स्वतंत्रता के पश्चात् भारत: प्रमुख घटनाक्रम एवं नीतियाँ
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के समक्ष राष्ट्र-निर्माण की अनेक जटिल चुनौतियाँ थीं। एक नवगठित राष्ट्र के रूप में भारत को राजनीतिक, प्रादेशिक और कूटनीतिक मोर्चों पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने थे। यह अवधि देश को एक सूत्र में बाँधने, आधुनिक बनाने और वैश्विक मंच पर उसकी पहचान स्थापित करने की थी।
1. भारतीय संघ में देशी रियासतों का विलय
15 अगस्त, 1947 को जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तब देश में लगभग 565 देशी रियासतें (Princely States) थीं। इन रियासतों के पास ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होने का विकल्प था, जिससे भारत के राजनीतिक एकीकरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया था।
- चुनौती: सरदार वल्लभभाई पटेल, जो उस समय उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे, को रियासतों को भारत में शामिल करने की जिम्मेदारी दी गई। उनके सचिव वी.पी. मेनन ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- रणनीति: पटेल ने ‘लौह और कठोर’ (Iron Fist in Velvet Glove) की नीति अपनाई। उन्होंने रियासतों के शासकों को भारत में विलय के लिए राजी करने के लिए कूटनीति का प्रयोग किया, लेकिन सैन्य बल के प्रयोग से भी पीछे नहीं हटे।
- विलय का तरीका: अधिकांश रियासतों ने ‘विलय पत्र’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसके तहत वे रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषय भारत सरकार को सौंपने को तैयार हो गए।
- विशेष मामले: कुछ रियासतों, जैसे हैदराबाद (ऑपरेशन पोलो), जूनागढ़ और कश्मीर (युद्ध के माध्यम से) में सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता पड़ी।
- परिणाम: अद्भुत राजनयिक कौशल और दृढ़ संकल्प के कारण 1947-50 की अवधि के भीतर ही लगभग सभी रियासतों का भारत में विलय हो गया, जिससे एक एकीकृत और संप्रभु राष्ट्र का निर्माण हुआ।
2. भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन
रियासतों के विलय के बाद, भारत में प्रशासनिक सुविधा के आधार पर राज्यों की सीमाएँ बनाई गईं। लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में भाषायी आधार पर अलग राज्यों की मांग उठने लगी, विशेष रूप से तेलुगु भाषी क्षेत्रों में।
- दक्षिण भारत में आंदोलन: मद्रास प्रेसीडेंसी के तेलुगु भाषी लोगों ने अलग आंध्र प्रदेश राज्य की मांग की। इस आंदोलन का नेतृत्व स्वामी श्रीरामुलम ने किया, जिन्होंने 1952 में आमरण अनशन शुरू किया और उसी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने राष्ट्रव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया।
- राज्य पुनर्गठन आयोग (1953): प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस मांग के दबाव में फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission – SRC) का गठन किया।
- आयोग की सिफारिशें: 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और मुख्य रूप से भाषायी आधार पर राज्यों के गठन की सिफारिश की।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956: संसद द्वारा इस अधिनियम को पारित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने। इसने भारत के राजनीतिक मानचित्र को बदल दिया (जैसे, हैदरabād राज्य का विभाजन, केरल का गठन, मैसूर राज्य का पुनर्गठन आदि)।
- ऐतिहासिक महत्व: इसने लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक एकीकरण को मजबूत किया और क्षेत्रीय अस्मिता की भावना को संस्थागत रूप दिया। बाद के वर्षों में भी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर नए राज्य (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, उत्तराखंड आदि) बने।
3. नेहरू एवं इंदिरा गांधी के अंतर्गत गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
शीत युद्ध के दौरान दुनिया दो गठबंधनों (अमेरिका के नेतृत्व वाला NATO और सोवियत संघ के नेतृत्व वाला वारसॉ पैक्ट) में बंट गई थी। भारत ने इनमें से किसी भी गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया और गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की नीति अपनाई।
- नेहरू की भूमिका: प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के प्रमुख संस्थापकों और विचारकों में से एक थे। उन्होंने इंडोनेशिया के सुकर्णो, मिस्र के नासिर और यूगोस्लाविया के टीटो के साथ मिलकर 1961 में बेलग्रेड में NAM की पहली औपचारिक शिखर बैठक आयोजित की।
- नीति के सिद्धांत: यह नीति ‘तटस्थता’ (Neutrality) नहीं, बल्कि ‘सक्रिय स्वतंत्रता’ थी। इसका उद्देश्य वैश्विक मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेना, उपनिवेशवाद का विरोध करना, और विश्व शांति एवं सहयोग को बढ़ावा देना था।
- इंदिरा गांधी का योगदान: इंदिरा गांधी ने इस नीति को जारी रखा और इसे और मजबूत किया। 1971 की भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने अमेरिकी दबाव के बावजूद सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि की, जो गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत के अनुरूप एक स्वतंत्र कदम था। उन्होंने NAM को वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों की वकालत करने वाले मंच के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- लाभ: इस नीति ने भारत को दोनों महाशक्तियों से आर्थिक और रक्षा सहायता प्राप्त करने, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बनाया।
4. बांग्लादेश का उदय (1971)
1971 का भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश का उदय, इंदिरा गांधी के काल की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
- पृष्ठभूमि: 1970 के पाकिस्तानी आम चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिला, लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने सत्ता हस्तांतरण से इनकार कर दिया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू करके भयावह दमन किया, जिसके कारण लाखों शरणार्थी भारत (विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम) में आ गए।
- भारत की प्रतिक्रिया: इंदिरा गांधी ने कूटनीतिक और सैन्य दोनों तैयारियाँ कीं। उन्होंने विश्व समुदाय को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया और अगस्त 1971 में भारत और सोवियत संघ के बीच एक शांति और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसने संभावित अमेरिकी या चीनी हस्तक्षेप को रोक दिया।
- युद्ध: दिसंबर 1971 में, पाकिस्तानी वायु सेना द्वारा भारतीय वायुसेना के ठिकानों पर हमले के बाद, पूर्ण पैमाने पर युद्ध शुरू हो गया। भारतीय सेनाओं ने मुक्ति वाहिनी (बांग्लादेश गुरिल्लाओं) के साथ मिलकर तेजी से कार्रवाई की।
- परिणाम: मात्र 13 दिनों में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। 16 दिसंबर, 1971 को ढाका में लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी के नेतृत्व में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इसके परिणामस्वरूप एक नए स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ।
- ऐतिहासिक महत्व: इस जीत ने भारत की सैन्य शक्ति को प्रदर्शित किया, दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र को बदल दिया और इंदिरा गांधी की स्थिति को एक सशक्त और निर्णायक नेता के रूप में मजबूत किया।
निष्कर्ष
ये चारों घटनाक्रम – रियासतों का विलय, भाषायी राज्यों का गठन, गुटनिरपेक्ष नीति और बांग्लादेश का उदय – स्वतंत्र भारत के इतिहास की आधारशिला हैं। इन्होंने भारत को एक एकीकृत राष्ट्र बनाया, इसकी आंतरिक विविधता को प्रशासनिक ढाँचा प्रदान किया और वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र, सशक्त及जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। ये नीतियाँ और घटनाएँ आज भी भारत के राजनीतिक, सामाजिक और कूटनीतिक लैंडस्केप को प्रभावित करती हैं।
