्ट्रों का जन्म हुआ।
- रियासतों का विलय: विभाजन ने देसी रियासतों (जैसे जूनागढ़, हैदराबाद और सबसे विवादास्पद, कश्मीर) के भविष्य का प्रश्न खड़ा कर दिया, जिसने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और युद्ध की स्थिति उत्पन्न की।
- भारत-पाकिस्तान के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध: विभाजन ने दोनों देशों के बीच एक अविश्वास और शत्रुता की शुरुआत कर दी, जो आज तक किसी न किसी रूप में जारी है और जिसके कारण 1947-48, 1965, 1971 और 1999 में युद्ध हुए।
- पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष: पाकिस्तान के भीतर ही पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण असंतोष पनपा, जो 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम और उदय का कारण बना।
निष्कर्ष
भारत का विभाजन केवल एक भौगोलिक विभाजन मात्र नहीं था, बल्कि यह एक सामूहिक मानसिक आघात, सांस्कृतिक विखंडन और एक सदाबहार राजनीतिक विवाद की शुरुआत थी। इसकी छाया आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर देखी जा सकती है। यह एक ऐतिहासिक सबक है जो धर्म के आधार पर राष्ट्र निर्माण के दुष्परिणामों की याद दिलाता है और धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और एकता के महत्व को रेखांकित करता है।
