1. परिचय: 1991 का आर्थिक संकट (The 1991 Economic Crisis)

1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। यह संकट मुख्य रूप से भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP) की समस्या, ऊँचा राजकोषीय घाटा (High Fiscal Deficit) और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) की भारी कमी के रूप में सामने आया। संकट इतना गहरा था कि विदेशी मुद्रा भंडार मात्र तीन सप्ताह के आयात का खर्च वहन करने लायक रह गया था। इस आपात स्थिति ने व्यापक आर्थिक सुधारों की नींव रखी, जिन्हें सामूहिक रूप से “नई आर्थिक नीति” या “उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के सुधार” के नाम से जाना जाता है।

2. सुधारों की आवश्यकता एवं औचित्य (The Need and Justification for Reforms)

2.1. तात्कालिक कारण (Immediate Causes):

  • भुगतान संतुलन का संकट (BoP Crisis): आयात, निर्यात से काफी अधिक था, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ रहा था।
  • विदेशी मुद्रा भंडार में कमी (Dwindling Forex Reserves): 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ₹1,500 करोड़ (लगभग $1.2 बिलियन) तक गिर गया, जो अपर्याप्त था।
  • मूल्यवृद्धि (Inflation): 1990-91 में मुद्रास्फीति की दर 13% के करीब पहुँच गई थी।
  • खाड़ी युद्ध (Gulf War): इसके कारण कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हुई और प्रवासी भारतीयों (NRI) के पैसों का प्रवाह कम हुआ।
  • सरकार का ऊँचा राजकोषीय घाटा (High Fiscal Deficit): सरकार का व्यय उसकी आय से कहीं अधिक था, जिसे उधारी से पूरा किया जा रहा था।

2.2. दीर्घकालिक/संरचनात्मक कारण (Long-term/Structural Causes):

  • लाइसेंस-पर्मिट राज (License-Permit Raj): 1950 के दशक में अपनाई गई ‘आयात प्रतिस्थापन’ (Import Substitution) की नीति के तहत उद्योग लगाने, उत्पादन बढ़ाने और कीमतें तय करने के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक थी। इससे नौकरशाही, अक्षमता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता (Inefficiency of PSUs): अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (PSUs) घाटे में चल रहे थे और सरकार पर वित्तीय बोझ बन गए थे।
  • व्यापार नीतियों में प्रतिबंध (Restrictive Trade Policies): ऊँचे आयात शुल्क (Tariffs) और मात्रात्मक प्रतिबंधों (Quantitative Restrictions) ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर दिया था, जिससे घरेलू उद्योगों में गुणवत्ता और दक्षता की कमी आई।
  • वित्तीय दमन (Financial Repression): बैंकिंग क्षेत्र पर सरकार का कड़ा नियंत्रण था और ब्याज दरें यथार्थवादी नहीं थीं।

इन सभी कारणों ने एक ऐसी आर्थिक प्रणाली का निर्माण किया जो अक्षम, निम्न-विकास वाली और वैश्विक अर्थव्यवस्था से कटी हुई थी। सुधारों का औचित्य इसी अक्षमता को दूर करने, आर्थिक विकास की गति को तेज करने, वैश्विक अर्थव्यवस्था से एकीकृत होने और संकट से उबरने में निहित था।

3. सुधारों के प्रमुख घटक (Key Components of the Reforms)

3.1. उदारीकरण (Liberalization)

इसका अर्थ है अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों को कम或समाप्त करना, ताकि निजी क्षेत्र के लिए व्यव negocio करना आसान हो।

  • औद्योगिक उदारीकरण: औद्योगिक नीति संकल्प, 1991 द्वारा लाइसेंस-पर्मिट राज को समाप्त किया गया (कुछ अपवादों को छोड़कर जैसे रक्षा, शराब, सिगरेट आदि)।
  • वित्तीय उदारीकरण: बैंकों को ब्याज दरें तय करने की स्वतंत्रता दी गई, निजी क्षेत्र के बैंकों की स्थापना को प्रोत्साहन, और पूंजी बाजारों का विकास किया गया।
  • कर सुधार: कर की दरों को युक्तिसंगत बनाया गया और सरलीकृत किया गया (जैसे,最高आयकर दर 97% से घटाकर 50% की गई)।

3.2. निजीकरण (Privatization)

इसका अर्थ है सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को कम करना और आर्थिक गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना।

  • PSUs का विनिवेश (Disinvestment): सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी का कुछ भाग निजी खिलाड़ियों और जनता को बेचना शुरू किया।
  • नए एकाधिकारों का अंत: कई क्षेत्रों में जहाँ पहले सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र को अनुमति थी (जैसे दूरसंचार, विमानन), वहाँ निजी कंपनियों को प्रवेश दिया गया।
  • बोली/निविदा प्रक्रिया (Bidding): निजी कंपनियों को सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बोली लगाने की अनुमति दी गई।

3.3. वैश्वीकरण (Globalization)

इसका अर्थ है घरेलू अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण।

  • व्यापार सुधार: आयात शुल्क (Import Tariffs) में भारी कमी की गई और मात्रात्मक प्रतिबंध (QRs) हटाए गए।
  • विदेशी निवेश को प्रोत्साहन: FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) और FPI (पोर्टफोलियो निवेश) के लिए दरवाजे खोले गए। स्वचालित मार्ग (Automatic Route) शुरू किया गया।
  • विनिमय दर सुधार: 1991 में भारतीय रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) किया गया और अंततः 1993-94 में इसे आंशिक रूप से परिवर्तनीय (Partial Convertibility) बना दिया गया। बाद में, प्रबंधित तिरती दर (Managed Float) system अपनाया गया।

4. सुधारों के प्रभाव एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन (Impact and Critical Evaluation)

4.1. सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts):

  • उच्च आर्थिक विकास दर (High GDP Growth): GDP growth rate में significant improvement आई, जो 1990s के दशक में लगभग 6-7% और 2000s में 8% के आसपास रही।
  • विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि: Forex reserves में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, आज यह $600 बिलियन+ के स्तर पर है।
  • विदेशी निवेश में वृद्धि: FDI और FPI के माध्यम से पूंजी और प्रौद्योगिकी का प्रवाह बढ़ा।
  • उपभोक्ता विकल्पों में वृद्धि: बाजार में competition बढ़ने से consumers को better quality products और more choices मिले।
  • गरीबी में कमी: उच्च विकास दर के कारण गरीबी की दर (Poverty Rate) में उल्लेखनीय गिरावट आई।

4.2. आलोचनाएँ एवं चुनौतियाँ (Criticisms and Challenges):

  • कृषि की उपेक्षा: सुधारों का लाभ मुख्यतः उद्योग और सेवा क्षेत्र तक सीमित रहा, कृषि क्षेत्र पिछड़ता रहा।
  • आर्थिक असमानता में वृद्धि: अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हुई। क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ीं।
  • रोजगारहीन विकास (Jobless Growth): GDP growth के अनुपात में रोजगार के अवसर नहीं बढ़े, विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र में।
  • विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़े जोखिम: 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट जैसी घटनाओं का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा।
  • सार्वजनिक क्षेत्र का कमजोर होना: विनिवेश की प्रक्रिया कई बार राजस्व जुटाने का जरिया बनकर रह गई, PSUs के true restructuring पर कम ध्यान दिया गया।

5. निष्कर्ष (Conclusion)

1991 के आर्थिक सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक paradigm shift थे। इन्होंने देश को गंभीर संकट से उबारा और इसे एक नई, high-growth trajectory पर स्थापित किया। इन सुधारों ने भारत को वैश्विक economic map पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभारा। हालाँकि, इन सुधारों से उत्पन्न चुनौतियाँ—जैसे असमानता, कृषि संकट और रोजगार—आज भी बनी हुई हैं। भविष्य की राह एक संतुलित दृष्टिकोण की माँग करती है, जहाँ बाजार की दक्षता के साथ-साथ समावेशी विकास (inclusive growth) और सामाजिक सुरक्षा (social security) पर भी समान बल दिया जाए। सुधारों की प्रक्रिया एक ‘कार्य-प्रगति’ (work-in-progress) बनी हुई है।


अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ (IFIs) और भारतीय अर्थव्यवस्था

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ (International Financial Institutions – IFIs) बहुपक्षीय संगठन हैं जो वैश्विक आर्थिक सहयोग, वित्तीय स्थिरता, और विकास को बढ़ावा देने के लिए कार्य करती हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पर इन संस्थाओं का गहरा और बहुआयामी प्रभाव रहा है।

प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ और उनकी भूमिकाएँ

1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)

    • स्थापना एवं उद्देश्य: 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में स्थापित। इसका प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक वित्तीय स्थिरता बनाए रखना, अंतर्राष्ट्रीय व्यापर को बढ़ावा देना, और सदस्य देशों को भुगतान संतुलन (BoP) संकट के दौरान वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

    • कार्यप्रणाली: IMF अल्पकालिक और मध्यम अवधि के ऋण (जैसे SBA, EFF) प्रदान करता है, जो आमतौर पर ‘नीतिगत सुधारों’ (Structural Adjustment Programs) से जुड़े होते हैं। यह वैश्विक आर्थिक निगरानी (जैसे Article IV Consultations) और तकनीकी सहायता भी प्रदान करता है।

    • भारत में भूमिका: ऐतिहासिक रूप से, भारत ने 1980s और 1991 के गंभीर BoP संकट के दौरान IMF से ऋण लिया। 1991 का ऋण भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत का एक प्रमुख कारक था। वर्तमान में, IMF भारत के लिए एक सलाहकार और अनुसंधान संगठन की भूमिका निभाता है।

2. विश्व बैंक समूह (World Bank Group)

    • स्थापना एवं उद्देश्य: IMF के साथ ही स्थापित। इसका मुख्य लक्ष्य दीर्घकालिक विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना है।

    • घटक: IBRD (मध्यम आय वाले देशों के लिए), IDA (सबसे गरीब देशों के लिए रियायती ऋण), IFC (निजी क्षेत्र में निवेश), MIGA (व्यापार जोखिम बीमा), और ICSID (विवाद निपटान)।

    • भारत में भूमिका: विश्व बैंक भारत का सबसे बड़ा विकास भागीदार है। इसने बुनियादी ढाँचे (सड़कें, बिजली, बंदरगाह), कृषि, शिक्षा (सर्वशिक्षा अभियान), स्वास्थ्य (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन), और सामाजिक क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए ऋण और अनुदान दिया है।

3. विश्व व्यापार संगठन (WTO)

    • स्थापना एवं उद्देश्य: 1995 में गैट (GATT) के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित। इसका उद्देश्य वैश्विक व्यापार के नियमों को निर्धारित करना, व्यापारिक झगड़ों का निपटारा करना, और व्यापार उदारीकरण की वार्ताएँ आयोजित करना है।

    • सिद्धांत: अधिकतर राष्ट्र प्राधिकार (MFN), राष्ट्रीय उपचार, और स्वतंत्र व्यापार।

    • भारत में भूमिका: WTO में भारत एक प्रमुख वार्ताकार के रूप में उभरा है। इसने विकासशील देशों के हितों, विशेष रूप से कृषि सब्सिडी और खाद्य सुरक्षा के मुद्दों (जैसे सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग) की वकालत की है। WTO के नियमों ने भारत की व्यापार और कृषि नीतियों को आकार दिया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव

    • आर्थिक सुधारों को गति: 1991 में IMF के समझौते ने भारत में LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधारों की शुरुआत की, जिसने अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी लाई।

    • बुनियादी ढाँचे का विकास: विश्व बैंक और IFC से वित्तपोषण ने देश के बुनियादी ढाँचे (परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास) के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    • व्यापार में वृद्धि: WTO के नियम-आधारित व्यवस्था ने भारत को वैश्विक बाजारों में बेहतर पहुँच प्रदान की, जिससे निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, विशेष रूप से सेवाओं और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में।

    • तकनीकी ज्ञान और सर्वोत्तम प्रथाएँ: IFIs ने नीति निर्माण, शासन, और परियोजना कार्यान्वयन में तकनीकी विशेषज्ञता और ज्ञान साझा किया है।

आलोचनाएँ एवं चुनौतियाँ

    • संप्रभुता पर प्रभाव: IMF के ‘कठोर परिस्थितियों’ (Conditionalities) की आलोचना की जाती है, जो देश की नीतिगत स्वायत्तता को सीमित कर सकती हैं।

    • कृषि पर दबाव: WTO के समझौते, विशेष रूपेण AOA (कृषि पर समझौता), ने भारतीय किसानों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया, जिससे कुछ क्षेत्रों में संकट पैदा हुआ।

    • सामाजिक-आर्थिक असमानता: आलोचकों का मानना है कि IFIs द्वारा प्रायोजित सुधारों ने आर्थिक विकास को तो बढ़ाया, लेकिन इसके साथ ही आय और धन की असमानता भी बढ़ी।

    • पर्यावरणीय चिंताएँ: बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं ने कभी-कभी पुनर्वास और पर्यावरणीय क्षति के मुद्दों को जन्म दिया है।

निष्कर्ष: एक बदलता हुआ संबंध

भारत का IFIs के साथ संबंध एक ‘ऋण लेने वाले’ से एक ‘भागीदार’ और ‘हितधारक’ में बदल गया है। भारत अब इन संस्थाओं में सुधारों, जैसे कि IMF की कोटा प्रणाली और WTO में अधिक न्यायसंगत नियमों की वकालत करने वाला एक प्रमुख आवाज है। भारत की आर्थिक सफलता ने इसे IFIs में एक महत्वपूर्ण वोट और नैतिक अधिकार दिया है, जिसका उपयोग यह वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए कर रहा है। भविष्य में, IFIs के साथ जुड़ाव रणनीतिक और पारस्परिक रूप से लाभप्रद बना रहेगा।

JPSC MAINS PAPER 5/Chapter – 24