Updated on 11/06/23 by Mananjay MahatoShare on WhatsApp

 नाच बान्दर नाच रे आंखिक गीत NACH BANDAR NACH RE ANKHIK GEET KHORTHA

नाँच बाँदर नाँच रे

नाँच बाँदर नाँच रे

 मोर चाहे बाँच रे 

तोर खातिर सुसनी साग 

हमर खातिर माछ रे

नाँच बाँदर नाँच रे 

मोर चाहे बाँच रे

हमर खातिर सोना चाँदी 

तोर खातिर काँच रे 

नाँच बाँदर नाँच रे 

मोर चाहे बाँच रे

हमर खातिर दलान घर 

तोर खातिर गाछ रे 

नाँच बाँदर नाँच रे 

मोर चाहे बाँच रे ।

कविता का भावार्थ – यह एक यथार्थवादी कविता है। इस कविता में बंदर झारखण्डी जनता का प्रतीक है जिसकी नियति ही शोषित होने की है। बाहर के लोग झारखण्डी जनता का हर तरह से तन, मन, धन का शोषण करते हैं। 

1. ‘नाच बाँदर नाच रे’ कविता केकर लिखल लागे ? श्री निवास पानुरी 

2. नाच बांदर नाच रे ई कविता पाँतात्र बाँदर केकर प्रतीक लागे ? झारखंडी लोक

3 . ‘नाच बाँदर नाच रे’ कोन किताब से लेल गेल हे ? आँखीक गीत

नाच बान्दर नाच रे आंखिक गीत NACH BANDAR NACH RE ANKHIK GEET KHORTHA