मूल अधिकार और मौलिक कर्तव्य: अवधारणा, विशेषताएँ एवं विश्लेषण
भारतीय संविधान का भाग-III (अनुच्छेद 12 से 35) मूल अधिकारों से और भाग-IV(क) (अनुच्छेद 51(क)) मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है। ये दोनों ही भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के आधारस्तंभ हैं, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं और साथ ही उन पर कर्तव्यों का दायित्व भी डालते हैं।
मूल अधिकार (Fundamental Rights)
1. अवधारणा एवं उद्भव
मूल अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास (शारीरिक, मानसिक, नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक) के लिए अत्यावश्यक माने जाते हैं। इनकी अवधारणा का उद्भव इंग्लैंड के मैग्नाकार्टा (1215 ई.), अमेरिकी बिल ऑफ राइट्स (1791) और फ्रांस की क्रांति से हुआ है। भारत में इन्हें संविधान द्वारा गारंटी प्रदान की गई है तथा इनका उल्लंघन होने पर न्यायालय में मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है।
2. मुख्य विशेषताएँ
- संवैधानिक गारंटी: ये अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त और संरक्षित हैं।
- न्याययोग्य: इनके हनन की स्थिति में व्यक्ति सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है (अनुच्छेद 32 और 226)।
- सीमित एवं विवेकाधीन: ये अधिकार असीमित नहीं हैं। राज्य इन पर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता आदि के आधार पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
- सकारात्मक एवं नकारात्मक: कुछ अधिकार राज्य पर नकारात्मक दायित्व (जैसे- अतिक्रमण न करना) डालते हैं (जैसे- स्वतंत्रता का अधिकार), तो कुछ सकारात्मक (जैसे- शोषण के विरुद्ध अधिकार)।
- सामान्यत: निलंबनयोग्य: राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) की स्थिति में अनुच्छेद 19 के अधिकार स्वत: निलंबित हो जाते हैं तथा राष्ट्रपति अन्य अधिकारों (अनुच्छेद 21 को छोड़कर) के प्रवर्तन को निलंबित कर सकते हैं।
- व्यापकता एवं समता: ये अधिकार सामान्यत: सभी व्यक्तियों (नागरिकों एवं विदेशियों दोनों) को प्राप्त हैं, हालाँकि कुछ अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए हैं (जैसे- अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30)।
3. मूल अधिकारों के प्रकार
- समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18): विधि के समक्ष समता, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध, लोक नियोजन में अवसर की समता, अस्पृश्यता का अंत, उपाधियों का अंत।
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22): वाक्-स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक सभा, संगम/संघ बनाने, देश के किसी भी भाग में आवागमन, निवास, व्यवसाय की स्वतंत्रता। गिरफ्तारी और नजरबंदी से संरक्षण।
- शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24): मानव दुर्व्यापार, बेगारी और बालश्रम पर प्रतिबंध।
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28): अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म का प्रचार-प्रसार, धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता।
- सांस्कृतिक एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30): अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने तथा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार।
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32): इसे ‘संविधान का हृदय और आत्मा’ (डॉ. अंबेडकर) कहा गया है। इसके तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी की जा सकती हैं।
नोट: संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31) 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा मूल अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300(क) के तहत एक विधिक अधिकार बना दिया गया है।
मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)
1. अवधारणा एवं उद्भव
मौलिक कर्तव्य नागरिकों के उन नैतिक, नागरिक और संवैधानिक दायित्वों को दर्शाते हैं जिनका पालन प्रत्येक नागरिक को देश के प्रति करना चाहिए। इन्हें 1976 में सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग-IV(क) और अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत जोड़ा गया। यह USSR (रूस) के संविधान से प्रेरित हैं। प्रारंभ में 10 कर्तव्य थे, 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा एक और कर्तव्य (11वाँ) जोड़ा गया।
2. मुख्य विशेषताएँ
- केवल नागरिकों पर लागू: ये कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशियों पर नहीं।
- गैर-न्याययोग्य: इन कर्तव्यों का पालन न करने पर कोई सीधी कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। ये कानूनी दायित्व के बजाय नैतिक और नागरिक दायित्वों पर अधिक जोर देते हैं।
- स्मरणकारी एवं चेतनाशील: ये नागरिकों को उनके दायित्वों का स्मरण कराते हैं और राष्ट्रभक्ति की भावना को बढ़ावा देते हैं।
- व्यापक दायरा: इनमें संविधान, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान, राष्ट्रहित में कार्य, सामंजस्य और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा आदि शामिल हैं।
3. मौलिक कर्तव्यों की सूची (अनुच्छेद 51(क))
- संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।
- स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।
- भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण रखें।
- देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
- भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करें।
- हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षण करें।
- प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करें।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
- सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
- व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करें।
- (86वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया) 6-14 वर्ष की आयु के बच्चे के माता-पिता या संरक्षक द्वारा शिक्षा के अवसर प्रदान करना।
मूल अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों में अंतर्संबंध
मूल अधिकार और मौलिक कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। अधिकारों का सही उपयोग तभी संभव है जब नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों। उदाहरण के लिए:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 19) का अर्थ यह नहीं है कि कोई देश की अखंडता के विरुद्ध भाषण दे। यहाँ कर्तव्य (अनुच्छेद 51(क)(c)) देश की एकता और अखंडता बनाए रखने का है।
- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25) का पालन करते हुए सामंजस्य और भाईचारे की भावना (अनुच्छेद 51(क)(e)) का कर्तव्य निभाना होगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में कहा है कि अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन आवश्यक है और कर्तव्यों की अवहेलना करने वालों के अधिकारों पर भी विचार किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मूल अधिकार और मौलिक कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र के दो पहलू हैं। मूल अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा सुनिश्चित करते हैं, वहीं मौलिक कर्तव्य उसे राष्ट्र और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं। एक सफल लोकतंत्र के लिए दोनों का सह-अस्तित्व अनिवार्य है। हालाँकि कर्तव्यों को न्याययोग्य बनाने की माँग उठती रहती है, लेकिन यह माना जाता है कि इनकी वास्तविक भावना नागरिकों के अंदर से ही जागृत होनी चाहिए।
