झारखण्ड के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्र, वृष्टि के तरीके तथा अजैविक दबाव

झारखण्ड, जिसे “भारत का रूर” भी कहा जाता है, एक खनिज-संपन्न राज्य होने के साथ-साथ एक कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था वाला राज्य है। यहाँ की अर्थव्यवस्था और जीवनयापन काफी हद तक कृषि पर निर्भर है। राज्य की विविध भौगोलिक संरचना, मिट्टी के प्रकार और वर्षा के पैटर्न के आधार पर इसे विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशेषताएं, फसल प्रणाली और चुनौतियाँ हैं।

झारखण्ड के प्रमुख कृषि-जलवायु क्षेत्र

राज्य को मुख्य रूप से तीन कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:

1. मध्य और उत्तर-पश्चिमी पठारी क्षेत्र (Central and North Western Plateau Region)

    • विस्तार: यह क्षेत्र राज्य के एक बड़े हिस्से को कवर करता है, जिसमें रांची, हजारीबाग, चतरा, पलामू, गढ़वा, लोहरदगा और लातेहार जिले शामिल हैं।

    • भू-आकृति: यह मुख्य रूप से एक पठारी इलाका है, जिसमें पहाड़ियाँ, घाटियाँ और मैदानी क्षेत्र शामिल हैं।

    • मिट्टी: इस क्षेत्र में लाल और पीली दोमट मिट्टी पाई जाती है, जो काफी उपजाऊ है।

    • वृष्टि (वर्षा) का तरीका: यहाँ औसतन 1000-1200 मिमी वार्षिक वर्षा होती है। वर्षा मानसून पर निर्भर है और जून से सितंबर के बीच केंद्रित रहती है। कभी-कभी सूखे की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

    • प्रमुख फसलें: धान (मुख्य खाद्यान्न), मक्का, गेहूं, दलहन (अरहर, मसूर), तिलहन (सरसों) और सब्जियाँ।

    • अजैविक दबाव (Abiotic Stresses):
      • अनियमित वर्षा एवं सूखा: मानसून की अनिश्चितता इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे खरीफ फसलों को खतरा रहता है।
      • मिट्टी का कटाव: पहाड़ी ढलानों पर वनों की कटाई के कारण मिट्टी का कटाव एक गंभीर समस्या है।
      • मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी: लगातार खेती और जल-अपवाह के कारण मिट्टी की उर्वरता घट रही है।

2. पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी पठारी क्षेत्र (Eastern and South Eastern Plateau Region)

    • विस्तार: इस क्षेत्र में संथाल परगना का कुछ हिस्सा, दुमका, पाकुड़, साहिबगंज, गोड्डा, जामताड़ा और देवघर जिले शामिल हैं।

    • भू-आकृति: यह क्षेत्र संथाल परगना के मैदानी और पहाड़ी इलाकों से मिलकर बना है।

    • मिट्टी: यहाँ हल्की दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी (क्ले) पाई जाती है। कुछ क्षेत्रों में लैटेराइट मिट्टी भी देखने को मिलती है।

    • वृष्टि (वर्षा) का तरीका: इस क्षेत्र में औसत वर्षा 1200-1400 मिमी के आसपास होती है, जो पहले वाले क्षेत्र से कुछ अधिक है। हालाँकि, वर्षा का वितरण असमान है।

    • प्रमुख फसलें: धान, मक्का, अरहर, कपास, गन्ना और सब्जियाँ।

    • अजैविक दबाव (Abiotic Stresses):
      • बाढ़: दामोदर, मयूराक्षी और अजय नदी घाटी के निचले इलाकों में बाढ़ एक आवर्ती समस्या है, जो फसलों को नुकसान पहुँचाती है।
      • मिट्टी की अम्लता: कुछ क्षेत्रों में मिट्टी अम्लीय है, जो फसल उत्पादकता को सीमित करती है।
      • जल-जमाव: निचले इलाकों में जल-निकासी की खराब व्यवस्था के कारण जल-जमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

3. पश्चिमी शुष्क क्षेत्र (Western Dry Region)

    • विस्तार: यह क्षेत्र मुख्यतः पश्चिमी सिंहभूम जिले (विशेष रूप से चाईबासा के आसपास) में फैला हुआ है।

    • भू-आकृति: यह एक अपेक्षाकृत शुष्क और अर्ध-शुष्क पठारी क्षेत्र है।

    • मिट्टी: यहाँ हल्की दोमट और लाल बलुई मिट्टी पाई जाती है, जिसमें नमी धारण करने की क्षमता कम होती है।

    • वृष्टि (वर्षा) का तरीका: यह राज्य का सबसे शुष्क क्षेत्र है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा केवल 800-1000 मिमी ही होती है। वर्षा अत्यधिक अनिश्चित और अस्थिर है।

    • प्रमुख फसलें: मोटे अनाज (बाजरा, रागी), मक्का, अरहर, मूंगफली और कुछ दलहन। यहाँ सिंचाई के सीमित साधनों के कारण शुष्क-सहिष्णु फसलों पर जोर दिया जाता है।

    • अजैविक दबाव (Abiotic Stresses):
      • गंभीर जल-तनाव एवं सूखा: यह इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख अजैविक दबाव है। कम और अनियमित वर्षा के कारण फसल उत्पादन बहुत प्रभावित होता है।
      • मिट्टी में नमी की कमी: हल्की बलुई मिट्टी में नमी जल्दी सूख जाती है।
      • उच्च तापमान: गर्मियों में तापमान अधिक रहता है, जिससे वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है और मिट्टी में नमी और कम हो जाती है।

निष्कर्ष

झारखण्ड की कृषि विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों से प्रभावित है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट क्षमताएं और सीमाएं हैं। राज्य में कृषि की स्थिरता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए, इन क्षेत्र-विशिष्ट अजैविक दबावों (सूखा, बाढ़, मिट्टी का कटाव, अम्लता आदि) का समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जल-संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म-सिंचाई, क्षेत्र-विशिष्ट फसल किस्मों के विकास और मिट्टी स्वास्थ्य प्रबंधन जैसी टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा। एक क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति ही झारखण्ड की कृषि को जोखिम-मुक्त और लाभकारी बना सकती है।

JPSC MAINS PAPER 6/Chapter – 1 #10