ऐन फ्रैंक 

डायरी के पन्ने 

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कल मैंने वक्त गुज़ारने का एक नया तरीका खोज 

निकाला। दूरबीन लगाकर 

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धवार, 

धवार, 8 जुलाई, 1942 

प्यारी किट्टी, 

ऐसा लग रहा है मानो रविवार के बाद से बरसों 

बीत गए हों। इतना कुछ हो गया है जैसे पूरी दुनिया ही उलट-पुलट गई है। लेकिन जैसा कि तुम देख सकती हो, किट्टी, मैं ज़िंदा हूँ, लेकिन यह मत पूछो कि कहाँ और कैसे। मैं जो कुछ भी कह रही हूँ उसमें शायद ही कोई बात तुम्हारे पल्ले पड़े, इसलिए मैं तुम्हें शुरू से बताती हूँ कि रविवार की दोपहर को क्या हुआ था। 

तीन बजे थे। हैलो जा चुका था लेकिन वह दोबारा फिर से आने वाला था, तभी दरवाज़े की घंटी बजी। चूँकि मैं बाल्कनी में धूप में अलसाई सी बैठी पढ़ रही थी इसलिए मुझे घंटी की आवाज़ सुनाई नहीं दी। कुछ देर बाद रसोई के दरवाज़े पर मार्गोट नज़र आई । वह बहुत गुस्से में थी – पापा को ए. एस. एस. से बुलाए जाने का नोटिस मिला है, वह फुसफुसाई । माँ मिस्टर वान दान को देखने गई हुई हैं। मिस्टर वान दान पापा के बिजनेस पार्टनर हैं और उनके अच्छे दोस्त हैं। 

मैं आवाक् रह गई थी। 

बुलावा? 

हर कोई जानता था कि बुलावे का क्या मतलब होता है। यातना शिविरों के नज़ारे और वहाँ की कोठरियों के दृश्य मेरी आँखों के आगे तैर गए। हम अपने पापा को इस तरह की नियति के भरोसे कैसे छोड़ सकते थे। हम उन्हें हर्गिज़ नहीं जाने देंगे। मार्गोट ने उस वक्त 

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वितान 

कहा था जब वह ड्राइंग रूम में माँ की राह देख रही थी। माँ मिस्टर वान दान से पूछने गई हैं कि हम कल ही छुपने की जगह पर जा सकते हैं। वान दान परिवार भी हमारे साथ जा रहा है। हम लोग कुल मिलाकर सात लोग होंगे। मौन । हम आगे बात ही नहीं कर पाए। यह खयाल कि पापा यहूदी अस्पताल में किसी को देखने गए हुए हैं, माँ के लिए इंतज़ार की लंबी घड़ियाँ, गरमी, सस्पेंस, इन सारी चीज़ों ने हमारे शब्द ही हमसे छीन लिए थे। तभी दरवाज़े की घंटी बजी – यह हैलो ही होगा, मैंने कहा था। 

दरवाज़ा मत खोलो, मार्गोट ने हैरान होते मुझे रोका, लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं थी क्योंकि हमने नीचे से माँ और मिस्टर वान दान को हैलो से बात करते हुए सुन लिया था । तब दोनों ही भीतर आए और अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया। जब भी दरवाज़े की घंटी बजती तो मुझे या मार्गोट को उचककर नीचे देखना पड़ता कि क्या पापा आ गए हैं। हमने किसी और को भीतर नहीं आने दिया। मुझे और मार्गोट को बाहर भेज दिया गया था क्योंकि वान दान माँ से अकेले में बात करना चाहते थे। जब मैं और मार्गोट बेडरूम में बैठे बात कर रहे थे तो उसने मुझे बताया कि यह बुलावा पापा के लिए नहीं बल्कि खुद उसके लिए था। इस दूसरे सदमे से मैं तो चीखने लगी । मार्गोट सोलह बरस की थी। तय है कि वे लोग इस उम्र की लड़कियों को उनके खुद के भरोसे यहाँ से भेजना चाहते हैं। लेकिन भगवान का शुक्र है, वह नहीं जाएगी। माँ ने मुझसे यही कहा था। पापा जब मुझसे छिपने की जगह पर जाने की बात कर रहे थे तो उन्होंने भी शायद यही कहा होगा। 

अज्ञातवास…हम कहाँ जाकर छुपेंगे? शहर में? किसी घर में? किसी परछत्ती पर? कब. . कहाँ… कैसे…ये ऐसे सवाल थे जो मैं पूछ नहीं सकती थी लेकिन फिर भी ये सवाल मेरे दिमाग में कुलबुला रहे 

रहे थे। 

मार्गोट और मैंने अपनी बहुत ज़रूरी चीजें एक थैले में भरनी शुरू कीं । 

मैंने सबसे पहले अपने थैले में यह डायरी ठँसी । इसके बाद मैंने कर्लर, रुमाल, स्कूली किताबें, एक कंघी और कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थैले में डालीं। मैं अज्ञातवास में जाने के खयाल से इतनी अधिक आतंकित थी कि मैंने थैले में अजीबोगरीब चीजें भर डालीं, फिर भी मुझे अफ़सोस नहीं है। स्मृतियाँ मेरे लिए पोशाकों की तुलना में ज़्यादा मायने रखती हैं। तब हमने मिस्टर क्लिीमेन को फ़ोन किया कि क्या वे शाम को हमारे घर आ पाएँगे । 

मिस्टर वान दान चले गए ताकि मिएप को लिवा ला सकें। मिएप आईं और वादा किया कि वे रात को एक बार फिर आएँगी। वे अपने साथ जूतों, ड्रेसों, जैकेटों, अंडरवियरों तथा स्टॉकिंग्स से भरा एक थैला लेकर गईं। इसके बाद हमारे फ़्लैट में सन्नाटा छा गया। हममें से किसी की भी खाना खाने की इच्छा ही नहीं हुई। मौसम अभी भी गरम था और सारी चीजें जैसे हमारे लिए अजनबी होती चली जा रही थीं। 

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डायरी के पन्ने 

Mak 

हमने अपना ऊपर वाला एक बड़ा कमरा तीसेक बरस के एक विधुर मिस्टर गोल्डश्म्ड्टि को किराए पर दे रखा था। तय था कि उसे उस शाम कोई काम धंधा नहीं था, इसके बावजूद – हमारे कई इशारों के बावजूद वह रात दस बजे तक वहीं पर मँडराता रहा । मिएप और जॉन गिएज रात ग्यारह बजे आए। मिएप 1933 से पापा की कंपनी में काम कर रही थीं और इसलिए पापा के करीबी दोस्तों में थीं। उसके पति जॉन भी पापा के अच्छे दोस्त थे। एक बार फिर जूते, स्टॉकिंग्स, अंडरवियर और किताबें मिएप के गहरे बैग और जॉन की जेबों में गायब हो रही थीं। साढ़े ग्यारह बजे वे खुद भी विदा लेकर चले गए। मैं बुरी तरह से थक गई थी, फिर भी एक बात मैं अच्छी तरह जानती थी कि यह रात मेरे अपने बिस्तर में मेरी आखिरी रात है । मैं जैसे घोड़े बेचकर सोई। मेरी नींद अगली सुबह साढ़े पाँच बजे मार्गोट के जगाने पर ही खुली । किस्मत से यह सुबह रविवार की तरह गरम नहीं थी । दिन भर गरम बरसात की फुहारें पड़ती रहीं। हम चारों ने अपने बदन पर इतने ज़्यादा कपड़े ले लिए थे मानो हम रात फ्रिज में गुज़ारने जा रहे हों। वजह सिर्फ़ इतनी-सी थी कि हम अपने साथ ज़्यादा से ज़्यादा कपड़े ले जाना चाहते थे। हम जिस स्थिति में थे उसमें कोई यहूदी व्यक्ति कपड़ों से भरा सूटकेस ले जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मैंने दो बनियानें, तीन पैंटें, एक ड्रेस और उसके ऊपर एक स्कर्ट, एक जैकेट, एक बरसाती, दो जोड़ी स्टॉकिंग्स, भारी जूते, एक कैप, एक स्कार्फ़, और इन सबके अलावा और भी बहुत कुछ ओढ़-पहन रखा था। घर से निकलने से पहले ही मेरा दम घुटने लगा था लेकिन किसी को भी परवाह नहीं थी कि मुझसे पूछे – ऐन, कैसा लग रहा है तुम्हें? 

मार्गोट ने अपने थैले में स्कूल की किताबें ठूंस ली थीं और वह अपनी साइकिल लेने चली गई और फिर वह मिएप की निगरानी में अज्ञात जगह के लिए रवाना हो गई। कुछ भी रहा हो, मेरे लिए तो वह अनजान जगह ही थी; क्योंकि मुझे अभी भी पता नहीं था कि हम कहाँ जाने वाले हैं। साढ़े सात बजे हमने भी अपने पीछे दरवाज़ा बंद किया । मूर्जे ही एकमात्र ऐसी जीवित प्राणी थी 

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वितान 

जिसे मुझे गुड – बाई कहना था । हमने गोल्डस्म्ड्टि के लिए जो नोट छोड़ा उसके अनुसार बिल्ली को पड़ोसियों के यहाँ छोड़ा जाना था। वे ही अब उसकी देखभाल करने वाले थे। खाली बिस्तरे, मेज़ पर बिखरा नाश्ते का सामान, रसोई में बिल्ली के लिए सेर भर मीट, ये सारी चीज़ें यही दर्शाती थीं कि हम बहुत ही हड़बड़ी में छोड़-छाड़कर गए हैं। लेकिन इंप्रैशन छोड़कर जाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं थी । हम तो किसी भी तरह वहाँ से निकल जाना चाहते थे और कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहते थे । और कोई बात मायने नहीं रखती 

थी। 

बाकी कल, 

तुम्हारी ऐन 

गुरुवार, 9 जुलाई, 1942 

प्यारी किट्टी, 

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तो आखिर हम चल पड़े। मम्मी, पापा और मैं तेज़ बरसात में भीगते हुए आए। हम तीनों के कंधों पर बड़े-बड़े थैले और शॅपिंग बैग थे जो अल्लम-गल्लम चीज़ों से ऊपर तक ठूंस-ठूस कर भरे हुए थे। सुबह – सुबह काम पर जाने वाले लोग हमें बड़ी बेचारगी भरी 

सुबह-सुबह निगाहों से देख रहे थे। आप उन्हें देखते ही बता सकते थे कि वे आपके लिए अफ़सोस कर रहे थे कि वे हमें किसी तरह का वाहन उपलब्ध नहीं करा सकते थे। हमारे सीने पर चमकता पीला सितारा’ सारी दास्तान खुद ही कह देता था । 

जब हम गली में पहुँच गए तभी पापा और मम्मी ने धीरे-धीरे बताना शुरू किया कि उनकी योजना क्या थी । पिछले कई महीनों के दौरान हम थोड़ा-थोड़ा करके जितना भी हो सका, फर्नीचर और कपड़े-लत्ते फ़्लैट से बाहर ले जाते रहे थे। यह तय कर लिया गया था कि हम लोग 16 जुलाई को अज्ञातवास में चले जाएँगे। अचानक मार्गोट के लिए बुलावा आ जाने के कारण योजना को दस दिन आगे खिसकाना पड़ा था । इसका मतलब यही था कि अब हमें कम तैयार किए गए कमरों में ही गुज़ारा करना होगा । 

छिपने की जगह पापा के ऑफ़िस की इमारत में ही थी। इसे समझ पाना बाहर वालों के लिए थोड़ा मुश्किल होगा इसलिए मैं थोड़ा बहुत समझा देती हूँ । पापा के ऑफ़िस में काम करने वाले लोग बहुत ज़्यादा नहीं थे। बस, मिस्टर कुगलर, मिस्टर क्लीमेन, मिएप और तेइस बरस की टाइपिस्ट जिसका नाम बेप वोस्कुइल था। उन सबको हमारे आने के बारे में खबर 

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हिटलर के शासन में यहूदियों को विवश किया गया था कि वे अपनी पहचान के लिए पीला सितारा पहनें 

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कर दी गई थी । मिस्टर वोस्कुइल, बेप के पिता, दो और सहायकों के साथ गोदाम में काम करते थे, उन्हें कुछ भी नहीं बताया 

गया था। 

इमारत के बारे में थोड़ा-सा बता दूँ । तल मंज़िल पर बना बड़ा-सा गोदाम काम करने की जगह और भंडार घर के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके अलग-अलग हिस्से बने हुए हैं। ये हिस्से गोदाम, पिसाई का कमरा वगैरह हैं जहाँ इलायची, लौंग और काली मिर्च वगैरह पीसे जाते हैं। 

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वितान 

गोदाम के दरवाज़े से ही सटा हुआ एक बाहर का दरवाज़ा है जो ऑफ़िस का प्रवेशद्वार है। ऑफ़िस के दरवाज़े के एकदम अंदर की तरफ़ एक दूसरा दरवाज़ा है और उसके पीछे सीढ़ियाँ हैं। सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ें तो एक और दरवाज़ा आता है, जिस पर आर-पार दिखाई न देने वाले काँच की खिड़की लगी है। इस पर काले अक्षरों में ‘कार्यालय’ लिखा हुआ है। यही आगे वाला बड़ा यानी फ्रंट ऑफ़िस है – ये बहुत बड़ा हवादार और खूब रौशनी वाला कमरा है। दिन के दौरान यहाँ बेप, मिएप और मिस्टर क्लीमेन काम करते हैं। एक छोटा-सा गलियारा है जिसमें तिजोरी, कपड़ों की अलमारी और स्टेशनरी की बड़ी-सी अलमारी है | इस गलियारे के पार एक छोटा-सा दमघोंटू, अँधियारा कमरा है – यह बैक ऑफ़िस है, इसमें मिस्टर कुगलर और मिस्टर वानदान बैठा करते थे। अब इसमें सिर्फ़ मिस्टर कुगलर बैठते हैं। मिस्टर कुगलर के ऑफ़िस में पैसेज से भी पहुँचा जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ काँच वाले दरवाज़े के ज़रिये जिसे अंदर से तो आसानी से खोला जा सकता है, लेकिन बाहर से इतनी आसानी से नहीं । मिस्टर कुगलर के ऑफ़िस से निकलने के बाद तुम लंबे, तंग गलियारे से कोयले वाले गोदाम की ओर बढ़ोगी और चार सीढ़ियाँ चढ़ोगी तो तुम अपने आपको प्राइवेट ऑफ़िस में पाओगी। यह पूरी इमारत का शो पीस है। शानदार महोगनी फ़र्नीचर, लिनोलियम का फ़र्श, जिस पर कालीन बिछा है, एक रेडियो है, आकर्षक लैंप हैं। सब कुछ उत्तम दरजे का। इसके साथ वाला कमरा बहुत बड़ा रसोईघर है। उसमें पानी गरम करने का हीटर है, गैस के दो चूल्हे हैं, साथ में पाखाना है। ये पहली मंज़िल का नक्शा है। नीचे की सीढ़ियों वाले गलियारे से एक रास्ता दूसरी मंज़िल की तरफ़ जाता है। सीढ़ियाँ खतम होते ही थोड़ी खुली जगह है और उसके दोनों तरफ़ दरवाज़े हैं। दाई तरफ़ का दरवाज़ा मसाले रखने के स्टोर, अटारी और घर के सामने की तरफ़ वाली मियानी की तरफ़ जाता है। घर के सामने की तरफ़ से एक परंपरागत डच डिज़ाइन की, सीधी और इतनी घुमावदार सीढ़ियाँ हैं कि एड़ियों में मोच आ जाए। यह रास्ता गली की तरफ़ खुलता है। 

सीढ़ियों के ऊपर बनी जगह से दाईं तरफ़ का दरवाज़ा घर के पिछवाड़े की तरफ़ हमारी गुप्त एनेक्सी की तरफ़ जाता है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इस सपाट मटमैले दरवाज़े के पीछे इतने कमरे भी हो सकते हैं। दरवाज़े के आगे सीढ़ी का बस एक ही पायदान है। इसे पार करते ही आप भीतर होते हैं। आपके सामने ही कई सीढ़ियाँ ऊपर की तरफ़ चली जाती हैं। बाईं तरफ़ एक तंग – सा गलियारा है जो एक बड़े कमरे में जाकर खुलता है। यही कमरा फ्रैंक परिवार के लिए ड्राइंगरूम और बेडरूम का काम करता है। अगला दरवाज़ा एक छोटे कमरे का है। यह परिवार की दो जवान लड़कियों के बैडरूम और स्टडीरूम के काम आता है। सीढ़ियों की दाईं तरफ़ गुसलखाना और बिना खिड़कियों वाला एक कमरा है जिसमें एक वॉश बेसिन लगा हुआ है । किनारे की तरफ़ वाले दरवाज़े से पाखाने की तरफ़ और दूसरे 

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दरवाज़े से मेरे और मार्गोट के कमरे की तरफ़ जाया जा सकता है। यदि आप और सीढ़ियाँ चढ़कर बिलकुल ऊपर तक चले जाएँ तो आप नहर के किनारे बने इस पुराने मकान में ऊपर एक बहुत बड़ा, खुला – खुला और हवादार कमरा देखकर हैरान रह जाएँगे। इसमें एक गैस का चूल्हा है और एक सिंक है । ( भगवान का शुक्र है कि यह मिस्टर कुलगर की प्रयोगशाला के काम आता था ।) यह मिस्टर और मिसेज़ वान दान का बेडरूम और रसोईघर होगा। इसे कॉमन कमरे, डाइनिंगरूम और हम सबके लिए स्टडी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। एक छोटा-सा कमरा पीटर वान दान के लिए बेडरूम का काम करेगा। और फिर जैसी इमारत के सामने की तरफ़ है, वैसी ही अटारी और मियानी यहाँ भी हैं, तो ये रहा हमारा नया गरीबखाना। लो, मैंने तुम्हें पूरी इमारत की सैर करवा दी। 

शुक्रवार, 10 जुलाई, 1942 

मेरी प्यारी किट्टी, 

तुम्हारी, ऐन 

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मैंने घर के लंबे-चौड़े बखान के साथ हो सकता है तुम्हें बोर कर दिया हो लेकिन मैं अभी भी यही सोचती हूँ कि तुम जानो, हम कहाँ आ पहुँचे हैं। मैं यहाँ कैसे आ पहुँची हूँ, इसके बारे में तुम्हें मेरे आगे के पत्रों से पता चलेगा। 

लेकिन पहले मैं अपना किस्सा जारी रखूँगी। मैंने अभी तक अपनी बात पूरी नहीं की है। 263 प्रिंसेनग्रास्ट में हमारे पहुँचने पर मिएप तुरंत हमें लंबे गलियारे से सीढ़ियों से ऊपर दूसरी मंज़िल पर और फिर एनेक्सी में ले आई। उसने हमें अकेला छोड़ा और हमारे पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया। मार्गोट अपनी साइकिल पर पहले ही आ चुकी थी और हमारी राह देख रही थी । 

हमारी बैठक और दूसरे कमरे सामान से ठुसे पड़े थे। कहीं तिल धरने की जगह नहीं थी। पिछले महीनों में जो कार्ड-बोर्ड के बक्से ऑफ़िस में भेजे गए थे, चारों तरफ़ फ़र्श पर, बिस्तरों पर फैले पड़े थे। छोटा कमरा फ़र्श से छत तक कपड़ों से अटा पड़ा था। उस रात अगर हम ढंग से सोने के बारे में सोचते तो ये सारा सामान 

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वितान 

तरतीब से लगाने की ज़रूरत थी । हमें सफ़ाई का काम तुरंत शुरू कर देना था। माँ और मार्गोट की तो हाथ हिलाने की भी हिम्मत नहीं थी। वे बिना चादरों वाली गद्दियों पर ही पसर गईं। थकी, बेहाल और पस्त। लेकिन पापा और मैंने सफ़ाई का मोर्चा सँभाला और तुरंत जुट गए। 

हम सारा दिन पैकिंग खोलते रहे, अलमारियाँ भरते रहे. कीलें ठोकते रहे और तमाम सामान ठिकाने से लगाते रहे। आखिर थक कर चूर हो गए और साफ़ बिस्तरों पर ढह गए। हमने पूरे दिन में एक बार भी गरम खाना नहीं खाया था। लेकिन परवाह किसे थी। माँ और मार्गोट की थकान के मारे बुरी हालत थी और पापा और मुझे फ़ुर्सत नहीं थी । 

मंगलवार की सुबह हमने पिछली रात के छोड़े हुए काम को पूरा करना शुरू किया। 

बेप और मिएप हमारे राशन कूपनों से शॉपिंग 

करने गई और पापा ने 

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ब्लैक आउट वाले परदे लगाए। मैंने रसोई का 

फ़र्श रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। सवेरे से 

रात तक हम लगातार 

काम में जुटे रहे। 

बुधवार तक तो मुझे यह सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं मिली कि मेरी ज़िंदगी में कितना बड़ा परिवर्तन आ चुका है। अब गुप्त एनेक्सी में आने के बाद पहली बार मुझे थोड़ी फ़ुर्सत मिली कि तुम्हें बताऊँ कि मेरी जिंदगी में क्या हो चुका है और क्या होने जा रहा है। 

तुम्हारी, ऐन 

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Mara 

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शनिवार, 28 नवंबर, 1942 

मेरी प्यारी किट्टी, 

हम इन दिनों बिजली का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते रहे 

और अपने राशन से ज़्यादा खर्च कर चुके हैं। नतीजा यह होगा कि और अधिक किफ़ायत, और हो सकता है, बिजली भी कट जाए । एक पखवाड़े के लिए कोई बिजली नहीं, कितना मज़ेदार खयाल है, नहीं क्या? लेकिन कौन जानता है, यह अरसा इससे कम भी हो सकता है। बहुत अँधेरा हो जाता है चार, साढ़े चार बजते ही। हम तब पढ़ नहीं सकते। इसलिए वह वक्त हम ऊल-जुलूल हरकतें करके गुज़ारते हैं। हम पहेलियाँ बुझाते हैं, अँधेरे में व्यायाम करते हैं, अंग्रेज़ी या फ्रेंच बोलते हैं और किताबों की समीक्षा करते हैं। हम कुछ भी करें, थोड़ी देर बाद बोर लगने लगता है। कल मैंने वक्त गुज़ारने का एक नया तरीका खोज निकाला । दूरबीन लगाकर पड़ोसियों के रोशनी वाले कमरों में झाँकना । दिन के वक्त हमारे परदे हटाए नहीं जा सकते, एक इंच भर भी नहीं, लेकिन जब अँधेरा हो तो परदे हटाने में कोई हर्ज नहीं होता । 

मुझे पता नहीं था कि हमारे पड़ोस में इतने दिलचस्प लोग रहते हैं। खैर, हमारे पड़ोसी हैं। मैंने जो पड़ोसी देखे – उनमें से एक परिवार डिनर कर रहा था, एक परिवार फ़िल्म बना रहा था तो सामने वाले घर में एक दंत चिकित्सक एक डरी हुई बुढ़िया से जूझ रहा था। 

मिस्टर डसेल जिनके बारे में कहा गया था कि उनकी बच्चों के साथ बहुत पटती है और वे उन्हें खूब प्यार करते हैं, दरअसल बाबा आदम के ज़माने के अनुशासन मास्टर हैं और लंबे-लंबे भाषण देने लगते हैं जिन्हें सुनकर ही नींद आने लगे। चूँकि मुझ अकेली को ही यह सुख ( ? ) मिला हुआ है कि मैं उनके साथ, महाराज डसेल के साथ यह लंबोतरा, सँकरा कमरा शेअर करती हूँ, और चूँकि मुझे ही, हम तीन बच्चों में आमतौर पर खरदिमाग और तुनकमिजाज समझा जाता है, मेरे पास यही एक उपाय बचता है कि उनकी वही पुरानी डाँट फटकार और भाषणों की लंबी-लंबी उबाऊ श्रृंखला की तरफ़ कान न धरूँ। न सुनने का नाटक करती रहूँ। ये बात तो खैर मैं फिर भी सहन कर लेती लेकिन मिस्टर डसेल अच्छे-खासे चुगलखोर हैं। 

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वितान 

वे जाकर इन सारी बातों की रिपोर्ट मम्मी को दे आते हैं। अगर मिस्टर डसेल ने मुझे कोई उपदेश पिलाया होता है तो उसे दोबारा से मुझे मम्मी से सुनना पड़ता है और मम्मी तो कोई लिहाज़ भी नहीं करती मेरा, और अगर मेरी किस्मत वाकई अच्छी होती है तो मिसेज़ वान मुझे पाँच मिनट बाद बुलवा भेजती हैं। 

सचमुच, मीन-मेख निकालने वाले परिवार में आप केंद्र में हों और सारा दिन आपको, हर तरफ़ से दुत्कारा फटकारा जाए- ये सब झेलना आसान काम नहीं होता । 

रात को जब मैं बिस्तर पर होती हूँ तो अपने पापों और बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई अपनी खामियों के बारे में सोचती हूँ तो वे इतनी ज़्यादा होती हैं कि अपने मूड के हिसाब से या तो मैं 

Dit is een 

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ik me zou wensen. 

altÿjd zo Le zŷn. Dan had ik nog wel Een kans om naar Holywood te komen. 

Amihank 

10 Ock. 1942 

उन पर हँस सकती हूँ या रो ही सकती हूँ। तब मैं 

इस अजीब से खयाल के साथ सो जाती हूँ कि मैं जो कुछ हूँ, उससे अलग होना चाहती हूँ या मैं उससे अलग तरीके से व्यवहार करना चाहती हूँ जो मैं हूँ या जो मैं होना चाहती हूँ। मेरी प्यारी किट्टी, अब मैं तुम्हें कितना उलझा रही हूँ। लेकिन मैं चीजें 

एक बार लिखकर उन्हें 

ऐन फ्रैंक की डायरी का एक पन्ना 

काटना पसंद नहीं करती 

और इस कमी वाले वक्त में कागज़ को मोड़-तोड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल देना बिलकुल मना है। इसलिए मैं तुम्हें सिर्फ़ यही सलाह दे सकती हूँ कि तुम ऊपर वाले हिस्से को फिर से पढ़ने की कोशिश मत करना; क्योंकि इसमें तुम्हें बात का सिर-पैर भी नहीं मिलेगा । 

तुम्हारी, ऐन 

शुक्रवार, 19 मार्च, 1943 

युद्ध 

मेरी प्यारी किट्टी, 

अभी एक घंटा भी नहीं बीता था कि हमारी खुशी निराशा में बदल गई। टर्की अभी में शामिल नहीं हुआ है। हुआ यह था कि एक केंद्रीय मंत्री ने यह कहा था कि टर्की 

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जल्दी ही तटस्थता छोड़ देगा। डैम चौक पर अखबार बेचने वाला चिल्ला रहा था; ‘टर्की इंग्लैंड के पक्ष में ‘ । अखबार उसके हाथ से झपटे जा रहे थे, और इस तरह से हमने वह उत्साहवर्धक अफ़वाह सुनी थी। 

हज़ार गिल्डर के नोट अवैध मुद्रा घोषित किए जा रहे हैं। यह ब्लैक मार्केट का धंधा करने वालों और उन जैसे लोगों के लिए बहुत बड़ा झटका होगा, लेकिन उससे बड़ा संकट उन लोगों का जो या तो भूमिगत हैं या जो अपने धन का हिसाब-किताब नहीं दे सकते। हज़ार गिल्डर का नोट बदलवाने के लिए आप इस स्थिति में हों कि ये नोट आपके पास आया कैसे और उसका सुबूत भी देना होगा। इन्हें कर अदा करने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है; लेकिन अगले हफ़्ते तक ही । पाँच सौ गिल्डर के नोट भी तभी बेकार हो जाएँगे । गिएज एंड कंपनी के पास अभी हज़ार गिल्डर के नोट बाकी थे जिनका कोई हिसाब-किताब नहीं था। इन्हें कंपनी ने आगामी वर्षों के लिए अनुमानित कर अदायगी में निपटा दिया है। इसलिए फ़िलहाल तो गर्दन पानी के ऊपर ही है। 

कुछ 

Mamm 

मिस्टर डसेल को कहीं से बाबा आदम के ज़माने की पैरों से चलने वाली दाँतों की ड्रिल मशीन मिल गई है। इसका मतलब, संभवतः जल्दी ही मेरे दाँतों का पूरा चेक अप हो पाएगा। 

जब घर के कायदे-कानून मानने की बात आती है तो मिस्टर डसेल भयंकर रूप से आलस दिखाते हैं। न केवल वे चार्लोट से पत्राचार कर रहे हैं, और भी कई दूसरे लोगों के साथ भी चिट्ठी-पत्री बनाए हुए हैं। मार्गोट, जो कि उनकी डच अध्यापिका हैं, उनके ये पत्र ठीक करती हैं। पापा ने उन्हें मना किया है कि वे ये सब कारोबार बंद करें और मार्गोट ने उनके पत्र ठीक करने बंद कर दिए हैं। लेकिन मुझे लगता है, वे अपनी चिट्ठी-पत्री फिर से शुरू कर देंगे। 

जनाब हिटलर घायल सैनिकों से बातचीत कर रहे हैं। हमने उन्हें रेडियो पर सुना । सचमुच यह सब कुछ करुणाजनक था । सवालों – जवाबों का सिलसिला इस तरह से चल रहा था : 

‘मेरा नाम हैनरिक शापेल है। ‘ 

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आप कहाँ जख्मी हुए थे?’ ‘स्नालिनग्राद के पास । ‘ 

‘किस किस्म का घाव है यह?’ 

‘दोनों पाँव बरफ़ की वजह से गल गए हैं और बाएँ बाज़ू में हड्डी टूट गई है। ‘ 

ये बातें जस की तस दे रही हूँ जो मैंने रेडियो पर कठपुतलियों के खेल की तरह सुनीं । घायल सैनिक जैसे अपने ज़ख्मों को दिखाते हुए गर्व महसूस कर रहे थे। जितने ज़्यादा घाव, उतना ज़्यादा गर्व। उनमें से एक तो हिटलर से हाथ मिलाने के खयाल से ही इतना उत्साहित हुआ जा रहा था (मेरे खयाल से तो अभी भी वह उसी उत्साह में होगा ) कि वह एक शब्द भी नहीं बोल पाया। 

मुझसे डसेल साहब का साबुन ज़मीन पर गिर गया था। मेरी किस्मत खराब थी कि मेरा पैर उस पर पड़ गया। अब पूरा साबुन ही गायब है। मैंने पापा से कहा है कि मिस्टर डसेल को इसकी भरपाई कर दें । उनको हर महीने युद्ध के समय के घटिया साबुन की एक ही बट्टी मिलती है। 

शुक्रवार, 23 जनवरी, 

मेरी प्यारी किट्टी, 

1944 

CER 

Qubly 

तुम्हारी, ऐन 

इधर के सप्ताहों में मुझे परिवार के वंश वृक्षों और राजसी परिवारों की वंशावली तालिकाओं में खासी रुचि हो गई है। मैं इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि एक बार तुम खोजना शुरू कर दो तो तुम्हें अतीत में गहरे, और गहरे उतरना पड़ेगा । इस खोज से तुम्हारे हाथ और भी रोचक जानकारियाँ लगेंगी। 

काम 

हालाँकि जब मेरे स्कूल के काम की बात आती है तो मैं बहुत मेहनत करती हूँ और रेडियो पर बी.बी.सी. की होम सर्विस को समझ सकती हूँ, इसके बावजूद मैं अपने ज़्यादातर रविवार अपने प्रिय फ़िल्मी कलाकारों की तसवीरें अलग करने और देखने में गुज़ारती हूँ। यह संग्रह अच्छा-खासा हो चुका है। मिस्टर कुगलर मुझ पर हर सोमवार कुछ ज़्यादा ही मेहरबान होते हैं और मेरे लिए सिनेमा एंड थियेटर पत्रिका की प्रति लेते आते हैं। इस घर-परिवार के ऐसे लोग भी, जो ज़रा भी दुनियादार नहीं हैं, इसे पैसों की बरबादी मानते हैं लेकिन इस बात पर हैरान भी होते हैं कि कैसे मैं एक साल के बाद भी किसी फ़िल्म के सभी कलाकारों के नाम ऊपर से नीचे तक सही-सही बता सकती हूँ। बेप जो अकसर छुट्टी के दिन अपने बॉयफ्रेंड के साथ फ़िल्म देखने जाती है, शनिवार को ही मुझे बता देती है कि वे कौन सी फ़िल्म देखने जा रहे हैं, तो मैं फ़िल्म के मुख्य नायकों और नायिकाओं के नाम तथा समीक्षाएँ फ़र्राटे से बोलना शुरू कर देती हूँ। हाल ही में मम्मी ने फ़िकरा कसा कि मुझे बाद में फ़िल्में 

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देखने जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि मुझे सारी फ़िल्मों की कहानियाँ, नायकों के नाम तथा समीक्षाएँ ज़बानी याद हैं। 

जब भी मैं नयी केश सज्जा बनाकर बाहर आती हूँ, मैं सबके चेहरों पर उग आई असहमति साफ़-साफ़ पढ़ सकती हूँ। और यह भी बता सकती हूँ कि कोई न कोई ज़रूर टोक देगा कि मैं फलाँ फ़िल्म स्टार की नकल कर रही हूँ। मेरा यह जवाब कि ये स्टाइल मेरा खुद का आविष्कार है, मज़ाक के रूप में लिया जाता है। जहाँ तक मेरे हेयर स्टाइल का सवाल है, यह आधे घंटे से ज़्यादा नहीं टिका रहता। तब तक मैं उससे बोर हो चुकी होती हूँ और सबकी टिप्पणियाँ सुनते-सुनते मेरे कान पकने लगते हैं। मैं सीधे गुसलखाने की तरफ़ लपकती हूँ और मेरे बाल फिर से पहले की तरह उलझे हुए घुँघराले हो जाते हैं। 

बुधवार, 28 जनवरी, 1944 

मेरी प्यारी किट्टी, 

तुम्हारी, ऐन 

SEPT 

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आज सुबह मैं सोच रही थी कि क्या तुमने अपने आपको कभी गाय समझा है जिसे हर दिन मेरी बासी खबरें बार-बार चबानी पड़ती हैं। इनकी इतनी अधिक जुगाली कि तुम्हें उबासी आ जाए और तुम मन ही मन कामना करो कि ऐन कुछ नए समाचार दे। 

सॉरी, तुम्हें ये नाली के सड़ते पानी की तरह नीरस लगता होगा। लेकिन ज़रा मेरी हालत की कल्पना करो जिसे रोज़-रोज़ यही सुनना पड़ता है। अगर खाने के वक्त बातचीत राजनीति या अच्छे खाने के बारे में नहीं हो रही होती तो मम्मी या मिसेज़ वान दान अपने बचपन की उन कहानियों को लेकर बैठ जाती हैं जो हम हज़ार बार सुन चुके हैं या फिर डसेल शुरू हो जाते हैं खूबसूरत रेस के घोड़े, उनकी चार्लोट का महँगा वॉर्डरोब, लीक करती नावें, चार बरस की उम्र में तैर सकने वाले बच्चे, दर्द करती माँसपेशियाँ और डरे हुए मरीज़ – ये सब किस्से । इन सारी बातों का निचोड़ ये है : 

: जब भी हम आठों में से कोई भी अपना मुँह खोलता है, बाकी सातों उसके लिए कहानी पूरी कर सकते हैं। किसी भी लतीफ़े को 

सुनने से पहले ही हमें उसकी पंच लाइन पता होती है। नतीजा यह 

डायरी के पन्ने 

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वितान 

होता है कि लतीफ़ा सुनाने वाले को अकेले हँसना पड़ता है। अलग-अलग ग्वाले, राशनवाले, कसाई जो घरों की इन दो भूतपूर्व मालकिनों के संपर्क में आए, इतनी बार उनके चरित्र चित्रण हो चुके हैं कि हमारी कल्पना शक्ति में उनमें जोड़ने के लिए कुछ भी नहीं बचा। एनेक्सी की यह हालत है कि यहाँ नया या ताज़ा सुनने – सुनाने को कुछ भी नहीं बचा है। 

फिर भी, इन सारी चीज़ों में ताज़ा सुनने – सुनाने को कुछ भी नहीं बचा है। लोगों को नमक-मिर्च लगाकर वह सब कुछ दोहराने की आदत न होती जो मिस्टर क्लीमेन, जॉन, मिएप पहले ही बता चुके होते हैं। कई बार मैं मेज़ के नीचे अपने आपको खुद चिकोटी काट कर रोके रहती हूँ कि कहीं किसी को टोक न दूँ। छोटे बच्चे, खासकर ऐन कभी भी किसी बड़े को टोकने, सही लाइन पर लाने की हिमाकत न करें। भले ही उनकी गाड़ी पटरी से उतरी जा रही हो या उनकी कल्पनाशक्ति का दिवाला पिट चुका हो । 

जॉन और मिस्टर क्लीमेन को अज्ञातवास में छुपे या भूमिगत हो गए लोगों के बारे में बात करना अच्छा लगता है। वे जानते हैं कि हम अपने जैसी हालत में जी रहे लोगों की बातें जानने के इच्छुक हैं। हमें उन सबकी तकलीफ़ों से हमदर्दी है जो गिरफ़्तार हो गए हैं और उन लोगों की खुशी में हमारी खुशी है जो कैद से आजाद कर दिए गए हैं। भूमिगत होना और अज्ञातवास में चले जाना तो अब आम बात हो गई है। हाँ कई प्रतिरोधी दल भी हैं, जैसे फ्री नीदरलैंड्स जो नकली पहचानपत्र बनाते हैं, अज्ञातवास में छुपे लोगों को वित्तीय सहायता देते हैं, युवा ईसाइयों के लिए काम तलाशते हैं। कितनी हैरानी की बात है कि ये लोग अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की मदद के लिए कितना काम कर रहे हैं। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हमारी मदद करने वालों का है, जो हमारी आज तक मदद करते आए हैं और उम्मीद तो यही है कि वे हमें सुरक्षित किनारे तक ले आएँगे । इसका कारण यह है कि अगर वे ऐसा नहीं करते तो उनकी किस्मत भी हमारी जैसी हो जाएगी। उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम उनके लिए मुसीबत हैं। वे रोज़ाना ऊपर आते हैं, पुरुषों से कारोबार और राजनीति की बात करते हैं, महिलाओं से खाने और युद्ध के समय की मुश्किलों की बात करते हैं, बच्चों से किताबों और अखबारों की बात करते हैं। वे हमेशा खुशदिल दिखने की कोशिश करते हैं, जन्मदिनों और दूसरे मौकों पर फूल और उपहार लाते हैं। हमेशा हर संभव मदद करते हैं। हमें ये बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए। ऐसे में जब दूसरे लोग जर्मनों के खिलाफ़ युद्ध में बहादुरी दिखा रहे हैं, हमारे मददगार रोज़ाना अपनी बेहतरीन भावनाओं और प्यार से हमारा दिल जीत रहे हैं। 

अजीब-अजीब कहानियाँ चल रही हैं। उनमें काफ़ी सच भी हैं। अभी मिस्टर क्लीमेन गेल्डरलैंड में भूमिगत हो चुके आदमियों और पुलिसवालों के बीच हुए फ़ुटबाल मैच का ज़िक्र कर रहे थे, हिल्वरसम में नए राशनकार्ड जारी किए गए। (ऐसे लोगों को, जो अज्ञातवास में रह रहे हैं, राशन खरीदने की सुविधा हो सके ) अगर राशनकार्ड न हो तो एक कार्ड के 

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लिए 60 गिल्डर देने पड़ते हैं। जिले में अज्ञातवास में रह रहे सभी लोगों से रजिस्ट्रार ने आग्रह किया कि वे फ़लाँ दिन एक अलग मेज़ पर आकर अपने कार्ड ले जाएँ । 

इस सबके साथ ये भी खयाल रखना पड़ता है कि इस तरह की चालाकियों की जर्मनों को हवा भी न लगे । 

डायरी के पन्ने 

बुधवार, 29 मार्च, 1944 

तुम्हारी, ऐन 

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मेरी प्यारी किट्टी, 

कैबिनेट मंत्री मिस्टर बोल्के स्टीन ने लंदन से डच प्रसारण में कहा कि युद्ध के बाद युद्ध का वर्णन करने वाली डायरियों और पत्रों का संग्रह किया जाएगा। और फिर हर कोई मेरी डायरी पर झपट पड़ा। सोचो, ये कितना दिलचस्प होगा जब मैं इस गुप्त एनेक्सी के बारे में छपवाऊँगी। उसका शीर्षक ही ऐसा होगा कि लोग इसे एक जासूसी कहानी समझेंगे । 

मैं सही बता रही हूँ, युद्ध के दस साल बाद लोग इससे कितना चकित होंगे कि जब उन्हें पता चलेगा कि हम लोग कैसे रहते थे, हम क्या खाते थे और यहूदियों के रूप में अज्ञातवास में हम क्या-क्या बातें करते थे। हालाँकि मैं तुम्हें इस जीवन के बारे में काफ़ी – कुछ बता चुकी हूँ, फिर भी तुम अभी भी थोड़ा-सा ही जान पाई हो। हवाई हमले के दौरान औरतें कैसी डर जाती हैं; अब देखो ना, पिछले रविवार जब 350 ब्रिटिश वायुयानों ने इज्मुईडेन पर 550 टन गोला-बारूद बरसाया तो हमारे घर ऐसे काँप रहे थे जैसे हवा में घास की पत्तियाँ। या हमारे इन घरों में कैसी महामारियाँ फैली हुई हैं। 

तुम्हें इस सबकी कुछ खबर नहीं है। सब कुछ तुम्हें बताने में पूरा दिन लग जाएगा। लोगों को सब्ज़ियों और सभी प्रकार के सामानों के लिए लाइनों में खड़े होना पड़ता है; डॉक्टर अपने मरीज़ों को नहीं देख पाते, क्योंकि उन्होंने पीठ मोड़ी नहीं कि उनकी कारें और मोटर साइकिलें चुरा ली जाती हैं, चोरी-चकारी इतनी बढ़ गई 

कि डच लोगों में अँगूठी पहनने का रिवाज तक नहीं रह गया है। 

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वितान 

छोटे-छोटे बच्चे आठ-आठ, दस-दस बरस के होंगे लेकिन लोगों के घरों की खिड़कियाँ तोड़ कर घुस जाते हैं और जो भी हाथ लगा, उठा ले जाते हैं। लोग पाँच मिनट के लिए भी अपना घर छोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं, क्योंकि लौटने पर उन्हें घर में झाडू फिरी मिलेगी । चोरी गए टाइपराइटरों, ईरानी कालीनों, बिजली से चलने वाली घड़ियों, कपड़ों आदि को लौटाने के लिए अखबारों में इनाम के विज्ञापन आए दिन पढ़ने को मिलते हैं। गली-गली नुक्कड़ों पर लगी बिजली से चलने वाली घड़ियाँ लोग उतार ले गए और सार्वजनिक टेलीफ़ोनों का पुर्जा – पुर्ज़ा गायब हो चुका है। 

डचों की नैतिकता अच्छी नहीं है। सब भूखे हैं; नकली कॉफ़ी को छोड़ दो तो एक हफ़्ते का राशन दो दिन भी नहीं चल पाता। अभी और क्या देखना बाकी है, पुरुषों को जर्मनी भेजा जा रहा है, बच्चे बीमार हैं या फिर भूख से बेहाल हैं; सब लोग फटे-पुराने कपड़े और घिसे-पिटे जूते पहनकर काम चला रहे हैं। ब्लैक मार्केट में जूते का नया तला 7.50 गिल्डर का मिलता है। इसके अलावा बहुत कम मोची मरम्मत का काम कर रहे हैं, यदि वे करते भी हैं तो चार महीने इंतज़ार करना पड़ेगा और इस बीच जूता गायब हो चुका होगा । 

इसका एक लाभ भी हुआ है, खाना जितना खराब होता जा रहा है बिक्री उतनी ही गंभीर हो रही है; सरकारी लोगों पर हमले की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। खाद्य कार्यालय, पुलिस, अधिकारी- सभी या तो अपने साथी नागरिकों की मदद कर रहे हैं या उन पर कोई आरोप लगाकर जेल में भेज देते हैं। सौभाग्य से बहुत कम डच लोग गलत पक्ष में हैं। 

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मंगलवार, 11 अप्रैल, 1944 मेरी प्यारी किट्टी, 

तुम्हारी, ऐन 

मेरा सिर घूम रहा है। समझ में नहीं आ रहा, कहाँ से शुरू करूँ। गुरुवार ( जब मैंने तुम्हें पिछली बार लिखा था ) सब कुछ ठीक-ठाक था। शुक्रवार (गुड फ्राइडे ) हम मोनापोली खेल खेलते रहे। शनिवार भी हम यही खेल खेले। दिन पता ही नहीं चला, कैसे बीत गए । शनिवार कोई दो बजे का वक्त रहा होगा, तेज़ गोलाबारी शुरू हो गई। मशीनगनें चल रही थीं। मर्द लोगों का यही कहना था। बाकी लोगों के लिए सब कुछ शांत था। 

रविवार दोपहर के वक्त मेरे आमंत्रण पर पीटर साढ़े चार बजे मुझसे मिलने के लिए आया। सवा पाँच बजे हम ऊपर सामने वाली अटारी पर चले गए। वहाँ हम छः बजे तक रहे। छः बजे से सवा सात बजे तक रेडियो पर बहुत ही खूबसूरत मोत्ज़ार्ट संगीत बज रहा था। मुझे रात्रि राग बहुत ही भले लगे। मैं रसोई में तो संगीत सुन ही नहीं पाती, क्योंकि दिव्य संगीत मेरी आत्मा की गहराइयों में उतरता चला जाता है। रविवार के दिन पीटर स्नान नहीं 

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कर पाया था। नहाने का टब नीचे ऑफ़िस में गंदे कपड़ों से भरा हुआ रखा था। हम दोनों ऊपर अटारी पर एक साथ गए। हम दोनों आराम से बैठ सकें, इसलिए मुझे जो भी कुशन सामने नज़र आया, मैं ऊपर लेती गई। हम एक पेटी पर बैठ गए। अब हुआ यह कि एक तो वह पेटी बहुत छोटी थी और दूसरे कुशन भी छोटा-सा ही था, हम दोनों एक-दूसरे से बहुत सट कर बैठे हुए थे। सहारा लेने के लिए हमारे पीछे दो और पेटियाँ थीं ही । मोरची हमें कंपनी देने के लिए हमारे साथ थी ही। 

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अचानक पौने नौ बजे मिस्टर वान दान ने सीटी बजाई और पूछा कि कहीं हम मिस्टर डसेल का कुशन तो नहीं ले आए हैं। हम कूदे और कुशन लेकर सीधे नीचे आ गए। बिल्ली और मिस्टर वान दान हमारे साथ थे । यह कुशन ही सारे झगड़े की जड़ था। डसेल इसलिए खफ़ा थे कि मैं वो तकिया उठा लाई थी जिसे वे कुशन की तरह इस्तेमाल करते थे। उन्हें डर था कि उनके तकिए पर पिस्सु चिपक जाएँगे। उन्होंने सारे घर को सिर पर उठा रखा था क्योंकि हम उनका कुशन उठा लाए थे। बदला लेने की नीयत से पीटर और मैंने उनके बिस्तर में दो कड़े ब्रुश घुसेड़ दिए लेकिन जब मिस्टर डसेल ने तय किया कि जाकर अपने कमरे में बैठेंगे तो हमें ये ब्रुश निकाल लेने पड़े। इस छोटे से प्रहसन पर हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। लेकिन हमारा हँसी-मज़ाक जल्दी ही खत्म हो गया। साढ़े नौ बजे पीटर ने हौले से दरवाज़ा खटखटाया और पापा से कहा कि वे ज़रा ऊपर आएँ, उसे अंग्रेज़ी के एक कठिन वाक्य में दिक्कत आ रही है। 

‘मुझे तो दाल में कुछ काला नज़र आ रहा है।’ मैंने मार्गोट से कहा, ‘ तय है, पीटर ने किसी और बहाने से यह बात कही है। ‘ जिस तरीके से मर्द लोग बात कर रहे हैं, मैं शर्त लगा कर कह सकती हूँ कि सेंधमारी हो रही थी। पिता जी, मिस्टर वान दान और पीटर लपक कर नीचे पहुँच गए। मार्गोट, माँ, मिसेज़ वान दान और मैं ऊपर इंतज़ार करते रहे। चार डरी-सहमी औरतें बातें ही तो कर सकती हैं। जब तक हमने नीचे ज़ोर का एक धमाका नहीं सुना, हम बातों में लगी रहीं। उसके बाद का मामला है। मेरा सोचना सही था । 

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उसी वक्त गोदाम में सब कुछ शांत हो गया । घड़ी ने पौने दस बजाए। हमारे चेहरों का रंग उड़ चुका था, इसके बावजूद कि हम डरे हुए थे, हम शांत बने रहे। आदमी लोग कहाँ थे? ये धमाके की आवाज़ कैसी थी ? क्या वे लोग सेंधमारों के साथ लड़ रहे थे? हम डर के मारे सोच भी नहीं पा रहे थे। हम सिर्फ़ इंतज़ार ही कर सकते थे। 

दस बजे, सीढ़ियों पर कदमों की आवाजें आईं। पापा का चेहरा पीला पड़ चुका था, वे नर्वस थे। पहले वे भीतर आए। उनके पीछे मिस्टर वान दान, ‘ बत्तियाँ बंद कर दो, दबे पाँव ऊपर वाली मंज़िल पर चले जाओ, पुलिस के आने की आशंका है। ‘ 

अब डरने का वक्त भी नहीं बचा था । बत्तियाँ बुझा दी गईं थीं। मैंने फटाफट एक जैकेट उठाई और हम ऊपर जाकर बैठ गए। हमें कुछ भी बतानेवाला कोई भी नहीं था। मर्द लोग वापस नीचे जा चुके थे। वे चारों दस बज कर दस मिनट तक वापिस ही नहीं आए। दो लोग पीटर की खुली खिड़की में से निगाह रखे हुए थे। सीढ़ियों के बीच वाले दरवाज़े पर ताला जड़ दिया गया था। बुककेस बंद कर दिया गया था। हमने रात को जलाई जाने वाली बत्ती पर एक स्वेटर डाल दिया। तब उन्होंने हमें सब कुछ बताया कि क्या हुआ था। 

पीटर अभी सीढ़ियों पर ही था जब उसने ज़ोर के दो धमाके सुने। वह नीचे गया तो देखता क्या है कि गोदाम के दरवाज़े में से बाईं तरफ़ का आधा फट्टा गायब है। वह लपक कर ऊपर आया और ‘ होम गार्ड्स’ को चौकन्ना किया। वे चारों लपके- लपके नीचे गए। जब वे गोदाम में पहुँचे तो सेंधमार अपने धंधे में लगे हुए थे। बिना सोचे-समझे मिस्टर वान दान चिल्लाए, ‘पुलिस…’ बाहर भागने की आवाजें आईं। सेंधमार भाग चुके थे। फट्टे को दोबारा उसकी जगह पर लगाया गया ताकि पुलिस को इस गैप का पता न चले। लेकिन अभी एक पल भी नहीं बीता था कि फट्टा फिर वापस नीचे गिरा दिया गया । पुरुष लोग… सेंधमारों की ढिठाई पर हैरान थे। मिस्टर वान दान और पीटर गुस्से के मारे थरथराने लगे । मिस्टर वान दान ने दरवाज़े पर कुल्हाड़ी का एक ज़ोरदार प्रहार किया। उसके बाद सब कुछ शांत हो गया। एक बार फिर फट्टे को उसकी जगह पर जमाया गया और एक बार फिर उनका यह प्रयास निष्फल कर दिया गया। बाहर की तरफ़ से एक आदमी और एक औरत टॉर्च की रोशनी फेंकते दिखाई दिए । ‘क्या मुसीबत है… ‘ उन आदमियों में से एक भुनभुनाया। लेकिन अब संकट यह था कि उनकी भूमिकाएँ बदल चुकी थीं। अब वे पुलिस के बजाए सेंधमारों वाली हालत में आ गए थे। चारों लपक कर ऊपर आए। डसेल और मिस्टर वान दान ने डसेल साहब की किताबें उठाईं, पीटर ने दरवाज़ा खोला, रसोई तथा प्राइवेट ऑफ़िस की खिड़कियाँ खोलीं। फ़ोन को नीचे फ़र्श पर पटका और आखिरकार चारों बुककेस के पीछे पहुँचने में सफल हो ही गए । 

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मंगलवार, 13 जून, 1944 

मेरी प्यारी किट्टी, 

मेरा एक और जन्मदिन गुज़र गया है। इस हिसाब से मैं पंद्रह बरस की हो गई हूँ। मुझे काफ़ी सारे उपहार मिले हैं— स्प्रिंगर की पाँच खंडों वाली कलात्मक इतिहास पुस्तक, चड्डियों का एक सेट, दो बेल्टें, एक रूमाल, दही के दो कटोरे, जैम की शीशी, शहद वाले दो छोटे बिस्किट, मम्मी-पापा की तरफ़ से वनस्पति विज्ञान की एक किताब, मार्गेट की तरफ़ से सोने का एक ब्रेसलेट, वान दान परिवार की तरफ़ से स्टिकर एलबम, डसेल की तरफ़ से बायोमाल्ट और मीठे मटर, मिएप की तरफ़ से मिठाई, बेप की तरफ़ से मिठाई और लिखने के लिए कॉपियाँ और सबसे बड़ी बात मिस्टर कुगलर की तरफ़ से मारिया तेरेसा नाम की किताब तथा क्रीम से भरे चीज़ के तीन स्लाइस | पीटर ने पीओनी फूलों का खूबसूरत गुलदस्ता दिया। बेचारे को ये उपहार जुटाने में ही अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ी। लेकिन वह कुछ और जुटा ही नहीं पाया। 

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बेहद खराब मौसम-लगातार बारिश, हवाएँ, और उफ़ान समुद्र के बावजूद हमले शानदार तरीके से जारी हैं। 

पर 

कल चर्चिल, स्मट्स, आइजनहावर, तथा आर्मोल्ड उन फ्रांसीसी गाँवों में गए जिन पर ब्रिटिश सैनिकों ने पहले कब्ज़ा कर लिया था और बाद में मुक्त कर दिया । चर्चिल एक टॉरपीडो नाव में थे। इससे तटों पर गोलाबारी की जाती है। बहुत से लोगों की तरह चर्चिल को भी पता नहीं है- डर किस चिड़िया का नाम है। जन्मजात बहादुर। 

यहाँ हमारी एनेक्सी की किलेबंदी से डच लोगों के मूड की थाह पाना बहुत मुश्किल है। इस बात में कोई शक नहीं कि लोगबाग बैठे ठाले भी खुश रह लेते हैं। ब्रिटिश सैनिकों ने आखिर अपनी कमर कस ही ली है और अपने मकसद को पूरा करने के लिए निकल पड़े हैं। जो लोग ये दावे करते फिर रहे हैं कि वे ब्रिटिश द्वारा कब्ज़ा किए जाने के पक्ष में नहीं हैं, नहीं जानते कि वे कितनी गलती पर हैं। उनके तर्क का कारण इतना भर है – ब्रिटिश को लड़ते रहना चाहिए, संघर्ष करना चाहिए, और हॉलैंड 

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को आज़ाद कराने के लिए अपने शूरवीर सैनिकों की शहादत के लिए आगे आना चाहिए । हॉलैंड के साथ-साथ कब्ज़े वाले दूसरे देशों को भी आज़ाद कराना चाहिए, लेकिन उसके बाद ब्रिटिश को हॉलैंड में रुकना नहीं चाहिए। इसके बजाय उन्हें चाहिए कि वे सभी कब्ज़े वाले देशों से हाथ जोड़-जोड़कर माफ़ी माँगें, डच ईस्ट इंडीज़ को उसके सही हकदारों के हाथों में सौंपे और थके, टूटे, हारे और लुटे-पिटे अपने देश ब्रिटेन में लौट जाएँ । मूर्खों की कहीं कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद, जैसा कि मैंने कहा, कुछेक समझदार डच लोगों की भी कमी नहीं है। अगर ब्रिटिश ने जर्मनी के साथ शांति संधि पर हस्ताक्षर कर लिए होते तो हॉलैंड और उसके पड़ोसी देशों का क्या हाल हुआ होता। उसके पास ऐसा करने के बहुत मौके मौजूद थे। हॉलैंड जर्मनी बन चुका होता और तब… यह होना ही समाप्ति का संकेत होता । सब कुछ खत्म हो जाने का संकेत । 

ऐसे सभी डच लोग, जो अभी भी ब्रिटिश को हिकारत से देखते हैं, ब्रिटेन की खिल्ली उड़ाते हैं, उसके बुढ़ाते लॉर्डों की सरकार को ताने मारते हैं, उन्हें कायर कहते हैं, इसके बावजूद जर्मनों से नफ़रत करते हैं, एक अच्छा-खासा सबक सिखाने के लायक हैं। उनकी जमकर मरम्मत की जानी चाहिए तभी हमारे जंग लगे दिमाग खुलेंगे। उनमें जोश आएगा। 

मेरे दिमाग में हर समय इच्छाएँ, विचार, आरोप तथा डाँट फटकार ही चक्कर खाते रहते हैं। मैं सचमुच उतनी घमंडी नहीं हूँ जितना लोग मुझे समझते हैं। मैं किसी और की तुलना में अपनी कई कमज़ोरियों और खामियों को बेहतर तरीके से जानती हूँ। लेकिन एक फ़र्क है- मैं जानती हूँ कि मैं खुद को बदलना चाहती हूँ, बदलूंगी और काफ़ी हद तक बदल चुकी हूँ। 

तब ऐसा क्यों है, मैं अपने आप से यह सवाल पूछती हूँ कि लोग मुझे अभी भी इतना नाक घुसेडू और अपने आपको तीसमारखाँ समझने वाली क्यों मानते हैं? क्या मैं वाकई अक्खड़ हूँ? क्या मैं ही अकेली अक्खड़ हूँ या वे सब ही हैं? यह सब वाहियात लगता है, मुझे पता है। लेकिन मैं ऊपर लिखा ये आखिरी वाक्य काटने वाली नहीं। ये वाक्य इतना मूर्खतापूर्ण नहीं है जितना लगता है। मुझ पर हमेशा आरोपों की बौछार करते रहने वाले दो लोग हैं मिसेज़ वान दान और डसेल, उनके बारे में सबको पता है कि वे कितने जड़बुद्धि हैं। मूर्ख जिसके आगे कोई विशेषण लगाने की ज़रूरत नहीं । मूर्ख लोग आमतौर पर इस बात को सहन नहीं कर पाते कि कोई उनसे बेहतर काम करके दिखाए। और इसका सबसे बढ़िया उदाहरण ये दो जड़मति, मिसेज़ वान दान और मूर्खाधिराज डसेल हैं। मिसेज़ वान दान मुझे इसलिए मूर्ख समझती हैं क्योंकि मैं उनके जितनी बीमारियों की शिकार नहीं हूँ। वे मुझे अक्खड़ समझती हैं क्योंकि वे मुझसे भी ज़्यादा अक्खड़ हैं। वे समझती हैं कि मेरी पोशाकें छोटी पड़ गई हैं, क्योंकि उनकी पोशाकें और भी ज़्यादा छोटी पड़ गई हैं। और वे समझती हैं कि मैं अपने आपको कुछ ज़्यादा ही तीसमारखाँ समझती हूँ क्योंकि वे उन विषयों पर 

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मुझसे भी दो गुना ज्यादा बोलती हैं जिनके बारे में वे खाक भी नहीं जानतीं। यह बात डसेल पर भी फिट होती है। लेकिन मेरी प्रिय कहावत है- ‘जहाँ आग होगी, धुआँ भी वहीं होगा’। और मुझे यह मानने में रत्ती भर भी संकोच नहीं है कि मैं सब कुछ जानती हूँ । 

मेरे व्यक्तित्व के साथ सबसे मुश्किल बात यह है कि मैं किसी भी और व्यक्ति की तुलना में अपने आपको सबसे 

धिक्कारती हूँ, यदि माँ अपनी सलाहें देना शुरू कर देती हैं तो उनके उपदेशों की पोटली इतनी भारी हो जाती है कि मुझे डर लगने लगता है- कैसे होगी इससे मुक्ति ! जब तक ऐन का वही पुराना रूप सामने नहीं आ जाता – ‘मुझे कोई नहीं समझता । ‘ 

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यह वाक्य मेरा हिस्सा है। बेशक लगे कि ऐसा नहीं होगा, फिर भी इसमें थोड़े से सच का अंश है। कई बार तो मैं अपने आपको प्रताड़ित करते हुए इतनी गहरे उतर जाती हूँ कि सांत्वना के दो बोल सुनने के लिए तरस जाती हूँ कि कोई आए और मुझे इससे उबारे। काश, कोई तो होता जो मेरी भावनाओं को गंभीरता से समझ पाता। अफ़सोस, ऐसा व्यक्ति मुझे अब तक नहीं मिला है, इसलिए तलाश जारी रहेगी। 

मुझे पता है, तुम पीटर के बारे में सोचकर हैरान हो रही हो । नहीं क्या, किट्टी? मैं मानती हूँ कि यह सच है कि पीटर मुझे प्यार करता है, गर्लफ्रेंड की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह । उसका स्नेह दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है; लेकिन कई बार कोई रहस्यमयी ताकत हम दोनों को पीछे की तरफ़ खींचती है। मैं नहीं जानती कि वो कौन-सी शक्ति है। 

कई बार मैं सोचती हूँ कि मैं उसके पीछे जिस तरह प्रेमदीवानी बनी रहती हूँ, उसे बढ़ा-चढ़ाकर बता रही हूँ, लेकिन यह सच नहीं है। इसका कारण यह है कि अगर मैं उसके कमरे में एक-दो दिन के लिए न जा पाऊँ तो मेरी बुरी हालत हो जाती है। मैं उसके लिए तड़पने लगती हूँ। पीटर अच्छा और भला लड़का है; लेकिन उसने मुझे कई तरह से निराश किया है। धर्म के प्रति उसकी नफ़रत, खाने के बारे में उसका बातें करना और इस तरह 

की और कई बातें मैं बिलकुल भी पसंद नहीं करती। इसके 

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बावजूद मुझे पक्का यकीन है कि हमने जो वायदा किया है कि कभी झगड़ेंगे नहीं, हम उस पर हमेशा टिके रहेंगे। पीटर शांतिप्रिय, सहनशील और बेहद सहज आत्मीय व्यक्ति है। वह मुझे कई ऐसी बातें भी कह लेने देता है जिन्हें कहने की वह अपनी मम्मी को भी इजाज़त न देता। वह दृढ़ निश्चयी होकर इस मुहिम पर जुटा हुआ है कि वह अपने पर लगे हुए सभी इल्ज़ामों से अपने आपको पाक-साफ़ करे और अपने काम-काज में सलीका लाए। इसके बावजूद वह अपने भीतरी ‘स्व’ को मुझसे छुपाता क्यों है और मुझे कभी भी इस बात की अनुमति नहीं देता कि मैं उसमें झाँकूँ। निश्चय ही, वह मेरी तुलना में ज़्यादा घुन्ना है, लेकिन अनुभव से जानती हूँ (हालाँकि मुझ पर लगातार यह आरोप लगाया जाता है कि जो कुछ भी जानना चाहिए वह मैं थ्योरी में जानती हूँ, व्यवहार में नहीं) कि कई बार ऐसे घुन्ने लोग भी, जिनसे संवाद कर पाना बहुत मुश्किल होता है, अपनी बात किसी से कह पाने की उत्कट चाह लिए होते हैं। 

मैं 

पीटर और मैंने, दोनों ने अपने चिंतनशील बरस, एनेक्सी में ही बिताए हैं। हम अकसर भविष्य, वर्तमान और अतीत की बातें करते हैं, लेकिन जैसा कि मैं तुम्हें बता चुकी हूँ, मैं असली चीज़ की कमी महसूस करती हूँ और जानती हूँ कि वह मौजूद है। 

क्या इसका कारण यह है कि मैं अरसे से बाहर नहीं निकली हूँ और प्रकृति के लिए पागल हुई जा रही हूँ। मैं उस वक्त को याद करती हूँ जब नीला आसमान, पक्षियों की चहचहाने की आवाज़, चाँदनी और खिलती कलियाँ, इन चीज़ों ने मुझे कभी भी अपने जादू से बाँधा न होता। मेरे यहाँ आने के बाद चीजें बदल गई हैं। उदाहरण के लिए छुट्टियों के दौरान की बात है। बेहद गरमी थी। मैं रात के साढ़े ग्यारह बजे तक ज़बरदस्ती आँखें खोले बैठी रही ताकि मैं अपने अकेले के बूते पर अच्छी तरह चाँद को देख सकूँ। अफ़सोस, मेरी सारी मेहनत बेकार गई। चौंध इतनी ज़्यादा थी कि खिड़की खोलने का जोखिम नहीं लिया जा सकता था। कई महीने बाद एक और मौका ऐसा आया था। उस रात मैं ऊपर वाली मंज़िल पर थी। खिड़की खुली हुई थी। जब तक खिड़की बंद करने का वक्त नहीं हो गया, मैं वहीं बैठी रही। यह गहरी, साँवली बरसात की रात थी। तेज़ हवाएँ चल रही थीं । बादलों के बीच लुकाछिपी चल रही थी। इस सारे नज़ारे ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। पिछले डेढ़ बरस में यह पहली बार हो रहा था कि मैं आमने-सामने रात से साक्षात्कार कर रही थी। उस शाम के बाद प्रकृति से साक्षात्कार करने की मेरी चाह लगातार बढ़ती गई थी। तब मुझे चोर उचक्कों, मोटे काले चूहे या पुलिस के छापे का भी डर नहीं रहा था। मैं अकेले ही नीचे चली गई थी और रसोई तथा प्राइवेट ऑफ़िस की खिड़की से प्रकृति के नज़ारे देखती रही थी। कई लोग सोचते हैं कि प्रकृति सुंदर होती है, कई लोग समय- समय पर तारों भरे आसमान के तले सोते हैं, और कई लोग अस्पतालों और जेलों में उस दिन की राह देखते 

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रहते हैं कि वे कब आज़ाद होंगे और वे फिर से प्रकृति के इस अनूठे उपहार का आनंद ले पाएँगे। प्रकृति गरीब-अमीर के बीच कोई भेदभाव नहीं करती। 

यह मेरी कल्पना मात्र नहीं है – आसमान, बादलों, चाँद और तारों की तरफ़ देखना मुझे शांति और आशा की भावना से सराबोर कर देता है। यह वेलेरियन या ब्रोमाइड की तुलना में आज़माया हुआ बेहतर नुस्खा है। शांति पाने की रामबाण दवा । प्रकृति मुझे विनम्रता का उपहार देती है और इससे मैं बड़े से बड़ा धक्का भी हिम्मत के साथ झेल जाती हूँ। लेकिन किस्मत का लिखा यही है- कुछेक दुर्लभ अवसरों को छोड़कर मैं मैल से चीकट हुई खिड़कियों में खँसे गंदे परदों में से प्रकृति को बहुत ही कम निहार पाती हूँ। इस तरह से देखने से आनंद लेने की सारी भावना ही मर जाती है। प्रकृति ही तो एक ऐसा वरदान है जिसका कोई सानी नहीं। 

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कई प्रश्नों में से एक प्रश्न जो मुझे अकसर परेशान करता रहता है और अभी भी समझा जाता है यह कह देना बहुत ही आसान है कि ये गलत है, लेकिन मेरे लिए इतना ही काफ़ी नहीं है। मैं विराट अन्याय के कारण जानना चाहती हूँ। 

धार 

संभवत: पुरुषों ने औरतों पर शुरू से ही इस आधार पर शासन करना शुरू किया कि वे उनकी तुलना में शारीरिक रूप से ज़्यादा सक्षम हैं; पुरुष ही कमाकर लाता है; बच्चे पालता पोसता है; और जो मन में आए, करता है, लेकिन हाल ही में स्थिति बदली है। औरतें अब तक इन सबको सहती चली आ रही थीं, जो कि बेवकूफ़ी ही थी। चूँकि इस प्रथा को जितना अधिक जारी रखा गया, यह उतनी ही गहराई से अपनी जड़ें जमाती चली गई। सौभाग्य से, शिक्षा, काम तथा प्रगति ने औरतों की आँखें खोली हैं। कई देशों में तो उन्हें बराबरी का हक दिया जाने लगा है। कई लोगों ने कई औरतों ने और कुछेक पुरुषों ने भी अब इस बात को महसूस किया है कि इतने लंबे अरसे तक इस तरह की वाहियात स्थिति को झेलते जाना गलत ही था । आधुनिक महिलाएँ पूरी तरह स्वतंत्र होने का हक चाहती हैं। 

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लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है। महिलाओं का भी पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। आमतौर पर देखा जाए तो पूरी दुनिया में पुरुष वर्ग को पूरा सम्मान मिलता है तो महिलाओं ने ही क्या कुसूर किया है कि वे इससे वंचित रहें और उन्हें अपने हिस्से का सम्मान न मिले। सैनिकों और युद्धों के वीरों का सम्मान किया जाता है, उन्हें अलंकृत किया जाता है, उन्हें अमर बना डालने तक का शौर्य प्रदान किया जाता है, शहीदों को पूजा भी जाता है, लेकिन कितने लोग ऐसे हैं जो औरतों को भी सैनिक का दर्जा देते हैं ? 

‘मौत के खिलाफ़ मनुष्य’ नाम की किताब में मैंने पढ़ा था कि आमतौर पर युद्ध में लड़ने वाले वीर को जितनी तकलीफ़, पीड़ा, बीमारी और यंत्रणा से गुज़रना पड़ता है, उससे कहीं अधिक तकलीफें औरतें बच्चे को जन्म देते समय झेलती हैं और इन सारी तकलीफ़ों से गुज़रने के बाद उसे पुरस्कार क्या मिलता है? जब बच्चा जनने के बाद उसका शरीर अपना आकर्षण खो देता है तो उसे एक तरफ़ धकिया दिया जाता है, उसके बच्चे उसे छोड़ देते हैं और उसका सौंदर्य उससे विदा ले लेता है। औरत ही तो है जो मानव जाति की निरंतरता को बनाए रखने के लिए इतनी तकलीफ़ों से गुज़रती है और संघर्ष करती है, बहुत अधिक मज़बूत और बहादुर सिपाहियों से भी ज़्यादा मेहनत करके खटती है। वह जितना संघर्ष करती है, उतना तो बड़ी-बड़ी डींगें हाँकनेवाले ये सारे सिपाही मिलकर भी नहीं करते। 

मेरा ये कहने का कतई मतलब नहीं है कि औरतों को बच्चे जनना बंद कर देना चाहिए, इसके विपरीत प्रकृति चाहती है कि वे ऐसा करें और इस वजह से उन्हें यह काम करते रहना चाहिए। मैं जिस चीज़ की भर्त्सना करती हूँ वह है हमारे मूल्यों की प्रथा और ऐसे व्यक्तियों की मैं भर्त्सना करती हूँ जो यह बात मानने को तैयार ही नहीं होते कि समाज में औरतों, खूबसूरत और सौंदर्यमयी औरतों का योगदान कितना महान और मुश्किल है। 

मैं इस पुस्तक के लेखक श्री पोल दे क्रुइफ जी से पूरी तरह सहमत हूँ जब वे कहते हैं कि पुरुषों को यह बात सीखनी ही चाहिए कि संसार के जिन हिस्सों को हम सभ्य कहते हैं – वहाँ जन्म अनिवार्य और टाला न जा सकने वाला काम नहीं रह गया है। आदमियों के लिए बात करना बहुत आसान होता है – उन्हें औरतों द्वारा झेली जाने वाली तकलीफ़ों से कभी भी गुज़रना नहीं पड़ेगा। 

मेरा विश्वास है कि अगली सदी आने तक यह मान्यता बदल चुकी होगी कि बच्चे पैदा करना ही औरतों का काम है। औरतें ज़्यादा सम्मान और सराहना की हकदार बनेंगी। वे सब औरतें जो एक उफ़ भी किए बिना, यह लंबे-चौड़े बखानों के बिना ये तकलीफ़े सहती हैं। 

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तुम्हारी ऐन. एम. फ्रैंक 

अनुवाद : सूरजप्रकाश 

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अभ्यास 

1. “ यह साठ लाख लोगों की तरफ़ से बोलनेवाली एक आवाज़ है। एक ऐसी आवाज़, जो किसी संत या कवि की नहीं, बल्कि एक साधारण लड़की की है।” इल्या इहरनबुर्ग की इस टिप्पणी के संदर्भ में ऐन फ्रैंक की डायरी के पठित अंशों पर विचार करें। 

2. “काश, कोई तो होता जो मेरी भावनाओं को गंभीरता से समझ पाता। 

अफ़सोस, ऐसा व्यक्ति मुझे अब तक नहीं मिला…।” क्या आपको लगता है कि ऐन के इस कथन में उसके डायरी लेखन का कारण छिपा है ? 3. ‘प्रकृति – प्रदत्त प्रजनन – शक्ति के उपयोग का अधिकार बच्चे पैदा करें या न करें अथवा कितने बच्चे पैदा करें – इस की स्वतंत्रता स्त्री से छीन कर हमारी विश्व – व्यवस्था ने न सिर्फ़ स्त्री को व्यक्तित्व – विकास के अनेक अवसरों से वंचित किया है बल्कि जनांधिक्य की समस्या भी पैदा की है’। ऐन की डायरी के 13 जून, 1944 के अंश में व्यक्त विचारों के संदर्भ में इस कथन का औचित्य ढूँढ़ें। 

4. “ ऐन की डायरी अगर एक ऐतिहासिक दौर का जीवंत दस्तावेज़ है, तो साथ ही उसके निजी सुख-दुख और भावनात्मक उथल-पुथल का भी। इन पृष्ठों में दोनों का फ़र्क मिट गया है।” इस कथन पर विचार करते हुए अपनी सहमति या असहमति तर्कपूर्वक व्यक्त करें। 

5. ऐन ने अपनी डायरी ‘किट्टी’ को संबोधित चिट्ठी की शक्ल में लिखने 

की ज़रूरत क्यों महसूस की होगी ? 

इसे भी जानें 

नाज़ी दस्तावेज़ों के पाँच करोड़ पन्नों में ऐन फ्रैंक का नाम केवल एक बार आया है लेकिन अपने लेखन के कारण आज ऐन हज़ारों पन्नों में दर्ज हैं जिसका एक नमूना यह खबर भी है- 

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नाज़ी अभिलेखागार के दस्तावेज़ों में महज़ एक नाम के रूप में दफ़न है ऐन फ्रैंक 

बादरोलसेन, 26 नवंबर (एपी) । नाज़ी यातना शिविरों का रौंगटे खड़े करने वाला चित्रण कर दुनिया भर में मशहूर हुई ऐनी फ्रैंक का नाम हालैंड के उन हज़ारों लोगों की सूची में महज़ एक नाम के रूप में दर्ज है जो यातना शिविरों में बंद थे। 

नाज़ी नरसंहार से जुड़े दस्तावेज़ों के दुनिया के सबसे बड़े अभिलेखागार एक जीर्णशीर्ण फाइल में 40 नंबर के आगे लिखा हुआ है-ऐनी फ्रैंक ऐनी की डायरी ने उसे विश्व में खास बना दिया लेकिन 1944 में सितंबर माह के किसी एक दिन वह भी बाकी लोगों की तरह एक नाम भर थी । एक भयभीत बच्ची जिसे बाकी 1018 यहूदियों के साथ पशुओं को ढोने वाली गाड़ी में पूर्व में स्थित एक यातना शिविर के लिए रवाना कर दिया गया था। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डच रेडक्रास ने वेस्टरबोर्क ट्रांजिट कैंप से यातना शिविरों में भेजे गए लोगों संबंधी सूचना एकत्र कर इंटरनेशनल ट्रेसिंग सर्विस (आईटीएस) को भेजे थे। आईटीएस नाज़ी दस्तावेज़ों का एक ऐसा अभिलेखागार है जिसकी स्थापना युद्ध के बाद लापता हुए लोगों का पता लगाने के लिए की गई थी। 

इस युद्ध के समाप्त होने के छह दशक से अधिक समय के बाद अब अंतरराष्ट्रीय रेडक्रास समिति विशाल आईटीएस अभिलेखागार को युद्ध में ज़िंदा बचे लोगों, उनके रिश्तेदारों व शोधकर्ताओं के 

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लिए पहली बार सार्वजनिक करने जा रही है। 

एक करोड़ 75 लाख लोगों के गारे में दर्ज इस रिकार्ड का इस्तेमाल अभी तक परिजनों को मिलाने, लाखों विस्थापित लोगों के भविष्य का पता लगाने और 

बाद में मुआवज़े के दावों के संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने में किया जाता रहा है। लेकिन आम लोगों को इसे देखने की अनुमति नहीं दी गई है। 

मध्य जर्मनी के इस शहर में 25.7 किलोमीटर लंबी अलमारियों और कैबिनेटों में संग्रहित इन फ़ाइलों में उन हज़ारों यातना शिविरों, बंधुआ मज़दूर केंद्रों और उत्पीड़न केंद्रों से जुड़े दस्तावेज़ों का पूर्ण संग्रह उपलब्ध है। 

किसी ज़माने में थर्ड रीख के रूप में प्रसिद्ध इस शहर में कई अभिलेखागार हैं। प्रत्येक में युद्ध से जुड़ी त्रासदियों का लेखाजोखा रखा गया है। 

आईटीएस में एनी फ्रैंक का नाम नाज़ी दस्तावेज़ों के पाँच करोड़ पन्नों में केवल एक बार आया है वेस्टरबोर्क से 19 मई से 6 सितंबर 1944 के बीच भेजे गए लोगों से जुड़ी फ़ाइल में फ्रैंक उपनाम से दर्जनों नाम दर्ज हैं। 

इस सूची में ऐनी का नाम, जन्मतिथि, एम्सटर्डम का पता और यातना शिविर के लिए रवाना होने की तारीख दर्ज है। इन लोगों को कहाँ ले जाया गया वह कालम खाली छोड़ दिया गया है। आईटीएस के प्रमुख यूडो जोस्त ने पोलैंड के यातना शिविर का ज़िक्र करते हुए कहा – यदि स्थान का नाम नहीं दिया गया है तो इसका मतलब यह आशविच था। ऐनी, उनकी बहन मार्गोट व उसके माता पिता को चार अन्य यहूदियों के साथ 1944 में गिरफ्तार किया गया था। ऐनी डच नागरिक नहीं जर्मन शरणार्थी थी । यातना शिविरों के बारे में ऐनी की डायरी 1952 में ‘ऐनी फ्रैंक दी डायरी ऑफ़ द यंग गर्ल’ शीर्षक से छपी थी। 

साभार जनसत्ता 27 नवंबर, 2006 

डायरी के पन्ने ऐन फ्रैंक