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जल संसाधन: एक परिचय

भारत में जल संसाधन देश की आर्थिक समृद्धि और जनसंख्या के कल्याण की आधारशिला हैं। यह कृषि, उद्योग, घरेलू उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन के लिए एक अनिवार्य संसाधन है। हालाँकि, बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने इस सीमित संसाधन पर दबाव को काफी बढ़ा दिया है, जिससे इसका विवेकपूर्ण प्रबंधन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है।

भारत में जल की उपलब्धता

भारत में जल संसाधनों के प्रमुख स्रोत हैं:

  • वर्षा: भारत में अधिकांश जल की प्राप्ति दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। देश का औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1170 मिमी है, लेकिन यह अत्यधिक विषम है – पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी राज्यों में 2500 मिमी से अधिक, जबकि राजस्थान के पश्चिमी भाग में 150 मिमी से भी कम।
  • सतही जल: इसमें नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों का जल शामिल है। भारत में 20 बड़ी नदी घाटियाँ हैं, जिनमें गंगा, ब्रह्मपुत्र, और सिंधु सबसे बड़ी हैं। देश का कुल वार्षिक सतही जल प्रवाह लगभग 1869 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) अनुमानित है।
  • भूगर्भीय जल: भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है, जो सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है। देश का कुल पुन:भरण योग्य भूजल संसाधन लगभग 433 BCM है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, और तमिलनाडु जैसे राज्य कृषि के लिए भूजल पर अत्यधिक निर्भर हैं।

जल का उपयोग (Water Use)

भारत में जल उपयोग के क्षेत्रों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा गया है:

  • सिंचाई (Irrigation): यह जल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो देश के कुल जल उपयोग का लगभग 80-85% हिस्सा है। भारत की कृषि अत्यधिक मानसून पर निर्भर है, इसलिए सिंचाई सुविधाएँ फसल सुरक्षा और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • घरेलू उपयोग (Domestic Use): शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पीने, खाना पकाने, सफाई और स्वच्छता जैसी आवश्यकताओं के लिए जल का उपयोग। यह कुल उपयोग का लगभग 5-7% है, लेकिन शहरीकरण के साथ इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
  • औद्योगिक उपयोग (Industrial Use): विभिन्न उद्योगों जैसे थर्मल पावर प्लांट, स्टील, सीमेंट, रसायन और वस्त्र उद्योग में प्रक्रिया, ठंडा करने और सफाई के लिए जल की आवश्यकता होती है। यह कुल उपयोग का लगभग 8-10% है।
  • अन्य उपयोग: इसमें बिजली उत्पादन (जलविद्युत), नौवहन, मत्स्य पालन और मनोरंजन शामिल हैं।

सिंचाई: विधियाँ एवं चुनौतियाँ

सिंचाई की प्रमुख विधियाँ:

  • पारंपरिक विधियाँ: इनमें कुँआ, नहर, तालाब और झील जैसे स्रोत शामिल हैं। इनमें अक्सर जल की बर्बादी अधिक होती है।
  • आधुनिक जल-बचत तकनीकें (Micro-Irrigation):
    • ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation): इसमें पौधों की जड़ों तक पाइप और एमिटर के माध्यम से पानी की बूंद-बूंद कर आपूर्ति की जाती है। इससे पानी की बचत (30-50%) और उपज में वृद्धि होती है।
    • स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation): इसमें पानी को वर्षा की तरह फसलों पर छिड़का जाता है, जो समतल और ऊबड़-खाबड़ दोनों प्रकार की भूमि के लिए उपयुक्त है।

चुनौतियाँ:

  • जल दक्षता का निम्न स्तर।
  • नहरों में रिसाव और वाष्पीकरण से हानि।
  • बाढ़ सिंचाई से जल-logging और मृदा लवणता की समस्या।
  • बिजली सब्सिडी के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन।

जल संरक्षण एवं प्रबंधन (Water Conservation & Management)

जल संकट से निपटने के लिए जल संरक्षण और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resources Management – IWRM) आवश्यक है।

जल संरक्षण के उपाय:

  • वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting – RWH): छत और सतह के जल को एकत्रित करके भंडारण करना या भूजल को रिचार्ज करना। तमिलनाडु ने इसे अनिवार्य बनाकर एक मिसाल कायम की है।
  • पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाओं का पुनरुद्धार: राजस्थान की ‘जोहड़’, ‘टांका’, महाराष्ट्र की ‘बंधारा’ और हिमाचल की ‘कुल’ जैसी संरचनाओं को फिर से सक्रिय करना।
  • वाटरशेड प्रबंधन: भू-जल स्तर को बढ़ाने, मृदा अपरदन रोकने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण।
  • लघु सिंचाई परियोजनाएँ: बड़े बांधों के बजाय छोटे चेक डैम, नाला प्लग आदि का निर्माण।

जल प्रबंधन के लिए सरकारी पहलें:

  • जल शक्ति अभियान: जल संरक्षण और जल सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने वाला एक अभियान।
  • अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana): भूजल प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना।
  • नमामि गंगे मिशन: गंगा नदी及其 tributaries की सफाई और संरक्षण के लिए एक एकीकृत मिशन।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): ‘हर खेत को पानी’ का लक्ष्य और ड्रिप及 sprinkler जैसी सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देना।
  • राष्ट्रीय जल मिशन (National Water Mission): जल संरक्षण, कुशल उपयोग और समान वितरण सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

भारत के लिए जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन एक गंभीर चुनौती और आवश्यकता दोनों है। इसके लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक प्रौद्योगिकी का समन्वय, कानूनी और संस्थागत सुधार, और सबसे महत्वपूर्ण, जनभागीदारी शामिल हो। ‘जल ही जीवन है’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए, जल के प्रति एक संरक्षण और सम्मान का दृष्टिकोण विकसित करना ही भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की कुंजी है।

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