प्रशासन: अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति क्षेत्र

भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों के हितों और उनके क्षेत्रों के विशेष प्रशासन की व्यवस्था करने हेतु विशेष उपबन्ध किए गए हैं। ये प्रावधान भाग-10 तथा पाँचवी और छठी अनुसूची में वर्णित हैं।

1. संवैधानिक अवधारणा एवं उद्देश्य

भारत की जनजातीय आबादी ऐतिहासिक रूप से वंचित, भौगोलिक रूप से पृथक और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई है। इनकी独特 की सांस्कृतिक पहचान, परंपराएँ, सामाजिक ढाँचा और भूमि से जुड़ाव है। मुख्यधारा के प्रशासनिक ढाँचे से इनके एकीकरण से इनकी विशिष्टता के समाप्त होने और शोषण का खतरा था।

इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने “सकारात्मक भेदभाव” (Positive Discrimination) और “सुरक्षात्मक प्रशासन” (Protective Administration) की नीति अपनाई। इसका मुख्य उद्देश्य था:

  • जनजातीय समुदायों को सामाजिक-आर्थिक शोषण से बचाना।
  • उनकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और रीति-रिवाजों को संरक्षित करना।
  • उनके प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जमीन और जंगल) पर उनके अधिकारों की रक्षा करना।
  • उन्हें स्वशासन का अधिकार देना और विकास की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना।

2. प्रशासनिक व्यवस्था के प्रकार

संविधान में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए दो मुख्य व्यवस्थाएँ हैं:

(क) पाँचवी अनुसूची के प्रावधान

यह भारत के अधिकांश राज्यों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर)।

मुख्य विशेषताएँ:

  • राष्ट्रपति का अधिकार: राष्ट्रपति किसी भी राज्य में अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति की अधिसूचना जारी कर सकते हैं।
  • जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council – TAC):
    • ऐसे प्रत्येक राज्य में, जहाँ अनुसूचित क्षेत्र हैं, एक जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन किया जाना अनिवार्य है।
    • इसमें 20 सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन-चौथाई अनुसूचित जनजातियों के विधानसभा सदस्य होते हैं (यदि उनकी संख्या इतनी है)।
    • इसका कार्य “अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और कल्याण” से संबंधित मामलों पर राज्यपाल को सलाह देना है।
  • राज्यपाल की भूमिका:
    • राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। वह यह सुनिश्चित करता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में लागू होने वाली केंद्र या राज्य की कोई भी विधि जनजातियों के हितों के विरुद्ध न हो।
    • वह किसी भी कानून को उस क्षेत्र में लागू करने से पहले उसमें संशोधन का आदेश दे सकता है।
    • वह “जनजाति हित” को परिभाषित करने वाले विनियम बना सकता है, विशेष रूप से भूमि के हस्तांतरण और साहूकारी ( money-lending) के नियमन के लिए।
  • संसद की शक्ति: संसद इन क्षेत्रों के लिए विशेष कानून बना सकती है।

(ख) छठी अनुसूची के प्रावधान

यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है। यह पाँचवी अनुसूची से अधिक स्वायत्तता और स्व-शासन का प्रावधान करती है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • स्वायत्त जिला परिषदें (Autonomous District Councils – ADCs):
    • राज्यपाल जनजातीय बहुल क्षेत्रों को ‘स्वायत्त जिले’ घोषित कर सकता है और उनके लिए स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) का गठन कर सकता है।
    • ये परिषदें व्यवस्थापिका, न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों से संपन्न हैं।
  • व्यवस्थापिका शक्तियाँ: परिषदों को निम्नलिखित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है:
    • जमीन का प्रशासन, वन प्रबंधन (कुछ सीमाओं के साथ)।
    • कृषि, सिंचाई।
    • गाँव और नगर का प्रशासन।
    • समाजिक रीति-रिवाज।
    • जनजातीय मामलों का निपटारा करने के लिए विशेष न्यायालयों का गठन।
  • न्यायिक शक्तियाँ: परिषदें कुछ (certain) दीवानी और फौजदारी मामलों का निपटारा करने के लिए न्यायालयों का गठन कर सकती हैं।
  • वित्तीय शक्तियाँ: परिषदों को भूमि कर, मकान कर, व्यापार लाइसेंस शुल्क आदि लगाने और वसूलने का अधिकार है।
  • राज्यपाल की निगरानी: राज्यपाल इन परिषदों के निर्माण और भंग करने, उनके अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन और उनके द्वारा पारित विधेयकों पर स्वीकृति देने का अधिकार रखता है।

3. पाँचवी और छठी अनुसूची में अंतर

आधार पाँचवी अनुसूची छठी अनुसूची
क्षेत्र अन्य सभी राज्य (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम को छोड़कर) केवल असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम
प्रशासनिक ढाँचा केंद्रित, राज्यपाल-केंद्रित विकेंद्रित, स्वायत्त जिला परिषद-केंद्रित
स्वशासन की डिग्री कम (सलाहकारी) अधिक (व्यवस्थापिका, न्यायिक, प्रशासनिक शक्तियाँ)
मुख्य एजेंसी जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) स्वायत्त जिला परिषद (ADC) और स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद (ARC)
शक्तियाँ मुख्यतः सलाहकारी और सुरक्षात्मक व्यापक विधायी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ

4. चुनौतियाँ एवं महत्व

चुनौतियाँ:

  • संसाधनों की कमी: अधिकांश जनजातीय सलाहकार परिषदों (TAC) और स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) के पास पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन का अभाव है।
  • शक्तियों का दुरुपयोग: कई बार स्थानीय नेताओं द्वारा इन संस्थाओं का उपयोग सत्ता साधने के लिए किया जाता है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के साथ तालमेल का अभाव: अक्सर इन क्षेत्रों के विकास की योजनाएँ ऊपर से थोपी जाती हैं, जो स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नहीं होतीं।
  • वन अधिकार अधिनियम (2006) जैसे नए कानूनों के साथ समन्वय की कमी।
  • आंतरिक विस्थापन और बाहरी लोगों का प्रवेश: विकास परियोजनाओं और उद्योगों के कारण भूमि अधिग्रहण एक बड़ी समस्या है।

महत्व:

  • यह संवैधानिक प्रावधान सहभागी लोकतंत्र और सांस्कृतिक बहुलवाद के भारतीय मॉडल की नींव है।
  • यह जनजातीय समुदायों को सांस्कृतिक विलोपन और शोषण से बचाता है।
  • यह विकेन्द्रीकरण और स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देता है।
  • यह देश की अखंडता और सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत करता है।

निष्कर्षतः, ये संवैधानिक प्रावधान जनजातीय समुदायों के उत्थान और सशक्तिकरण के लिए एक सुरक्षात्मक ढाँचा प्रदान करते हैं। हालाँकि, इनकी प्रभावकारिता इन संस्थाओं को मजबूत करने, संसाधन उपलब्ध कराने और सही मायने में सहभागी शासन सुनिश्चित करने पर निर्भर करती है।

JPSC MAINS PAPER 4/polity Chapter – 1 #8