विकेंद्रीकृत योजनाः अर्थ, महत्त्व और भारत में मुख्य पहलें

1. विकेंद्रीकृत योजना: अर्थ और संकल्पना

विकेंद्रीकृत योजना (Decentralized Planning) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें योजना बनाने, क्रियान्वयन और निगरानी का अधिकार केंद्र सरकार से लेकर स्थानीय स्तर की संस्थाओं (जैसे पंचायतें और नगर पालिकाएं) को हस्तांतरित कर दिया जाता है। इसका मूल सिद्धांत है कि स्थानीय समस्याओं और आवश्यकताओं की सबसे अच्छी समझ स्थानीय लोगों को होती है।

यह ‘ऊपर से नीचे’ (Top-Down) के बजाय ‘नीचे से ऊपर’ (Bottom-Up) के दृष्टिकोण पर आधारित है, जहाँ स्थानीय इकाइयाँ अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर योजनाएँ बनाती हैं, जिन्हें बाद में उच्च स्तर पर एकीकृत किया जाता है।

विकेंद्रीकरण के प्रमुख आयाम:

  • राजनीतिक विकेंद्रीकरण: स्थानीय निकायों को चुनाव के माध्यम से राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण।
  • प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: नियोजन, निर्णय लेने और कार्यान्वयन की शक्तियों का अधिकारिक रूप से हस्तांतरण।
  • वित्तीय विकेंद्रीकरण: स्थानीय निकायों को अपने संसाधन जुटाने (टैक्स, शुल्क) और बजट आवंटन प्राप्त करने की शक्ति।
  • कार्यात्मक विकेंद्रीकरण: विभिन्न कार्यों और विभागों का स्थानीय स्तर पर विस्तार।

2. विकेंद्रीकृत योजना का महत्त्व

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विकेंद्रीकृत योजना का विशेष सामरिक महत्व है।

  • लोकतंत्र की गहरी जड़ें: यह लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाता है और नागरिकों को शासन प्रक्रिया में सीधे भागीदार बनाता है।
  • स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाएँ: स्थानीय लोगों को पता होता है कि उनके क्षेत्र के लिए सड़क, पानी, शिक्षा या स्वास्थ्य में से किसकी प्राथमिकता अधिक है। इससे संसाधनों का इष्टतम आवंटन होता है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना: चूंकि योजनाएँ स्थानीय स्तर पर बनती और क्रियान्वित होती हैं, इसलिए भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
  • सामाजिक न्याय को बढ़ावा: यह सुनिश्चित करता है कि वंचित और हाशिए के समूह (एससी, एसटी, महिलाएं) की आवाज योजना निर्माण प्रक्रिया में शामिल हो।
  • क्रियान्वयन में दक्षता: स्थानीय निगरानी के कारण परियोजनाओं का क्रियान्वयन तेज और अधिक प्रभावी होता है।
  • सामुदायिक सहभागिता: लोगों में स्वामित्व की भावना पैदा होती है, जिससे योजनाओं के दीर्घकालिक रखरखाव में मदद मिलती है।

3. पीआरआईएस (PRIs) और विकेंद्रीकृत योजना

पंचायती राज संस्थाएँ (PRI – Panchayati Raj Institutions) भारत में विकेंद्रीकृत योजना की रीढ़ हैं। संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 ने इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर विकेंद्रीकृत शासन की नींव रखी।

PRI की त्रिस्तरीय संरचना:

  1. ग्राम पंचायत (गाँव स्तर)
  2. पंचायत समिति (ब्लॉक/तहसील स्तर)
  3. जिला परिषद (जिला स्तर)

विकेंद्रीकृत योजना में PRI की भूमिका:

  • नीति निर्माण में भागीदारी: जिला योजना समिति (DPC – District Planning Committee) का गठन संविधान के अनुच्छेद 243ZD के तहत किया गया है, जो जिले के लिए एक समेकित योजना बनाने का काम करती है। इसमें PRI के सदस्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • ग्राम सभा की शक्ति: ग्राम सभा स्थानीय योजनाओं को मंजूरी देने, लाभार्थियों की पहचान करने और सामाजिक ऑडिट करने का काम करती है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं का क्रियान्वयन: MGNREGA, स्वच्छ भारत मिशन, पीएम आवास योजना जैसी कई योजनाओं का क्रियान्वयन अब पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है।
  • स्थानीय संसाधनों का प्रबंधन: सामान्य संपत्तियों (जैसे तालाब, चरागाह) के प्रबंधन की जिम्मेदारी PRI की है।

4. भारत में विकेंद्रीकृत योजना की मुख्य पहलें

भारत ने विकेंद्रीकृत योजना को साकार करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

  • 73वां और 74वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992): यह सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जिसने पंचायती राज संस्थाओं और नगर पालिकाओं को संवैधानिक मान्यता दी। इसमें अनुसूचित जाति/जनजाति और महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान भी शामिल है।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA, 2005): इस योजना में विकेंद्रीकृत योजना का सिद्धांत अंतर्निहित है। इसमें अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया है और ग्राम सभा को योजनाओं की पहचान करने, मंजूरी देने और उनकी निगरानी करने की महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
  • पंचायतों को शक्ति अभियान (PSA): सरकार द्वारा चलाया गया यह अभियान पंचायतों को कार्यात्मक और वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करने पर केंद्रित है।
  • डिजिटल इंडिया भुगतान (DIP) और e-GramSWARAJ पोर्टल: पंचायतों के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता लाने और ऑनलाइन लेखा-जोखा रखने के लिए शुरू किए गए डिजिटल प्लेटफॉर्म।
  • 14वें और 15वें वित्त आयोग: इन आयोगों ने राज्यों को होने वाले हस्तांतरण में से सीधे पंचायतों और नगर निकायों के लिए एक निश्चित राशि का प्रावधान रखा, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई।
  • समेकित जिला योजना: जिला योजना समिति (DPC) द्वारा जिले की एक समेकित योजना तैयार करना, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को कवर करती है।

चुनौतियाँ:

  • वित्तीय संसाधनों की कमी और कर संग्रहण क्षमता का अभाव।
  • अधिकारों का हस्तांतरण करने में राज्य सरकारों की अनिच्छा।
  • पंचायत सदस्यों के पास तकनीकी ज्ञान और योजना कौशल का अभाव।
  • नौकरशाही का दखल और राजनीतिक हस्तक्षेप।
  • सामंती और पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचे के कारण वंचित वर्गों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने में कठिनाई।

निष्कर्ष:

विकेंद्रीकृत योजना ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के सिद्धांत को साकार करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह सहभागी लोकतंत्र, समावेशी विकास और सुशासन का आधार स्तंभ है। हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन डिजिटलीकरण, क्षमता निर्माण और राजनीतिक इच्छाशक्ति के माध्यम से भारत में विकेंद्रीकृत योजना की क्षमता को पूरी तरह से साकार किया जा सकता है।

JPSC MAINS PAPER 5/Chapter – 23