महात्मा गांधी और जनसामूहिक राजनीति: असहयोग, सविनय अवज्ञा एवं भारत छोड़ो आन्दोलन

महात्मा गांधी के नेतृत्व ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रकृति को मौलिक रूप से परिवर्तित कर दिया। उन्होंने इसे एक सीमित ‘एलिट’ आन्दोलन से एक जनसामूहिक संघर्ष में बदल दिया, जिसमें लाखों आम भारतीयों—किसानों, मजदूरों, महिलाओं और छात्रों की सक्रिय भागीदारी थी। यह परिवर्तन उनके द्वारा चलाए गए तीन प्रमुख जनआन्दोलनों—असहयोग आन्दोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34) और भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के माध्यम से संभव हुआ।

1. असहयोग आन्दोलन (1920-1922)

पृष्ठभूमि: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की आर्थिक कठिनाइयाँ, रॉलट एक्ट (1919) और विशेष रूप से जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919) ने देश में रोष की लहर पैदा कर दी थी। खिलाफत आन्दोलन को मिला झटका भी एक प्रमुख कारण था।

गांधीजी का दर्शन एवं रणनीति: गांधीजी का मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों के सहयोग से ही चलती है। यदि भारतीय सरकार को अपना सहयोग वापस ले लें, तो सरकार का ताना-बाना बिखर जाएगा। यह एक शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध का तरीका था।

    • सरकारी उपाधियों, सम्मानों और पदों का त्याग।

    • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार।

    • विदेशी वस्तुओं, विशेषकर कपड़ों का बहिष्कार और चरखा कातकर खादी पहनना।

    • सरकारी चुनावों, उत्सवों और समारोहों का बहिष्कार।

जनभागीदारी: आन्दोलन ने अभूतपूर्व जनसमर्थन प्राप्त किया। छात्रों ने सरकारी स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालतों में जाना बंद कर दिया, और शहरों-गाँवों में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।

समाप्ति: फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में हिंसक घटना (एक पुलिस थाने में आग लगाने से कई पुलिसकर्मियों की मौत) के बाद गांधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया। उनका मानना था कि आन्दोलन अहिंसा के मार्ग से भटक गया है।

महत्व: यह पहला अखिल भारतीय जनआन्दोलन था जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-जन तक पहुँचाया। इसने स्वराज की माँग को एक जनसाधारण की माँग बना दिया।

2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-1934)

पृष्ठभूमि: साइमन कमीशन का बहिष्कार (1928), नेहरू रिपोर्ट और लॉर्ड इरविन द्वारा अस्पष्ट डोमिनियन स्टेटस का वादा आन्दोलन के प्रमुख कारण थे। तत्कालीन कारण नमक कर और नमक पर सरकार के एकाधिकार के विरोध में शुरू हुआ नमक सत्याग्रह था।

गांधीजी का दर्शन एवं रणनीति: असहयोग के विचार को एक कदम आगे बढ़ाते हुए, इस आन्दोलन में सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों की ‘सविनय’ (शालीनतापूर्वक) अवज्ञा करने पर जोर दिया गया। इसका प्रारंभ दांडी मार्च (12 मार्च – 6 अप्रैल, 1930) से हुआ, जब गांधीजी ने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल यात्रा कर स्वयं नमक बनाकर कानून तोड़ा।

    • नमक कानून तोड़ना।

    • अवैध रूप से शराब और विदेशी कपड़े की दुकानों की पिकेटिंग।

    • जंगल कानूनों का उल्लंघन (जनजातीय इलाकों में)।

    • करों का भुगतान न करना (खासकर चौकीदार टैक्स)।

जनभागीदारी: इस आन्दोलन ने असहयोग आन्दोलन से भी अधिक व्यापक पैमाने पर लोगों को संगठित किया। महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। व्यापारियों ने विदेशी सामान का व्यापार बंद कर दिया। किसानों ने लगान नहीं दिया।

गांधी-इरविन समझौता (मार्च 1931): इसके तहत सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित किया गया, कांग्रेस ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी और सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का वादा किया।

महत्व: इस आन्दोलन ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के संघर्ष को प्रचारित किया। इसने दिखाया कि भारतीय जनता अब पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

3. भारत छोड़ो आन्दोलन (1942)

पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्वयुद्ध में बिना भारतीयों की सहमति के भारत को शामिल करना, क्रिप्स मिशन (1942) की विफलता, जिसने युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस का अस्पष्ट वादा किया था, इस आन्दोलन के तात्कालिक कारण थे। देश में तेजी से बढ़ती कीमतों और युद्ध की तबाही ने जनाक्रोश को और बढ़ाया।

गांधीजी का दर्शन एवं रणनीति: गांधीजी ने इस आन्दोलन को “करो या मरो” (Do or Die) का नारा देकर एक जनक्रांति का रूप दिया। यह ब्रिटिश शासन को तुरंत समाप्त करने के लिए एक सीधी और स्पष्ट माँग थी।

    • ब्रिटिश शासन को भारत से तुरंत हटाने की माँग।

    • एक सामूहिक जन-असहयोग और सविनय अवज्ञा का आह्वान।

    • यदि नेताओं को गिरफ्तार किया जाता है, तो जनता स्वतःस्फूर्त ढंग से आन्दोलन चलाएगी।

जनभागीदारी: यह आन्दोलन अब तक के सभी आन्दोलनों में सबसे अधिक विस्फोटक और जमीनी था। इसने जनसामान्य की ऊर्जा को एक नई दिशा दी। छात्रों, किसानों, मजदूरों और यहाँ तक कि government servants ने भी बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। समानांतर सरकारें (जैसे बलिया, तामलुक) स्थापित हुईं।

दमन: आन्दोलन की शुरुआत (8 अगस्त, 1942) के几乎 तुरंत बाद ही कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। बावजूद इसके, आन्दोलन जनता के स्तर पर जारी रहा और हड़तालों, तोड़-फोड़ और प्रदर्शनों के रूप में फैल गया, जिसे सरकार ने बेहद कठोरता से दबाया।

महत्व: भारत छोड़ो आन्दोलन ने स्पष्ट कर दिया कि अब ब्रिटिश शासन भारत में लंबे समय तक टिक नहीं सकता। इसने भारत की आजादी की नींव को मजबूत किया और यह दर्शाया कि भारतीय जनता बिना नेतृत्व के भी संगठित होकर संघर्ष कर सकती है।

निष्कर्ष

महात्मा गांधी के इन तीनों आन्दोलनों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा, नई ऊर्जा और एक जनसामूहिक चरित्र प्रदान किया। असहयोग ने जनता को जगाया, सविनय अवज्ञा ने उन्हें संगठित किया और भारत छोड़ो आन्दोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध एक निर्णायक जनक्रांति का रूप ले लिया। गांधीजी की अहिंसक रणनीति ने न केवल एक नैतिक बल प्रदान किया बल्कि लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदार बनने का साहस और मंच दिया। ये आन्दोलन अंततः भारत की आजादी की लड़ाई के मील के पत्थर साबित हुए।

JPSC MAINS PAPER 3/History Chapter – 1 #27