जलीय चक्र (Hydrological Cycle)

जलीय चक्र पृथ्वी पर जल के निरंतर संचलन की प्रक्रिया है जिसमें जल अपनी अवस्था बदलता रहता है। यह चक्र निम्नलिखित चरणों में पूरा होता है:

  • वाष्पीकरण (Evaporation): सूर्य के ताप के कारण महासागरों, नदियों, झीलों आदि का जल जलवाष्प में बदल जाता है।
  • वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पौधों द्वारा अपने रंध्रों से जलवाष्प का उत्सर्जन।
  • संघनन (Condensation): वायुमंडल में ऊपर उठकर जलवाष्प ठंडा होकर बादलों का निर्माण करता है।
  • वर्षण (Precipitation): बादलों से जल बूंदों के रूप में वर्षा, हिमपात या ओलावृष्टि के रूप में पृथ्वी पर गिरता है।
  • अपवाह (Runoff): वर्षा का जल नदियों, नालों आदि के माध्यम से पुनः महासागरों में पहुँचता है।
  • अन्त: स्रावण (Infiltration): जल का भूमि में रिसकर भूजल भंडार का निर्माण करना।

महासागरों में ताप वितरण (Temperature Distribution in Oceans)

महासागरों में तापमान का वितरण असमान होता है और यह निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

  • अक्षांश (Latitude): विषुवत रेखा के निकट तापमान अधिक और ध्रुवों की ओर कम होता जाता है।
  • सागरीय धाराएँ (Ocean Currents): गर्म धाराएँ तापमान बढ़ाती हैं जबकि ठंडी धाराएँ तापमान घटाती हैं।
  • पवनें (Winds): पवनें सतही जल का तापमान प्रभावित करती हैं।
  • जल की लवणता (Salinity): अधिक लवणता वाले जल का हिमांक कम होता है।

महासागरों में तापमान ऊर्ध्वाधर रूप से भी बदलता रहता है। सतह से गहराई की ओर जाने पर तापमान घटता जाता है। तापमान प्रवणता (Thermocline) वह क्षेत्र है जहाँ तापमान में तीव्र गिरावट आती है।

महासागरों में लवण वितरण (Salinity Distribution in Oceans)

महासागरीय जल में घुले हुए लवणों की मात्रा को लवणता कहते हैं। यह प्रति हज़ार भाग (ppt) में मापी जाती है। महासागरों की औसत लवणता 35 ppt है। लवणता के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक:

  • वाष्पीकरण और वर्षा का अनुपात: जहाँ वाष्पीकरण अधिक और वर्षा कम होती है, वहाँ लवणता अधिक होती है।
  • महासागरीय धाराएँ: धाराएँ लवणता के वितरण में सहायक होती हैं।
  • मीठे जल का अन्तर्वाह: नदियों के मुहानों पर लवणता कम होती है।
  • समुद्री बर्फ का गलना या जमना: बर्फ के गलने से लवणता घटती है और जमने से बढ़ती है।

लवणता विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर घटती जाती है। भूमध्य सागर, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्रों में लवणता सर्वाधिक पाई जाती है।

तरंगें (Waves)

तरंगें महासागरीय जल की सतह पर उठने वाली लहरें हैं जो पवनों के कारण उत्पन्न होती हैं। तरंग के मुख्य भाग:

  • शिखर (Crest): तरंग का सबसे ऊपरी भाग
  • गर्त (Trough): तरंग का सबसे निचला भाग
  • तरंगदैर्घ्य (Wavelength): दो क्रमागत शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी
  • तरंग ऊँचाई (Wave Height): शिखर और गर्त के बीच की ऊर्ध्वाधर दूरी
  • तरंग आवर्तकाल (Wave Period): दो क्रमागत शिखरों के एक निश्चित बिंदु से गुजरने में लगा समय

तरंगें मुख्यतः अपवहन (सर्फ) के रूप में तट से टकराती हैं जो तटीय कटाव और निक्षेपण का कारण बनती हैं।

ज्वार-भाटा (Tides)

ज्वार-भाटा चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण महासागरीय जल के नियमित उठाव और गिराव की घटना है।

  • ज्वार (High Tide): समुद्र के जल स्तर का अधिकतम ऊपर उठना
  • भाटा (Low Tide): समुद्र के जल स्तर का न्यूनतम स्तर तक गिरना

ज्वार-भाटा के प्रकार:

  • अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal Tides): दिन में दो बार ज्वार और दो बार भाटा
  • दैनिक ज्वार (Diurnal Tides): दिन में एक बार ज्वार और एक बार भाटा
  • मिश्रित ज्वार (Mixed Tides): अर्ध-दैनिक और दैनिक ज्वार का मिश्रण

विशेष ज्वार स्थितियाँ:

  • विसंवादी ज्वार (Neap Tides): चंद्रमा और सूर्य के बीच समकोण बनने पर उत्पन्न कम ऊँचाई वाले ज्वार
  • समवादी ज्वार (Spring Tides): पूर्णिमा और अमावस्या को चंद्रमा और सूर्य के एक सीध में होने पर उत्पन्न उच्च ऊँचाई वाले ज्वार

महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

महासागरीय धाराएँ महासागरों में नदियों के समान निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली जल की धाराएँ हैं। ये दो प्रकार की होती हैं:

  • गर्म धाराएँ (Warm Currents): विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं और तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ाती हैं।
  • ठंडी धाराएँ (Cold Currents): ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर प्रवाहित होती हैं और तटीय क्षेत्रों के तापमान को घटाती हैं।

धाराओं के निर्माण के कारण:

  • पवनें (Winds): व्यापारिक पवनें और पछुआ पवनें धाराओं की दिशा निर्धारित करती हैं।
  • तापमान अंतर (Temperature Difference): विषुवत रेखा और ध्रुवों के बीच तापमान अंतर
  • लवणता अंतर (Salinity Difference): लवणता के अंतर से जल के घनत्व में अंतर
  • पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation): कोरिऑलिस बल के कारण धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।
  • तटीय आकृति (Coastal Configuration): तट की आकृति धाराओं की दिशा प्रभावित करती है।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ:

  • प्रशांत महासागर: क्यूरोशियो धारा, कैलिफोर्निया धारा, पेरू की धारा
  • अटलांटिक महासागर: गल्फ स्ट्रीम, लैब्राडोर धारा, कनारी धारा
  • हिंद महासागर: अगुलहास धारा, मोज़ाम्बिक धारा

महासागरीय तल (Ocean Floor)

महासागरीय तल एक जटिल और विविधतापूर्ण स्थलाकृति वाला क्षेत्र है जिसे निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:

  • महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf): महाद्वीपों के किनारे समुद्र के भीतर फैला हुआ उथला समतल भाग। यह समुद्र तट से लेकर 200 मीटर गहराई तक फैला होता है।
  • महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope): महाद्वीपीय मग्नतट के बाद का खड़ा ढाल वाला भाग जो गहरे सागरीय मैदानों तक जाता है।
  • महाद्वीपीय उद्भित (Continental Rise): महाद्वीपीय ढाल के आधार पर जमा तलछट का ढेर।
  • गहरे सागरीय मैदान (Deep Sea Plains): समुद्र तल के चौड़े समतल मैदान जो 3000-6000 मीटर गहराई में स्थित होते हैं।
  • महासागरीय गर्त (Oceanic Trenches): समुद्र तल के सबसे गहरे भाग जहाँ गहराई 6000 मीटर से अधिक होती है।
  • मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridges): ज्वालामुखीय क्रिया द्वारा निर्मित पर्वत शृंखलाएँ जो महासागरों के मध्य में स्थित होती हैं।
  • समुद्रीय ज्वालामुखी (Seamounts): समुद्र तल से ऊपर उठे हुए ज्वालामुखी पर्वत जिनका शिखर समुद्र सतह से नीचे होता है।
  • गयोट (Guyots): चपटे शिखर वाले समुद्रीय ज्वालामुखी जो कभी समुद्र सतह पर थे लेकिन अब जलमग्न हैं।

महासागरीय तल का अध्ययन समुद्र विज्ञान, प्लेट टेक्टोनिक्स और जलवायु अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

JPSC MAINS PAPER 3/Geography Chapter – 10