साहित्यिक युग / पहचान: सत्तर के दशक के प्रसिद्ध प्रगतिशील एवं जनवादी कवि (वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन से गहरे जुड़े कवि)।
प्रथम प्रकाशित कविता: ‘जनता का आदमी’ (1972 ई.), जो ‘वाम’ पत्रिका में छपी थी।
प्रमुख रचनाएँ :
एकमात्र प्रकाशित काव्य-संग्रह
दुनिया रोज़ बनती है (1998 ई.): यह इनका पहला और एकमात्र संग्रह है, जिसमें इनकी लगभग तीन दशकों की चर्चित कविताएँ संकलित हैं।
प्रसिद्ध कविताएँ
जनता का आदमी (1972): इनकी पहली कविता।
गोली दागो पोस्टर (1972): ‘फ़िलहाल’ पत्रिका में प्रकाशित ऐतिहासिक जनवादी कविता।
भारत-दर्शन
भागी हुई लड़कियाँ (1972)
ब्रूनो की बेटियाँ (1980)
भारत-दर्शन
पतंग: (NCERT कक्षा 12 की ‘आरोह भाग-2’ पाठ्यपुस्तक में शामिल अत्यंत प्रसिद्ध कविता)।
कपड़े के जूते
भारत-दर्शन
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
पहल सम्मान
नागार्जुन सम्मान
फ़िराक गोरखपुरी सम्मान
गिरिजा कुमार माथुर सम्मान
भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान
राहुल सम्मान
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का विशेष साहित्य सम्मान
बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान
जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर सातवें आठवें दशक में कवि आलोक धन्वा ने बहुत छोटी अवस्था में अपनी गिनी-चुनी कविताओं से अपार लोकप्रियता अर्जित की। सन् 1972-1973 में प्रकाशित इनकी आरंभिक कविताएँ हिंदी के अनेक गंभीर काव्यप्रेमियों को जबानी याद रही हैं। आलोचकों का तो मानना है कि उनकी कविताओं ने हिंदी कवियों और कविताओं को कितना प्रभावित किया, इसका मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है। इतनी व्यापक ख्याति के बावजूद या शायद उसी की वजह से बनी हुई अपेक्षाओं के दबाव के चलते, आलोक धन्वा ने कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया। सन् 72 से लेखन आरंभ करने के बाद उनका पहला और अभी तक का एकमात्र काव्य संग्रह सन् 98 में प्रकाशित हुआ। काव्य संग्रह के अलावा वे पिछले दो दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने जमशेदपुर में अध्ययन मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म तथा साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भागीदारी की है।
पाठ्यपुस्तक में ली गई कविता पतंग आलोक धन्वा के एकमात्र संग्रह का हिस्सा है। यह एक लंबी कविता है जिसके तीसरे भाग को पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है। पतंग के बहाने इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं एवं उमंगों का सुंदर चित्रण किया गया है। बाल क्रियाकलापों एवं प्रकृति में आए परिवर्तन को अभिव्यक्त करने के लिए सुंदर बिंबों का उपयोग किया गया है। पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है। आसमान में उड़ती हुई पतंग ऊँचाइयों की वे हदें हैं, बालमन जिन्हें छूना चाहता है और उसके पार जाना चाहता है। कविता धीरे-धीरे बिंबों की एक ऐसी नयी दुनिया में ले जाती है जहाँ शरद ऋतु का चमकीला इशारा है, जहाँ तितलियों की रंगीन दुनिया है, दिशाओं के मृदंग बजते हैं। जहाँ छतों के खतरनाक कोने से गिरने का भय है तो दूसरी ओर भय पर विजय पाते बच्चे हैं जो गिर-गिरकर सँभलते हैं और पृथ्वी का हर कोना खुद-ब-खुद उनके पास आ जाता है। वे हर बार नयी-नयी पतंगों को सबसे ऊँचा उड़ाने का हौसला लिए फिर फिर भादो(अँधेरे) के बाद के शरद(उजाला) की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या आप भी उनके साथ हैं
पतंग
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया सवेरा हुआ खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा शरद आया पुलों को पार करते हुए अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए घंटी बजाते हुए ज़ोर-जोर से पतंग उड़ानेवाले बच्चोंके त कोshe चमकीले इशारों से बुलाते हुए और आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए कि पतंग ऊपर उठ सके दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके- बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके- कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास जब वे दौड़ते हैं बेसुध छतों को भी नरम बनाते हुए दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं डाल की तरह लचीले वेग से अकसर छतों के खतरनाक किनारों तकउस समय गिरने से बचाता है उन्हें सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं अपने रंध्रों के सहारे अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से और बच जाते हैं तब तो और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास