विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर राष्ट्रीय नीति
भारत की विज्ञान और प्रौद्योगिकी (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) नीति का उद्देश्य देश को वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में एक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करना है। यह नीति सामाजिक-आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में उपयोग करने पर केंद्रित है।
मुख्य उद्देश्य:
- स्वदेशीकरण: रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा आदि रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D): सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में R&D पर खर्च को बढ़ावा देना।
- मानव संसाधन विकास: वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की एक नई पीढ़ी तैयार करना।
- नवाचार एवं उद्यमिता: स्टार्ट-अप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहन।
- अंतर-विषयक एकीकरण: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में एकीकृत करना।
प्रमुख पहलें:
- राष्ट्रीय अंतरिक्ष मिशन: चंद्रयान, मंगलयान और नेविगेशन सिस्टम (NavIC)।
- डिजिटल इंडिया: डिजिटल अवसंरचना और सेवाओं का विस्तार।
- जैव-प्रौद्योगिकी मिशन: कृषि, स्वास्थ्य देखभाल और पर्यावरण में अनुप्रयोग।
- राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM): देश भर में कम्प्यूटेशनल क्षमता का विकास।
देश की ऊर्जा मांग
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण भारत की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है। देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है।
मांग को प्रभावित करने वाले कारक:
- आर्थिक विकास: सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के साथ ऊर्जा की मांग सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
- जनसंख्या वृद्धि: अधिक लोगों का मतलब है बिजली, परिवहन और खाना पकाने के लिए ऊर्जा की अधिक आवश्यकता।
- जीवन स्तर में सुधार: ग्रामीण विद्युतीकरण और मध्यम वर्ग के विस्तार से घरेलू बिजली की मांग बढ़ी है।
- औद्योगिक क्षेत्र: इस्पात, सीमेंट, रसायन आदि ऊर्जा-गहन उद्योग मांग का एक प्रमुख हिस्सा हैं।
चुनौतियाँ:
- मांग और आपूर्ति के बीच अंतर।
- आयात पर निर्भरता, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करती है।
- पर्यावरणीय प्रभाव, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के जलने से।
ऊर्जा के परंपरागत स्रोत
ये वे स्रोत हैं जिनका उपयोग लंबे समय से किया जा रहा है और ये प्रकृति में समाप्त होने वाले (Exhaustible) हैं। भारत की ऊर्जा आपूर्ति में इनका प्रमुख योगदान है।
प्रमुख परंपरागत स्रोत:
- कोयला:
- भारत की ऊर्जा प्रणाली की रीढ़; बिजली उत्पादन का लगभग 55% हिस्सा।
- देश में कोयले के भंडार पर्याप्त हैं, लेकिन गुणवत्ता कम है।
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस:
- परिवहन और औद्योगिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण।
- आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 85%) आयात किया जाता है, जिससे व्यापार घाटा और सुरक्षा चिंताएँ पैदा होती हैं।
- परमाणु ऊर्जा:
- एक गैर-जीवाश्म, उच्च-घनत्व वाला ऊर्जा स्रोत।
- देश में यूरेनियम के सीमित भंडार हैं, लेकिन थोरियम के विशाल भंडार हैं (भविष्य की संभावना)।
- जलविद्युत ऊर्जा:
- एक नवीकरणीय लेकिन परंपरागत रूप से वर्गीकृत स्रोत।
- पर्यावरणीय विस्थापन और पारिस्थितिकी प्रभाव जैसी चुनौतियाँ।
ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोत
इन्हें नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोत भी कहा जाता है। ये प्रकृति में असमाप्त (Inexhaustible) हैं और पर्यावरण के अनुकूल माने जाते हैं। जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं के कारण भारत इन पर तेजी से ध्यान केंद्रित कर रहा है।
प्रमुख गैर-परंपरागत स्रोत:
- सौर ऊर्जा:
- भारत की महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा रणनीति का केंद्रबिंदु।
- राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM) के तहत 2030 तक 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य, जिसमें सौर ऊर्जा की प्रमुख हिस्सेदारी है।
- गुजरात और राजस्थान में बड़े सोलर पार्क।
- पवन ऊर्जा:
- भारत दुनिया के शीर्ष पवन ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है।
- तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे तटीय और प्रायद्वीपीय राज्यों में अच्छी क्षमता।
- जैव-ऊर्जा:
- बायोमास, बायोगैस और बायोफ्यूल से प्राप्त ऊर्जा।
- कचरे का निपटान और ग्रामीण ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में मददगार।
- लघु जलविद्युत परियोजनाएँ:
- 25 MW तक की क्षमता वाली परियोजनाएँ, जो पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं।
- अन्य: ज्वारीय, भू-तापीय और हाइड्रोजन ऊर्जा भविष्य के संभावित स्रोत हैं।
सरकारी पहलें:
- नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की स्थापना।
- उत्पादन-लिंकित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से घरेलौ सौर विनिर्माण को बढ़ावा।
- हरित हाइड्रोजन मिशन।
निष्कर्ष
भारत की ऊर्जा भविष्य की रणनीति “ऊर्जा त्रय” (Energy Trilemma) को संतुलित करने पर निर्भर है: ऊर्जा सुरक्षा (Security), ऊर्जा की पहुंच (Access) और पर्यावरणीय स्थिरता (Sustainability)। इसके लिए कोयला जैसे परंपरागत स्रोतों के दक्ष उपयोग के साथ-साथ सौर और पवन जैसे गैर-परंपरागत स्रोतों के तीव्र विस्तार की आवश्यकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति, ऊर्जा भंडारण (बैटरी), स्मार्ट ग्रिड और हाइड्रोजन जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों में नवाचार को बढ़ावा देकर इस संक्रमण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नाभिकीय ऊर्जा: एक परिचय
नाभिकीय ऊर्जा, परमाणु नाभिक के विखंडन (Fission) अथवा संलयन (Fusion) की प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा है। वर्तमान में विद्युत उत्पादन हेतु प्रयुक्त होने वाली तकनीक परमाणु विखंडन पर आधारित है, जिसमें यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम-239 जैसे भारी तत्वों के नाभिकों को न्यूट्रॉन की बौछार से तोड़ा जाता है, जिससे अपार ऊर्जा मुक्त होती है।
नाभिकीय ऊर्जा के लाभ
- उच्च ऊर्जा घनत्व: एक छोटी सी मात्रा में ईंधन से विशाल मात्रा में ऊर्जा का उत्पादन संभव है। उदाहरण के लिए, एक किलोग्राम यूरेनियम-235 से लगभग 35 लाख किलोग्राम कोयले के बराबर ऊर्जा प्राप्त होती है।
- निम्न कार्बन उत्सर्जन: परमाणु ऊर्जा संयंत्र बिजली उत्पादन के दौरान बहुत कम मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं, इस प्रकार जलवायु परिवर्तन से निपटने में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
- विश्वसनीय आधार भार ऊर्जा स्रोत: यह सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, दिन-रात और किसी भी मौसम में लगातार बिजली की आपूर्ति कर सकती है।
- ऊर्जा सुरक्षा: यह देशों को ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने तथा अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहायता कर सकती है।
नाभिकीय ऊर्जा की हानियाँ एवं चुनौतियाँ
- रेडियोधर्मी कचरा: परमाणु रिएक्टरों से निकलने वाला रेडियोधर्मी कचरा हजारों वर्षों तक खतरनाक बना रहता है। इसके भंडारण और निपटान की सुरक्षित व्यवस्था एक गंभीर वैश्विक चुनौती है।
- दुर्घटनाओं का जोखिम: चेर्नोबिल (1986), फुकुशिमा (2011) और थ्री माइल आइलैंड (1979) जैसी दुर्घटनाओं ने मानवीय और पर्यावरणीय दृष्टि से इसके गंभीर जोखिमों को उजागर किया है।
- उच्च प्रारंभिक लागत: परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण में भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है तथा इनके निर्माण में लंबा समय लगता है।
- सामरिक जोखिम एवं प्रसार: नागरिक परमाणु कार्यक्रम से सैन्य उद्देश्यों हेतु परमाणु हथियार बनाने का जोखिम हमेशा बना रहता है, जो अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा है।
- सीमित ईंधन संसाधन: यूरेनियम एक सीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधन है और इसके खनन के पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं।
भारत की नाभिकीय नीति: झुकाव एवं दिशा
भारत की नाभिकीय नीति तीन स्तंभों पर आधारित है:
- ऊर्जा सुरक्षा: तीव्र आर्थिक विकास की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने हेतु नाभिकीय ऊर्जा को एक स्वच्छ एवं विश्वसनीय स्रोत के रूप में विकसित करना।
- सामरिक स्वायत्तता: एक विश्वसनीय न्यूनतम अवरोध (Credible Minimum Deterrence) की नीति के तहत परमाणु हथियारों का संचालन करना।
- नागरिक एवं सैन्य कार्यक्रमों का पृथक्करण: भारत ने अपने नागरिक और सैन्य परमाणु कार्यक्रमों को स्पष्ट रूप से अलग रखा है।
वर्तमान प्रवृत्ति: 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के बाद, भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार में प्रवेश मिला। इससे देश में परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ। भारत का लक्ष्य नाभिकीय ऊर्जा का विस्तार करना है, साथ ही तीन-स्तरीय ईंधन चक्र (थोरियम सहित) और तीव्र प्रजनक रिएक्टर (Fast Breeder Reactors) जैसी उन्नत तकनीकों पर अनुसंधान जारी है।
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधियाँ: एनपीटी और सीटीबीटी
क. परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty – NPT)
- उद्देश्य: परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना तथा नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग स्थापित करना।
- सदस्यता: 1970 में लागू हुई। इसमें परमाणु हथियार संपन्न राज्य (NWS) – अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन; और गैर-परमाणु हथियार राज्य (NNWS) शामिल हैं।
- भारत का रुख: भारत NPT पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है क्योंकि इसे यह संधि भेदभावपूर्ण लगती है, जो कुछ देशों को परमाणु हथियार रखने का अधिकार देती है जबकि अन्य को वंचित करती है। भारत ने स्वेच्छा से ही अपने परमाणु हथियारों के अप्रसार और नागरिक सुविधाओं पर IAEA की सुरक्षा (Safeguards) को स्वीकार किया है।
ख. व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty – CTBT)
- उद्देश्य: सभी वातावरणों (वायुमंडल, अंतरिक्ष, भूमिगत और जलमग्न) में सभी परमाणु विस्फोट परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाना।
- वर्तमान स्थिति: यह संधि अभी तक लागू नहीं हुई है क्योंकि इसे अनुबंध में सूचीबद्ध 44 विशिष्ट देशों के अनुसमर्थन की आवश्यकता है, जिनमें से कुछ (जैसे अमेरिका, चीन, भारत, पाकिस्तान, इजरायल, उत्तर कोरिया) ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है।
- भारत का रुख: भारत ने 1996 में इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। भारत का मानना है कि CTBT वास्तविक निरस्त्रीकरण की दिशा में एक ठोस कदम नहीं है और यह उन देशों के लिए तकनीकी लाभ को जमा करने का मार्ग प्रशस्त करती है जिन्होंने पहले ही व्यापक परीक्षण किए हैं। हालाँकि, भारत 1998 के बाद से एक स्वैच्छिक एकतरफा परीक्षण रोक (Moratorium) का पालन कर रहा है।
निष्कर्ष
नाभिकीय ऊर्जा एक दोधारी तलवार के समान है। एक ओर, यह ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में एक शक्तिशाली साधन हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, इसके दुरुपयोग, दुर्घटनाओं और रेडियोधर्मी कचरे के जोखिम गंभीर चिंता का विषय हैं। भारत ने एक संतुलित रास्ता अपनाया है, जहाँ वह अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नागरिक परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है, साथ ही अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रति इसका दृष्टिकोण समानता और वास्तविक निरस्त्रीकरण पर आधारित है। भविष्य की दिशा उन्नत एवं सुरक्षित प्रौद्योगिकियों के विकास तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर निर्भर करेगी।
जैव प्रौद्योगिकी: उपयोग एवं प्रतिकूल प्रभाव
जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवधारियों, उनके अंगों, कोशिकाओं या आणविक घटकों का उपयोग करके ऐसे उत्पाद एवं तकनीकें विकसित की जाती हैं जो मानव जीवन को बेहतर बनाती हैं। इसका अनुप्रयोग कृषि, चिकित्सा, खाद्य प्रसंस्करण एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में हो रहा है। हालाँकि, इसके व्यापक उपयोग के साथ ही कुछ संभावित प्रतिकूल प्रभावों पर भी विचार करना आवश्यक है।
विभिन्न क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग
1. कृषि (Agriculture)
- जैनटिक रूप से संशोधित (GM) फसलें: कीटों एवं रोगों के प्रति प्रतिरोधी, सूखा सहनशील तथा उच्च उपज देने वाली फसलों का विकास। उदाहरण: Bt कपास, Bt बैंगन, सुनहरे चावल (Golden Rice)।
- ऊतक संवर्धन (Tissue Culture): एकल कोशिका से पूर्ण पौधे तैयार करना, जिससे स्वस्थ एवं शीघ्र वृद्धि वाले पौधे प्राप्त होते हैं।
- जैव-उर्वरक (Bio-fertilizers) एवं जैव-कीटनाशक (Bio-pesticides): रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना।
2. जीवधारियों के प्रजनन में (In Animal Husbandry)
- कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination): उच्च गुणवत्ता वाले पशुओं के वीर्य का उपयोग करके बेहतर नस्ल का विकास।
- भ्रूण स्थानांतरण तकनीक (Embryo Transfer Technology): एक उच्च नस्ल की गाय से अनेक भ्रूण प्राप्त करके दूसरी गायों में स्थानांतरित करना।
- पशु टीकाकरण: हैजा, खुरपका-मुंहपका रोग आदि के लिए टीके विकसित करना।
3. औषधि (Medicine)
- जैनटिक इंजीनियरिंग द्वारा औषधि निर्माण: मानव इंसुलिन, वृद्धि हार्मोन, हेपेटाइटिस-बी टीका आदि का उत्पादन।
- जीन थेरेपी (Gene Therapy): आनुवंशिक बीमारियों (जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस) के उपचार हेतु दोषपूर्ण जीन को सही जीन से प्रतिस्थापित करना।
- स्टेम सेल थेरेपी: क्षतिग्रस्त ऊतकों एवं अंगों की मरम्मत की संभावना।
- रोगों का शीघ्र निदान: डायग्नोस्टिक किट्स (जैसे- ELISA) द्वारा AIDS, हेपेटाइटिस आदि का त्वरित पता लगाना।
4. खाद्य तकनीक (Food Technology)
- खाद्य संरक्षण: सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके दही, पनीर, अचार आदि का निर्माण।
- पोषण वृद्धि: फसलों के पोषक तत्वों (जैसे विटामिन-ए, आयरन) में वृद्धि करना (बायोफोर्टिफिकेशन)।
- खाद्य परिरक्षक: प्राकृतिक खाद्य परिरक्षकों का विकास।
5. पर्यावरणीय संरक्षण (Environmental Conservation)
- जैव-उपचार (Bioremediation): सूक्ष्मजीवों की सहायता से तेल रिसाव, भारी धातु प्रदूषण जैसे प्रदूषकों का अपघटन।
- जैव-प्रदूषक संवेदक (Biosensors): पर्यावरण में विषैले पदार्थों का पता लगाना।
- अपशिष्ट प्रबंधन: कचरे का कम्पोस्टिंग द्वारा जैव-खाद में रूपांतरण।
- जैव-ईंधन (Biofuel): अल्कोहॉल एवं बायोगैस जैसे स्वच्छ ईंधन का उत्पादन।
जैव प्रौद्योगिकीय व्यवधानों के सम्भावित प्रतिकूल प्रभाव
1.पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव
- जैव-विविधता को खतरा: GM फसलों के जीन का प्राकृतिक फसलों में स्थानांतरण (जीन प्रवाह) हो सकता है, जिससे पारंपरिक किस्में प्रदूषित हो सकती हैं।
- लक्ष्येतर जीवों पर प्रभाव: उदाहरण के लिए, Bt कपास का पराग मधुमक्खियों जैसे लाभकारी कीटों को नुकसान पहुँचा सकता है।
- सुपरवीड्स का उद्भव: हर्बिसाइड रेजिस्टेंट जीन वाली फसलों से उत्पन्न खरपतवार नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
2.मानव स्वास्थ्य पर जोखिम
- एलर्जी की संभावना: नए प्रोटीन के कारण मानव शरीर में एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है।
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध: जीन ट्रांसफर में प्रयुक्त एंटीबायोटिक मार्कर जीन मानव आंतों के बैक्टीरिया में स्थानांतरित हो सकते हैं, जिससे एंटीबायोटिक दवाओं का प्रभाव कम हो सकता है।
- दीर्घकालिक प्रभावों की अनिश्चितता: GM खाद्य पदार्थों के दीर्घकालिक सेवन के प्रभावों पर अभी पूर्ण शोध का अभाव है।
3.सामाजिक-आर्थिक चिंताएँ
- बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR): कंपनियों द्वारा जैविक संसाधनों पर एकाधिकार की संभावना, जिससे छोटे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
- आनुवंशिक एकरूपता: एक ही प्रकार की फसल के व्यापक प्रसार से पूरी फसल के कीट/रोग की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है।
- नैतिक एवं धार्मिक मुद्दे: जीन में हस्तक्षेप को लेकर नैतिक प्रश्न, विशेष रूप से जानवरों के जीन को पौधों में स्थानांतरित करना।
4.नियामक एवं जैव सुरक्षा चुनौतियाँ
- पर्याप्त नियमन का अभाव: कई देशों में जैव सुरक्षा मानक (Biosafety Standards) एवं नियामक ढाँचा कमजोर है।
- लेबलिंग का अभाव: उपभोक्ताओं को GM उत्पादों के बारे में सही जानकारी नहीं मिल पाती, जिससे उनके चयन का अधिकार प्रभावित होता है।
निष्कर्ष
जैव प्रौद्योगिकी एक शक्तिशाली उपकरण है जिसमें वैश्विक चुनौतियों जैसे खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पर्यावरणीय गिरावट से निपटने की अपार संभावनाएँ हैं। हालाँकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए, इसके संभावित जोखिमों को दूर करने हेतु मजबूत जैव-सुरक्षा प्रोटोकॉल, पारदर्शी नियमन और सार्वजनिक जागरूकता आवश्यक है। एक संतुलित एवं सतत दृष्टिकोण ही इसके जोखिमों को कम करते हुए इसके लाभों को समाज के लिए सुनिश्चित कर सकता है।
दूरसंवेदी
दूरसंवेदी (Remote Sensing) पृथ्वी की सतह या किसी अन्य वस्तु के बारे में बिना सीधे भौतिक संपर्क में आए, सूचना एकत्र करने की एक प्रौद्योगिकी है। यह प्रक्रिया आमतौर पर विमानों या उपग्रहों पर स्थापित सेंसर (कैमरा, रडार, लिडार आदि) द्वारा वस्तु से परावर्तित या उत्सर्जित विद्युत चुम्बकीय विकिरण का पता लगाकर और उसका विश्लेषण करके की जाती है।
दूरसंवेदी के प्रमुख अनुप्रयोग
1. मौसम की भविष्यवाणी (Weather Forecasting)
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- मौसम उपग्रह: जियोस्टेशनरी और पोलर ऑर्बिटिंग उपग्रह लगातार बादलों के पैटर्न, वायुमंडलीय नमी, समुद्र की सतह का तापमान, तूफानों के विकास और हवाओं की गति पर नजर रखते हैं।
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- चक्रवात पूर्वानुमान: उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (जैसे चक्रवात, हरिकेन) के निर्माण, उनकी तीव्रता, गति और मार्ग का सटीक अनुमान लगाने में दूरसंवेदी डेटा महत्वपूर्ण है, जिससे समय रहते चेतावनी जारी की जा सकती है।
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- मौसम मॉडल: मौसम पूर्वानुमान मॉडलों के लिए दूरसंवेदी डेटा एक प्राथमिक इनपुट है, जो वैश्विक और क्षेत्रीय मौसम पैटर्न को समझने में मदद करता है।
2. आपदा प्रबंधन एवं चेतावनी (Disaster Management and Warning)
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- बाढ़ मानचित्रण: बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का त्वरित मानचित्रण करके, राहत और बचाव कार्यों को निर्देशित करने में मदद मिलती है।
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- सूखा निगरानी: वनस्पति सूचकांक (जैसे NDVI) और मिट्टी की नमी के आधार पर सूखे की तीव्रता और विस्तार का आकलन किया जाता है।
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- भूस्खलन एवं भूकंप जोखिम क्षेत्र: ढलान, भू-विज्ञान, और भू-उपयोग डेटा का उपयोग करके संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जाती है।
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- चक्रवात एवं सुनामी: समुद्र की सतह के तापमान, तूफान की गति और समुद्र तल की ऊँचाई में परिवर्तन का पता लगाकर सटीक चेतावनी दी जाती है।
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- वन अग्नि का पता लगाना: उपग्रह थर्मल इन्फ्रारेड सेंसर के जरिए आग के हॉटस्पॉट का पता लगाते हैं, जिससे अग्नि प्रसार का आकलन और नियंत्रण किया जा सकता है।
3. जल संसाधनों का मानचित्रण (Water Resources Mapping)
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- सतही जल निकाय: नदियों, झीलों, जलाशयों और बांधों की सीमा और उनके स्थानिक परिवर्तनों का मानचित्रण।
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- भूजल संभाव्य क्षेत्र: विशिष्ट भू-आकृति, जैसे रेखीय विसर्प (Lineaments) की पहचान करके भूजल के संभावित स्रोतों का पता लगाया जाता है।
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- हिमनद एवं हिम आवरण अध्ययन: हिमनदों के पिघलने, उनके क्षेत्रफल में परिवर्तन और हिम रेखा की निगरानी की जाती है, जो जल संसाधन प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
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- जल गुणवत्ता: जल निकायों में तलछट, शैवाल के फैलाव और प्रदूषकों की उपस्थिति का आकलन किया जा सकता है।
4. मृदा एवं खनिज संसाधनों का मानचित्रण (Soil and Mineral Resources Mapping)
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- मृदा मानचित्रण: विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का वर्गीकरण, उनकी उर्वरता, नमी सामग्री और अपरदन संवेदनशीलता का आकलन किया जाता है।
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- मृदा अपरदन एवं भू-अवनयन: दूरसंवेदी डेटा से भूमि क्षरण के क्षेत्रों की पहचान और निगरानी की जा सकती है।
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- खनिज अन्वेषण: पृथ्वी की सतह पर विशिष्ट चट्टानों और खनिजों के अद्वितीय स्पेक्ट्रल हस्ताक्षर (Spectral Signature) की पहचान करके खनिज संसाधनों के संभावित क्षेत्रों का पता लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोथर्मल परिवर्तन वाले क्षेत्र अक्सर अयस्क निक्षेपों से जुड़े होते हैं।
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- भू-वैज्ञानिक मानचित्रण: चट्टानों के प्रकार, भ्रंश रेखाओं, मोड़ों और अन्य भू-वैज्ञानिक संरचनाओं के मानचित्रण में सहायता।
निष्कर्ष
दूरसंवेदी प्रौद्योगिकी, जीआईएस (भौगोलिक सूचना तंत्र) के साथ मिलकर, पृथ्वी के संसाधनों के प्रबंधन, पर्यावरण निगरानी और आपदा न्यूनीकरण में एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुई है। यह बड़े और दुर्गम क्षेत्रों का तीव्र, आवर्ती और व्यापक डेटा प्रदान करती है, जिससे नीति निर्माण और वैज्ञानिक शोध को significant बल मिलता है।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम, उपग्रहों के अनुप्रयोग एवं मिसाइल कार्यक्रम
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत 1960 के दशक में डॉ. विक्रम साराभाई के दूरदर्शी नेतृत्व में हुई। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का शांतिपूर्ण उपयोग करके राष्ट्रीय विकास को गति देना है। इस कार्यक्रम के प्रमुख घटक हैं:
1. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
- स्थापना: 15 अगस्त, 1969।
- मुख्यालय: बेंगलुरु, कर्नाटक।
- प्रमुख केंद्र: विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (तिरुवनंतपुरम), इसरो उपग्रह केंद्र (बेंगलुरु), सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (श्रीहरिकोटा)।
- उद्देश्य: अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान और ग्रह अन्वेषण को बढ़ावा देना।
2. उपग्रह प्रक्षेपण यान (Launch Vehicles)
- SLV-3 (सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): भारत का पहला प्रायोगिक उपग्रह प्रक्षेपण यान, रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया।
- ASLV (ऑगमेंटेड सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): SLV-3 का उन्नत संस्करण।
- PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): ISRO का ‘वर्कहॉर्स’। यह पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों को पोलर सन-सिंक्रोनस कक्षा में स्थापित करने के लिए विश्वसनीय यान है। चंद्रयान-1 और मंगलयान (MOM) जैसे मिशन इसी के द्वारा प्रक्षेपित किए गए।
- GSLV (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): भारी संचार उपग्रहों को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित करने हेतु। इसमें क्रायोजेनिक इंजन तकनीक का उपयोग किया जाता है।
- LVM3 (GSLV Mk-III): भारत का सबसे शक्तिशाली लॉन्च व्हीकल, जो 4 टन तक के उपग्रहों को GTO में स्थापित कर सकता है। चंद्रयान-2 और 3 के प्रक्षेपण में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. प्रमुख अंतरिक्ष मिशन
- आर्यभट्ट: भारत का पहला उपग्रह (1975)।
- चंद्रयान-1 (2008): चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज की।
- मंगलयान (MOM, 2013): पहले प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुँचने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना।
- ASTROSAT (2015): भारत का पहला समर्पित अंतरिक्ष वेधशाला मिशन।
- चंद्रयान-3 (2023): चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में सफलतापूर्वक सॉफ्ट-लैंडिंग की, जिससे भारत चंद्रमा पर पहुँचने वाला विश्व का चौथा और दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला प्रथम देश बना।
- आदित्य-L1 (2023): सूर्य का अध्ययन करने वाला भारत का पहला मिशन।
- गगनयान मिशन: भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम, जिसका लक्ष्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजना है।
विभिन्न उद्देश्यों हेतु उपग्रहों के अनुप्रयोग
1. संचार (Communication)
- उपग्रह श्रृंखला: INSAT (इंडियन नेशनल सैटेलाइट सिस्टम) और GSAT (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट) श्रृंखला।
- अनुप्रयोग: दूरदर्शन प्रसारण, टेलीकॉम, टेलीमेडिसिन, टेली-एजुकेशन (EDUSAT), आपदा चेतावनी एवं प्रबंधन।
2. पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation/Remote Sensing)
- उपग्रह श्रृंखला: IRS (इंडियन रिमोट सेंसिंग) श्रृंखला, Cartosat, Resourcesat, Oceansat।
- अनुप्रयोग:
- कृषि: फसल उत्पादन पूर्वानुमान, मृदा एवं जल संसाधन मानिटरिंग।
- जल संसाधन: जलाशयों के जल स्तर की निगरानी, भूजल संभावित क्षेत्रों की पहचान।
- आपदा प्रबंधन: बाढ़, चक्रवात, सूखा एवं वनाग्नि की निगरानी एवं मानचित्रण।
- शहरी नियोजन: अवैध निर्माण पर नजर, अवसंरचना विकास।
- सुरक्षा: सीमा क्षेत्रों की निगरानी।
3. नेविगेशन (Navigation)
- नाविक (NavIC – Navigation with Indian Constellation): भारत का स्वदेशी क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली।
- अनुप्रयोग: ट्रांसपोर्ट (वाहन ट्रैकिंग), आपदा प्रबंधन, मछुआरों एवं नौसेना के लिए सटीक स्थिति सूचना, मोबाइल फोन इंटीग्रेशन।
4. वैज्ञानिक अन्वेषण (Scientific Exploration)
- चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-L1 जैसे मिशन खगोलीय पिंडों के रहस्यों को सुलझा रहे हैं।
भारतीय मिसाइल कार्यक्रम
भारतीय मिसाइल कार्यक्रम का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के नेतृत्व में किया गया है, जिसमें अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी शामिल हैं। इसका प्रमुख फोकस सामरिक और स्ट्रैटेजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।
1. एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP – 1983)
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू इस कार्यक्रम ने भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखी। इसके अंतर्गत पाँच मिसाइल प्रणालियों का विकास किया गया:
- पृथ्वी: सतह-से-सतह पर मार करने वाली लघु दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल।
- आकाश: सतह-से-हवा में मार करने वाली मध्यम दूरी की मिसाइल।
- त्रिशूल: कम दूरी की सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल।
- नाग: तीसरी पीढ़ी की ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल।
- अग्नि: सतह-से-सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल श्रृंखला, जो रणनीतिक बलों की रीढ़ है।
2. प्रमुख मिसाइल प्रणालियाँ
- अग्नि श्रृंखला: अग्नि-I (700-1250 किमी) से लेकर अग्नि-V (5,000+ किमी) तक, जो अंतर्महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) की श्रेणी में आती है। अग्नि-V भारत की सबसे लंबी दूरी की मिसाइल है।
- पृथ्वी श्रृंखला: पृथ्वी-II (350 किमी) एक स्ट्रैटेजिक मिसाइल है।
- ब्रह्मोस: भारत (DRDO) और रूस (NPOM) की संयुक्त परियोजना। यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है (~मach 2.8)। यह जमीन, हवा, जहाज और पनडुब्बी, सभी से प्रक्षेपित की जा सकती है।
- नाग / हेलिना: हेलिना, नाग मिसाइल का हेलीकॉप्टर से प्रक्षेपित होने वाला संस्करण है।
- आकाश मिसाइल प्रणाली: बहुत लक्ष्य-क्षमता वाली मिसाइल, जो एक साथ कई लक्ष्यों पर नजर रख सकती है।
- MRSAM / SRSAM: मध्यम/लघु दूरी की सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जो भारतीय सेना एवं नौसेना के लिए विकसित की गई हैं।
- K-15 / K-4 मिसाइल: पनडुब्बी से प्रक्षेपित होने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM), जो भारत की परमाणु त्रय (Nuclear Triad) क्षमता को पूरा करती है।
3. मिसाइल रक्षा प्रणाली (Ballistic Missile Defence – BMD)
DRDO द्वारा विकसित, यह एक दो-स्तरीय प्रणाली है जो दुश्मन की आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को बाहरी वायुमंडल (Exo-atmospheric) और भीतरी वायुमंडल (Endo-atmospheric) में ही नष्ट करने में सक्षम है।
निष्कर्ष
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम देश की वैज्ञानिक प्रतिभा, तकनीकी स्वावलंबन और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं। जहाँ अंतरिक्ष कार्यक्रम ने ‘जीवन को बेहतर बनाने’ (Giving Impetus to Development) पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं मिसाइल कार्यक्रम ने राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। ये दोनों ही कार्यक्रम ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Atmanirbhar Bharat) के संकल्प को साकार करने की दिशा में मील के पत्थर हैं और भारत को वैश्विक स्तर पर एक तकनीकी शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं।
