संघीय प्रशासन: केन्द्रीय संस्थाएँ
भारत का संघीय प्रशासन विभिन्न संवैधानिक एवं संविधानेत्तर संस्थाओं पर आधारित है। इनमें से कुछ प्रमुख संस्थाएँ – केन्द्रीय सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, योजना आयोग (नेITI आयोग का पूर्ववर्ती) और वित्त आयोग – शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं। ये नीति निर्माण, कार्यान्वयन, सलाह और समन्वय का कार्य करती हैं।
1. केन्द्रीय सचिवालय (Central Secretariat)
अवधारणा एवं उद्देश्य
केन्द्रीय सचिवालय भारत सरकार के प्रशासनिक तंत्र का सर्वोच्च कार्यालय है। यह मंत्रालयों और विभागों का एक समूह है जो नीति निर्माण, संसद के प्रति उत्तरदायित्व, और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय का कार्य करता है। इसकी अवधारणा ब्रिटिश शासनकाल से उत्पन्न हुई है और यह स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक शासन का एक अभिन्न अंग बन गया है।
मुख्य विशेषताएँ
- सलाहकार भूमिका: सचिवालय मंत्रियों को नीतिगत मामलों पर सलाह देता है।
- निर्णय निर्माण में सहायता: यह नए नीतिगत प्रस्ताव तैयार करता है और मंत्री को निर्णय लेने के लिए必要的 जानकारी प्रदान करता है।
- विधायी कार्य: संसद में पेश किए जाने वाले विधेयक, अधिनियम, नियम आदि तैयार करना।
- वित्तीय कार्य: बजट तैयार करना और व्यय पर नियंत्रण रखना।
- समन्वय: विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच नीतियों और कार्यक्रमों का समन्वय सुनिश्चित करना।
- सोपानिक संरचना: इसमें सचिव (अपर सचिव/संयुक्त सचिव), निदेशक, उप सचिव, और अनुभाग अधिकारी जैसे पद होते हैं।
2. प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO)
अवधारणा एवं उद्देश्य
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) एक व्यक्तिगत स्टाफ संगठन है जो प्रधानमंत्री को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता प्रदान करता है। इसकी स्थापना 1977 में की गई थी। यह प्रधानमंत्री के कार्यों के कुशल संचालन और सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के साथ प्रधानमंत्री के संपर्क के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था है।
मुख्य विशेषताएँ
- प्रधानमंत्री के लिए सहायता: PMO प्रधानमंत्री को दैनिक कार्यों, नीति निर्माण और निर्णय लेने में सीधे सहायता प्रदान करता है।
- समन्वय का केन्द्र: यह विभिन्न मंत्रालयों के बीच, विशेष रूप से महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों में, समन्वय का केंद्र बिंदु है।
- महत्वपूर्ण नीतियों की निगरानी: PMO राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, और प्रमुख अवसंरचना परियोजनाओं जैसे महत्वपूर्ण मामलों की प्रगति की निगरानी करता है।
- प्रधानमंत्री का लिंक: यह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, मंत्रिमंडल, योजना आयोग (अब NITI Aayog), और अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
- राजनीतिक एवं प्रशासनिक भूमिका: PMO में अधिकारी प्रधानमंत्री के राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों एजेंडे को संभालते हैं।
3. योजना आयोग (Planning Commission)
अवधारणा एवं उद्देश्य
योजना आयोग की स्थापना 15 मार्च, 1950 को एक संविधानेत्तर और गैर-सांविधिक निकाय के रूप में की गई थी। इसकी अवधारणा सोवियत मॉडल से प्रेरित थी और इसका प्राथमिक उद्देश्य देश के संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करना था। इसे 1 जनवरी, 2015 को भंग कर दिया गया और इसके स्थान पर NITI Aayog (National Institution for Transforming India) की स्थापना की गई।
मुख्य विशेषताएँ
- पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण: देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ तैयार करना।
- संसाधनों का आवंटन: केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के आवंटन पर सलाह देना।
- केन्द्रीकृत योजना: यह एक केन्द्रीकृत योजना मॉडल था जिसमें आयोग के पास महत्वपूर्ण शक्तियाँ थीं।
- प्रधानमंत्री की अध्यक्षता: प्रधानमंत्री स्वयं आयोग के अध्यक्ष होते थे।
- राज्यों पर निर्भरता: आयोग द्वारा तैयार योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे कभी-कभी तनाव उत्पन्न होता था।
- आलोचना: इसे ‘एक आकार सभी पर फिट’ के दृष्टिकोण, अत्यधिक केन्द्रीकरण, और राज्यों की भागीदारी की कमी के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा।
4. वित्त आयोग (Finance Commission)
अवधारणा एवं उद्देश्य
वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसका गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 280 के तहत हर पाँच वर्ष (या उससे पहले भी) में किया जाता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को परिभाषित करना以及 राज्यों को केन्द्रीय करों में हिस्से (Tax Devolution) और अनुदान (Grants-in-Aid) की सिफारिशें करना है।
मुख्य विशेषताएँ
- संवैधानिक दर्जा: यह एक संवैधानिक निकाय है, जिसके गठन का प्रावधान संविधान में ही है।
- वित्तीय संघवाद का स्तंभ: यह भारत के संघीय ढाँचे में केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को संतुलित करने का प्रमुख साधन है।
- पाँच वर्ष का कार्यकाल: प्रत्येक आयोग का गठन पाँच वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है।
- सिफारिशें: आयोग राष्ट्रपति को निम्नलिखित पर सिफारिशें प्रस्तुत करता है:
- केन्द्र और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय का वितरण।
- राज्यों में राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए अनुदान की राशि।
- कोई भी अन्य मामला जो राष्ट्रपति हित में समझे।
- सलाहकारी भूमिका: इसकी सिफारिशें बंधनकारी नहीं होतीं, लेकिन सरकार आमतौर पर इन्हें स्वीकार करती है।
- स्वतंत्रता: आयोग एक स्वतंत्र निकाय है जो सरकार से प्रभावित हुए बिना अपनी सिफारिशें देता है।
निष्कर्ष
ये चारों संस्थाएँ – केन्द्रीय सचिवालय, PMO, योजना आयोग (अब NITI Aayog), और वित्त आयोग – भारतीय शासन प्रणाली के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं। केन्द्रीय सचिवालय स्थायी नौकरशाही का प्रतिनिधित्व करता है, PMO कार्यपालिका के政治 नेतृत्व का, योजना आयोग (ऐतिहासिक रूप से) केन्द्रीकृत योजना का, और वित्त आयोग संवैधानिक रूप से वित्तीय संघवाद को बनाए रखने का। इनकी भूमिकाएँ समय के साथ विकसित हुई हैं, लेकिन शासन में इनका महत्व अभी भी केंद्रीय है।
