हिन्दू समुदाय में समाज सुधार आन्दोलन
19वीं शताब्दी का भारतीय इतिहास सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की विरासत से भरा पड़ा है। पश्चिमी शिक्षा, विज्ञान और मानवतावाद के प्रभाव ने भारतीय बुद्धिजीवियों को अपने समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम हिन्दू समाज के भीतर ही कई प्रगतिशील आन्दोलनों के उदय के रूप में सामने आया। ये आन्दोलन नवजागरण की भावना से प्रेरित थे और इन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1. ब्रह्म समाज (1828)
संस्थापक: राजा राममोहन राय
मुख्य विचारधारा एवं सिद्धांत:
- एकेश्वरवाद (ईश्वर एक, निराकार और सर्वशक्तिमान है) पर बल।
- मूर्ति पूजा, बहुदेववाद और कर्मकांड की कटु आलोचना।
- वेदों और उपनिषदों की श्रेष्ठता में विश्वास, लेकिन अन्य सभी हिन्दू ग्रंथों की तार्किक आलोचना।
- सती प्रथा, बाल विवाह, जाति प्रथा आदि सामाजिक बुराइयों का विरोध।
- स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन।
- तर्क और conscience (अंतरात्मा की आवाज) को धर्म का आधार मानना।
योगदान: राजा राममोहन राय को ‘आधुनिक भारत का जनक’ और ‘भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत’ कहा जाता है। उन्होंने लॉर्ड विलियम बेंटिक के साथ मिलकर 1829 में सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. आर्य समाज (1875)
संस्थापक: स्वामी दयानन्द सरस्वती
मुख्य विचारधारा एवं सिद्धांत:
- मूल मंत्र: “वेदों की ओर लौटो” (Back to the Vedas)।
- वेदों को ‘अपौरुषेय’ ( divine in origin) और ज्ञान का एकमात्र स्रोत मानना।
- मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, छुआछूत और जातिगत भेदभाव का पुरजोर विरोध।
- समाज की एकमात्र इकाई के रूप में ‘चार वर्ण’ की व्यवस्था में विश्वास, जन्म के आधार पर नहीं बल्कि गुण व कर्म के आधार पर।
- स्त्री-शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह का Strong समर्थन।
- शुद्धि Movement: हिन्दू धर्म छोड़ चुके लोगों को वापस हिन्दू धर्म में लाने का आन्दोलन।
योगदान: आर्य समाज ने शिक्षा के प्रसार (D.A.V. schools & colleges) और हिन्दू समाज में आत्मगौरव की भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई। इसने हिन्दू समाज को सुसंगठित और सशक्त बनाया।
3. रामकृष्ण मिशन (1897)
संस्थापक: स्वामी विवेकानन्द (उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के आदर्शों पर आधारित)
मुख्य विचारधारा एवं सिद्धांत:
- वेदान्त दर्शन को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करना।
- मुख्य सिद्धांत: ” service to man is service to god” (जीव सेवा ही शिव सेवा है)।
- सभी धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास। विवेकानन्द ने 1893 के शिकागो विश्व धर्म संसद में इसी सिद्धांत का प्रचार किया।
- आध्यात्मिक development के साथ-साथ लौकिक विकास (शिक्षा, चिकित्सा, ग्रामोत्थान) पर जोर।
- मानवतावाद और Universal brotherhood को बढ़ावा देना।
योगदान: विवेकानन्द ने पश्चिमी जगत को भारतीय दर्शन की श्रेष्ठता से अवगत कराया और भारतीय युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाई। रामकृष्ण मिशन शिक्षण और राहत कार्यों के लिए विश्व-विख्यात है।
4. प्रार्थना समाज (1867)
संस्थापक: डॉ. आत्माराम पांडुरंग (केशवचन्द्र सेन के सहयोग से)
मुख्य विचारधारा एवं सिद्धांत:
- ब्रह्म समाज से प्रभावित, लेकिन इसकी तुलना में अधिक उदारवादी दृष्टिकोण।
- मूर्ति पूजा का विरोध और एकेश्वरवाद में विश्वास।
- हिन्दू धार्मिक ग्रंथों की तार्किक व्याख्या पर जोर।
- जाति प्रथा, छुआछूत, बाल विवाह जैसी Social evils का विरोध।
- स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और अनाथालयों की स्थापना जैसे सामाजिक कार्यों पर Focus।
योगदान: प्रार्थना समाज ने विशेष रूप से महाराष्ट्र में सामाजिक सुधारों को गति प्रदान की। महादेव गोविन्द रानाडे और आर.जी. भंडारकर जैसे नेताओं ने इसके माध्यम से समाज सेवा के कार्य किए।
5. थियोसोफिकल सोसाइटी (1875, भारत में 1882)
संस्थापक: मैडम एच.पी. ब्लावात्स्की (H.P. Blavatsky) और कर्नल एच.एस. ओल्कॉट (H.S. Olcott)। भारत में इसकी स्थापना एनी बेसेंट ने मद्रास (चेन्नई) के निकट अडयार में की।
मुख्य विचारधारा एवं सिद्धांत:
- थियोसोफी का अर्थ है ‘divine wisdom’ (दैवीय ज्ञान)।
- इसका उद्देश्य प्राचीन हिन्दू और बौद्ध दर्शन (जैसे- पुनर्जन्म, कर्म सिद्धांत आदि) को पुनर्जीवित करना था।
- विश्व बंधुत्व की स्थापना करना, तुलनात्मक धर्मों का अध्ययन करना और मानव की अदृश्य शक्तियों की खोज करना इसके मुख्य लक्ष्य थे।
- यह आन्दोलन भारतीयों में हिन्दू धर्म के प्रति गर्व की भावना पैदा करने में सफल रहा।
योगदान: एनी बेसेंट ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया और होम Rule League की स्थापना की। सोसाइटी ने शिक्षा के क्षेत्र में (जैसे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना में) और भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
निष्कर्ष
ये सभी सुधारवादी आन्दोलन 19वीं सदी के भारत के सामाजिक-धार्मिक landscape को बदलने में seminal भूमिका निभाई। इन्होंने न केवल अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ intellectual battle लड़ी, बल्कि आधुनिक शिक्षा, तार्किक चिंतन, मानवतावाद और राष्ट्रीय चेतना के बीज भी बोए। ये आन्दोलन पश्चिमी आधुनिकता और भारतीय傳統 के बीच एक सार्थक समन्वय स्थापित करने का प्रयास थे, जिसने एक आधुनिक, progressive और गौरवान्वित भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
