- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): ये पूर्णतः संरक्षित क्षेत्र होते हैं जहाँ मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती। उदाहरण: कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान।
- वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): इनमें राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में कुछ नियम शिथिल होते हैं तथा स्थानीय लोगों की कुछ गतिविधियों की अनुमति हो सकती है। उदाहरण: भरतपुर पक्षी अभयारण्य, गिर वन्यजीव अभयारण्य।
- जीवमंडल संरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves): ये विशाल क्षेत्र होते हैं जो संरक्षण, अनुसंधान और सतत विकास को एक साथ समाहित करते हैं। इनमें एक कोर जोन (पूर्ण संरक्षण), बफर जोन (सीमित गतिविधि) और संक्रमण क्षेत्र (मानव बस्ती) होता है। उदाहरण: नीलगिरि, सुंदरबन, पंचमढ़ी।
लाभ:
- प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण।
- जीवों को प्राकृतिक व्यवहार एवं अनुकूलन का अवसर।
- दीर्घकालिक और लागत-प्रभावी समाधान।
- बड़ी आबादी का संरक्षण संभव।
परस्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation)
परस्थाने संरक्षण का अर्थ है “प्राकृतिक आवास से बाहर” जीवों तथा पादपों का संरक्षण करना। जब किसी प्रजाति के विलुप्त होने का गंभीर खतरा होता है, तो इस विधि का सहारा लिया जाता है।
परस्थाने संरक्षण के मुख्य उपाय:
- चिड़ियाघर (Zoological Parks): जंतुओं को प्रदर्शन एवं प्रजनन हेतु रखा जाता है।
- वनस्पति उद्यान (Botanical Gardens): दुर्लभ और संकटग्रस्त पौधों को संग्रहित और संरक्षित किया जाता है।
- वन्यजीव प्रजनन केंद्र (Wildlife Safari Parks): जंतुओं को उनके प्राकृतिक आवास जैसे वातावरण में रखा जाता है।
- क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation): जर्मप्लाज्म (बीज, बीजाणु, शुक्राणु आदि) को अतिनिम्न तापमान पर संरक्षित किया जाता है।
- जीन बैंक (Gene Banks): आनुवंशिक सामग्री (DNA, बीज, ऊतक) का दीर्घकालिक भंडारण।
लाभ:
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए तत्काल सुरक्षा।
- आनुवंशिक विविधता का संरक्षण।
- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं शिक्षा के लिए बेहतर अवसर।
- प्रजातियों को पुन: प्राकृतिक आवास में बसाने (Re-introduction) में सहायक।
निष्कर्ष
स्वस्थाने और परस्थाने संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं। स्वस्थाने संरक्षण आदर्श और प्राथमिकता वाला तरीका है, जबकि परस्थाने संरक्षण एक आपातकालीन सुरक्षा जाल (Safety Net) का काम करता है। भारत में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’, ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ जैसे कार्यक्रम स्वस्थाने संरक्षण के उदाहरण हैं, वहीं चिड़ियाघर और जैविक उद्यान परस्थाने संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। एक सफल संरक्षण रणनीति के लिए दोनों विधियों का समन्वित उपयोग आवश्यक है।
प्रदूषण: कारण, प्रभाव एवं नियंत्रण
प्रदूषण का अर्थ है – पर्यावरण में अवांछित पदार्थों (प्रदूषकों) का मिलना, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है तथा मानव, पशु-पक्षी, पौधों आदि के स्वास्थ्य एवं कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण मुख्यतः पाँच प्रकार का होता है।
1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)
परिभाषा: वायुमंडल में हानिकारक गैसों (जैसे CO, SO2, NOx) तथा सूक्ष्म कणों (Particulate Matter) की मात्रा का बढ़ना, जो जीव-जंतुओं एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
मुख्य कारण:
- औद्योगिकरण: उद्योगों से निकलने वाला धुआँ एवं रसायन।
- वाहन: डीजल-पेट्रोल वाहनों से निकलने वाला धुआँ।
- ऊर्जा उत्पादन: कोयला आधारित ताप बिजली घर।
- कृषि कार्य: फसल अवशेष जलाना (पराली जलाना)।
- निर्माण कार्य: निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल।
प्रमुख प्रभाव:
- मानव स्वास्थ्य: श्वसन रोग (दमा, ब्रोंकाइटिस), हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर।
- पर्यावरण: अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षय।
- आर्थिक: फसलों की उत्पादकता में कमी, संरचनात्मक क्षति।
नियंत्रण के उपाय:
- वाहनों में उत्प्रेरक कनवर्टर (Catalytic Converter) का प्रयोग।
- औद्योगिक इकाइयों के लिए उत्सर्जन मानक (Emission Standards) का पालन।
- स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) को बढ़ावा।
- जन जागरूकता एवं सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन।
2. जल प्रदूषण (Water Pollution)
परिभाषा: जल निकायों (नदियों, झीलों, समुद्रों, जल-भरावों) में हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे जल की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि वह उपयोग के लायक नहीं रहता।
मुख्य कारण:
- औद्योगिक अपशिष्ट: रासायनिक एवं विषैले कचरे का सीधे नदियों में विसर्जन।
- अपशिष्ट जल (Sewage): घरेलू मल-मूत्र एवं गंदे पानी का अनुपचारित निस्तारण।
- कृषि रसायन: खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक एवं कीटनाशक।
- ठोस कचरा: नदियों में प्लास्टिक एवं अन्य कचरे का फेंका जाना।
प्रमुख प्रभाव:
- जलजनित रोग: हैजा, टाइफाइड, पीलिया।
- जलीय生态系统 का विनाश: ऑक्सीजन की कमी (यूट्रोफिकेशन) से जलीय जीवों की मृत्यु।
- भूजल संदूषण: विषैले रसायनों का भूजल में रिसाव।
नियंत्रण के उपाय:
- सीवेज उपचार संयंत्र (Sewage Treatment Plants – STPs) का निर्माण।
- नदियों की सफाई हेतु मिशन (जैसे- नमामि गंगे)।
- जैव-उपचार (Bioremediation) तकनीकों का उपयोग।
- कृषि में जैविक खाद एवं जैव कीटनाशकों को बढ़ावा।
3. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
परिभाषा: वह अवांछित या अत्यधिक तीव्र ध्वनि जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय गुणवत्ता के लिए हानिकारक है।
मुख्य कारण:
- यातायात: वाहनों, रेलवे एवं विमानों का शोर।
- औद्योगिक गतिविधियाँ: मशीनों, जेनरेटरों आदि का शोर।
- निर्माण कार्य: ड्रिलिंग, विस्फोट आदि।
- सामाजिक/धार्मिक कार्यक्रम: लाउडस्पीकरों का प्रयोग।
प्रमुख प्रभाव:
- श्रवण हानि: स्थायी या अस्थायी बहरापन।
- मनोवैज्ञानिक: तनाव, चिड़चिड़ापन, नींद में खलल।
- शारीरिक: उच्च रक्तचाप, हृदय गति अनियमितता।
नियंत्रण के उपाय:
- शोर नियंत्रण नियमों (Noise Pollution Rules) का कड़ाई से पालन।
- हॉर्न के अनावश्यक प्रयोग पर प्रतिबंध।
- औद्योगिक एवं निर्माण क्षेत्रों में शोर रोधी उपकरणों का प्रयोग।
- हरित पट्टी (Green Belts) का विकास।
4. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
परिभाषा: मृदा में विषैले रसायनों, लवणों, रोगजनकों या प्रदूषकों की उच्च सांद्रता का मिलना, जिससे मृदा की उर्वरता एवं स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
मुख्य कारण:
- कृषि रसायन: अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग।
- औद्योगिक अपशिष्ट: भारी धातुओं (सीसा, पारा) का मृदा में मिलना।
- अनुपचारित सीवेज: सीवेज के पानी से सिंचाई।
- ठोस कचरे का अनुचित निपटान: लैंडफिल साइटों से रिसाव।
प्रमुख प्रभाव:
- मृदा उर्वरता में कमी।
- खाद्य श्रृंखला में विषाक्त पदार्थों का प्रवेश।
- भूजल का प्रदूषण।
नियंत्रण के उपाय:
- जैविक खेती को बढ़ावा।
- वर्मीकम्पोस्टिंग (केंचुआ खाद) का उपयोग।
- अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण (Recycling)।
- वनीकरण द्वारा मृदा अपरदन रोकना।
ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management)
ठोस कचरा प्रबंधन से तात्पर्य कचरे के संग्रहण, परिवहन, उपचार एवं निपटान की एक व्यवस्थित प्रक्रिया से है। इसे ‘3R’ के सिद्धांत (Reduce, Reuse, Recycle) के माध्यम से प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
कचरे के प्रकार:
- बायोडिग्रेडेबल कचरा: रसोई का कचरा, फल-सब्जियों के छिलके, बगीचे का कचरा।
- अपघटनशील कचरा: प्लास्टिक, काँच, धातु, इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste)।
- चिकित्सा कचरा: अस्पतालों से निकलने वाला संक्रामक कचरा।
- निर्माण एवं विध्वंस कचरा: इमारतों के निर्माण एवं ढहाने से निकला मलबा।
प्रबंधन की प्रक्रिया:
| 1. स्रोत पर पृथक्करण | कचरे को गीला (जैविक) एवं सूखा (पुनर्चक्रण योग्य) में अलग करना। |
| 2. संग्रहण | अलग-अलग कचरे को अलग-अलग वाहनों द्वारा एकत्रित करना। |
| 3. परिवहन | कचरे को संग्रहण केंद्र से उपचार स्थल तक ले जाना। |
| 4. उपचार एवं निपटान | विभिन्न तरीकों से कचरे का प्रसंस्करण। |
उपचार के तरीके:
- लैंडफिल: कचरे को भूमि में दबाना। (पर्यावरण के लिए हानिकारक)।
- कम्पोस्टिंग: जैविक कचरे को सूक्ष्मजीवों की सहायता से खाद में बदलना।
- वर्मीकम्पोस्टिंग: केंचुओं की सहायता से उच्च गुणवत्ता वाली खाद बनाना।
- अपशिष्ट से ऊर्जा (Waste to Energy): कचरे को जलाकर बिजली उत्पन्न करना।
- पुनर्चक्रण (Recycling): प्लास्टिक, काँच, धातु आदि को पुनः उपयोग हेतु तैयार करना।
सरकारी पहल:
- स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): खुले में शौच मुक्ति एवं ठोस कचरा प्रबंधन पर जोर।
- कचरा मुक्त शहर (Garbage Free Cities): शहरों को कचरा मुक्त बनाने का लक्ष्य।
- प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016: एकल-उपयोग प्लास्टिक पर नियंत्रण।
निष्कर्ष: प्रदूषण एवं कचरा प्रबंधन आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसके समाधान हेतु तकनीकी नवाचार, कड़े नियमन एवं जन सहभागिता तीनों आवश्यक हैं। सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु एक समग्र एवं समन्वित दृष्टिकोण ही सफलता की कुंजी है।
जैव विविधता: अवधारणा, हॉटस्पॉट एवं जैव विविधता के लिए खतरे
परिचय
जैव विविधता (Biodiversity) पृथ्वी पर जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता को दर्शाता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना एवं कार्यप्रणाली का आधार है तथा मानव कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जैव विविधता की अवधारणा (Concept of Biodiversity)
जैव विविधता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वाल्टर जी. रोसेन ने 1985 में किया था। इसे मुख्यतः तीन स्तरों पर परिभाषित किया जाता है:
- आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही जाति (Species) के विभिन्न सदस्यों के बीच आनुवंशिक लक्षणों में पाई जाने वाली विभिन्नता। उदाहरण: मनुष्यों में रंग, कद, चेहरे की बनावट आदि में भिन्नता; धान की विभिन्न किस्में।
- जातीय विविधता (Species Diversity): किसी निश्चित क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों (पौधों, जंतुओं, सूक्ष्मजीवों) की संख्या और उनकी बहुलता। उदाहरण: एक वन में पाए जाने वाले पेड़, पक्षी, स्तनधारी, कीट आदि।
- पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे वन, घास स्थल, मरुस्थल, आर्द्रभूमि, समुद्री तट, समुद्र आदि की विविधता।
जैव विविधता के हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots)
जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं जहाँ अत्यधिक मात्रा में स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) पाई जाती हैं, लेकिन साथ ही ये क्षेत्र मानवीय गतिविधियों के कारण गंभीर रूप से खतरे में हैं।
हॉटस्पॉट घोषित होने के मापदंड:
- क्षेत्र में कम से कम 1,500 स्थानिक संवहनीय पादप प्रजातियाँ होनी चाहिए।
- क्षेत्र का कम से कम 70% प्राकृतिक आवास नष्ट हो चुका होना चाहिए।
भारत में स्थित प्रमुख हॉटस्पॉट:
- हिमालय (The Himalayas): इसमें भारत, नेपाल, भूटान और चीन के कुछ हिस्से शामिल हैं। यहाँ सफेद भालू, हिम तेंदुआ, लाल पांडा जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- इंडो-बर्मा क्षेत्र (Indo-Burma Region): इसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्य (असम को छोड़कर), अंडमान द्वीप समूह, म्यांमार, थाईलैंड आदि शामिल हैं। यह क्षेत्र स्तनधारियों, सरीसृपों और उभयचरों की विविधता के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
- पश्चिमी घाट (Western Ghats) और श्रीलंका: यह क्षेत्र अत्यधिक स्थानिकता के लिए जाना जाता है। यहाँ सिंह-पुच्छ मकाक, नीलगिरि तहर, और बड़ी संख्या में मेंढक एवं छिपकली की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- सुंडालैंड (Sundaland): भारत के निकोबार द्वीप समूह इसी हॉटस्पॉट का हिस्सा हैं।
जैव विविधता के लिए खतरे (Threats to Biodiversity)
वर्तमान में जैव विविधता का ह्रास एक गंभीर वैश्विक चिंता का विषय है। इसके लिए उत्तरदायी प्रमुख खतरे निम्नलिखित हैं:
- आवास विनाश, खंडन एवं अवक्रमण (Habitat Loss, Fragmentation and Degradation): वनों की कटाई, कृषि विस्तार, शहरीकरण, खनन और बुनियादी ढाँचे के विकास के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट, टुकड़ों में बंट या खराब हो रहे हैं। यह जैव विविधता ह्रास का सबसे बड़ा कारण है।
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Invasion of Alien Species): जब कोई बाहरी प्रजाति नए क्षेत्र में पहुँचती है, तो वह स्थानीय प्रजातियों के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करके, उन्हें शिकार बनाकर या रोग फैलाकर उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है। उदाहरण: भारत में गाजर घास (Parthenium), लैंटाना, और अमेरिकन मोस्किटोफिश।
- प्रदूषण (Pollution): वायु, जल और मृदा प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदूषित करके प्रजातियों के स्वास्थ्य और अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक प्रदूषण और औद्योगिक कचरा प्रमुख समस्याएँ हैं।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change): वैश्विक तापमान में वृद्धि, वर्षा चक्र में बदलाव और चरम मौसमी घटनाएँ (बाढ़, सूखा) प्रजातियों के निवास स्थान, प्रजनन चक्र और प्रवासन पैटर्न को बाधित कर रही हैं।
- अति-दोहन (Overexploitation): आवश्यकता से अधिक मात्रा में वन्यजीवों का शिकार, मत्स्यन और वनोपज का संग्रह। उदाहरण: हाथी दाँत के लिए हाथियों का शिकार, तेंदुआ खाल के लिए शिकार, शार्क के पंख के लिए मत्स्यन।
- मानव-जनित आग (Anthropogenic Fires): वनों में लगने वाली आग, चाहे प्राकृतिक हो या मानवजनित, पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाती है और अनेक प्रजातियों को मार देती है।
निष्कर्ष
जैव विविधता पृथ्वी का एक अनमोल संसाधन है जो हमें भोजन, फाइबर, दवाएँ, जल शुद्धिकरण, जलवायु विनियमन और सांस्कृतिक एवं सौंदर्य संबंधी लाभ प्रदान करती है। इसके तेजी से हो रहे ह्रास ने वैश्विक स्तर पर चिंता उत्पन्न कर दी है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए सतत विकास को बढ़ावा देना, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार करना, स्थानीय समुदायों को शामिल करना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (जैसे- CBD, CITES) को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।
वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे
वर्तमान समय में पूरा विश्व कई गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ये मुद्दे अब स्थानीय या क्षेत्रीय न रहकर वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं और इनके समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। प्रमुख वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे निम्नलिखित हैं:
1. जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
अर्थ: पृथ्वी के सामान्य जलवायु प्रतिरूप में दीर्घकालिक परिवर्तन। इसमें तापमान, वर्षा, हवा के प्रतिरूप आदि में बदलाव शामिल हैं।
कारण:
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- ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) का बढ़ता स्तर।
-
- जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का दहन।
-
- वनों की कटाई (Deforestation)।
-
- औद्योगिकरण एवं शहरीकरण।
प्रभाव:
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- चरम मौसमी घटनाओं (बाढ़, सूखा, चक्रवात) में वृद्धि।
-
- समुद्र के स्तर में वृद्धि।
-
- कृषि उत्पादन पर नकारात्मक असर।
-
- पारिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता को खतरा।
समाधान: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (पेरिस समझौता), नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, ऊर्जा दक्षता, वनीकरण।
2. वैश्विक तापन (Global Warming)
अर्थ: जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख पहलू, जिसमें पृथ्वी के औसत वायुमंडलीय तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है।
कारण: ग्रीनहाउस प्रभाव में तीव्र वृद्धि। सूर्य की गर्मी को सोखने वाली गैसों (ग्रीनहाउस गैसों) की वायुमंडल में मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।
प्रभाव:
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- ध्रुवीय बर्फ का पिघलना और हिमनदों का सिकुड़ना।
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- महासागरों का अम्लीकरण (Ocean Acidification)।
-
- मौसम चक्रों में गड़बड़ी।
3. ओज़ोन परत का ह्रास (Ozone Layer Depletion)
अर्थ: वायुमंडल की स्ट्रैटोस्फीयर परत में स्थित ओज़ोन (O₃) गैस की परत का पतला होना। यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को रोकती है।
कारण: मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों का उत्सर्जन, जो रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एरोसॉल स्प्रे में प्रयोग होते थे।
प्रभाव:
-
- त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिंद के मामलों में वृद्धि।
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- मानव प्रतिरक्षा प्रणाली पर दबाव।
-
- फसलों एवं समुद्री प्लवक (Phytoplankton) को नुकसान।
समाधान: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) एक सफल वैश्विक समझौता, जिसके तहत ओज़ोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया गया।
4. अम्ल वर्षा (Acid Rain)
अर्थ: वर्षा, हिम, कोहरा या धूल का अम्लीय होना। यह तब होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जैसी गैसें वायुमंडल में जल के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं।
कारण:
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- कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईंधन का दहन।
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- औद्योगिक प्रक्रियाएं।
-
- वाहनों से निकलने वाला धुआं।
प्रभाव:
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- झीलों और नदियों का अम्लीय होना, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है।
-
- मृदा की उर्वरता में कमी।
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- इमारतों, स्मारकों और धातु की संरचनाओं का क्षरण।
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- वनों को नुकसान।
5. मरुस्थलीकरण (Desertification)
अर्थ: किसी भी शुष्क या अर्ध-शुष्क क्षेत्र की भूमि का उर्वरता और उत्पादकता खोकर मरुस्थल में बदलना। यह भूमि क्षरण (Land Degradation) का चरम रूप है।
कारण:
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- मानवजनित: अति-चराई, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, वनों की कटाई, जल संसाधनों का अति-दोहन।
-
- प्राकृतिक: अनियमित वर्षा, सूखा।
प्रभाव:
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- कृषि योग्य भूमि का सिकुड़ना।
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- खाद्य सुरक्षा को खतरा।
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- जैव विविधता का नुकसान।
-
- पर्यावरणीय शरणार्थियों की समस्या।
समाधान: टिकाऊ भू-प्रबंधन, वनीकरण, वाटर हार्वेस्टिंग, समोच्च बंधान (Contour Bunding) जैसी तकनीकों का प्रयोग।
निष्कर्ष
ये सभी वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। इनके समाधान के लिए केवल सरकारों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर भी प्रयास आवश्यक हैं। टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को अपनाकर ही हम भविष्य में एक स्वस्थ और सुरक्षित ग्रह सुनिश्चित कर सकते हैं।
पर्यावरणीय कानूनों पर विवरणात्मक टिप्पणी
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक मजबूत विधिक ढाँचा विकसित किया गया है। निम्नलिखित प्रमुख अधिनियम इस ढाँचे की रीढ़ हैं:
1. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986)
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- पृष्ठभूमि: स्टॉकहोम सम्मेलन (1972) में भारत द्वारा दिए गए वचन का परिणाम था। इसका निर्माण भोपाल गैस त्रासदी (1984) के पश्चात हुआ, जिसने केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक अधिकार देने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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- उद्देश्य: पर्यावरण के संरक्षण, सुधार तथा प्रदूषण निवारण हेतु एक समग्र कानून बनाना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- केंद्र सरकार को देश भर में पर्यावरण की गुणवत्ता बनाए रखने तथा सुधारने के लिए अधिकार देना।
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- पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को ‘ईको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित करने का अधिकार।
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- विभिन्न उद्योगों, प्रक्रियाओं तथा स्थानों के लिए उत्सर्जन और अपवर्जन मानक निर्धारित करना।
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- खतरनाक पदार्थों के प्रबंधन के लिए नियम बनाना।
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- अधिनियम के उल्लंघन पर कारावास और जुर्माने का प्रावधान।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: यह एक ‘अम्ब्रेला विधान’ (Umbrella Legislation) है जो अन्य पर्यावरणीय कानूनों के अंतर्गत आने वाले मुद्दों को कवर करता है और केंद्र सरकार को इन कानूनों को लागू करने की शक्ति प्रदान करता है।
2. वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981)
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- पृष्ठभूमि: वायु प्रदूषण से निपटने के लिए यह भारत का पहला विशिष्ट कानून था।
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- उद्देश्य: वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उसमें कमी लाना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- राज्यों में ‘राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (SPCB) और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (CPCB) की स्थापना का प्रावधान।
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- बोर्डों को वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित करने का अधिकार।
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- औद्योगिक तथा अन्य इकाइयों से उत्सर्जन के मानकों को निर्धारित करना तथा उनकी निगरानी करना।
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- ऐसे उद्योगों को, जो वायु प्रदूषण फैलाते हैं, स्थापित करने या संचालित करने हेतु बोर्ड से सहमति लेना अनिवार्य।
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- वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: इस अधिनियम ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्रदान किया और पर्यावरणीय नियामकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
3. जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974)
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- पृष्ठभूमि: यह भारत का जल प्रदूषण से सीधे निपटने वाला प्रथम प्रमुख कानून था।
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- उद्देश्य: जल प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण तथा देश में जल की गुणवत्ता बनाए रखना एवं उसमें सुधार करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- केंद्रीय तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की स्थापना (इन्हीं बोर्डों को बाद में वायु अधिनियम के अंतर्गत भी भूमिका दी गई)।
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- बोर्डों को जल निकायों (नदी, कुँआ, झील आदि) में प्रदूषकों के विसर्जन पर नियंत्रण करने का अधिकार।
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- किसी भी उद्योग, संचालन या प्रक्रिया द्वारा सीवेज या औद्योगिक effluents को जल में विसर्जित करने हेतु बोर्ड से ‘सहमति’ (Consent) लेना अनिवार्य।
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- बोर्डों को जल के नमूने लेने तथा प्रदूषण फैलाने वालों पर मुकदमा चलाने की शक्ति।
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- जल प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: इसने भारत में जल संसाधनों के संरक्षण की नींव रखी और ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (Polluter Pays Principle) के सिद्धांत को व्यवहार में लाने का मार्ग प्रशस्त किया।
4. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest (Conservation) Act, 1980)
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- पृष्ठभूमि: 1952 की वन नीति के बाद वनों के तीव्र गति से ह्रास के कारण इस अधिनियम का निर्माण हुआ। इसका उद्देश्य वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों में अंधाधुंध परिवर्तन पर रोक लगाना था।
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- उद्देश्य: देश के वनों के संरक्षण तथा वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों में परिवर्तन पर नियंत्रण स्थापित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- किसी भी ‘आरक्षित वन’ (Reserved Forest) भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्य के लिए उपयोग में लेने हेतु केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य।
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- वन भूमि पर वनीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले पेड़ों की खेती के अलावा किसी भी प्रकार की खेती पर रोक।
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- राज्य सरकार बिना केंद्र की अनुमति के किसी भी वन भूमि को व्यक्ति या संस्था को लीज पर नहीं दे सकती।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: यह अधिनियम वनों की कटाई पर नियंत्रण के लिए एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ है। इसने वन भूमि के डायवर्जन के लिए एक स्पष्ट और केंद्र-नियंत्रित प्रक्रिया स्थापित की, जिससे परियोजनाओं पर पर्यावरणीय दृष्टि से गहन विचार हो सके।
निष्कर्ष
ये चारों अधिनियम मिलकर भारत के पर्यावरणीय शासन की नींव का निर्माण करते हैं। जहाँ जल और वायु अधिनियम विशिष्ट प्रदूषण समस्याओं से निपटते हैं, वहीं वन संरक्षण अधिनियम प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर केंद्रित है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम एक सर्वव्यापी कानून के रूप में कार्य करता है जो सरकार को इन सभी क्षेत्रों में नियम बनाने और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करता है। एक सिविल सेवक के लिए इन कानूनों की बारीकियों को समझना, टिकाऊ विकास और पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पारिस्थितिकी तंत्र – अवधारणा, संरचना एवं कार्य
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की अवधारणा
पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की एक मौलिक कार्यात्मक इकाई है जहाँ जीवधारी (सजीव घटक) एक-दूसरे के साथ तथा अपने भौतिक पर्यावरण (निर्जीव घटक) के साथ अंत:क्रिया करते हैं, जिससे ऊर्जा का प्रवाह होता है और इससे पदार्थों के चक्रण द्वारा एक स्पष्ट जैविक संरचना का निर्माण होता है।
सरल शब्दों में, “पारिस्थितिकी तंत्र = जीव समुदाय + भौतिक पर्यावरण“।
इस अवधारणा को सर्वप्रथम ए. जी. टांसले (A.G. Tansley) ने 1935 में प्रतिपादित किया था। यह एक ऐसी प्रणाली है जो स्वयं अपने आप में पोषण (न्यूट्रिशन), उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) और स्थायित्व (सस्टेनेबिलिटी) बनाए रखती है।
पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना
पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को मुख्य रूप से दो घटकों में बाँटा जा सकता है:
- अजैविक घटक (Abiotic Components)
- ये निर्जीव पदार्थ और भौतिक कारक हैं जो वातावरण को बनाते हैं।
- उदाहरण:
- अकार्बनिक पदार्थ: कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, पानी, फॉस्फोरस आदि।
- कार्बनिक पदार्थ: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, ह्यूमस आदि।
- भौतिक कारक: सूर्य का प्रकाश, तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा, मृदा की प्रकृति आदि।
- जैविक घटक (Biotic Components)
- ये सभी जीवधारी हैं जो पर्यावरण के सजीव भाग का निर्माण करते हैं। इन्हें पोषण के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:
- उत्पादक (Producers): ये स्वपोषी (Autotrophs) जीव हैं जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। उदाहरण: हरे पौधे, शैवाल, कुछ जीवाणु।
- उपभोक्ता (Consumers): ये परपोषी (Heterotrophs) जीव हैं जो अपने भोजन के लिए उत्पादकों या अन्य उपभोक्ताओं पर निर्भर करते हैं। इन्हें आगे वर्गीकृत किया गया है:
- शाकाहारी (Herbivores): प्राथमिक उपभोक्ता (जैसे – हिरण, खरगोश)।
- मांसाहारी (Carnivores): द्वितीयक एवं तृतीयक उपभोक्ता (जैसे – शेर, बाज)।
- सर्वाहारी (Omnivores): जो पौधे और जंतु दोनों खाते हैं (जैसे – मनुष्य, कौआ)।
- परजीवी (Parasites): जो अन्य जीवों के शरीर से पोषण प्राप्त करते हैं।
- अपघटक (Decomposers) या अपमार्जक (Reducers): ये सूक्ष्मजीव (जीवाणु, कवक) हैं जो मृत जीवों के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में विघटित कर देते हैं, जिन्हें पुन: उत्पादक उपयोग में लेते हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
- ये सभी जीवधारी हैं जो पर्यावरण के सजीव भाग का निर्माण करते हैं। इन्हें पोषण के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:
पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य
पारिस्थितिकी तंत्र के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं, जो इसे एक गतिशील और कार्यशील इकाई बनाते हैं:
| 1. ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow) | पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) होता है। यह सूर्य से प्रारंभ होकर उत्पादकों, विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं से होते हुए अपघटकों तक जाती है। यह प्रक्रिया खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और खाद्य जाल (Food Web) के माध्यम से संपन्न होती है। यह ऊर्जा पिरामिड के नियमों का पालन करती है। |
| 2. पोषक चक्रण (Nutrient Cycling) | इसे ‘जैव-रासायनिक चक्र’ (Biogeochemical Cycle) भी कहते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, जल आदि जैसे पोषक तत्वों का चक्रण होता रहता है। ये तत्व निर्जीव पर्यावरण से जीवों में और जीवों से वापस पर्यावरण में अपघटकों की सहायता से पहुँचते हैं। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है। |
| 3. खाद्य श्रृंखला एवं जाल (Food Chain and Web) | यह ऊर्जा प्रवाह और पोषक चक्रण का मार्ग प्रदर्शित करती है। एक जीव से दूसरे जीव में भोजन और ऊर्जा के हस्तांतरण की श्रृंखला को खाद्य श्रृंखला कहते हैं। जब अनेक खाद्य श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ जाती हैं, तो वे एक जटिल खाद्य जाल का निर्माण करती हैं। |
| 4. पारिस्थितिकी अनुक्रमण (Ecological Succession) | समय के साथ एक पारिस्थितिकी तंत्र में जीव समुदायों के क्रमिक परिवर्तन की प्रक्रिया को अनुक्रमण कहते हैं। यह एक नग्न या बंजर क्षेत्र में जीवन की शुरुआत (प्राथमिक अनुक्रमण) या मौजूदा समुदाय के विनाश के बाद पुनर्निर्माण (द्वितीयक अनुक्रमण) से होती है, जो एक स्थिर क्लाइमेक्स समुदाय की ओर ले जाती है। |
| 5. उत्पादकता (Productivity) | यह पारिस्थितिकी तंत्र की वह दर है जिस पर जैवमात्रा (Biomass) का उत्पादन होता है। यह दो प्रकार की होती है:
|
निष्कर्ष
पारिस्थितिकी तंत्र की अवधारणा, इसकी संरचना और कार्य पारिस्थितिकी विज्ञान की आधारशिला हैं। यह समझ पर्यावरण संतुलन बनाए रखने, जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रकृति में सब कुछ परस्पर जुड़ा हुआ है और इस जटिल जाल का कोई भी हिस्सा अलग-थलग नहीं रह सकता।
प्राकृतिक संसाधन: नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय संसाधन
प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर पाए जाने वाले वे पदार्थ या तत्व हैं जिनका उपयोग मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है। इन संसाधनों का निर्माण प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा होता है और ये मानवीय हस्तक्षेप के बिना अस्तित्व में आते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: नवीकरणीय संसाधन और गैर-नवीकरणीय संसाधन।
1. नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources)
नवीकरणीय संसाधन वे संसाधन हैं जो प्रकृति में स्वाभाविक रूप से और लगातार पुनः पूर्ति योग्य होते हैं। इनका उपयोग करने के बाद भी ये समय के साथ-साथ स्वतः या मानवीय प्रयासों से फिर से उपलब्ध हो जाते हैं।
नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरण:
- सौर ऊर्जा: सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा, जो अनंत और प्रदूषण-मुक्त है।
- पवन ऊर्जा: हवा की गति से उत्पन्न ऊर्जा, जिसका उपयोग बिजली बनाने के लिए किया जाता है।
- जल ऊर्जा: नदियों के बहते जल से उत्पन्न ऊर्जा।
- जैव-भार (बायोमास): पौधों और जैविक कचरे से प्राप्त ऊर्जा।
- भू-तापीय ऊर्जा: पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त ऊष्मा ऊर्जा।
- ज्वारीय ऊर्जा: समुद्र के ज्वार-भाटा से प्राप्त ऊर्जा।
विशेषताएँ:
- ये संसाधन प्रकृति में लगातार पुनः पूर्ति योग्य होते हैं।
- ये पर्यावरण के अनुकूल और प्रदूषण कम करने वाले होते हैं।
- इनके भंडार असीमित माने जाते हैं।
- इन पर निर्भरता सतत विकास के लिए आवश्यक है।
2. गैर-नवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources)
गैर-नवीकरणीय संसाधन वे संसाधन हैं जिनके निर्माण में लाखों वर्षों का समय लगता है और एक बार उपयोग करने के बाद इनकी पूर्ति नहीं की जा सकती। इनके भंडार सीमित हैं और इनके अत्यधिक दोहन से ये समाप्त हो सकते हैं।
गैर-नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरण:
- जीवाश्म ईंधन: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस। ये प्राचीन जीवों के अवशेषों से बने हैं।
- खनिज: लौह अयस्क, तांबा, सोना, बॉक्साइट, अल्युमीनियम आदि।
- परमाणु ऊर्जा के स्रोत: यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोएक्टिव खनिज।
विशेषताएँ:
- इनके भंडार सीमित और समाप्त होने वाले हैं।
- इनके निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत मंद गति से होती है।
- इनके दहन से वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
- ये औद्योगिक विकास और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत रहे हैं।
नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय संसाधनों में अंतर
| आधार | नवीकरणीय संसाधन | गैर-नवीकरणीय संसाधन |
| पुनः पूर्ति | तीव्र गति से पुनः पूर्ति योग्य | पुनः पूर्ति योग्य नहीं |
| भंडार | असीमित | सीमित |
| पर्यावरणीय प्रभाव | कम प्रदूषणकारी | अधिक प्रदूषणकारी |
| लागत | प्रारंभिक लागत अधिक, परिचालन लागत कम | निष्कर्षण लागत अधिक |
| उदाहरण | सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल | कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस |
| भविष्य | टिकाऊ विकास का आधार | समाप्त होने का खतरा |
निष्कर्ष
गैर-नवीकरणीय संसाधनों के तेजी से घटते भंडार और पर्यावरण पर उनके हानिकारक प्रभावों को देखते हुए, वैश्विक ऊर्जा नीति का फोकस अब नवीकरणीय संसाधनों की ओर स्थानांतरित हो रहा है। भारत जैसे देशों के लिए, जहाँ ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का विकास न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसलिए, एक संतुलित और टिकाऊ भविष्य के लिए नवीकरणीय संसाधनों के दोहन एवं संरक्षण पर समान रूप से बल देना आवश्यक है।
पर्यावरणीय संरक्षण – स्वस्थाने (In-situ) और परस्थाने (Ex-situ) संरक्षण
पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने तथा जैव विविधता के ह्रास को रोकने के लिए संरक्षण एक अनिवार्य रणनीति है। संरक्षण की मुख्य रूप से दो विधियाँ हैं: स्वस्थाने (In-situ) और परस्थाने (Ex-situ) संरक्षण।
स्वस्थाने संरक्षण (In-situ Conservation)
स्वस्थाने संरक्षण का अर्थ है “प्राकृतिक आवास (मूल स्थान) के भीतर ही” जीवों तथा पादपों का संरक्षण करना। यह विधि पारिस्थितिकी तंत्र की संपूर्णता को बनाए रखने पर केंद्रित है।
स्वस्थाने संरक्षण के मुख्य उपाय:
- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): ये पूर्णतः संरक्षित क्षेत्र होते हैं जहाँ मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती। उदाहरण: कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान।
- वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): इनमें राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में कुछ नियम शिथिल होते हैं तथा स्थानीय लोगों की कुछ गतिविधियों की अनुमति हो सकती है। उदाहरण: भरतपुर पक्षी अभयारण्य, गिर वन्यजीव अभयारण्य।
- जीवमंडल संरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves): ये विशाल क्षेत्र होते हैं जो संरक्षण, अनुसंधान और सतत विकास को एक साथ समाहित करते हैं। इनमें एक कोर जोन (पूर्ण संरक्षण), बफर जोन (सीमित गतिविधि) और संक्रमण क्षेत्र (मानव बस्ती) होता है। उदाहरण: नीलगिरि, सुंदरबन, पंचमढ़ी।
लाभ:
- प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण।
- जीवों को प्राकृतिक व्यवहार एवं अनुकूलन का अवसर।
- दीर्घकालिक और लागत-प्रभावी समाधान।
- बड़ी आबादी का संरक्षण संभव।
परस्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation)
परस्थाने संरक्षण का अर्थ है “प्राकृतिक आवास से बाहर” जीवों तथा पादपों का संरक्षण करना। जब किसी प्रजाति के विलुप्त होने का गंभीर खतरा होता है, तो इस विधि का सहारा लिया जाता है।
परस्थाने संरक्षण के मुख्य उपाय:
- चिड़ियाघर (Zoological Parks): जंतुओं को प्रदर्शन एवं प्रजनन हेतु रखा जाता है।
- वनस्पति उद्यान (Botanical Gardens): दुर्लभ और संकटग्रस्त पौधों को संग्रहित और संरक्षित किया जाता है।
- वन्यजीव प्रजनन केंद्र (Wildlife Safari Parks): जंतुओं को उनके प्राकृतिक आवास जैसे वातावरण में रखा जाता है।
- क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation): जर्मप्लाज्म (बीज, बीजाणु, शुक्राणु आदि) को अतिनिम्न तापमान पर संरक्षित किया जाता है।
- जीन बैंक (Gene Banks): आनुवंशिक सामग्री (DNA, बीज, ऊतक) का दीर्घकालिक भंडारण।
लाभ:
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए तत्काल सुरक्षा।
- आनुवंशिक विविधता का संरक्षण।
- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं शिक्षा के लिए बेहतर अवसर।
- प्रजातियों को पुन: प्राकृतिक आवास में बसाने (Re-introduction) में सहायक।
निष्कर्ष
स्वस्थाने और परस्थाने संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं। स्वस्थाने संरक्षण आदर्श और प्राथमिकता वाला तरीका है, जबकि परस्थाने संरक्षण एक आपातकालीन सुरक्षा जाल (Safety Net) का काम करता है। भारत में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’, ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ जैसे कार्यक्रम स्वस्थाने संरक्षण के उदाहरण हैं, वहीं चिड़ियाघर और जैविक उद्यान परस्थाने संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। एक सफल संरक्षण रणनीति के लिए दोनों विधियों का समन्वित उपयोग आवश्यक है।
प्रदूषण: कारण, प्रभाव एवं नियंत्रण
प्रदूषण का अर्थ है – पर्यावरण में अवांछित पदार्थों (प्रदूषकों) का मिलना, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है तथा मानव, पशु-पक्षी, पौधों आदि के स्वास्थ्य एवं कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण मुख्यतः पाँच प्रकार का होता है।
1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)
परिभाषा: वायुमंडल में हानिकारक गैसों (जैसे CO, SO2, NOx) तथा सूक्ष्म कणों (Particulate Matter) की मात्रा का बढ़ना, जो जीव-जंतुओं एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
मुख्य कारण:
- औद्योगिकरण: उद्योगों से निकलने वाला धुआँ एवं रसायन।
- वाहन: डीजल-पेट्रोल वाहनों से निकलने वाला धुआँ।
- ऊर्जा उत्पादन: कोयला आधारित ताप बिजली घर।
- कृषि कार्य: फसल अवशेष जलाना (पराली जलाना)।
- निर्माण कार्य: निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल।
प्रमुख प्रभाव:
- मानव स्वास्थ्य: श्वसन रोग (दमा, ब्रोंकाइटिस), हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर।
- पर्यावरण: अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षय।
- आर्थिक: फसलों की उत्पादकता में कमी, संरचनात्मक क्षति।
नियंत्रण के उपाय:
- वाहनों में उत्प्रेरक कनवर्टर (Catalytic Converter) का प्रयोग।
- औद्योगिक इकाइयों के लिए उत्सर्जन मानक (Emission Standards) का पालन।
- स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) को बढ़ावा।
- जन जागरूकता एवं सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन।
2. जल प्रदूषण (Water Pollution)
परिभाषा: जल निकायों (नदियों, झीलों, समुद्रों, जल-भरावों) में हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे जल की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि वह उपयोग के लायक नहीं रहता।
मुख्य कारण:
- औद्योगिक अपशिष्ट: रासायनिक एवं विषैले कचरे का सीधे नदियों में विसर्जन।
- अपशिष्ट जल (Sewage): घरेलू मल-मूत्र एवं गंदे पानी का अनुपचारित निस्तारण।
- कृषि रसायन: खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक एवं कीटनाशक।
- ठोस कचरा: नदियों में प्लास्टिक एवं अन्य कचरे का फेंका जाना।
प्रमुख प्रभाव:
- जलजनित रोग: हैजा, टाइफाइड, पीलिया।
- जलीय生态系统 का विनाश: ऑक्सीजन की कमी (यूट्रोफिकेशन) से जलीय जीवों की मृत्यु।
- भूजल संदूषण: विषैले रसायनों का भूजल में रिसाव।
नियंत्रण के उपाय:
- सीवेज उपचार संयंत्र (Sewage Treatment Plants – STPs) का निर्माण।
- नदियों की सफाई हेतु मिशन (जैसे- नमामि गंगे)।
- जैव-उपचार (Bioremediation) तकनीकों का उपयोग।
- कृषि में जैविक खाद एवं जैव कीटनाशकों को बढ़ावा।
3. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
परिभाषा: वह अवांछित या अत्यधिक तीव्र ध्वनि जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय गुणवत्ता के लिए हानिकारक है।
मुख्य कारण:
- यातायात: वाहनों, रेलवे एवं विमानों का शोर।
- औद्योगिक गतिविधियाँ: मशीनों, जेनरेटरों आदि का शोर।
- निर्माण कार्य: ड्रिलिंग, विस्फोट आदि।
- सामाजिक/धार्मिक कार्यक्रम: लाउडस्पीकरों का प्रयोग।
प्रमुख प्रभाव:
- श्रवण हानि: स्थायी या अस्थायी बहरापन।
- मनोवैज्ञानिक: तनाव, चिड़चिड़ापन, नींद में खलल।
- शारीरिक: उच्च रक्तचाप, हृदय गति अनियमितता।
नियंत्रण के उपाय:
- शोर नियंत्रण नियमों (Noise Pollution Rules) का कड़ाई से पालन।
- हॉर्न के अनावश्यक प्रयोग पर प्रतिबंध।
- औद्योगिक एवं निर्माण क्षेत्रों में शोर रोधी उपकरणों का प्रयोग।
- हरित पट्टी (Green Belts) का विकास।
4. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
परिभाषा: मृदा में विषैले रसायनों, लवणों, रोगजनकों या प्रदूषकों की उच्च सांद्रता का मिलना, जिससे मृदा की उर्वरता एवं स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
मुख्य कारण:
- कृषि रसायन: अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग।
- औद्योगिक अपशिष्ट: भारी धातुओं (सीसा, पारा) का मृदा में मिलना।
- अनुपचारित सीवेज: सीवेज के पानी से सिंचाई।
- ठोस कचरे का अनुचित निपटान: लैंडफिल साइटों से रिसाव।
प्रमुख प्रभाव:
- मृदा उर्वरता में कमी।
- खाद्य श्रृंखला में विषाक्त पदार्थों का प्रवेश।
- भूजल का प्रदूषण।
नियंत्रण के उपाय:
- जैविक खेती को बढ़ावा।
- वर्मीकम्पोस्टिंग (केंचुआ खाद) का उपयोग।
- अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण (Recycling)।
- वनीकरण द्वारा मृदा अपरदन रोकना।
ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management)
ठोस कचरा प्रबंधन से तात्पर्य कचरे के संग्रहण, परिवहन, उपचार एवं निपटान की एक व्यवस्थित प्रक्रिया से है। इसे ‘3R’ के सिद्धांत (Reduce, Reuse, Recycle) के माध्यम से प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
कचरे के प्रकार:
- बायोडिग्रेडेबल कचरा: रसोई का कचरा, फल-सब्जियों के छिलके, बगीचे का कचरा।
- अपघटनशील कचरा: प्लास्टिक, काँच, धातु, इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste)।
- चिकित्सा कचरा: अस्पतालों से निकलने वाला संक्रामक कचरा।
- निर्माण एवं विध्वंस कचरा: इमारतों के निर्माण एवं ढहाने से निकला मलबा।
प्रबंधन की प्रक्रिया:
| 1. स्रोत पर पृथक्करण | कचरे को गीला (जैविक) एवं सूखा (पुनर्चक्रण योग्य) में अलग करना। |
| 2. संग्रहण | अलग-अलग कचरे को अलग-अलग वाहनों द्वारा एकत्रित करना। |
| 3. परिवहन | कचरे को संग्रहण केंद्र से उपचार स्थल तक ले जाना। |
| 4. उपचार एवं निपटान | विभिन्न तरीकों से कचरे का प्रसंस्करण। |
उपचार के तरीके:
- लैंडफिल: कचरे को भूमि में दबाना। (पर्यावरण के लिए हानिकारक)।
- कम्पोस्टिंग: जैविक कचरे को सूक्ष्मजीवों की सहायता से खाद में बदलना।
- वर्मीकम्पोस्टिंग: केंचुओं की सहायता से उच्च गुणवत्ता वाली खाद बनाना।
- अपशिष्ट से ऊर्जा (Waste to Energy): कचरे को जलाकर बिजली उत्पन्न करना।
- पुनर्चक्रण (Recycling): प्लास्टिक, काँच, धातु आदि को पुनः उपयोग हेतु तैयार करना।
सरकारी पहल:
- स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): खुले में शौच मुक्ति एवं ठोस कचरा प्रबंधन पर जोर।
- कचरा मुक्त शहर (Garbage Free Cities): शहरों को कचरा मुक्त बनाने का लक्ष्य।
- प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016: एकल-उपयोग प्लास्टिक पर नियंत्रण।
निष्कर्ष: प्रदूषण एवं कचरा प्रबंधन आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसके समाधान हेतु तकनीकी नवाचार, कड़े नियमन एवं जन सहभागिता तीनों आवश्यक हैं। सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु एक समग्र एवं समन्वित दृष्टिकोण ही सफलता की कुंजी है।
जैव विविधता: अवधारणा, हॉटस्पॉट एवं जैव विविधता के लिए खतरे
परिचय
जैव विविधता (Biodiversity) पृथ्वी पर जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता को दर्शाता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना एवं कार्यप्रणाली का आधार है तथा मानव कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जैव विविधता की अवधारणा (Concept of Biodiversity)
जैव विविधता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वाल्टर जी. रोसेन ने 1985 में किया था। इसे मुख्यतः तीन स्तरों पर परिभाषित किया जाता है:
- आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही जाति (Species) के विभिन्न सदस्यों के बीच आनुवंशिक लक्षणों में पाई जाने वाली विभिन्नता। उदाहरण: मनुष्यों में रंग, कद, चेहरे की बनावट आदि में भिन्नता; धान की विभिन्न किस्में।
- जातीय विविधता (Species Diversity): किसी निश्चित क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों (पौधों, जंतुओं, सूक्ष्मजीवों) की संख्या और उनकी बहुलता। उदाहरण: एक वन में पाए जाने वाले पेड़, पक्षी, स्तनधारी, कीट आदि।
- पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे वन, घास स्थल, मरुस्थल, आर्द्रभूमि, समुद्री तट, समुद्र आदि की विविधता।
जैव विविधता के हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots)
जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं जहाँ अत्यधिक मात्रा में स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) पाई जाती हैं, लेकिन साथ ही ये क्षेत्र मानवीय गतिविधियों के कारण गंभीर रूप से खतरे में हैं।
हॉटस्पॉट घोषित होने के मापदंड:
- क्षेत्र में कम से कम 1,500 स्थानिक संवहनीय पादप प्रजातियाँ होनी चाहिए।
- क्षेत्र का कम से कम 70% प्राकृतिक आवास नष्ट हो चुका होना चाहिए।
भारत में स्थित प्रमुख हॉटस्पॉट:
- हिमालय (The Himalayas): इसमें भारत, नेपाल, भूटान और चीन के कुछ हिस्से शामिल हैं। यहाँ सफेद भालू, हिम तेंदुआ, लाल पांडा जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- इंडो-बर्मा क्षेत्र (Indo-Burma Region): इसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्य (असम को छोड़कर), अंडमान द्वीप समूह, म्यांमार, थाईलैंड आदि शामिल हैं। यह क्षेत्र स्तनधारियों, सरीसृपों और उभयचरों की विविधता के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
- पश्चिमी घाट (Western Ghats) और श्रीलंका: यह क्षेत्र अत्यधिक स्थानिकता के लिए जाना जाता है। यहाँ सिंह-पुच्छ मकाक, नीलगिरि तहर, और बड़ी संख्या में मेंढक एवं छिपकली की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- सुंडालैंड (Sundaland): भारत के निकोबार द्वीप समूह इसी हॉटस्पॉट का हिस्सा हैं।
जैव विविधता के लिए खतरे (Threats to Biodiversity)
वर्तमान में जैव विविधता का ह्रास एक गंभीर वैश्विक चिंता का विषय है। इसके लिए उत्तरदायी प्रमुख खतरे निम्नलिखित हैं:
- आवास विनाश, खंडन एवं अवक्रमण (Habitat Loss, Fragmentation and Degradation): वनों की कटाई, कृषि विस्तार, शहरीकरण, खनन और बुनियादी ढाँचे के विकास के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट, टुकड़ों में बंट या खराब हो रहे हैं। यह जैव विविधता ह्रास का सबसे बड़ा कारण है।
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Invasion of Alien Species): जब कोई बाहरी प्रजाति नए क्षेत्र में पहुँचती है, तो वह स्थानीय प्रजातियों के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करके, उन्हें शिकार बनाकर या रोग फैलाकर उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है। उदाहरण: भारत में गाजर घास (Parthenium), लैंटाना, और अमेरिकन मोस्किटोफिश।
- प्रदूषण (Pollution): वायु, जल और मृदा प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदूषित करके प्रजातियों के स्वास्थ्य और अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक प्रदूषण और औद्योगिक कचरा प्रमुख समस्याएँ हैं।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change): वैश्विक तापमान में वृद्धि, वर्षा चक्र में बदलाव और चरम मौसमी घटनाएँ (बाढ़, सूखा) प्रजातियों के निवास स्थान, प्रजनन चक्र और प्रवासन पैटर्न को बाधित कर रही हैं।
- अति-दोहन (Overexploitation): आवश्यकता से अधिक मात्रा में वन्यजीवों का शिकार, मत्स्यन और वनोपज का संग्रह। उदाहरण: हाथी दाँत के लिए हाथियों का शिकार, तेंदुआ खाल के लिए शिकार, शार्क के पंख के लिए मत्स्यन।
- मानव-जनित आग (Anthropogenic Fires): वनों में लगने वाली आग, चाहे प्राकृतिक हो या मानवजनित, पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाती है और अनेक प्रजातियों को मार देती है।
निष्कर्ष
जैव विविधता पृथ्वी का एक अनमोल संसाधन है जो हमें भोजन, फाइबर, दवाएँ, जल शुद्धिकरण, जलवायु विनियमन और सांस्कृतिक एवं सौंदर्य संबंधी लाभ प्रदान करती है। इसके तेजी से हो रहे ह्रास ने वैश्विक स्तर पर चिंता उत्पन्न कर दी है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए सतत विकास को बढ़ावा देना, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार करना, स्थानीय समुदायों को शामिल करना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (जैसे- CBD, CITES) को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।
वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे
वर्तमान समय में पूरा विश्व कई गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ये मुद्दे अब स्थानीय या क्षेत्रीय न रहकर वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं और इनके समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। प्रमुख वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे निम्नलिखित हैं:
1. जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
अर्थ: पृथ्वी के सामान्य जलवायु प्रतिरूप में दीर्घकालिक परिवर्तन। इसमें तापमान, वर्षा, हवा के प्रतिरूप आदि में बदलाव शामिल हैं।
कारण:
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- ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) का बढ़ता स्तर।
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- जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का दहन।
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- वनों की कटाई (Deforestation)।
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- औद्योगिकरण एवं शहरीकरण।
प्रभाव:
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- चरम मौसमी घटनाओं (बाढ़, सूखा, चक्रवात) में वृद्धि।
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- समुद्र के स्तर में वृद्धि।
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- कृषि उत्पादन पर नकारात्मक असर।
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- पारिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता को खतरा।
समाधान: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (पेरिस समझौता), नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, ऊर्जा दक्षता, वनीकरण।
2. वैश्विक तापन (Global Warming)
अर्थ: जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख पहलू, जिसमें पृथ्वी के औसत वायुमंडलीय तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है।
कारण: ग्रीनहाउस प्रभाव में तीव्र वृद्धि। सूर्य की गर्मी को सोखने वाली गैसों (ग्रीनहाउस गैसों) की वायुमंडल में मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।
प्रभाव:
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- ध्रुवीय बर्फ का पिघलना और हिमनदों का सिकुड़ना।
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- महासागरों का अम्लीकरण (Ocean Acidification)।
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- मौसम चक्रों में गड़बड़ी।
3. ओज़ोन परत का ह्रास (Ozone Layer Depletion)
अर्थ: वायुमंडल की स्ट्रैटोस्फीयर परत में स्थित ओज़ोन (O₃) गैस की परत का पतला होना। यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को रोकती है।
कारण: मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों का उत्सर्जन, जो रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एरोसॉल स्प्रे में प्रयोग होते थे।
प्रभाव:
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- त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिंद के मामलों में वृद्धि।
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- मानव प्रतिरक्षा प्रणाली पर दबाव।
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- फसलों एवं समुद्री प्लवक (Phytoplankton) को नुकसान।
समाधान: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) एक सफल वैश्विक समझौता, जिसके तहत ओज़ोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया गया।
4. अम्ल वर्षा (Acid Rain)
अर्थ: वर्षा, हिम, कोहरा या धूल का अम्लीय होना। यह तब होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जैसी गैसें वायुमंडल में जल के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं।
कारण:
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- कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईंधन का दहन।
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- औद्योगिक प्रक्रियाएं।
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- वाहनों से निकलने वाला धुआं।
प्रभाव:
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- झीलों और नदियों का अम्लीय होना, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है।
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- मृदा की उर्वरता में कमी।
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- इमारतों, स्मारकों और धातु की संरचनाओं का क्षरण।
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- वनों को नुकसान।
5. मरुस्थलीकरण (Desertification)
अर्थ: किसी भी शुष्क या अर्ध-शुष्क क्षेत्र की भूमि का उर्वरता और उत्पादकता खोकर मरुस्थल में बदलना। यह भूमि क्षरण (Land Degradation) का चरम रूप है।
कारण:
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- मानवजनित: अति-चराई, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, वनों की कटाई, जल संसाधनों का अति-दोहन।
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- प्राकृतिक: अनियमित वर्षा, सूखा।
प्रभाव:
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- कृषि योग्य भूमि का सिकुड़ना।
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- खाद्य सुरक्षा को खतरा।
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- जैव विविधता का नुकसान।
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- पर्यावरणीय शरणार्थियों की समस्या।
समाधान: टिकाऊ भू-प्रबंधन, वनीकरण, वाटर हार्वेस्टिंग, समोच्च बंधान (Contour Bunding) जैसी तकनीकों का प्रयोग।
निष्कर्ष
ये सभी वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। इनके समाधान के लिए केवल सरकारों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर भी प्रयास आवश्यक हैं। टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को अपनाकर ही हम भविष्य में एक स्वस्थ और सुरक्षित ग्रह सुनिश्चित कर सकते हैं।
पर्यावरणीय कानूनों पर विवरणात्मक टिप्पणी
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक मजबूत विधिक ढाँचा विकसित किया गया है। निम्नलिखित प्रमुख अधिनियम इस ढाँचे की रीढ़ हैं:
1. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986)
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- पृष्ठभूमि: स्टॉकहोम सम्मेलन (1972) में भारत द्वारा दिए गए वचन का परिणाम था। इसका निर्माण भोपाल गैस त्रासदी (1984) के पश्चात हुआ, जिसने केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक अधिकार देने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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- उद्देश्य: पर्यावरण के संरक्षण, सुधार तथा प्रदूषण निवारण हेतु एक समग्र कानून बनाना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- केंद्र सरकार को देश भर में पर्यावरण की गुणवत्ता बनाए रखने तथा सुधारने के लिए अधिकार देना।
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- पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को ‘ईको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित करने का अधिकार।
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- विभिन्न उद्योगों, प्रक्रियाओं तथा स्थानों के लिए उत्सर्जन और अपवर्जन मानक निर्धारित करना।
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- खतरनाक पदार्थों के प्रबंधन के लिए नियम बनाना।
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- अधिनियम के उल्लंघन पर कारावास और जुर्माने का प्रावधान।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: यह एक ‘अम्ब्रेला विधान’ (Umbrella Legislation) है जो अन्य पर्यावरणीय कानूनों के अंतर्गत आने वाले मुद्दों को कवर करता है और केंद्र सरकार को इन कानूनों को लागू करने की शक्ति प्रदान करता है।
2. वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981)
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- पृष्ठभूमि: वायु प्रदूषण से निपटने के लिए यह भारत का पहला विशिष्ट कानून था।
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- उद्देश्य: वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उसमें कमी लाना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- राज्यों में ‘राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (SPCB) और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (CPCB) की स्थापना का प्रावधान।
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- बोर्डों को वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित करने का अधिकार।
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- औद्योगिक तथा अन्य इकाइयों से उत्सर्जन के मानकों को निर्धारित करना तथा उनकी निगरानी करना।
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- ऐसे उद्योगों को, जो वायु प्रदूषण फैलाते हैं, स्थापित करने या संचालित करने हेतु बोर्ड से सहमति लेना अनिवार्य।
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- वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: इस अधिनियम ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्रदान किया और पर्यावरणीय नियामकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
3. जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974)
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- पृष्ठभूमि: यह भारत का जल प्रदूषण से सीधे निपटने वाला प्रथम प्रमुख कानून था।
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- उद्देश्य: जल प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण तथा देश में जल की गुणवत्ता बनाए रखना एवं उसमें सुधार करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- केंद्रीय तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की स्थापना (इन्हीं बोर्डों को बाद में वायु अधिनियम के अंतर्गत भी भूमिका दी गई)।
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- बोर्डों को जल निकायों (नदी, कुँआ, झील आदि) में प्रदूषकों के विसर्जन पर नियंत्रण करने का अधिकार।
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- किसी भी उद्योग, संचालन या प्रक्रिया द्वारा सीवेज या औद्योगिक effluents को जल में विसर्जित करने हेतु बोर्ड से ‘सहमति’ (Consent) लेना अनिवार्य।
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- बोर्डों को जल के नमूने लेने तथा प्रदूषण फैलाने वालों पर मुकदमा चलाने की शक्ति।
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- जल प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: इसने भारत में जल संसाधनों के संरक्षण की नींव रखी और ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (Polluter Pays Principle) के सिद्धांत को व्यवहार में लाने का मार्ग प्रशस्त किया।
4. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest (Conservation) Act, 1980)
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- पृष्ठभूमि: 1952 की वन नीति के बाद वनों के तीव्र गति से ह्रास के कारण इस अधिनियम का निर्माण हुआ। इसका उद्देश्य वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों में अंधाधुंध परिवर्तन पर रोक लगाना था।
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- उद्देश्य: देश के वनों के संरक्षण तथा वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों में परिवर्तन पर नियंत्रण स्थापित करना।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- किसी भी ‘आरक्षित वन’ (Reserved Forest) भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्य के लिए उपयोग में लेने हेतु केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य।
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- वन भूमि पर वनीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले पेड़ों की खेती के अलावा किसी भी प्रकार की खेती पर रोक।
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- राज्य सरकार बिना केंद्र की अनुमति के किसी भी वन भूमि को व्यक्ति या संस्था को लीज पर नहीं दे सकती।
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- प्रमुख प्रावधान:
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- महत्व: यह अधिनियम वनों की कटाई पर नियंत्रण के लिए एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ है। इसने वन भूमि के डायवर्जन के लिए एक स्पष्ट और केंद्र-नियंत्रित प्रक्रिया स्थापित की, जिससे परियोजनाओं पर पर्यावरणीय दृष्टि से गहन विचार हो सके।
निष्कर्ष
ये चारों अधिनियम मिलकर भारत के पर्यावरणीय शासन की नींव का निर्माण करते हैं। जहाँ जल और वायु अधिनियम विशिष्ट प्रदूषण समस्याओं से निपटते हैं, वहीं वन संरक्षण अधिनियम प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर केंद्रित है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम एक सर्वव्यापी कानून के रूप में कार्य करता है जो सरकार को इन सभी क्षेत्रों में नियम बनाने और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करता है। एक सिविल सेवक के लिए इन कानूनों की बारीकियों को समझना, टिकाऊ विकास और पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
