जो अव्यय शब्द संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उसका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों से बताते हैं।
पहचान: प्रायः इनके पहले ‘के’, ‘की’, ‘से’ आदि परसर्ग (कारक चिह्न) लगते हैं।
उदाहरण: के बिना, के सामने, के पीछे, के कारण, की ओर, के साथ।
वाक्य: ‘घर के सामने बगीचा है।’
(iii) समुच्चयबोधक अव्यय (योजक)
दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने या अलग करने वाले शब्द। इसके 2 मुख्य प्रकार हैं:
समानाधिकरण: समान स्तर के वाक्यों/शब्दों को जोड़ते हैं।
संयोजक: और, तथा, एवं।
विभाजक: या, अथवा, न…न।
विरोधदर्शक: किंतु, परंतु, लेकिन, मगर।
परिणामदर्शक: इसलिए, अतः, परिणामतः।
व्यधिकरण: मुख्य वाक्य को आश्रित उपवाक्य से जोड़ते हैं।
कारणवाचक: क्योंकि, चूंकि, इसलिए कि।
उद्देश्यवाचक: ताकि, जिससे कि।
सशर्त (संकेतवाचक): यदि…तो, अगर…तो।
स्वरूपवाचक: यानी, अर्थात, मानो।
(iv) विस्मयादिबोधक अव्यय
जो शब्द हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य, भय, ग्लानि आदि मनोभावों को व्यक्त करते हैं।
पहचान: इनके बाद विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगाया जाता है।
हर्षबोधक: वाह!, अहा!, शाबाश!
शोकबोधक: हाय!, उफ!, हे राम!
घृणाबोधक: छि-छि!, धिक्कार!
आश्चर्यबोधक: क्या!, अरे!, ओहो!
(v) निपात (विशेष उपयोगी)
जो अव्यय शब्द किसी शब्द के बाद लगकर उस पर विशेष बल प्रदान करते हैं, उन्हें निपात कहते हैं।
प्रमुख निपात: ही, भी, तक, तो, मात्र, केवल, भर, सा।
उदाहरण: ‘राधा ही बाज़ार जाएगी।’ (केवल राधा पर बल है)
अविकारी शब्द का पर्याय: अव्यय को ही ‘अविकारी शब्द’ कहा जाता है।
लिंग/वचन परीक्षण: वाक्य में आए शब्द का लिंग या वचन बदलकर देखें; यदि शब्द न बदले, तो वह अव्यय है (जैसे – ‘वह तेज भागता है’ / ‘वे तेज भागती हैं’ → ‘तेज’ अपरिवर्तित रहता है)।
क्रियाविशेषण vs संबंधबोधक:
यदि शब्द क्रिया से जुड़ा हो तो क्रियाविशेषण (उदा. अंदर आओ)।
यदि शब्द कारक चिह्न के साथ संज्ञा से जुड़ा हो तो संबंधबोधक (उदा. कमरे के अंदर आओ)।