झारखंड में वर्षा पोषित कृषि: विविधिकरण, पोषण सुरक्षा एवं सतत विकास
1. झारखंड की परम्परागत वर्षा पोषित कृषि एवं फसल प्रणाली
झारखंड की कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर है, जहाँ लगभग 90% खेती वर्षा पोषित (रेनफेड) है। यहाँ की कृषि प्रणाली स्थानीय जलवायु, भू-आकृति और सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुरूप विकसित हुई है।
परम्परागत खाद्य फसलें:
-
- धान (चावल): यह झारखंड की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। स्थानीय किस्में जैसे- दुबराज, बासमती, नागेना आदि उगाई जाती हैं।
-
- मक्का (मकई): धान के बाद दूसरी प्रमुख फसल, जिसका उपयोग रोटी और स्थानीय व्यंजनों में होता है।
-
- कोदो-कुटकी: ये छोटे मोटे अनाज (मिलेट्स) हैं जो शुष्क और कम उपजाऊ भूमि में भी पैदा हो जाते हैं। ये पोषण के स्रोत के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
-
- दालें: अरहर, उड़द, मूंग और मसूर जैसी दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं।
परम्परागत बागवानी फसलें:
-
- कंद एवं जड़ें: आलू, शकरकंद, कोचई (एक प्रकार की जड़ी) आदि।
-
- सब्जियाँ: करेला, लौकी, भिंडी, पालक, सरसों का साग, और स्थानीय पत्तेदार सब्जियाँ।
-
- फल: आम, कटहल, लीची, जामुन, केला और पपीता जैसे फल बागवानी के अंतर्गत उगाए जाते हैं।
2. जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्यान्न विविधिकरण की आवश्यकता
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का अनिश्चित स्वरूप, सूखा और अतिवृष्टि की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिससे केवल धान-गेहूं पर आधारित पारंपरिक कृषि प्रणाली जोखिम में है। इस संदर्भ में फसल विविधिकरण एक रणनीतिक विकल्प के रूप में उभरा है।
विविधिकरण के लाभ:
-
- जोखिम में कमी: एक फसल के विफल होने पर दूसरी फसल किसान की आजीविका को सहारा देती है।
-
- संसाधनों का कुशल उपयोग: विभिन्न फसलें मिट्टी से अलग-अलग पोषक तत्व लेती हैं और उन्हें वापस भी करती हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है।
-
- जल संरक्षण: मोटे अनाजों (मिलेट्स) को कम पानी की आवश्यकता होती है, जो जल संकट को दूर करने में मददगार हैं।
-
- बाजार में स्थिरता: विविध उत्पादों से किसानों को बाजार में उतार-चढ़ाव से बचने में मदद मिलती है।
3. फसल विविधिकरण एवं पोषण सुरक्षा का अंतर्संबंध
फसल विविधिकरण सीधे तौर पर पोषण सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। केवल चावल और गेहूं पर निर्भरता कार्बोहाइड्रेट तक सीमित पोषण प्रदान करती है, जबकि विविधिकरण संतुलित आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
पोषण सुरधा में योगदान:
-
- सूक्ष्म पोषक तत्व: दालें, मोटे अनाज, सब्जियाँ और फल प्रोटीन, आयरन, जिंक, कैल्शियम और विटामिन्स के प्रमुख स्रोत हैं।
-
- छोटे मोटे अनाज (न्यूट्री-सीरियल्स): कोदो, कुटकी, रागी आदि में उच्च फाइबर, कैल्शियम और लौह तत्व पाए जाते हैं, जो कुपोषण दूर करने में सहायक हैं।
-
- खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा: विविधिकरण के माध्यम से “केवल पेट भरना” (खाद्य सुरक्षा) से आगे बढ़कर “स्वस्थ शरीर” (पोषण सुरक्षा) का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
4. वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) एवं कृषि सुधार में इसकी भूमिका
झारखंड में वर्षा जल संचयन कृषि सुधार की कुंजी है। राज्य में पर्याप्त वर्षा होती है, लेकिन जल का अधिकांश भाग बहकर निकल जाता है। इसे रोककर कृषि उत्पादकता में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।
वर्षा जल संचयन के तरीके एवं लाभ:
-
- छोटे जलाशय (तालाब, डोबा): इनका निर्माण कर वर्षा के जल को संग्रहित किया जाता है, जिसका उपयोग रबी सीजन में सिंचाई के लिए किया जा सकता है।
-
- वाटरशेड प्रबंधन: ढलान वाली भूमि पर समोच्च रेखा में बंधान बनाकर, नाली खोदकर मिट्टी के कटाव को रोका जाता है और जल संचयन किया जाता है।
-
- फार्म पोण्ड: प्रत्येक खेत में एक छोटे तालाब का निर्माण, जो सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन का अवसर भी प्रदान करता है।
-
- सिंचाई सुनिश्चितता: संचित जल के उपयोग से खरीफ के साथ-साथ रबी और जायद सीजन में भी फसलें उगाना संभव हो पाता है।
-
- भूजल पुनर्भरण: वर्षा जल संचयन से भूजल स्तर में वृद्धि होती है, जिससे कुएँ और नलकूप सूखने से बचते हैं।
5. मत्स्य कृषि (फिशरीज): एक समेकित दृष्टिकोण
झारखंड में अनेक नदियाँ, झीलें और जलाशय हैं, जो मत्स्य पालन के लिए प्रचुर संभावनाएं प्रदान करते हैं। वर्षा जल संचयन से बने तालाब इस दिशा में और अधिक अवसर उपलब्ध कराते हैं।
महत्व एवं विकास की संभावनाएँ:
-
- आजीविका एवं आय: मत्स्य पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों की आय दोगुनी करने का एक प्रभावी साधन है।
-
- पोषण सुरक्षा: मछली प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड और अन्य पोषक तत्वों का उत्कृष्ट स्रोत है, जो कुपोषण दूर करने में सहायक है।
-
- एकीकृत कृषि प्रणाली: ‘मछली-बत्तख-सब्जी’ या ‘धान-मछली’ जैसी एकीकृत प्रणालियाँ अधिक लाभ और स्थिरता प्रदान करती हैं। मछली के अपशिष्ट से खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
-
- सरकारी पहल: ‘नीली क्रांति’ जैसी योजनाओं के तहत मत्स्य पालकों को बीज, चारा और प्रशिक्षण का समर्थन दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
झारखंड की कृषि की राह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बावजूद उज्ज्वल है, बशर्ते एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाए। परम्परागत ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए फसल विविधिकरण, वर्षा जल संचयन और मत्स्य पालन को एक साथ प्रोत्साहित करना ही वह कुंजी है जो राज्य को न केवल खाद्यान्न आत्मनिर्भरता बल्कि समग्र पोषण सुरक्षा और किसानों की आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा सकती है। यह सतत कृषि का मार्ग है, जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए मानव कल्याण सुनिश्चित करेगा।
