पृथ्वी पर जीवन के विकास का सिद्धांत एवं मानव का क्रमिक विकास
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और विकास की व्याख्या करने वाला जैव विकास का सिद्धांत (Theory of Evolution) आधुनिक जीव विज्ञान की आधारशिला है। इस सिद्धांत के अनुसार, आज हमारे चारों ओर दिखने वाली जैव विविधता लाखों-करोड़ों वर्षों में होने वाले धीमे और निरंतर परिवर्तनों का परिणाम है।
जीवन की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत
- जैव जनन सिद्धांत (Theory of Biogenesis): यह सिद्धांत बताता है कि जीवन की उत्पत्ति पहले से विद्यमान जीवों से ही होती है।
- अजैव जनन सिद्धांत (Theory of Abiogenesis): इसके अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से स्वतः हो सकती है। इसे ‘स्वतः उत्पत्ति का सिद्धांत’ भी कहते हैं, जिसे लुई पाश्चर के प्रयोगों ने गलत साबित कर दिया।
- आधुनिक सिद्धांत / ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत (Oparin-Haldane Theory): इसके अनुसार, पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प जैसी गैसें थीं। बिजली, UV विकिरण आदि ऊर्जा स्रोतों के प्रभाव से इन अकार्बनिक पदार्थों ने क्रिया कर सरल कार्बनिक यौगिक (जैसे अमीनो अम्ल, न्यूक्लियोटाइड) बनाए। इनसे कोएसरवेट बने और फिर कोशिका जैसी संरचनाओं का विकास हुआ। इस सिद्धांत को मिलर-यूरे प्रयोग (1953) द्वारा प्रयोगशाला में आंशिक रूप से सत्यापित किया गया।
जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत
- लैमार्क का सिद्धांत (Lamarckism): जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क के इस सिद्धांत के दो मुख्य सिद्धांत हैं:
- अंगों के उपयोग और अनुपयोग का नियम: अधिक प्रयोग होने वाले अंग विकसित होते हैं जबकि कम प्रयोग होने वाले अंग कमजोर होकर लुप्त हो जाते हैं।
- अर्जित लक्षणों की विरासत: जीवनकाल में अर्जित किए गए लक्षण अगली पीढ़ी को विरासत में मिलते हैं।
- डार्विन का सिद्धांत (Darwin’s Theory of Natural Selection): चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ (1859) में इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इसके मुख्य बिंदु हैं:
- विविधता (Variation): एक ही प्रजाति के सदस्यों में विविधताएं पाई जाती हैं।
- अस्तित्व के लिए संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों के कारण जीवों के बीच संघर्ष होता है।
- योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): वे जीव जिनमें पर्यावरण के अनुकूल विविधताएं होती हैं, संघर्ष में बचे रहते हैं और प्रजनन करते हैं।
- प्राकृतिक वरण (Natural Selection): प्रकृति स्वयं अनुकूल लक्षणों वाले जीवों का चयन करती है।
- उत्परिवर्तन सिद्धांत (Mutation Theory): ह्यूगो डी व्रीज ने बताया कि विकास के लिए उत्परिवर्तन (DNA में अचानक परिवर्तन) जिम्मेदार हैं। ये उत्परिवर्तन प्राकृतिक वरण के लिए कच्चा माल (Variations) उपलब्ध कराते हैं।
- आधुनिक संश्लेषित सिद्धांत (Modern Synthetic Theory): यह डार्विन के ‘प्राकृतिक वरण’ और ‘उत्परिवर्तन सिद्धांत’ को मिलाकर बना एक व्यापक सिद्धांत है। इसमें आनुवंशिकी, जीवाश्म विज्ञान, जैव रसायन और पारिस्थितिकी के तथ्य शामिल हैं।
मानव के क्रमिक विकास का इतिहास
मानव का विकास होमिनिडी (Hominidae) परिवार के अंतर्गत हुआ है। इस विकास यात्रा के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
| विकास का चरण | मुख्य विशेषताएं | समयकाल (लगभग) |
|---|---|---|
| ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) | यह मानव और वानरों का共同的 पूर्वज था। यह पेड़ों पर रहता था। | 2.5 – 1.5 करोड़ वर्ष पूर्व |
| रामापिथेकस (Ramapithecus) | इसके दांत मानव के समान थे। इसे मानव विकास की प्रारंभिक कड़ी माना जाता था, लेकिन अब इसे ऑरेंगुटान का पूर्वज माना जाता है। | 1.4 – 0.8 करोड़ वर्ष पूर्व |
| ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus) | यह सीधा खड़ा हो सकता था (Bipedal Locomotion) और इसकी मस्तिष्क क्षमता लगभग 500 cc थी। ‘लूसी’ इसी प्रजाति का प्रसिद्ध जीवाश्म है। | 40 – 20 लाख वर्ष पूर्व |
| होमो हैबिलिस (Homo Habilis) | इसने पत्थर के औजार बनाने आरंभ किए। इसे ‘सक्षम या होशियार मानव’ कहा जाता है। मस्तिष्क क्षमता लगभग 700 cc थी। | 20 – 15 लाख वर्ष पूर्व |
| होमो इरेक्टस (Homo Erectus) | यह पूर्ण रूप से सीधा खड़ा होने वाला पहला होमिनिड था। इसने आग का उपयोग सीख लिया था। ‘जावा मैन’ और ‘पेकिंग मैन’ इसी की उप-प्रजातियां थीं। मस्तिष्क क्षमता लगभग 900 cc थी। | 15 – 3 लाख वर्ष पूर्व |
| होमो निएंडरथलेंसिस (Homo Neanderthalensis) | यह यूरोप और मध्य पूर्व में रहता था। इसके मस्तिष्क का आकार आधुनिक मानव (लगभग 1400 cc) के बराबर था। यह गुफाओं में रहता था और शवों को दफनाता था, जो एक प्रकार की सामाजिक चेतना को दर्शाता है। | 2.5 लाख – 40,000 वर्ष पूर्व |
| होमो सेपियन्स (Homo Sapiens) | यह आधुनिक मानव है। इसकी उत्पत्ति अफ्रीका में हुई और यह पूरी पृथ्वी पर फैल गया। इसने कला, संस्कृति और कृषि का विकास किया। मस्तिष्क क्षमता लगभग 1350-1400 cc है। | 4 लाख वर्ष पूर्व से अब तक |
निष्कर्ष
पृथ्वी पर जीवन का विकास एक सतत और जटिल प्रक्रिया रही है। सरल एककोशिकीय जीवों से लेकर जटिल बहुकोशिकीय जीवों तक के इस सफर में प्राकृतिक वरण, अनुकूलन और आनुवंशिक उत्परिवर्तन जैसे कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मानव का विकास इस प्रक्रिया का एक हिस्सा मात्र है, न कि कोई अंतिम लक्ष्य। जीवाश्म, आनुवंशिक और शारीरिक साक्ष्य लगातार इस सिद्धांत की पुष्टि करते हैं, जिससे हमें अपनी उत्पत्ति और प्रकृति में स्थान को समझने में मदद मिलती है।
