Updated on 11/06/23 by Mananjay MahatoShare on WhatsApp

19 : पुरना पतइ कविता

तातल-हेमाल (कविता संग्रह ) का कवि – शिवनाथ प्रमाणिक 

पुरना पतई पोंगापंथी बिचार के अब तो मरे चाही जिनगिक गाछ ले पुरना पतइ झरे चाही । कते दिन से लटकल हे ई गरदने गाली गाली गुचवे खातिर उता – सुता करे चाही । बिलाइर के मॉडवा तरें पइत बछर कते बाँधवे डिहरेक लेल मानुसबादी डहर धरे चाही । डहर नाञ तनिको गामाइ नागेक दुइयो आँखी आँखी लटकल जमल आँचूर के फेरे चाही । कइसें कटे ‘ शिवेक ‘ जाड़ लटकल लेंदरा से मलाइल लेंदरा के खारे डुबाइ खोरे चाही ।

शीर्षक का अर्थ – पुराने पत्ते। 

भावार्थ-पुराने पते पुराने अहितकारी नियमों के प्रतीक हैं। पुराने पते के झड़े बिना नये पत्त आ नहीं सकते। अतः पुराने पतों का झडना जरूरी है अर्थात पुराने नियम-कायदों का, अंधविशसों मान्यताओं,आस्थाओं का समाप्त होना जरूरी है। यह कविता से सुमित्रनंनद पंत की कविता दूत झरों तरू के जीर्व पत्रदल से प्रभावित है।

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पुरना पतइ कविता तातल-हेमाल (कविता संग्रह ) का कवि – शिवनाथ प्रमाणिक