मुस्लिम समुदाय में समाज सुधार आन्दोलन: वहाबी आन्दोलन एवं अलीगढ़ आन्दोलन
उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय इतिहास सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलनों की घटनाओं से भरा पड़ा है। हिन्दू समाज की तरह मुस्लिम समुदाय में भी पाश्चात्य शिक्षा, आधुनिक विचारधारा और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के प्रतिफलन के रूप में सुधारवादी प्रवृत्तियाँ उभरीं। इनमें वहाबी आन्दोलन और अलीगढ़ आन्दोलन दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण आन्दोलन थे, जिनके स्वरूप, उद्देश्य और दृष्टिकोण में मूलभूत अंतर था।
1. वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement)
यह आन्दोलन 19वीं सदी का एक महत्वपूर्ण इस्लामिक पुनरुत्थानवादी (revivalist) आन्दोलन था, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समाज में धार्मिक शुद्धता लाना और बाहरी ताकतों (विशेषकर अंग्रेजों) के विरुद्ध जिहाद की भावना को प्रज्वलित करना था।
मुख्य विशेषताएँ एवं उद्देश्य:
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- संस्थापक: इस आन्दोलन की शुरुआत सऊदी अरब में मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब ने की, किंतु भारत में इसका वास्तविक प्रवर्तक सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) था।
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- धार्मिक शुद्धता: इस आन्दोलन का प्रमुख लक्ष्य इस्लाम में घुली हुई ‘बिदअत’ (कुरान और हदीस के अनुसार नवाचार) जैसी प्रथाओं को दूर करना, मूर्ति पूजा और सूफीवाद के प्रभाव का विरोध करना तथा इस्लाम की मूल एकेश्वरवादी शिक्षाओं की ओर लौटना था।
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- राजनीतिक लक्ष्य: आन्दोलन ने शीघ्र ही एक राजनीतिक चरित्र ग्रहण कर लिया। सैयद अहमद ने भारत में सिखों और फिर अंग्रेजी शासन को मुस्लिम समाज का प्रमुख शत्रु घोषित किया और उनके विरुद्ध ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) का आह्वान किया।
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- केंद्र एवं प्रसार: इस आन्दोलन का मुख्य केंद्र पटना था। इसका प्रभाव बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, पंजाब और हैदराबाद तक फैला।
पतन एवं महत्व:
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- 1870 के दशक तक अंग्रेजों ने दमनकारी नीतियों (जैसे 1871 का क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट) के द्वारा इस आन्दोलन को कुचल दिया।
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- महत्व: इस आन्दोलन ने मुसलमानों में धार्मिक एकता की भावना को मजबूत किया और बाद में होने वाले राष्ट्रीय आन्दोलनों के लिए एक संगठनात्मक आधार तैयार किया। यह एक प्रतिक्रियावादी आन्दोलन था जिसका लक्ष्य पुरानी सामंती व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना था।
2. अलीगढ़ आन्दोलन (Aligarh Movement)
वहाबी आन्दोलन के ठीक विपरीत, अलीगढ़ आन्दोलन एक उदारवादी, आधुनिकतावादी सुधार आन्दोलन था। इसके प्रणेता सर सैयद अहमद खान (1817-1898) थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के प्रति निष्ठा और आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर बल दिया।
मुख्य विशेषताएँ एवं उद्देश्य:
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- आधुनिक शिक्षा: सैयद अहमद खान का मानना था कि मुसलमानों की दयनीय स्थिति का मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा से वंचित होना है। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
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- संस्थागत विकास: 1875 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएण्टल (एम.ए.ओ.) कॉलेज की स्थापना इस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। यह संस्थान आधुनिक शिक्षा का प्रसारण केंद्र बना।
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- धार्मिक सुधार: सैयद अहमद खान ने इस्लाम की उदार व्याख्या की। उन्होंने कुरान की तर्कसंगत व्याख्या पर जोर दिया, धर्मान्धता और रूढ़िवादिता का विरोध किया, और धर्म को आधुनिक विज्ञान और तर्क के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।
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- राजनीतिक दर्शन: उनका मानना था कि भारत के मुसलमानों का हित अंग्रेजों के साथ सहयोग में है। उन्होंने प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का विरोध किया और मुसलमानों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी। उनकी ‘दो राष्ट्र’ के सिद्धांत की ओर इशारा करने वाली बातें बाद में पाकिस्तान के निर्माण की विचारधारा का आधार बनीं।
महत्व एवं विरासत:
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- अलीगढ़ आन्दोलन ने मुस्लिम समाज में शिक्षा की एक नई लहर को जन्म दिया और एक आधुनिक, शिक्षित मध्यम वर्ग का सृजन किया।
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- इसने मुसलमानों को आधुनिक युग की चुनौतियों के लिए तैयार किया, हालाँकि इसने उन्हें एक अलग पहचान भी प्रदान की जो बाद के वर्षों में साम्प्रदायिक राजनीति का आधार बनी।
तुलनात्मक विश्लेषण
| आधार | वहाबी आन्दोलन | अलीगढ़ आन्दोलन |
|---|---|---|
| प्रकृति | पुनरुत्थानवादी, रूढ़िवादी | उदारवादी, आधुनिकतावादी |
| दृष्टिकोण | पश्चिमी शिक्षा एवं संस्कृति का विरोध | पश्चिमी शिक्षा एवं विज्ञान का समर्थन |
| अंग्रेजों के प्रति रुख | शत्रुतापूर्ण, जिहाद का आह्वान | मैत्रीपूर्ण, सहयोग की नीति |
| मुख्य उद्देश्य | धार्मिक शुद्धता एवं राजनीतिक विद्रोह | शैक्षिक सुधार एवं सामाजिक उन्नति |
| विरासत | धार्मिक उग्रवाद को बढ़ावा | आधुनिक शिक्षा एवं अलगाववाद को बढ़ावा |
निष्कर्ष: दोनों आन्दोलनों ने अपने-अपने ढंग से 19वीं सदी के मुस्लिम समाज को प्रभावित किया। जहाँ वहाबी आन्दोलन ने एक पृथक धार्मिक पहचान पर जोर देकर साम्प्रदायिक चेतना को बढ़ावा दिया, वहीं अलीगढ़ आन्दोलन ने शिक्षा के माध्यम से समुदाय की प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया, किंतु इसके साथ ही एक अलग राजनीतिक पहचान की नींव भी रखी। ये दोनों ही आन्दोलन colonial भारत में मुस्लिम मानसिकता के निर्माण के प्रमुख स्तम्भ साबित हुए।
