• अव्यय का अर्थ एवं परिभाषा
    • शाब्दिक अर्थ: ‘अ + व्यय‘ = जो खर्च न हो (जिसमें परिवर्तन न हो)।
  • परिभाषा: ऐसे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, कारक, पुरुष या काल के कारण कोई परिवर्तन (विकार) नहीं होता, उन्हें अव्यय या अविकारी शब्द कहते हैं।
  • विशेषता: ये शब्द सदैव अपने मूल रूप में बने रहते हैं (जैसे – आज, जब, यहाँ, धीरे-धीरे, किंतु, और, वाह)।
  • अव्यय के प्रमुख भेद (4 + 1) – सामान्यतः अव्यय के 4 मुख्य भेद माने जाते हैं (परीक्षाओं में निपात को अक्सर 5वें भेद के रूप में पूछा जाता है):
    • 1. क्रियाविशेषण अव्यय (Adverb)
    • 2. संबंधबोधक अव्यय (Preposition)
    • 3. समुच्चयबोधक अव्यय (Conjunction)
    • 4. विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection)
    • 5. निपात (Emphasisers) (प्रायः स्वतंत्र भेद के रूप में भी गिना जाता है)
  • (i) क्रियाविशेषण अव्यय
    • जो अव्यय शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं। इसके मुख्य 4 भेद हैं:
    • कालवाचक: क्रिया के होने का समय बताए (कब?)
      • उदाहरण: आज, कल, परसों, अब, जब, तब, निरंतर, तुरंत।
    • स्थानवाचक: क्रिया के होने का स्थान बताए (कहाँ?)
      • उदाहरण: यहाँ, वहाँ, इधर, उधर, अंदर, बाहर, निकट, दूर।
    • परिमाणवाचक: क्रिया की मात्रा/माप बताए (कितना?)
      • उदाहरण: बहुत, थोड़ा, कम, अधिक, पर्याप्त, केवल।
    • रीतिवाचक: क्रिया के होने का ढंग/तरीका बताए (कैसे?)
      • उदाहरण: धीरे-धीरे, तेज़, अचानक, अवश्य, ध्यानपूर्वक, शायद।
  •  (ii) संबंधबोधक अव्यय
    • जो अव्यय शब्द संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उसका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों से बताते हैं
    • पहचान: प्रायः इनके पहले ‘के’, ‘की’, ‘से’ आदि परसर्ग (कारक चिह्न) लगते हैं।
    • उदाहरण: के बिना, के सामने, के पीछे, के कारण, की ओर, के साथ।
      • वाक्य: ‘घर के सामने बगीचा है।’
  • (iii) समुच्चयबोधक अव्यय (योजक)
    • दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने या अलग करने वाले शब्द। इसके 2 मुख्य प्रकार हैं:
    • समानाधिकरण: समान स्तर के वाक्यों/शब्दों को जोड़ते हैं।
      • संयोजक: और, तथा, एवं।
      • विभाजक: या, अथवा, न…न।
      • विरोधदर्शक: किंतु, परंतु, लेकिन, मगर।
      • परिणामदर्शक: इसलिए, अतः, परिणामतः।
    • व्यधिकरण: मुख्य वाक्य को आश्रित उपवाक्य से जोड़ते हैं।
      • कारणवाचक: क्योंकि, चूंकि, इसलिए कि।
      • उद्देश्यवाचक: ताकि, जिससे कि।
      • सशर्त (संकेतवाचक): यदि…तो, अगर…तो।
      • स्वरूपवाचक: यानी, अर्थात, मानो।
  • (iv) विस्मयादिबोधक अव्यय
    • जो शब्द हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य, भय, ग्लानि आदि मनोभावों को व्यक्त करते हैं।
    • पहचान: इनके बाद विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगाया जाता है।
    • हर्षबोधक: वाह!, अहा!, शाबाश!
    • शोकबोधक: हाय!, उफ!, हे राम!
    • घृणाबोधक: छि-छि!, धिक्कार!
    • आश्चर्यबोधक: क्या!, अरे!, ओहो!
  •  (v) निपात (विशेष उपयोगी)
    • जो अव्यय शब्द किसी शब्द के बाद लगकर उस पर विशेष बल प्रदान करते हैं, उन्हें निपात कहते हैं।
    • प्रमुख निपात: ही, भी, तक, तो, मात्र, केवल, भर, सा।
      • उदाहरण: ‘राधा ही बाज़ार जाएगी।’ (केवल राधा पर बल है)
  • अविकारी शब्द का पर्याय: अव्यय को ही ‘अविकारी शब्द’ कहा जाता है।
  • लिंग/वचन परीक्षण: वाक्य में आए शब्द का लिंग या वचन बदलकर देखें; यदि शब्द न बदले, तो वह अव्यय है (जैसे – ‘वह तेज भागता है’ / ‘वे तेज भागती हैं’ → ‘तेज’ अपरिवर्तित रहता है)।
  • क्रियाविशेषण vs संबंधबोधक:
    • यदि शब्द क्रिया से जुड़ा हो तो क्रियाविशेषण (उदा. अंदर आओ)।
    • यदि शब्द कारक चिह्न के साथ संज्ञा से जुड़ा हो तो संबंधबोधक (उदा. कमरे के अंदर आओ)।

अव्यय