- बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जन्म: 14 अप्रैल, सन् 1891, महू (मध्य प्रदेश)में
- प्रमुख रचनाएँ:
- दें कास्ट्स इन इंडिया, देयर मेकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (1917, प्रथम प्रकाशित कृति);
- द अनटचेबल्स, हू आर दे? (1948);
- हू आर द शूद्राज़ (1946);
- बुद्धा एंड हिज़ धम्मा (1957);
- थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स (1955);
- द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी(1923);
- द एबोलुशन ऑफ़ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया (पीएच.डी. की थीसिस, 1916);
- द राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ द हिंदू वीमैन (1965);
- एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936);
- लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी(1943);
- बुद्धिज्म एंड कम्युनिज़्म(1956),
- मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता (पत्रिका-संपादन);
- हिंदी में उनका संपूर्ण वाङ्मय भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय से बाबा साहब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय नाम से 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है
- निधन : दिसंबर, सन् 1956 दिल्ली में
- अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है।
- मानव-मुक्ति के पुरोधा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अपने समय के सबसे सुपठित जनों में से एक थे। प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयार्क (अमेरिका)फिर वहाँ से लंदन गए। उन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक और पूरा वैदिक वाङ्मय अनुवाद के जरिये पढ़ा और ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत कौं। सब मिलाकर वे इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बन कर उभरे। स्वदेश में कुछ समय उन्होंने वकालत भी की। समाज और राजनीति में बेहद सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने अछूतों, स्त्रियों और मज़दूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया।
- बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक डॉ. भीमराव आंबेडकर आधुनिक भारतीय चिंतन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान के अधिकारी हैं। उन्होंने जीवन भर दलितों की मुक्ति एवं सामाजिक समता के लिए संघर्ष किया। उनका पूरा लेखन इसी संघर्ष और सरोकार से जुड़ा हुआ है। स्वयं दलित जाति में जन्मे डॉ. आंबेडकर को बचपन से ही जाति-आधारित उत्पीड़न शोषण एवं अपमान से गुजरना पड़ा था। इसीलिए विद्यालय के दिनों में जब एक अध्यापक ने उनसे पूछा कि “तुम पढ़-लिख कर क्या बनोगे?” तो बालक भीमराव ने जवाब दिया था मैं पढ़-लिख कर वकील बनूँगा, अछूतों के लिए नया कानून बनाऊँगा और छुआछूत को खत्म करूँगा। डॉ. आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन इसी संकल्प के पीछे झोंक दिया। इसके लिए उन्होंने जमकर पढ़ाई की। व्यापक अध्ययन एवं चिंतन-मनन के बल पर उन्होंने हिंदुस्तान के स्वाधीनता संग्राम में एक नयी अंतर्वस्तु भरने का काम किया। वह यह था कि दासता का सबसे व्यापक व गहन रूप सामाजिक दासता है और उसके उन्मूलन के बिना कोई भी स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार रहेगी, इसलिए अधूरी होगी। उनके चिंतन व रचनात्मकता के मुख्यतः तीन प्रेरक व्यक्ति रहे बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले। जातिवादी उत्पीड़न के कारण हिंदू समाज से मोहभंग होने के बाद वे बुद्ध के समतावादी दर्शन में आश्वस्त हुए और 14 अक्तूबर, सन् 1956 को 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध मतानुयायी बन गए। भारत के संविधान निर्माण में उनकी महती भूमिका और एकनिष्ठ समर्पण के कारण ही हम आज उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता कह कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी समूची बहुमुखी विद्वत्ता एकांत ज्ञान-साधना की जगह मानव-मुक्ति व जन-कल्याण के लिए थी- यह बात वे अपने चिंतन और क्रिया के क्षणों से बराबर साबित करते रहे। अपने इस प्रयोजन में वे अधिकतर सफल भी हुए। यहाँ प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के विख्यात भाषण एनीहिलेशन ऑफ कास्ट (1936) के ललई सिंह यादव द्वारा कृत हिंदी-रूपांतर जाति- भेद का उच्छेद के दो प्रकरणों के तौर पर है। यह भाषण जाति–पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन (सन् 1936) के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था; परंतु इसकीक्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्णतः सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और यह पढ़ा न जा सका। बाद में, आंबेडकर ने इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया, जो पर्याप्त लोकप्रिय हुई। उनके अनुसार समानता, स्वतंत्रता व बंधुता- ये तीन तत्त्व आदर्श समाज में अनिवार्यतः होने चाहिए, जिससे लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के अर्थ तक भी पहुँचे। यहाँ प्रस्तुत पाठ उक्त पुस्तिका के प्रतिनिधि प्रकरण हैं। आज के जाति-मज़हब आधारित विषाक्त सामाजिक-राजनैतिक माहौल में इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।
श्रम विभाजन और जातिप्रथा
- इस पूरे भाग में डॉ. आंबेडकर ने यह साबित किया है कि:
- जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह मज़दूरों को भी अलग-अलग करती है और उन्हें ऊँच-नीच भी ठहराती है।
- जाति-प्रथा रुचि और योग्यता पर नहीं, बल्कि जन्म पर आधारित है।
- यह व्यक्ति को जीवन भर एक ही पेशे में बाँध देती है, भले ही वह पेशा बदलना चाहे।
- आधुनिक समय में जब तकनीक और उद्योग बदलते हैं, तब पेशा न बदल पाने की वजह से बेरोजगारी और भूखमरी होती है।
- इससे काम में मन नहीं लगता और दक्षता नहीं आती, इसलिए आर्थिक दृष्टि से भी यह हानिकारक है।
| यह विडंबना की ही बात है, कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं हैं। | यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आज के समय में भी जातिवाद का समर्थन करने वाले बहुत से लोग मौजूद हैं। |
| इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। | ये समर्थक कई तर्कों के आधार पर जाति-प्रथा का बचाव करते हैं। |
| समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है, कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है, | एक तर्क यह दिया जाता है कि आधुनिक समाज काम में दक्षता (कार्यकुशलता) के लिए काम को अलग-अलग हिस्सों में बाँटना (श्रम विभाजन) ज़रूरी मानता है, |
| और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। | और चूँकि जाति-प्रथा भी काम को बाँटने का ही एक रूप है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। |
| इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है, कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है। | इस तर्क में पहली खराबी यह है कि जाति-प्रथा सिर्फ कामों को ही नहीं बाँटती, बल्कि काम करने वाले लोगों (श्रमिकों) को भी अलग-अलग वर्गों में बाँट देती है। |
| श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। | कामों को बाँटना (श्रम विभाजन) निश्चित रूप से किसी भी सभ्य समाज के लिए ज़रूरी है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में कामों को बाँटने का मतलब यह नहीं होता कि मज़दूरों को भी अलग-अलग और अप्राकृतिक वर्गों में बाँट दिया जाए। |
| भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, | भारत की जाति-प्रथा की एक और खास बात यह है कि यह सिर्फ मज़दूरों को अलग-अलग नहीं करती, बल्कि इन अलग-अलग वर्गों को एक-दूसरे से ऊँचा या नीचा भी ठहरा देती है, |
| जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता। | जो दुनिया के किसी और समाज में नहीं देखा जाता। |
| जाति-प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। | अगर जाति-प्रथा को काम को बाँटने का तरीका भी मान लें, तो यह प्राकृतिक या स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति की अपनी पसंद या रुचि पर आधारित नहीं है। |
| कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। | एक कुशल और सक्षम समाज बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति की योग्यता को इतना विकसित किया जाए कि वह अपना काम या पेशा खुद चुन सके। |
| इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात गर्भाधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। | इसके उलट जाति-प्रथा का खराब सिद्धांत यह है कि इसमें व्यक्ति की शिक्षा, योग्यता या क्षमता को देखे बिना, सिर्फ उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के आधार पर, जन्म से पहले ही (गर्भ में) उसका पेशा तय कर दिया जाता है। |
| जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। | जाति-प्रथा सिर्फ पेशा पहले से तय ही नहीं करती, बल्कि व्यक्ति को उसी एक पेशे में जीवन भर के लिए बाँध भी देती है। |
| भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। | चाहे वह पेशा उसके लिए अनुपयुक्त हो या उससे कमाई न हो, फिर भी उसे वही करना पड़ता है, भले ही उसे भूखा मरना पड़े। |
| आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, | आधुनिक समय में अक्सर ऐसा होता है, क्योंकि उद्योगों और व्यवसायों की प्रक्रियाओं और तकनीकों में लगातार विकास होता है और कभी-कभी अचानक बड़े बदलाव भी आ जाते हैं, |
| जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? | जिसकी वजह से व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उसे पेशा बदलने की आज़ादी नहीं है, तो भूखा मरने के अलावा और क्या विकल्प बचता है? |
| हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। | हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी को भी अपने पैतृक (पूर्वजों के) पेशे के अलावा दूसरा पेशा चुनने की इज़ाजत नहीं देती, चाहे वह उस दूसरे पेशे में कितना भी माहिर क्यों न हो। |
| इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। | इस तरह पेशा बदलने की मनाही करके जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक बड़ा और सीधा कारण बनी हुई है। |
| इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। | इस तरह हम देखते हैं कि काम को बाँटने की दृष्टि से भी जाति-प्रथा बहुत बड़ी खामियों से भरी है। |
| जाति-प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। | जाति-प्रथा के तहत काम का बँटवारा व्यक्ति की अपनी मर्जी पर निर्भर नहीं करता। |
| मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्व नहीं रहता। | व्यक्ति की अपनी भावनाओं और रुचियों का इसमें कोई स्थान या महत्व नहीं होता। |
| ‘पूर्व लेख’ ही इसका आधार है। | सिर्फ ‘जन्म’ (पूर्व निर्धारित जाति) ही इसका आधार है। |
| इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि बहुत से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं। | इस आधार पर हमें मानना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और शोषण से भी बड़ी समस्या यह है कि बहुत से लोग ‘तय’ किए गए काम को बिना किसी रुचि के, सिर्फ मजबूरी में करते हैं। |
| ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। | ऐसी स्थिति में व्यक्ति स्वाभाविक रूप से नाराज़गी में रहता है और काम को टालने या कम करने की कोशिश करता है। |
| ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है। | जब काम करने वालों का न तो मन लगता है और न ही दिमाग़, तो उनसे कुशलता या अच्छा काम कैसे उम्मीद की जा सकती है? |
| अतः यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है कि आर्थिक पहलू से भी जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है। | इसलिए यह बिना किसी शक के साबित हो जाता है कि आर्थिक नज़रिए से भी जाति-प्रथा एक हानिकारक प्रथा है। |
| क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि व आत्म-शक्ति को दबा कर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर निष्क्रिय कर देती है। | क्योंकि यह व्यक्ति की प्राकृतिक इच्छा, रुचि और अपनी ताकत को दबा देती है और उसे अप्राकृतिक नियमों में बाँधकर निष्क्रिय (बेकार) बना देती है। |
- यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आज के समय में भी जातिवाद का समर्थन करने वाले बहुत से लोग मौजूद हैं।ये समर्थक कई तर्कों के आधार पर जाति-प्रथा का बचाव करते हैं।एक तर्क यह दिया जाता है कि आधुनिक समाज काम में दक्षता (कार्यकुशलता) के लिए काम को अलग-अलग हिस्सों में बाँटना (श्रम विभाजन) ज़रूरी मानता है,और चूँकि जाति-प्रथा भी काम को बाँटने का ही एक रूप है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है।इस तर्क में पहली खराबी यह है कि जाति-प्रथा सिर्फ कामों को ही नहीं बाँटती, बल्कि काम करने वाले लोगों (श्रमिकों) को भी अलग-अलग वर्गों में बाँट देती है।कामों को बाँटना (श्रम विभाजन) निश्चित रूप से किसी भी सभ्य समाज के लिए ज़रूरी है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में कामों को बाँटने का मतलब यह नहीं होता कि मज़दूरों को भी अलग-अलग और अप्राकृतिक वर्गों में बाँट दिया जाए।भारत की जाति-प्रथा की एक और खास बात यह है कि यह सिर्फ मज़दूरों को अलग-अलग नहीं करती, बल्कि इन अलग-अलग वर्गों को एक-दूसरे से ऊँचा या नीचा भी ठहरा देती है,जो दुनिया के किसी और समाज में नहीं देखा जाता।अगर जाति-प्रथा को काम को बाँटने का तरीका भी मान लें, तो यह प्राकृतिक या स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति की अपनी पसंद या रुचि पर आधारित नहीं है।एक कुशल और सक्षम समाज बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति की योग्यता को इतना विकसित किया जाए कि वह अपना काम या पेशा खुद चुन सके।इसके उलट जाति-प्रथा का खराब सिद्धांत यह है कि इसमें व्यक्ति की शिक्षा, योग्यता या क्षमता को देखे बिना, सिर्फ उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के आधार पर, जन्म से पहले ही (गर्भ में) उसका पेशा तय कर दिया जाता है।जाति-प्रथा सिर्फ पेशा पहले से तय ही नहीं करती, बल्कि व्यक्ति को उसी एक पेशे में जीवन भर के लिए बाँध भी देती है।चाहे वह पेशा उसके लिए अनुपयुक्त हो या उससे कमाई न हो, फिर भी उसे वही करना पड़ता है, भले ही उसे भूखा मरना पड़े।आधुनिक समय में अक्सर ऐसा होता है, क्योंकि उद्योगों और व्यवसायों की प्रक्रियाओं और तकनीकों में लगातार विकास होता है और कभी-कभी अचानक बड़े बदलाव भी आ जाते हैं,जिसकी वजह से व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उसे पेशा बदलने की आज़ादी नहीं है, तो भूखा मरने के अलावा और क्या विकल्प बचता है?हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी को भी अपने पैतृक (पूर्वजों के) पेशे के अलावा दूसरा पेशा चुनने की इज़ाजत नहीं देती, चाहे वह उस दूसरे पेशे में कितना भी माहिर क्यों न हो।इस तरह पेशा बदलने की मनाही करके जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक बड़ा और सीधा कारण बनी हुई है।इस तरह हम देखते हैं कि काम को बाँटने की दृष्टि से भी जाति-प्रथा बहुत बड़ी खामियों से भरी है।जाति-प्रथा के तहत काम का बँटवारा व्यक्ति की अपनी मर्जी पर निर्भर नहीं करता।व्यक्ति की अपनी भावनाओं और रुचियों का इसमें कोई स्थान या महत्व नहीं होता।सिर्फ ‘जन्म’ (पूर्व निर्धारित जाति) ही इसका आधार है।इस आधार पर हमें मानना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और शोषण से भी बड़ी समस्या यह है कि बहुत से लोग ‘तय’ किए गए काम को बिना किसी रुचि के, सिर्फ मजबूरी में करते हैं।ऐसी स्थिति में व्यक्ति स्वाभाविक रूप से नाराज़गी में रहता है और काम को टालने या कम करने की कोशिश करता है।जब काम करने वालों का न तो मन लगता है और न ही दिमाग़, तो उनसे कुशलता या अच्छा काम कैसे उम्मीद की जा सकती है?इसलिए यह बिना किसी शक के साबित हो जाता है कि आर्थिक नज़रिए से भी जाति-प्रथा एक हानिकारक प्रथा है।क्योंकि यह व्यक्ति की प्राकृतिक इच्छा, रुचि और अपनी ताकत को दबा देती है और उसे अप्राकृतिक नियमों में बाँधकर निष्क्रिय (बेकार) बना देती है।
मेरी कल्पना का आदर्श समाज
- जाति-प्रथा के खेदजनक परिणामों की नीरस गाथा को सुनते सुनाते आप में से कुछ लोग निश्चय ही ऊब गए होंगे। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। अतः अब मैं समस्या के रचनात्मक पहलू को लेता हूँ। मेरे द्वारा जाति-प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो फिर मेरी दृष्टि में आदर्श-समाज क्या है? ठीक है, यदि ऐसा पूछेंगे, तो मेरा उत्तर होगा कि मेरा आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श समाज में इतनी गातिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। इसी प्रकार स्वतंत्रता पर भी क्या कोई आपत्ति हो सकती है? गमनागमन की स्वाधीनता, जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता के अर्थों में शायद ही कोई ‘स्वतंत्रता’ का विरोध करे। इसी प्रकार संपत्ति के अधिकार, जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औजार व सामग्री रखने के अधिकार जिससे शरीर को स्वस्थ रखा जा सके, के अर्थ में भी ‘स्वतंत्रता’ पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। तो फिर मनुष्य की शक्ति के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की भी स्वतंत्रता क्यों न प्रदान की जाए? जाति-प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, तो उसका अर्थ उसे ‘दासता’ में जकड़कर रखना होगा, क्योंकि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ, जाति प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। अब आइए समता पर विचार करें। क्या ‘समता’ पर किसी की आपत्ति हो सकती है। फ्रांसीसी क्रांति के नारे में ‘समता’ शब्द ही विवाद का विषय रहा है। ‘समता’ के आलोचक यह कह सकते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। और उनका यह तर्क वजन भी रखता है। लेकिन तथ्य होते हुए भी यह विशेष महत्त्व नहीं रखता। क्योंकि शाब्दिक अर्थ में ‘समता’ असंभव होते हुए भी यह नियामक सिद्धांत है। मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निर्भर रहती है। (1) शारीरिक वंश परंपरा, (2) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना, शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि, सभी उपलब्धियाँ जिनके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्टता प्राप्त करता है, और अंत में (3) मनुष्य के अपने प्रयत्न। इन तीनों दृष्टियों से निस्संदेह मनुष्य समान नहीं होते। तो क्या इन विशेषताओं के कारण, समाज को भी उनके साथ असमान व्यवहार करना चाहिए? समता विरोध करने वालों के पास इसका क्या जवाब है? श्रम विभाजन और जाति-प्रथा व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण से, असमान प्रयत्न के कारण, असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का पूरा प्रोत्साहन देना सर्वथा उचित है। परंतु यदि मनुष्य प्रथम दो बातों में असमान है, तो क्या इस आधार पर उनके साथ भिन्न व्यवहार उचित हैं? उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वे लोग निश्चय ही बाज़ी मार ले जाएँगे, जिन्हें उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है। इस प्रकार पूर्ण सुविधा संपन्नों को ही ‘उत्तम व्यवहार’ का हकदार माना जाना वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा। अतः न्याय का तकाज़ा यह है कि जहाँ हम तीसरे (प्रयासों की असमानता, जो मनुष्यों के अपने वश की बात है) आधार पर मनुष्यों के साथ असमान व्यवहार को उचित ठहराते हैं, वहाँ प्रथम दो आधारों (जो मनुष्य के अपने वश की बातें नहीं हैं) पर उनके साथ असमान व्यवहार नितांत अनुचित है। और हमें ऐसे व्यक्तियों के साथ यथासंभव समान व्यवहार करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, समाज की यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तो संभव है, जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाए। ‘समता’ का औचित्य यहीं पर समाप्त नहीं होता। इसका और भी आधार उपलब्ध है। एक राजनीतिज्ञ पुरुष का बहुत बड़ी जनसंख्या से पाला पड़ता है। अपनी जनता से व्यवहार करते समय, राजनीतिज्ञ के पास न तो इतना समय होता है न प्रत्येक के विषय में इतनी जानकारी ही होती है, जिससे वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं तथा क्षमताओं के आधार पर वांछित व्यवहार अलग-अलग कर सके। वैसे भी आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार पर भिन्न व्यवहार कितना भी आवश्यक तथा औचित्यपूर्ण क्यों न हो, ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। ऐसी स्थिति में, राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार में एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता रहती है और यह व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है, कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए। राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते, बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता। इस प्रकार ‘समता’ यद्यपि काल्पनिक जगत की वस्तु है, फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए, उसके लिए यही मार्ग भी रहता है, क्योंकि यही व्यावहारिक भी है और यही उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है।
