ब्रिटिश भारत में भूमि राजस्व प्रणालियाँ: एक अवलोकन

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने शासन को मजबूत करने के साथ-साथ अपने राजस्व को अधिकतम करने के उद्देश्य से भूमि राजस्व प्रशासन में महत्वपूर्ण सुधार किए। इनमें से तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ थीं: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी व्यवस्था और महालवाड़ी व्यवस्था। ये व्यवस्थाएँ न केवल आर्थिक शोषण का साधन थीं, बल्कि इन्होंने भारतीय कृषि समाज की संरचना को गहराई से प्रभावित किया।

ऐतिहासिक संदर्भ

1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त करने के बाद कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक कुशल भू-राजस्व व्यवस्था स्थापित करने की थी। अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग व्यवस्थाएँ लागू की गईं।

1. स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement)

इसे ‘जमींदारी प्रथा’ के नाम से भी जाना जाता है। इसकी शुरुआत 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस और उत्तरी कर्नाटक में की गई।

मुख्य विशेषताएँ:

  • जमींदारों को भूमि का मालिक माना गया।
  • राजस्व की राशि स्थायी रूप से तय कर दी गई, अर्थात इसे भविष्य में बढ़ाया नहीं जा सकता था।
  • तय राजस्व समय पर जमा कराने पर जमींदारों को अपनी जमींदारी बनाए रखने का अधिकार था।
  • जमींदार, किसानों (रैयतों) से मनमाना लगान वसूल सकते थे।

प्रभाव:

  • कंपनी के लिए फायदे: राजस्व की निश्चितता, प्रशासनिक लागत में कमी।
  • जमींदारों के लिए: एक स्थिर और शक्तिशाली भू-स्वामी वर्ग का उदय हुआ जो अंग्रेजों के प्रति वफादार था।
  • किसानों के लिए नुकसान: शोषण में वृद्धि, उनकी स्थिति दास जैसी हो गई, भूदासता (Bonded Labour) को बढ़ावा मिला।
  • कृषि के लिए हानिकारक: जमींदारों के पास भूमि सुधार में निवेश करने का कोई प्रोत्साहन नहीं था।

2. रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System)

यह व्यवस्था मुख्य रूप से मद्रास, बॉम्बे, असम और कोचीन प्रांतों में लागू की गई। इसके प्रमुख प्रवर्तक थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे।

मुख्य विशेषताएँ:

  • रैयत (किसान) सीधे सरकार के साथ भूमि का समझौता करता था; बिचौलियों (जमींदारों) का कोई स्थान नहीं था।
  • किसान को भूमि का मालिक नहीं, बल्कि उसका उपभोक्ता माना गया।
  • राजस्व स्थायी नहीं था, इसे 20 से 30 वर्षों के बाद संशोधित किया जा सकता था।
  • राजस्व की दर सीधे भूमि की उपजाऊ शक्ति और प्रकार पर निर्भर करती थी।

प्रभाव:

  • सैद्धांतिक लाभ: बिचौलियों के शोषण से किसानों की सीधी सुरक्षा।
  • वास्तविक नुकसान: राजस्व दर बहुत ऊँची थी, जिसे चुकाना किसानों के लिए मुश्किल था।
  • कर्ज और गरीबी के चलते किसानों को अपनी भूमि छोड़नी पड़ती थी, जिससे भूमि हस्तांतरण और सूदखोरी को बढ़ावा मिला।
  • यह व्यवस्था भी अंततः किसानों के लिए दमनकारी साबित हुई।

3. महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari System)

यह व्यवस्था मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी प्रांत (आधुनिक UP), पंजाब, दिल्ली और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में लागू की गई। इसके प्रवर्तक हॉल्ट मैकेंजी और रॉबर्ट मर्टिन बर्ड थे।

मुख्य विशेषताएँ:

  • यह स्थायी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था का मिश्रण थी।
  • राजस्व का निर्धारण पूरे गाँव (महाल) के साथ किया जाता था।
  • गाँव का मुखिया (लंबरदार या मुकद्दम) समुदाय की ओर से राजस्व एकत्र करने और जमा करने का जिम्मेदार था।
  • राजस्व को समय-समय पर (आमतौर पर 30 वर्षों में) संशोधित किया जाता था।

प्रभाव:

  • प्रारंभ में यह स्थानीय परंपराओं के अनुकूल थी।
  • लेकिन ऊँची राजस्व दरों के कारण गाँवों पर सामूहिक कर्ज का बोझ बढ़ता गया।
  • कई मामलों में, गाँव का मुखिया एक जमींदार की तरह व्यवहार करने लगा, जिससे किसानों का शोषण हुआ।

निष्कर्ष: समग्र प्रभाव एवं महत्व

  • आर्थिक शोषण: सभी व्यवस्थाओं का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के राजस्व को अधिकतम करना था, जिसने भारतीय किसानों को गरीबी के दुष्चक्र में धकेल दिया।
  • कृषि का व्यावसायीकरण: नकदी फसलों (कपास, नील, अफीम) पर जोर दिया गया, जिससे खाद्यान्न संकट पैदा हुआ और अकालों की स्थिति बनी।
  • सामाजिक संरचना में परिवर्तन: नए भू-स्वामी वर्ग का उदय हुआ और पारंपरिक ग्रामीण ढाँचा टूट गया।
  • भूमि के अधिकार: भारत में निजी संपत्ति के अधिकार की अवधारणा को बल मिला, जो पारंपरिक सामूहिक अधिकारों से भिन्न थी।
  • राष्ट्रवाद का आधार: इन व्यवस्थाओं के कारण हुई कृषि अवनति और किसान असंतोष ने बाद में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
JPSC MAINS PAPER 3/History Chapter – 1 #25