ब्रिटिश साम्राज्य का उदय: भारत में यूरोपीय औपनिवेशीकरण
यह लेख भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना, विस्तार और समेकन की प्रक्रिया की व्याख्या करता है, जो यूपीएससी सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम के अनुरूप है।
1. यूरोपीय औपनिवेशीकरण की शुरुआत
15वीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय शक्तियों द्वारा एक नए समुद्री मार्ग की खोज के साथ भारत में यूरोपीय औपनिवेशीकरण की शुरुआत हुई।
-
- पुर्तगाली: वास्को डी गामा 1498 में कालीकट पहुंचा। उन्होंने गोवा, दमन और दीव जैसे क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
-
- डच: उन्होंने मुख्य रूप से मसालों के व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया और भारत में अंग्रेजों के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे।
-
- अंग्रेज: 1600 में, महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक चार्टर प्रदान किया, जिससे उसे भारत के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्राप्त हुआ।
-
- फ्रांसीसी: 1664 में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई और वे अंग्रेजों के प्रमुख यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी बन गए।
2. ईस्ट इंडिया कंपनी का निर्माण तथा विकास
31 दिसंबर, 1600 को स्थापित, “गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज” ने भारत में ब्रिटिश उपस्थिति की नींव रखी।
-
- प्रारंभिक फैक्ट्रियाँ: सूरत (1608), मद्रास (1639), बॉम्बे (1668), और कलकत्ता (1690) में कंपनी ने अपनी व्यापारिक फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं।
-
- मुगल फरमान: सम्राट जहाँगीर से कंपनी ने सूरत में कारखाना लगाने का अधिकार प्राप्त किया।
-
- किलेबंदी: कंपनी ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए फोर्ट सेंट जॉर्ज (मद्रास), फोर्ट विलियम (कलकत्ता), और बॉम्बे कैसल जैसे किलेबंद इलाकों का निर्माण किया।
-
- व्यापार से सत्ता की ओर: प्रारंभ में एक व्यापारिक इकाई, कंपनी धीरे-धीरे सैन्य और प्रशासनिक शक्ति अर्जित करने लगी।
3. प्लासी का युद्ध (1757)
यह भारत में ब्रिटिश सैन्य और राजनीतिक वर्चस्व की शुरुआत का प्रतीक था।
-
- कारण: बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला और अंग्रेजों के बीच तनाव; ‘काला कोठरी’ की घटना ने इसे और बढ़ा दिया।
-
- घटनाक्रम: रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर से साजिश रची।
-
- परिणाम: मीर जाफर के विश्वासघात के कारण नवाब की हार हुई। मीर जाफर को नया नवाब बनाया गया।
-
- महत्व: यह एक ‘युद्ध’ नहीं बल्कि एक ‘छद्म युद्ध’ था। अंग्रेजों को बंगाल की दीवानी का अधिकार और विशाल धन प्राप्त हुआ। कंपनी ने बंगाल पर वास्तविक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
4. बक्सर का युद्ध (1764)
प्लासी ने जहाँ नींव रखी, बक्सर ने ब्रिटिश शक्ति को वास्तव में समेकित किया।
-
- सहयोगी: मीर कासिम (बंगाल का पूर्व नवाब), शुजा-उद-दौला (अवध का नवाब), और शाह आलम द्वितीय (मुगल सम्राट) की संयुक्त सेनाएँ।
-
- परिणाम: मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेजों की निर्णायक जीत।
-
- महत्व: इस युद्ध ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी के अधिकार (1765) दिलाए। कंपनी अब संपत्ति एकत्र करने वाली और भू-राजस्व की प्रशासक बन गई। मुगल सम्राट अंग्रेजों का एक संरक्षक बनकर रह गया।
5. मैसूर पर नियंत्रण
दक्षिण में ब्रिटिश विस्तार के मार्ग में मैसूर राज्य सबसे बड़ी बाधा था। इसके परिणामस्वरूप चक्त युद्ध हुए:
-
- प्रथम एंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69): हैदर अली की जीत। मद्रास की संधि पर हस्ताक्षर।
-
- द्वितीय एंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84): हैदर अली की मृत्यु के बाद, टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा। मंगलौर की संधि से युद्ध समाप्त हुआ।
-
- तृतीय एंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92): लॉर्ड कार्नवालिस ने टीपू सुल्तान को हराया। श्रीरंगपट्टनम की संधि के तहत टीपू ने अपने राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेजों को दे दिया।
-
- चतुर्थ एंग्ल-मैसूर युद्ध (1799): लॉर्ड वेलेजली ने टीपू सुल्तान को हराया और उनकी मृत्यु हो गई। मैसूर पर विजय प्राप्त की गई और वडियार वंश को गद्दी पर बैठाया गया।
6. सहायक गठबंधन (Subsidiary Alliance)
लॉर्ड वेलेजली (1798-1805) द्वारा शुरू की गई यह एक साम्राज्यवादी नीति थी, जिसका उद्देश्य भारतीय राज्यों को ब्रिटिश अधीनता में लाना था।
-
- शर्तें: भारतीय शासकों को अपनी भूमि पर एक ब्रिटिश सेना रखनी होती थी और उसके खर्च के लिए भुगतान करना होता था। उन्हें बिना अंग्रेजों की अनुमति के किसी अन्य शक्ति के साथ युद्ध या संधि करने का अधिकार नहीं था। उन्हें अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रखना होता था।
-
- प्रभाव: इसने भारतीय राज्यों की संप्रभुता और वित्तीय संसाधनों को नष्ट कर दिया। हैदराबाद (1798), अवध (1801), और तanjore (1799) जैसे राज्य इस प्रणाली में शामिल होने वाले पहले राज्य थे।
7. चूक का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)
लॉर्ड डलहौजी (1848-56) द्वारा लागू की गई यह नीति ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार के लिए एक और आक्रामक उपकरण थी।
-
- सिद्धांत: इस नीति के तहत, यदि किसी देशी रियासत का शासक बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी के मर जाता था, तो उस राज्य को “लैप्स” (खत्म) माना जाता था और उस पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार हो जाता था।
-
- परिणाम: सतारा (1848), संबलपुर (1849), झाँसी (1853), और नागपुर (1854) सहित कई राज्यों को इस नीति के तहत ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। इसने भारतीय राजाओं और जनता में व्यापक असंतोष पैदा किया, जो 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक था।
8. राजगामी होने का सिद्धांत (Doctrine of Paramountcy)
लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823) द्वारा घोषित, इस सिद्धांत ने ब्रिटिश सर्वोच्चता का दावा किया।
-
- अर्थ: इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रिटिश सत्ता भारतीय राज्यों की ‘सर्वोपरि’ या ‘परम’ शक्ति थी। कंपनी का अधिकार भारतीय राज्यों की आंतरिक और बाहरी affairs में हस्तक्षेप करने तक विस्तारित था।
-
- उद्देश्य: भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार को कानूनी और नैतिक आधार प्रदान करना।
-
- महत्व: इसने सहायक गठबंधन को और मजबूत किया और ब्रिटिश साम्राज्यवादी Ambitions को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया।
निष्कर्ष: इन सभी नीतियों और युद्धों ने मिलकर 18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश सत्ता की नींव को मजबूत किया, जिससे एक व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे एक विशाल साम्राज्य के शासक में बदल गई।
