Updated on 14/09/25 by Mananjay MahatoShare on WhatsApp

भारतीय संविधान: प्रमुख विशेषताएँ, जनहित याचिका एवं आधारभूत संरचना का सिद्धांत

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और व्यापक लिखित संविधान है। यह देश के शासन के मौलिक सिद्धांतों, संरचना, प्रक्रियाओं, शक्तियों और नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का वर्णन करता है। यह एक जीवंत दस्तावेज है जो समय के साथ विकसित होता रहता है। यह लेख संविधान की मुख्य विशेषताओं, जनहित याचिका की अवधारणा और आधारभूत संरचना के सिद्धांत की विस्तृत चर्चा प्रस्तुत करता है।

भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएँ (Salient Features of the Indian Constitution)

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विशालतम और विस्तृत संविधान: मूल रूप में 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थीं। वर्तमान में इसमें 25 भाग, 470 से अधिक अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। इसके विस्तृत होने के कारण हैं – विश्व के अन्य संविधानों का अध्ययन, भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता,以及 एकल नागरिकता और अखंड न्यायपालिका जैसे प्रावधानों का समावेश।
  • लेखित और निर्मित संविधान: भारत का संविधान एक लिखित दस्तावेज है जिसे संविधान सभा द्वारा 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिनों में तैयार किया गया था।
  • प्रस्तावना (Preamble): संविधान की प्रस्तावना उसकी ‘आत्मा’ या ‘भूमिका’ है। इसमें भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है तथा न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को स्थापित किया गया है। 42वें संशोधन, 1976 द्वारा इसमें ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े गए।
  • मौलिक अधिकार (Fundamental Rights): संविधान के भाग-III (अनुच्छेद 12-35) में वर्णित ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं और राज्य द्वारा इनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार以及 संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल हैं।
  • राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy – DPSP): भाग-IV (अनुच्छेद 36-51) में वर्णित ये तत्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए राज्य के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी देश के शासन का आधार हैं।
  • मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties): 42वें संशोधन, 1976 द्वारा संविधान में भाग-IV-A (अनुच्छेद 51-A) जोड़कर नागरिकों के 11 मौलिक कर्तव्य शामिल किए गए।
  • संसदीय शासन प्रणाली: भारत ने ब्रिटिश मॉडल के आधार पर संसदीय प्रणाली को अपनाया है, जिसमें राष्ट्रपति राज्य का औपचारिक प्रमुख (नाममात्र की कार्यपालिका) होता है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् के पास होती है, जो संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • एकल नागरिकता: भारत के सभी नागरिकों के पास केवल भारत की नागरिकता होती है, राज्य की नहीं। यह विशेषता संघीय एकता को मजबूत करती है।
  • कठोर और लचीले संविधान का मिश्रण: भारतीय संविधान न तो अत्यधिक कठोर है (जैसा कि अमेरिका का है) और न ही अत्यधिक लचीला (जैसा कि ब्रिटेन का है)। इसमें कुछ अनुच्छेदों को संसद के साधारण बहुमत से, कुछ को विशेष बहुमत से और कुछ को विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे राज्यों के अनुमोदन से संशोधित किया जा सकता है।
  • स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका: भारत में न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालयों के ऊपर है, जो एक एकीकृत न्यायिक व्यवस्था को दर्शाता है।

जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)

जनहित याचिका (PIL) भारतीय न्यायिक इतिहास की एक क्रांतिकारी अवधारणा है, जिसने न्याय तक पहुँच को व्यापक बनाया है।

अवधारणा और उद्भव:

पारंपरिक रूप से, न्यायालय में केवल वही व्यक्ति मुकदमा दायर कर सकता था जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो (लोकस्टैंडी का सिद्धांत)। हालाँकि, 1980 के दशक में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अवधारणा को शिथिल कर दिया। अब, कोई भी सार्वजनिक-हित वाले व्यक्ति या संगठन, समाज के कमजोर और वंचित वर्गों (जैसे- आदिवासी, महिलाएँ, कैदी, बंधुआ मजदूर) के अधिकारों के हनन के मामले में उनकी ओर से याचिका दायर कर सकता है।

महत्व और प्रभाव:

  • न्याय तक पहुँच का विस्तार: PIL ने न्याय प्रणाली को गरीबों, निरक्षरों और वंचितों के लिए सुलभ बनाया।
  • सामाजिक परिवर्तन का उपकरण: इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार संरक्षण, पुलिस सुधार, स्वच्छता और शासन में पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसले हुए हैं।
  • न्यायिक सक्रियता: PIL न्यायिक सक्रियता का एक प्रमुख साधन बन गया, जहाँ न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका की निष्क्रियता को दूर करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

चुनौतियाँ:

हाल के वर्षों में, PIL का दुरुपयोग व्यक्तिगत या राजनीतिक हितों के लिए होने लगा है, जिससे ‘खबरदारी याचिकाओं’ में वृद्धि हुई है। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

आधारभूत संरचना का सिद्धांत (Doctrine of Basic Structure)

आधारभूत संरचना का सिद्धांत भारतीय संवैधानिक कानून का एक मौलिक और न्यायिक निर्मित सिद्धांत है, जो संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर एक सीमा तय करता है।

इतिहास और विकास:

  • शंकरी प्रसाद मामला (1951) और सज्जन सिंह मामला (1965): प्रारंभ में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं।
  • गोलकनाथ मामला (1967): इस महत्वपूर्ण निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को पलट दिया और कहा कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से को संशोधित कर सकती है, लेकिन मौलिक अधिकारों का सार नष्ट नहीं कर सकती।
  • केसवानंद भारती मामला (1973): यह ऐतिहासिक निर्णय इस सिद्धांत का आधार बना। 13-न्यायाधीशों की पीठ ने यह स्थापित किया कि संसद संविधान के आधारभूत ढाँचे या मूल संरचना को नष्ट किए बिना या संशोधित किए बिना ही संशोधन कर सकती है। संशोधन की शक्ति संविधान को नष्ट करने की शक्ति नहीं है।

आधारभूत संरचना के तत्व:

न्यायालय ने आधारभूत संरचना की एक सर्वव्यापी सूची तैयार नहीं की है, बल्कि विभिन्न मामलों में इसे परिभाषित किया है। इसमें शामिल हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • लोकतांत्रिक और गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली
  • संविधान का पंथनिरपेक्ष चरित्र
  • शक्तियों का पृथक्करण
  • विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संघीय संरचना
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • मौलिक अधिकारों का सार
  • कल्याणकारी राज्य (सामाजिक और आर्थिक न्याय) का आदर्श
  • न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत
  • संविधान की एकता और अखंडता
  • संविधान के मौलिक ढाँचे में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव

महत्व:

यह सिद्धांत संविधान के मूल दर्शन और मूल्यों को संरक्षित रखने का एक सशक्त उपकरण है। इसने न्यायपालिका को संसद द्वारा किए जा सकने वाले संशोधनों पर एक ‘निर्णायक मानदंड’ (Arbiter) के रूप में स्थापित किया है, जिससे संवैधानिक सत्ता पर संतुलन बना रहता है।

निष्कर्षतः, भारतीय संविधान एक गतिशील दस्तावेज है, जिसकी ये तीनों विशेषताएँ – इसकी व्यापक प्रकृति, जनहित याचिका और आधारभूत संरचना का सिद्धांत – मिलकर इसे एक जीवंत शासनाधिकरण बनाती हैं, जो न केवल शासन चलाता है बल्कि सामाजिक परिवर्तन और न्याय सुनिश्चित करने में भी सक्षम है।

JPSC MAINS PAPER 4/polity Chapter – 1 #2