प्राकृतिक आपदाएँ: अर्थ, प्रकार, कारण एवं प्रबंधन

प्राकृतिक आपदा प्रकृति में घटित कोई भी गंभीर घटना है जिसके परिणामस्वरूप जन-धन की भारी हानि होती है और जिससे निपटने के लिए बाहरी सहायता की आवश्यकता पड़ती है। भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और जलवायविक परिस्थितियों के कारण विश्व के सबसे अधिक आपदा-प्रवण देशों में से एक है।

1. बाढ़ (Flood)

अर्थ: जल के किसी स्रोत (नदी, झील, समुद्र) का जलस्तर इतना बढ़ जाना कि वह सामान्य सीमाओं से बाहर बहने लगे और आसपास के क्षेत्रों को जलमग्न कर दे, उसे बाढ़ कहते हैं।

  • मुख्य कारण: अत्यधिक वर्षा, बांधों/तटबंधों का टूटना, नदी तल में गाद जमाव, चक्रवातीय तूफान, शहरीकरण के कारण जल निकासी व्यवस्था का अभाव (शहरी बाढ़)।
  • प्रभावित क्षेत्र: उत्तरी भारत के मैदानी इलाके (बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल), तटीय क्षेत्र।
  • प्रभाव: जनजीवन अस्त-व्यस्त होना, कृषि भूमि का नुकसान, जलजनित रोगों (डायरिया, हैजा) का फैलना, बुनियादी ढाँचे को क्षति।
  • प्रबंधन: बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली, तटबंधों एवं डैम का निर्माण, नदियों की ड्रेजिंग, वनीकरण, बाढ़ समतल मैदानों का नियोजन।

2. सूखा (Drought)

अर्थ: किसी विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में लंबे समय तक सामान्य से बहुत कम वर्षा होना, जिससे मिट्टी में नमी की कमी, जल स्रोतों का सूखना और कृषि एवं आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना।

  • मुख्य कारण: मानसून की विफलता, वनों की कटाई, जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन, मृदा अपरदन।
  • प्रभावित क्षेत्र: राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र (विदर्भ), तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और ओडिशा का कुछ भाग (दक्कन का पठार)।
  • प्रभाव: फसलों का नष्ट होना, पशुओं की मृत्यु, अकाल, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में पलायन, जल संकट।
  • प्रबंधन: जल संचयन (वर्षा जल संचयन, चेक डैम), सूखा-सहिष्णु फसलों की किस्में, ड्रिप सिंचाई जैसी जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा, वनीकरण।

3. चक्रवात (Cyclone)

अर्थ: चक्रवात निम्न वायुदाब के केंद्र के चारों ओर तेज गति से घूमती हुई हवाओं की एक प्रणाली है। इसमें हिंसक तूफान और भारी वर्षा होती है।

  • मुख्य कारण: गर्म समुद्री surface (27°C से अधिक), कोरिओलिस बल, वायुमंडलीय अस्थिरता।
  • प्रभावित क्षेत्र: भारत का पूरा तटीय क्षेत्र, विशेषकर पूर्वी तट (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल) और पश्चिमी तट (गुजरात, महाराष्ट्र, केरल)।
  • प्रभाव: तटीय क्षेत्रों में भारी विनाश, उच्च गति की हवाएं और storm surge, बाढ़, संचार व्यवस्था ध्वस्त होना।
  • प्रबंधन: IMD द्वारा सटीक पूर्वानुमान और early warning system, चक्रवात आश्रय स्थलों का निर्माण, मैंग्रोव वनों का संरक्षण (प्राकृतिक बफर), तटीय विनियमन जोन (CRZ) नियम।

4. भूस्खलन (Landslide)

अर्थ: चट्टानों, मलबे या मिट्टी के ढलान के साथ नीचे खिसकने की घटना को भूस्खलन कहते हैं। यह अचानक या धीरे-धीरे हो सकता है।

  • मुख्य कारण: भारी वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, अत्यधिक खनन और निर्माण गतिविधियाँ, वनों की कटाई।
  • प्रभावित क्षेत्र: हिमालयन बेल्ट (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड), पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी राज्य।
  • प्रभाव: सड़कों और रेलमार्गों का अवरुद्ध होना, गाँवों का दुनिया से कट जाना, जन-धन की हानि, नदियों का अवरुद्ध होना (जिससे झील बनने और अचानक बाढ़ का खतरा)।
  • प्रबंधन: ढलान स्थिरीकरण (retaining walls, भूस्खलन रोधी जाल), वनीकरण, भू-उपयोग नियोजन (खतरनाक क्षेत्रों में निर्माण पर रोक), early warning system स्थापित करना।

आपदा प्रबंधन: एक एकीकृत दृष्टिकोण

आपदा प्रबंधन के चार मुख्य चरण हैं:

  1. शमन (Mitigation): आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए दीर्घकालिक उपाय (जैसे – इंजीनियरिंग समाधान, नीति निर्माण)।
  2. तैयारी (Preparedness): आपदा से निपटने की योजना बनाना, अभ्यास करना, early warning system स्थापित करना।
  3. प्रतिक्रिया (Response): आपदा के तुरंत बाद बचाव, राहत और सहायता कार्य।
  4. पुनर्वास (Recovery): प्रभावित क्षेत्र को सामान्य स्थिति में लौटाने के लिए दीर्घकालिक उपाय।

भारत ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 लागू किया है और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की स्थापना की है, जो आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष निकाय है। आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) पर सेंडाई फ्रेमवर्क के साथ एकीकरण भी भारत की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है।

JPSC MAINS PAPER 3/Geography Chapter – 15