Updated on 20/09/25 by Mananjay MahatoShare on WhatsApp

उन्नीसवीं सदी में भारत में राष्ट्रवाद का उदय

उन्नीसवीं सदी का भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक सुनियोजित, सुविचारित और संगठित राष्ट्रवादी चेतना के उदय का साक्षी बना। यह उदय कई सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों, आर्थिक शोषण और ब्रिटिश शासन की राजनीतिक नीतियों की प्रतिक्रिया में हुआ। निम्नलिखित बिंदु इस विकास की प्रमुख घटनाओं और धाराओं को दर्शाते हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress – INC) का गठन (1885)

स्थापना: 28 दिसंबर, 1885 को बॉम्बे में ए.ओ. ह्यूम की पहल पर स्थापना।

प्रारंभिक उद्देश्य:

    • शिक्षित भारतीयों के बीच राजनीतिक संवाद और सौहार्द को बढ़ावा देना।

    • देशहित के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सामूहिक मांगों को तैयार करना और सरकार के सामने रखना।

    • सरकारी नीतियों की आलोचना करना, न कि ब्रिटिश शासन本身的 की।

प्रारंभिक स्वभाव: प्रारंभ में यह एक उदारवादी, मध्यमवर्गीय और मांग-आधारित संगठन था, जो विधायिका में भारतीयों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने, सिविल सेवा परीक्षाओं में उम्र सीमा बढ़ाने, और सैन्य व्यय में कटौती जैसे मुद्दों पर केंद्रित था।

नरमपंथी (Moderates) तथा गरमपंथी (Extremists)

कांग्रेस के भीतर ही रणनीति और विचारधारा को लेकर दो प्रमुख धाराएं उभरीं:

नरमपंथी (1885-1905) गरमपंथी (1905 onwards)
नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता नेता: बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल)
विचारधारा: उदारवादी, आशावादी, ब्रिटिश न्याय में विश्वास विचारधारा: उग्र राष्ट्रवाद, आत्म-निर्भरता, स्वाभिमान
राजनीतिक विश्वास: संवैधानिक सुधार, प्रार्थना-याचिका-विरोध (Prayer-Petition-Protest) राजनीतिक विश्वास: स्वराज (Self-rule), निष्क्रिय प्रतिरोध, सीधी कार्रवाई
लक्ष्य: ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन लक्ष्य: पूर्ण स्वराज
योगदान: ब्रिटिश शोषण का आर्थिक विश्लेषण (जैसे- नौरोजी का ‘धन का अपवाह’ सिद्धांत), राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर योगदान: जनता को राजनीति से जोड़ा, राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाई। तिलक ने कहा- “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा“।

स्वदेशी आन्दोलन (1905-1908)

तात्कालिक कारण: लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन (1905) का फैसला।

उद्देश्य: बंग-भंग का विरोध करना और ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार करके औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को झटका देना।

मुख्य विशेषताएं:

    • विदेशी वस्तुओं (विशेषकर कपड़े) का सामूहिक बहिष्कार और उनकी होली जलाई गई।

    • स्वदेशी (देश में निर्मित) वस्तुओं, खासकर हथकरघा (खादी) कपड़ों के उपयोग को प्रोत्साहन।

    • राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना (जैसे- बंगाल नेशनल कॉलेज)।

    • जन-जागरण के लिए रैलियाँ, सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित।

महत्व: यह आंदोलन कांग्रेस की ‘नरम’ राजनीति से आगे बढ़कर जनता के बीच पहुँचने वाला पहला जन आंदोलन था। इसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई जनोन्मुखी और आक्रामक दिशा दी।

होम रूल लीग आन्दोलन (1916-1918)

नेता: बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र और कर्नाटक) और एनी बेसेंट (शेष भारत)।

प्रेरणा: आयरलैंड में चल रहे होम रूल आंदोलन से प्रभावित।

उद्देश्य: भारत के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (Self-Government) की मांग करना और जनता को इसके लिए शिक्षित व संगठित करना।

महत्व:

    • यह युद्धकाल में चलाया गया एक संवैधानिक और जनजागरूकता आंदोलन था।

    • इसने राष्ट्रीय आंदोलन को फिर से जीवित किया, जो स्वदेशी आंदोलन के बाद कुछ शांत पड़ गया था।

    • इसने भावी सत्याग्रह आंदोलनों के लिए जमीन तैयार की।

    • इसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता (1916) का मार्ग प्रशस्त किया।

खिलाफत आन्दोलन (1919-1924)

पृष्ठभूमि: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) के सुल्तान, जो मुसलमानों के खलीफा (धार्मिक प्रमुख) भी थे, के साथ ब्रिटेन द्वारा कठोर व्यवहार किया गया। भारतीय मुसलमान इससे नाराज थे।

नेतृत्व: मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, हकीम अजमल खान और महात्मा गांधी।

उद्देश्य: खलीफा के पद और उसके साम्राज्य की रक्षा करने की मांग करना।

महत्व:

    • यह एक धार्मिक मुद्दे पर आधारित था, लेकिन इसने एक व्यापक राष्ट्रवादी रंग अपना लिया।

    • महात्मा गांधी ने इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा, जिससे हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल मिला।

    • यह आंदोलन असहयोग आंदोलन (1920-22) के प्रमुख कारणों में से एक बना, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक जनआंदोलन में बदल दिया।

निष्कर्ष: उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में हुई ये घटनाएं भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की सतत प्रक्रिया की परिचायक हैं। एक छोटे, शिक्षित वर्ग के संगठन (कांग्रेस) से शुरू होकर यह आंदोलन धीरे-धीरे एक जनसाधारण के व्यापक आंदोलन में तब्दील हो गया, जिसने अंततः भारत को स्वतंत्रता दिलाई।

JPSC MAINS PAPER 3/History Chapter – 1 #26