कृषि क्षेत्र में सुधार एवं विकास का प्रभाव: एक विश्लेषण

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का ऐतिहासिक रूप से एक केंद्रीय स्थान रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात से ही इस क्षेत्र में सुधार एवं विकास के निरंतर प्रयास किए गए हैं, जिनके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव देखने को मिले हैं। भूमि सुधारों से लेकर हरित क्रांति, उदारीकरण से लेकर नई कृषि नीतियों तक के इस सफर ने भारतीय कृषि के स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है।

सुधारों एवं विकास के सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts)

  • खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि: हरित क्रांति के परिणामस्वरूप गेहूं और चावल जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिसने देश को खाद्यान्न के मामले में लगभग आत्मनिर्भर बना दिया।
  • उत्पादकता में सुधार: उन्नत बीजों, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, रासायनिक उर्वरकों और आधुनिक कृषि यंत्रों के प्रयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
  • कृषि व्यवसाय एवं निर्यात का विकास: उदारीकरण की नीतियों ने कृषि व्यवसाय (Agribusiness) और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के उद्योग को बढ़ावा दिया। भारत कई कृषि उत्पादों का एक प्रमुख निर्यातक बनकर उभरा है।
  • प्रौद्योगिकी का एकीकरण: e-NAM (नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट), ड्रोन टेक्नोलॉजी, और सटीक कृषि (Precision Farming) जैसी पहलों ने किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने और संसाधनों के कुशल प्रबंधन में मदद की है।
  • किसानों के लिए वित्तीय सहायता: प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाओं ने किसानों की आय में सहायता प्रदान करने और जोखिम को कम करने का प्रयास किया है।

सुधारों एवं विकास की चुनौतियाँ एवं नकारात्मक प्रभाव (Challenges and Negative Impacts)

  • पारिस्थितिक संकट: गहन कृषि पद्धतियों के कारण मृदा की उर्वरता में कमी, जल स्तर का गिरना और जल जमाव की समस्या उत्पन्न हुई है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक use ने पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है।
  • आर्थिक विषमता: सुधारों का लाभ मुख्यतः संपन्न और बड़े किसानों तक ही सीमित रहा, जिससे छोटे और सीमांत किसान पिछड़ते चले गए। इसने कृषि क्षेत्र के भीतर आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया।
  • ग्रामीण ऋणग्रस्तता: उच्च लागत वाली कृषि ने किसानों को साहूकारों और बैंकों के चंगुल में फंसाया है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर ऋणग्रस्तता की स्थिति उत्पन्न हुई है।
  • बाजार की अनिश्चितताएँ: APMC मंडियों की सीमाओं और मध्यस्थों के वर्चस्व के कारण किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। मूल्य अस्थिरता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
  • जलवायु परिवर्तन का खतरा: बदलती जलवायु परिस्थितियों, अनियमित मानसून और चरम मौसमी घटनाओं ने कृषि उत्पादन के लिए नए जोखिम पैदा कर दिए हैं।

आगे की राह (Way Forward)

भारतीय कृषि के समक्ष मौजूद चुनौतियों के समाधान हेतु एक समग्र एवं समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। नीचे दिए गए उपाय इसमें सहायक हो सकते हैं:

  1. सतत कृषि पद्धतियों को अपनाना: जैविक खेती, प्राकृतिक खेती (जैसे- जीरो बजट प्राकृतिक खेती), और जल संरक्षण techniques को बढ़ावा देना।
  2. मूल्य संवर्धन एवं प्रसंस्करण: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को मजबूत करके और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि करना।
  3. बाजार सुधारों को पूर्णतः लागू करना: e-NAM को और अधिक प्रभावी बनाना तथा किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से सीधे जोड़ना।
  4. किसान कल्याण पर बल: आय सुरक्षा, बेहतर भंडारण सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार करना।
  5. जलवायु-स्मार्ट कृषि: जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसल varieties के विकास और जल-कुशल सिंचाई प्रणालियों पर शोध को प्रोत्साहन देना।

निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि कृषि सुधारों ने देश को खाद्य सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन अब एक ऐसी कृषि नीति की आवश्यकता है जो ‘उत्पादन’ के साथ-साथ ‘पारिस्थितिकी’ और ‘किसान की समृद्धि’ पर समान रूप से ध्यान केंद्रित करे। केवल तभी भारत का कृषि क्षेत्र सही मायनों में विकसित हो सकेगा।

कृषि संकट: सब्सिडी, सार्वजनिक निवेश और सुधारों की भूमिका

भारतीय कृषि क्षेत्र लंबे समय से एक गहरे संकट से जूझ रहा है। यह संकट बहुआयामी है, जिसमें आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलू शामिल हैं। इस संकट के केंद्र में सरकार की नीतियाँ, विशेष रूप से सब्सिडी और सार्वजनिक निवेश के बीच असंतुलन, और संरचनात्मक सुधारों की कमी एक प्रमुख कारक है। यह नोट इन्हीं मुद्दों पर एक विस्तृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

1. सब्सिडी: एक दोधारी तलवार

सब्सिडी सरकार की किसानों के लिए आय सहायता और उपभोक्ताओं के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक प्रमुख नीति रही है। हालाँकि, इसके अपने लाभ और हानि हैं।

सब्सिडी के प्रकार एवं उद्देश्य:

  • इनपुट सब्सिडी: उर्वरक (यूरिया, DAP), बीज, बिजली, और सिंचाई पर दी जाने वाली सब्सिडी। उद्देश्य उत्पादन लागत कम करना और उत्पादकता बढ़ाना है।
  • उत्पादन सब्सिडी: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से। उद्देश्य किसानों को एक निश्चित आय का आश्वासन देना और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना है।
  • उपभोग सब्सिडी: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत अनाज का वितरण। उद्देश्य गरीबों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराना है।

सब्सिडी से जुड़े मुद्दे एवं आलोचनाएँ:

  • विकृत उत्पादन पैटर्न: यूरिया जैसी अत्यधिक सब्सिडी वाली वस्तुओं के अति-उपयोग से मृदा स्वास्थ्य का क्षरण होता है। इससे ‘राइस-व्हीट’ फसल चक्र में असंतुलन पैदा हो गया है।
  • वित्तीय भार: सब्सिडी का भार सरकार के वित्त पर बहुत अधिक है, जिससे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे R&D, बुनियादी ढाँचे और शिक्षा पर खर्च करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
  • लक्ष्यीकरण में विफलता: सब्सिडी का लाभ अक्सर बड़े और मझोले किसानों को ही मिल पाता है, छोटे और सीमांत किसान पीछे रह जाते हैं।
  • पर्यावरणीय क्षति: मुफ्त बिजली ने भूजल के अत्यधिक दोहन को प्रोत्साहित किया है, जिससे जल स्तर में गिरावट आई है।

2. सार्वजनिक निवेश में गिरावट: एक चिंताजनक प्रवृत्ति

सब्सिडी पर अत्यधिक निर्भरता का एक प्रमुख नकारात्मक प्रभाव कृषि में सार्वजनिक निवेश में लगातार हो रही गिरावट है।

  • GDP के प्रतिशत के रूप में: कृषि में सार्वजनिक निवेश (सिंचाई, बुनियादी ढाँचा, R&D, आदि) 1980-81 के लगभग 3.9% के शिखर से गिरकर वर्तमान में 3% से भी नीचे आ गया है।
  • निवेश बनाम सब्सिडी: सरकार का खर्च सब्सिडी देने में अधिक है, न कि दीर्घकालिक उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश में।
  • प्रभाव: इसके कारण सिंचाई सुविधाओं का अभाव, अपर्याप्त भंडारण और कोल्ड स्टोरेज, कमजोर रसद श्रृंखला, और कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D) में ठहराव आया है।

निवेश की कमी कृषि की उत्पादकता और लाभप्रदता में वृद्धि की दर को सीमित कर देती है, जिससे संकट और गहराता है।

3. कृषि सुधार: आवश्यकता एवं चुनौतियाँ

कृषि संकट से निपटने के लिए संरचनात्मक सुधारों की अत्यंत आवश्यकता है। सुधारों का उद्देश्य बाजारों को अधिक कुशल, पारदर्शी और किसान-हितैषी बनाना है।

सुधारों के क्षेत्र:

  • APMC एक्ट में सुधार: किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए एक से अधिक बाजारों (मंडियों) तक पहुँच प्रदान करना ताकि उन्हें बेहतर मूल्य मिल सके।
  • कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग: किसानों और क्रयकर्ताओं (प्रोसेसर, निर्यातक, रिटेल चेन) के बीच पूर्व-निर्धारित शर्तों पर समझौता, जिससे जोखिम कम हो और आय सुनिश्चित हो।
  • ई-NAM (इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट): मंडियों को ऑनलाइन एकीकृत करने का प्रयास ताकि राष्ट्रीय स्तर पर कीमतों की जानकारी उपलब्ध हो और व्यापार बढ़े।
  • व्यापार और निर्यात नीतियाँ: निर्यात प्रतिबंधों और उच्च निर्यात शुल्क जैसी नीतियों में लचीलापन लाना।

चुनौतियाँ एवं विवाद:

  • 2020 के कृषि कानून: तीन कृषि कानूनों का पारित होना और बाद में उनका वापस लिया जाना, सुधारों की राजनीतिक और सामाजिक जटिलता को दर्शाता है।
  • बिचौलियों का विरोध: सुधारों का अक्सर मंडी व्यवस्था (अर्थात, कमीशन एजेंट/अरहतीयों) से लाभान्वित होने वाले हितों द्वारा विरोध किया जाता है।
  • छोटे किसानों का भय: यह चिंता कि कॉर्पोरेट के साथ अनुबंधित खेती में छोटे किसानों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर होगी और वे शोषण का शिकार होंगे।
  • MSP की गारंटी का मुद्दा: किसान संगठन MSP को एक कानूनी अधिकार बनाने की माँग करते रहे हैं, जिसे सरकार के लिए लागू करना चुनौतीपूर्ण है।

4. बहुआयामी कृषि संकट: एक सिंहावलोकन

उपरोक्त कारकों के संयोजन ने एक गहन संकट को जन्म दिया है:

  • आर्थिक संकट: बढ़ती इनपुट लागत और अनिश्चित आय के कारण कर्ज का बोझ, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की आत्महत्या जैसे दुखद परिणाम सामने आते हैं।
  • पारिस्थितिक संकट: मृदा की उर्वरता में गिरावट, जल संकट, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की चपेट में आना।
  • सामाजिक संकट: कृषि की ओर युवाओं का रुझान कम होना, खेती को लेकर अरुचि, और ग्रामीण-शहरी प्रवासन में तेजी।

5. आगे का रास्ता: एक समग्र दृष्टिकोण

कृषि संकट के समाधान के लिए एक संतुलित और बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है:

  1. सब्सिडी का युक्तिकरण: डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) के माध्यम से इनपुट सब्सिडी को ‘स्मार्ट सब्सिडी’ में बदलना ताकि लक्ष्यीकरण सही हो और पर्यावरणीय नुकसान कम हो।
  2. निवेश बढ़ाना: सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कोल्ड चेन, और कृषि-प्रसंस्करण जैसे बुनियादी ढाँचे पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाना।
  3. FPOs को मजबूत करना: छोटे किसानों को फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FPOs) के माध्यम से संगठित करना ताकि उनकी बाजार तक पहुँच और सौदेबाजी की शक्ति बढ़े।
  4. मूल्य श्रृंखला में एकीकरण: “फार्म गेट से प्लेट तक” की अवधारणा को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाना।
  5. जलवायु-लचीला कृषि: जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई, और ड्रिप इरीगेशन जैसी टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना।
  6. नीति स्थिरता: निर्यात नीतियों में अचानक परिवर्तन से बचना ताकि किसानों और व्यापारियों को दीर्घकालिक नियोजन में मदद मिल सके।

निष्कर्ष

भारतीय कृषि एक नीतिगत दुविधा का सामना कर रही है। अल्पकालिक राहत प्रदान करने वाली सब्सिडी-केंद्रित नीतियाँ दीर्घकालिक उत्पादकता और स्थिरता सुनिश्चित करने वाले निवेश और सुधारों के रास्ते में बाधक बन गई हैं। इस संकट से उबरने के लिए एक स्पष्ट नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है – जो सब्सिडी के स्थान पर निवेश को, और संरक्षण के स्थान पर सुधार को प्राथमिकता दे। एक ऐसा दृष्टिकोण जो किसान की आय को केंद्र में रखते हुए पर्यावरणीय स्थिरता और बाजार दक्षता को एक साथ लेकर चले, ही भारतीय कृषि के भविष्य को सुरक्षित कर सकता है।

JPSC MAINS PAPER 5/Chapter – 27