वंशानुक्रम एवं आणविक जीवविज्ञान

1. एकल संकरण एवं द्वि-संकरण

ग्रेगर जॉन मेण्डेल द्वारा किए गए संकरण प्रयोगों ने वंशानुक्रम के सिद्धांतों की नींव रखी।

एकल संकरण (Monohybrid Cross)

  • परिभाषा: ऐसा संकरण जिसमें माता-पिता के बीच केवल एक ही विपर्यासी लक्षण (जैसे- पौधे की लम्बाई) का अध्ययन किया जाता है।
  • मेण्डेल के प्रयोग: मेण्डेल ने लम्बे (TT) एवं बौने (tt) मटर के पौधों का संकरण किया।
    • F1 पीढ़ी: सभी पौधे लम्बे (Tt) प्राप्त हुए। इससे प्रभाविता का नियम सिद्ध हुआ।
    • F2 पीढ़ी: F1 पीढ़ी के पौधों का स्व-परागण कराने पर 3 लम्बे : 1 बौना पौधा प्राप्त हुआ। यह विभाजन का नियम दर्शाता है।
  • F2 अनुपात: फीनोटाइपिक 3 : 1, जीनोटाइपिक 1 : 2 : 1 (TT : Tt : tt)

द्वि-संकरण (Dihybrid Cross)

  • परिभाषा: ऐसा संकरण जिसमें माता-पिता के बीच दो विपर्यासी लक्षणों (जैसे- बीज का आकार एवं बीज का रंग) का एक साथ अध्ययन किया जाता है।
  • मेण्डेल के प्रयोग: मेण्डेल ने गोल-पीले (RRYY) एवं झुर्रीदार-हरे (rryy) बीज वाले पौधों का संकरण किया।
    • F1 पीढ़ी: सभी पौधे गोल-पीले (RrYy) प्राप्त हुए।
    • F2 पीढ़ी: F1 पीढ़ी के पौधों का स्व-परागण कराने पर 4 प्रकार के फीनोटाइप प्राप्त हुए।
  • F2 अनुपात: फीनोटाइपिक 9 : 3 : 3 : 1 (गोल-पीले : गोल-हरे : झुर्रीदार-पीले : झुर्रीदार-हरे)। इससे स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम सिद्ध हुआ, जिसके अनुसार विभिन्न लक्षणों के जीन एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं।

2. लिंग निर्धारण एवं लिंग-सहलग्न वंशानुक्रम

लिंग निर्धारण (Sex Determination)

मनुष्यों में लिंग गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित होता है।

  • मादा: दो X गुणसूत्र (XX)
  • नर: एक X एवं एक Y गुणसूत्र (XY)
  • नर शुक्राणु द्वारा निर्धारण: यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अण्डे को निषेचित करता है तो लड़की (XX) और यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु निषेचित करता है तो लड़का (XY) पैदा होता है।

लिंग-सहलग्न वंशानुक्रम (Sex-Linked Inheritance)

X गुणसूत्र पर स्थित जीन द्वारा नियंत्रित रोग/लक्षण लिंग-सहलग्न कहलाते हैं।

  • विशेषताएँ:
    • पुरुषों में अभिव्यक्ति अधिक (क्योंकि उनमें केवल एक X गुणसूत्र होता है)।
    • महिलाएं वाहक (Carrier) का कार्य कर सकती हैं।
    • पिता से पुत्र में सीधे स्थानांतरित नहीं होते (क्योंकि पुत्र को पिता से Y गुणसूत्र मिलता है, X नहीं)।
  • उदाहरण:
    • वर्णान्धता (Colourblindness): X गुणसूत्र पर स्थित जीन। एक वर्णान्ध पुरुष (XcY) एवं एक सामान्य महिला (XX) की सन्तानें सामान्य होंगी, लेकिन पुत्रियाँ वाहक (XcX) होंगी।
    • हीमोफिलिया (Haemophilia): रक्त का नहीं जमना, X गुणसूत्र से जुड़ा हुआ।

3. डीएनए: संरचना, कार्य एवं प्रकृति

डीएनए की संरचना (Structure of DNA)

  • डबल हेलिक्स मॉडल: वाटसन एवं क्रिक द्वारा प्रस्तावित।
  • बुनियादी इकाई: न्यूक्लियोटाइड। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में तीन घटक होते हैं:
    • एक नाइट्रोजन बेस (एडेनीन-A, ग्वानीन-G, साइटोसीन-C, थाइमीन-T)
    • एक पेंटोज शर्करा (डीऑक्सीराइबोज)
    • एक फॉस्फेट समूह
  • दोनों स्ट्रैंड हाइड्रोजन बंधों द्वारा जुड़े होते हैं (A-T के बीच दो, G-C के बीच तीन H-बंध)।

डीएनए के कार्य (Functions of DNA)

  1. आनुवंशिक सूचना का भंडार: डीएनए में जीन्स के रूप में आनुवंशिक कोड संचित रहता है।
  2. वंशागति: कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए स्व-द्विगुणन (Replication) द्वारा अपनी प्रतिलिपि बनाता है और अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होता है।
  3. प्रोटीन संश्लेषण का नियंत्रण: डीएनए में निहित सूचना के अनुसार ही कोशिका में प्रोटीन का निर्माण होता है।

डीएनए की प्रकृति (Nature of DNA)

  • अर्ध-सरंक्षी द्विगुणन (Semi-Conservative Replication): डीएनए द्विगुणन की यह सर्वमान्य विधि है। इसमें नया बना डीएनए अणु एक पुराने स्ट्रैंड और एक नए स्ट्रैंड से मिलकर बनता है। मेसेल्सन और स्टाहल के प्रयोग ने इसे सिद्ध किया।
  • डीएनए एक स्थायी अणु है जो उत्परिवर्तन (Mutation) के बावजूद आनुवंशिक स्थिरता बनाए रखता है।

4. प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)

यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिका डीएनए में निहित जीन के कोड का उपयोग करके विशिष्ट प्रोटीन बनाती है। इसमें दो मुख्य चरण होते हैं:

चरण स्थान मुख्य घटनाएँ
1. अनुलेखन (Transcription) केन्द्रक डीएनए का एक स्ट्रैंड टेम्पलेट के रूप में कार्य करता है और mRNA (मैसेंजर RNA) का संश्लेषण होता है। RNA पोलीमरेज़ एंजाइम इस प्रक्रिया को उत्प्रेरित करता है।
2. अनुवाद (Translation) राइबोसोम mRNA पर उपस्थित जेनेटिक कोड (कोडॉन) का tRNA (ट्रांसफर RNA) द्वारा अमीनो अम्लों के क्रम में अनुवाद किया जाता है। ये अमीनो अम्ल पेप्टाइड बंधों द्वारा जुड़कर पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला (प्रोटीन) बनाते हैं।

5. जीन नियमन (Gene Regulation)

सभी कोशिकाओं में सभी जीन सक्रिय नहीं होते हैं। जीन नियमन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिका यह निर्धारित करती है कि कब, कहाँ और कितनी मात्रा में किसी जीन की अभिव्यक्ति होगी।

  • ऑपेरॉन मॉडल (Operon Model): जैकब और मोनाद द्वारा E. coli जीवाणु में प्रस्तावित।
    • लैक ऑपेरॉन: लैक्टोज उपापचय के लिए जिम्मेदार जीन्स का समूह। इसमें नियामक जीन, प्रचालक (Operator), और संरचनात्मक जीन शामिल हैं।
    • जब लैक्टोज उपस्थित होता है, तो यह एक दमनकारी (Repressor) से जुड़कर उसे निष्क्रिय कर देता है, जिससे जीन की अभिव्यक्ति हो पाती है।
  • बहुकोशिकीय जीवों में जीन नियमन, विभेदन (Differentiation) और विकास का आधार है।

6. विभेदन का आणविक आधार (Molecular Basis of Differentiation)

विभेदन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक सामान्य कोशिका (जैसे- युग्मनज) विशिष्ट संरचना एवं कार्य वाली विशिष्ट कोशिका (जैसे- तंत्रिका कोशिका, मांसपेशी कोशिका) में परिवर्तित होती है।

  • आणविक आधार: सभी कोशिकाओं में आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) समान होती है, लेकिन जीन अभिव्यक्ति का पैटर्न भिन्न होता है।
  • एक मांसपेशी कोशिका में, मांसपेशी-विशिष्ट जीन (जैसे एक्टिन, मायोसिन के जीन) सक्रिय रहते हैं, जबकि अन्य जीन (जैसे इन्सुलिन जीन) निष्क्रिय हो जाते हैं।
  • यह नियमन एपिजेनेटिक परिवर्तनों (जैसे डीएनए मेथिलिकरण, हिस्टोन संशोधन) द्वारा होता है, जो जीन को “चालू” या “बंद” कर सकते हैं बिना डीएनए के अनुक्रम को बदले।

निष्कर्ष: मेण्डेल के वंशागति के नियमों से शुरू होकर डीएनए की संरचना और जीन नियमन तक की यह यात्रा आधुनिक जीवविज्ञान की रीढ़ है। यह समझ महत्वपूर्ण है कि कैसे जीनोटाइप का प्रकटन फीनोटाइप के रूप में होता है और कैसे यह प्रक्रिया जटिल बहुकोशिकीय जीवों के निर्माण का आधार बनती है।

JPSC MAINS PAPER 6/Chapter – 1 #8