झारखण्ड में मृदा उत्पादकता की स्थिति एवं सुधार के उपाय
झारखण्ड, जिसे “छोटानागपुर पठार” के नाम से भी जाना जाता है, मुख्यतः एक पहाड़ी और वनाच्छादित राज्य है। यहाँ की मिट्टियाँ मुख्य रूप से लाल और पीली हैं, जो अधिकांशतः अम्लीय प्रकृति की, बलुई दोमट से लेकर मृतिका दोमट प्रकार की हैं। इन मिट्टियों में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा कम, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है। मृदा अपरदन, ढलानदार भूमि और अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के कारण यहाँ की मृदा उत्पादकता लगातार चुनौती का सामना कर रही है।
मृदा उत्पादकता सुधार हेतु प्रमुख उपाय
झारखण्ड की मृदा की सेहत में सुधार लाने और टिकाऊ उत्पादन प्राप्त करने के लिए जैविक पद्धतियाँ अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही हैं। इनमें वर्मी कम्पोस्ट, फार्म यार्ड मैन्योर (FYM) और जैविक उर्वरकों का प्रयोग प्रमुख है।
1. वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद)
वर्मी कम्पोस्ट केंचुओं की सहायता से कार्बनिक पदार्थों के विघटन से तैयार की गई एक उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद है।
- लाभ: यह मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक दशा में सुधार करती है। इसमें पोषक तत्व पौधों के लिए आसानी से उपलब्ध रूप में होते हैं। यह मिट्टी में पानी धारण करने की क्षमता बढ़ाती है और लाभदायक सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि करती है।
- झारखण्ड में प्रासंगिकता: राज्य में कृषि अवशेषों और फसल चक्र के बाद बचे पदार्थों की प्रचुरता है, जिनका उपयोग वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए किया जा सकता है। यह एक कम लागत वाली तकनीक है जिसे छोटे और सीमांत किसान आसानी से अपना सकते हैं।
- अनुप्रयोग विधि: इसे बीज बोते समय या पौध रोपण के समय मिट्टी में मिलाया जा सकता है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 2-5 टन वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग पर्याप्त होता है।
2. फार्म यार्ड मैन्योर (FYM) / गोबर की खाद
FYM पशुओं के गोबर, मूत्र और चारे के अवशेषों को सड़ाकर बनाई जाने वाली एक पारंपरिक जैविक खाद है।
- लाभ: FYM मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाने में मदद करती है, जो झारखण्ड की मिट्टियों के लिए एक प्रमुख आवश्यकता है। यह मिट्टी की संरचना को सुधारती है और धीरे-धीरे पोषक तत्व छोड़ती है।
- झारखण्ड में प्रासंगिकता: राज्य में पशुपालन एक महत्वपूर्ण सहायक गतिविधि है, इसलिए FYM के लिए कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यह मिट्टी की अम्लता को कम करने में भी सहायक है।
- अनुप्रयोग विधि: FYM को खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह से सड़ी हुई अवस्था में मिट्टी में मिला देना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 5-10 टन FYM का प्रयोग अनुशंसित है।
3. नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु
यह एक प्रकार के जैविक उर्वरक हैं, जिनमें वे लाभदायक जीवाणु होते हैं जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपलब्ध रूप में परिवर्तित कर देते हैं।
- प्रकार: मुख्यतः दो प्रकार के जीवाणु प्रयोग में लाए जाते हैं:
- राइजोबियम: यह दलहनी फसलों (जैसे- चना, अरहर, मूंग, उड़द) की जड़ों में गांठें बनाकर नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है।
- एजोटोबैक्टर / एजोस्पिरिलम: ये गैर-दलहनी फसलों (जैसे- धान, मक्का, गेहूं) के साथ सहजीवन के रूप में रहकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं।
- लाभ: ये रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं, लागत कम करते हैं और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखते हैं।
- अनुप्रयोग विधि: इन जीवाणुओं का प्रयोग आमतौर पर बीज उपचार (Seed Treatment) के रूप में किया जाता है। बीजों को एक स्टिकर (जैसे गुड़ का घोल) के साथ जीवाणु कल्चर से कोट करके बोया जाता है।
जैविक कृषि की अवधारणा
जैविक कृषि एक समग्र उत्पादन प्रबंधन प्रणाली है जो पर्यावरण के अनुकूल है और रासायनिक आदानों के प्रयोग को न्यूनतम करती है। इसकी मुख्य अवधारणाएँ हैं:
- मृदा स्वास्थ्य: जैविक कृषि का केंद्र बिंदु मृदा स्वास्थ्य है। स्वस्थ मिट्टी में स्वस्थ पौधे उगते हैं, जो मनुष्यों और जानवरों के लिए बेहतर पोषण प्रदान करते हैं।
- जैव विविधता: यह फसल चक्र, सहफसली खेती और जैविक खादों के माध्यम से खेत की जैव विविधता को बढ़ावा देती है।
- पारिस्थितिक संतुलन: यह प्रकृति के पारिस्थितिक तंत्र के सिद्धांतों पर काम करती है और कीटों एवं रोगों के प्रबंधन हेतु जैविक नियंत्रण विधियों को प्रोत्साहित करती है।
- झारखण्ड के संदर्भ में महत्व: झारखण्ड की जनजातीय अर्थव्यवस्था पारंपरिक रूप से प्रकृति के निकट रही है। जैविक कृषि इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़कर राज्य में कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभप्रद बना सकती है। इससे न केवल मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा बल्कि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य भी मिल सकेगा।
निष्कर्ष
झारखण्ड की मृदा उत्पादकता में सुधार लाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, FYM और नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणुओं जैसी जैविक पद्धतियाँ अत्यंत कारगर हैं। ये उपाय न केवल मिट्टी की दशा सुधारते हैं बल्कि जैविक कृषि की व्यापक अवधारणा को भी मजबूत करते हैं, जो राज्य के किसानों के लिए एक टिकाऊ और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत करती है।
