• हिंदी साहित्य का आधुनिक काल (सन् 1843 से अब तक) बहुत ही विस्तृत और विविधताओं से भरा है। इसे ‘गद्य काल’ भी कहा जाता है क्योंकि इसी युग में खड़ी बोली हिंदी का विकास हुआ।
  • 1. भारतेंदु युग (पुनर्जागरण काल: 1850 – 1900)
    • यह काल आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है।
    • भारतेंदु हरिश्चंद्र (युग प्रवर्तक)
    • बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
    • प्रतापनारायण मिश्र
    • जगमोहन सिंह
    • अंबिकादत्त व्यास
    • राधाचरण गोस्वामी

  • 2. द्विवेदी युग (जागरण-सुधार काल: 1900 – 1920)
    • इस युग ने हिंदी भाषा के परिष्कृत और व्याकरण सम्मत रूप को स्थापित किया।
    • महावीर प्रसाद द्विवेदी
    • अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
    • मैथिलीशरण गुप्त (राष्ट्रकवि)
    • रामचरित उपाध्याय
    • गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’
    • श्रीधर पाठक (स्वच्छंदतावाद के प्रवर्तक)

  • 3. छायावाद युग (1920 – 1936)
    • यह युग कल्पना, प्रकृति और व्यक्तिवाद की प्रधानता के लिए जाना जाता है। इसके चार प्रमुख ‘स्तंभ’ हैं:
    • जयशंकर प्रसाद
    • सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
    • सुमित्रानंदन पंत
    • महादेवी वर्मा
    • डॉ. रामकुमार वर्मा
    • माखनलाल चतुर्वेदी (एक भारतीय आत्मा)

  • 4. प्रगतिवाद युग (1936 – 1943)
    • यह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित युग है, जो शोषितों और किसानों की बात करता है।
    • नागार्जुन (बाबा)
    • केदारनाथ अग्रवाल
    • शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
    • त्रिलोचन शास्त्री
    • रांगेय राघव

  • 5. प्रयोगवाद और नई कविता (1943 से अब तक)
    • यहाँ से ‘तार सप्तक’ की शुरुआत हुई और नए प्रतीकों का प्रयोग बढ़ा।
    • अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)
    • गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’
    • धर्मवीर भारती
    • गिरिजाकुमार माथुर
    • भवानी प्रसाद मिश्र
    • सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
    • कुँवर नारायण
    • दुष्यंत कुमार (प्रसिद्ध गज़लकार)

  • आधुनिक काल की  लेखक:
    • रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (ओज और विद्रोह के कवि)
    • हरिवंश राय बच्चन (हालावाद के प्रवर्तक)
    • सुभद्रा कुमारी चौहान (वीर रस की कवयित्री)

भारतेंदु हरिश्चंद्र
  • भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) को आधुनिक हिंदी साहित्य का ‘जनक’ माना जाता है।
  • उन्होंने न केवल हिंदी कविता को नई दिशा दी, बल्कि गद्य (Prose) की विभिन्न विधाओं जैसे नाटक, निबंध और पत्रकारिता की नींव भी रखी।
  • प्रमुख काव्य कृतियाँ (Poetry) : भारतेंदु जी की कविताओं में भक्ति, श्रृंगार और देशभक्ति का अद्भुत संगम मिलता है:
    • प्रेम फुलवारी
    • प्रेम प्रलाप
    • प्रेम माधुरी
    • भक्त सर्वस्व
    • होली
    • मधु मुकुल
    • वर्षा विनोद
  • प्रमुख नाटक (Dramas)
    • उन्होंने मौलिक और अनुवादित दोनों प्रकार के नाटक लिखे, जो समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना पर आधारित थे:
    • भारत दुर्दशा: (देश की तत्कालीन स्थिति का चित्रण)
    • अंधेर नगरी: (भ्रष्ट शासन पर तीखा व्यंग्य)
    • सत्य हरिश्चंद्र
    • वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति: (सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार)
    • मुद्राराक्षस: (अनुवादित)
    • कपूर मंजरी
  • पत्रकारिता (Journalism)
    • उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए पत्रिकाओं का संपादन किया:
    • कविवचन सुधा (1868): साहित्यिक पत्रिका।
    • हरिश्चंद्र मैग्जीन (1873): जिसका नाम बाद में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ हो गया।
    • बाला बोधिनी (1874): विशेष रूप से महिलाओं के लिए।
  • भारतेंदु जी की कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ
    • “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
    • बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।”
    • इसका अर्थ है कि अपनी मातृभाषा की उन्नति ही सभी उन्नतियों का आधार है; बिना अपनी भाषा के ज्ञान के हृदय की पीड़ा दूर नहीं हो सकती।
  • विशेष योगदान
    • खड़ी बोली का विकास: उन्होंने गद्य के लिए खड़ी बोली को अपनाया, जबकि कविता के लिए उस समय ब्रजभाषा ही प्रचलित थी।
    • राष्ट्रीय चेतना: उन्होंने साहित्य के माध्यम से भारतीयों में स्वदेशी की भावना और अंग्रेजों के शोषण के प्रति जागरूकता पैदा की।
    • भारतेंदु मंडल: उन्होंने अपने समय के लेखकों का एक समूह तैयार किया (जैसे प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट), जिसे ‘भारतेंदु मंडल’ कहा जाता है।

 प्रेमचंद |प्रेमचन्द
  • मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) को हिंदी साहित्य का ‘उपन्यास सम्राट’ और ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। उन्होंने साहित्य को महलों और राजा-रानियों की कहानियों से निकालकर गाँव की चौपालों, किसानों के फटे हाल और आम आदमी के संघर्षों से जोड़ा।
  • उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।
    • जन्म तिथि: 31 जुलाई 1880 , लमही गाँव, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भारत
    • निधन : 8 अक्टूबर 1936 , वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
    • आयु: 56 वर्ष
  • उन्होंने शुरुआत में ‘नवाब राय‘ के नाम से उर्दू में लिखा, लेकिन बाद में ‘प्रेमचंद‘ नाम अपना लिया।
  • प्रमुख उपन्यास (Famous Novels)
    • गोदान (1936): इसे कृषक जीवन का ‘महाकाव्य’ कहा जाता है। होरी और धनिया की कहानी भारतीय किसान के शोषण और त्रासदी को दर्शाती है।
    • गबन: मध्यम वर्ग की दिखावे की प्रवृत्ति और आभूषण प्रेम पर आधारित।
    • सेवासदन: नारी जीवन की समस्याओं और वेश्यावृत्ति जैसे विषयों पर प्रहार।
    • रंगभूमि: सूरदास नामक अंधे भिखारी के माध्यम से औद्योगिकरण और मानवीय मूल्यों का संघर्ष।
    • कर्मभूमि: अछूतोद्धार और स्वाधीनता आंदोलन की पृष्ठभूमि।
    • निर्मला: दहेज प्रथा और अनमेल विवाह (बुजुर्ग पुरुष से युवा स्त्री का विवाह) की मार्मिक कहानी।
  • कहानियाँ (Famous Short Stories)
    • प्रेमचंद ने लगभग 300 कहानियाँ लिखीं, जो ‘मानसरोवर’ के 8 भागों में संकलित हैं। कुछ अमर कहानियाँ:
    • कफन: गरीबी और संवेदनहीनता का चरम चित्रण (घीसू और माधव की कहानी)।
    • ईदगाह: बाल मनोविज्ञान और त्याग की अद्भुत मिसाल (हामिद और उसका चिमटा)।
    • पूस की रात: जाड़े की रात में किसान की बेबसी।
    • नमक का दरोगा: ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की जीत।
    • दो बैलों की कथा: हीरा और मोती के माध्यम से स्वतंत्रता का मूल्य।
    • पंच परमेश्वर: न्याय और निष्पक्षता का संदेश।
    • बूढ़ी काकी: बुजुर्गों के प्रति समाज के उपेक्षापूर्ण व्यवहार पर प्रहार।
  • साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Features)
    • आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism): उन्होंने समाज की कड़वी सच्चाई को दिखाया, लेकिन अक्सर कहानी के अंत में एक नैतिक संदेश या आदर्श प्रस्तुत किया।
    • पात्र प्रधान चित्रण: उनके पात्र (जैसे होरी, हामिद, सूरदास) काल्पनिक होकर भी जीते-जागते इंसान लगते हैं।
    • आम बोलचाल की भाषा: उन्होंने संस्कृत निष्ठ हिंदी के बजाय उर्दू, फारसी और ग्रामीण शब्दों से युक्त सरल और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया।
    • सामाजिक सुधार: उनकी रचनाओं का मुख्य उद्देश्य जातिवाद, गरीबी, छुआछूत और नारी शोषण जैसी बुराइयों को मिटाना था।
  • पत्रकारिता और संपादन
    • उन्होंने ‘हंस’ पत्रिका की स्थापना की, जो प्रगतिशील साहित्य का प्रमुख स्तंभ बनी।
    • उन्होंने ‘जागरण’ और ‘मर्यादा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया।
    • रोचक तथ्य: प्रेमचंद का अंतिम उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ अधूरा रह गया था, जिसे बाद में उनके पुत्र अमृतराय ने पूरा किया।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ |सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
  • सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1899–1961) हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।
  • उन्हें हिंदी कविता में ‘मुक्त छंद’ (Free Verse) का प्रवर्तक माना जाता है।
  • निराला का जीवन संघर्षों, दुखों और विद्रोह की एक लंबी गाथा है, जो उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से झलकती है।
  • जन्म तिथि: 21 फरवरी 1899 (कुछ विद्वान वसंत पंचमी 1896 भी मानते हैं, परंतु परीक्षा की दृष्टि से 1899 प्रामाणिक माना जाता है)।
    • जन्म स्थान: महिषादल राज्य, मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल)।
    • मूल निवास: गढ़ाकोला, जिला-उन्नाव (उत्तर प्रदेश)।
  • उपनाम/उपाधि:
    • महाप्राण
    • छायावाद के महेश (शिव)
    • वसंत के अग्रदूत
    • साहित्य के क्रांतिकारी कवि
  • साहित्यिक युग: हिंदी साहित्य का छायावादी युग (छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों—प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी में से एक)।
  • पत्रिका संपादन:
    • समन्वय‘ (कोलकाता से) तथा ‘मतवाला‘ (1923, कोलकाता से)।
    • ‘मतवाला’ के मोटो वाक्य (“अमिय गरल शशि सीकर रबिकर…”) की रचना निराला जी ने ही की थी। इसके अलावा
    • इन्होंने ‘सुधा’ पत्रिका का भी संपादन किया।
  • प्रमुख काव्य कृतियाँ
    • अनामिका (1923) – (इसका द्वितीय संस्करण 1938 में आया, जिसमें ‘सरोज स्मृति’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कालजयी कविताएँ शामिल थीं)।
    • परिमल (1930) – (इसमें छायावादी और प्रगतिशील दोनों प्रकार की कविताएँ हैं; जैसे- ‘जूही की कली’, ‘बादल राग’)।
    • गीतिका (1936) – (नवगीतों एवं गेय पदों का संग्रह)।
    • तुलसीदास (1938) – (प्रबंध काव्य/खंडकाव्य, जिसे निराला जी की श्रेष्ठतम रचनाओं में गिना जाता है)।
    • कुकुरमुत्ता (1942) – (प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक एवं प्रगतिवादी काव्य)।
    • अणिमा (1943)
    • बेला (1946) – (इसमें गज़ल शैली के प्रयोग देखने को मिलते हैं)।
    • नए पत्ते (1946)
    • अर्चना (1950)
    • अराधना (1953)
    • गीत गुंज (1954)
    • सांध्य काकली (1969) – (मरणोपरांत प्रकाशित अंतिम काव्य संग्रह)।
  • प्रसिद्ध एवं चर्चित कविताएँ
    • जूही की कली (1916) – निराला जी की प्रथम कविता (इसे महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका में छापने से इनकार कर दिया था)।
    • सरोज स्मृति (1935) – अपनी पुत्री सरोज के असामयिक निधन पर लिखा गया हिंदी का प्रथम और श्रेष्ठतम ‘शोकगीत’ (Elegy)।
    • राम की शक्ति पूजा (1936) – बंगला कवि कृत्तिवास रामायण से प्रभावित उत्कृष्ट महाकाव्यात्मक कविता।
    • ध्वनि (“अभी न होगा मेरा अंत…”) – NCERT कक्षा 8 में संकलित।
    • भिक्षुक (“वह आता- दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता…”) – प्रगतिवादी चेतना की कविता।
    • बादल राग – (NCERT कक्षा 12 में संकलित, क्रांति का प्रतीक)।
    • वर दे, वीणावादिनि वर दे! – प्रसिद्ध सरस्वती वंदना।
    • वह तोड़ती पत्थर – प्रयागराज के पथ पर देखी गई मज़दूर स्त्री पर रचित यथार्थवादी कविता।
    • सम्राट एडवर्ड के प्रति
  • उपन्यास (Novels):
    • अप्सरा (1931)
    • अलका (1933)
    • प्रभावती (1936)
    • निरुपमा (1936)
    • कुल्ली भाट (1939) – (रेखाचित्र शैली का उपन्यास)
    • बिल्लेसुर बकरिहा (1945)
    • चोटी की पकड (1946)
    • काले कारनामे (1850, अपूर्ण)
  • कहानी संग्रह 
    • लिली (1934)
    • सखी (1935)
    • सुकुल की बीवी (1941)
    • चतुरी चमार (1949)
    • देवी (1948)
  • निबंध संग्रह (Essays):
    • प्रबंध पद्म (1934)
    • प्रबंध प्रतिमा (1940)
    • चाबुक (1951)
    • चयन (1957)
    • संग्रह (1963)
  • जीवनी एवं आलोचना:
    • रवींद्र कविता कानन (1929) – (आलोचना)
    • पन्त और पल्लव (1939) – (आलोचनात्मक ग्रंथ)
    • भक्त ध्रुव, भक्त प्रह्लाद, महाराणा प्रताप (जीवनी)
  • सम्मान और पुरस्कार
    • निराला जी जीवन भर आर्थिक तंगी, अवसाद और सामाजिक विरोधों से जूझते रहे। अपने स्वाभिमानी और कबीरपंथी स्वभाव के कारण उन्होंने कई अवसरों पर औपचारिक पुरस्कारों को अस्वीकार कर दिया।
    • मरणोपरांत सम्मान: भारत सरकार द्वारा 1976 में निराला जी के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया गया।
    • साहित्य जगत में उन्हें छंदों के बंधन से मुक्ति दिलाने के कारण ‘मुक्त छंद का प्रवर्तक‘ मानकर सम्मानित किया जाता है।
  • निधन : 15 अक्टूबर 1961 इलाहाबाद (अब प्रयागराज), उत्तर प्रदेश।
  • विशेष तथ्य
    • मुक्त छंद के प्रवर्तक: हिंदी कविता में ‘मुक्त छंद’ (Free Verse) का प्रयोग सबसे पहले निराला जी ने ही शुरू किया। इसे आलोचकों ने व्यंग्य में ‘केंचुआ छंद’ या ‘रबर छंद’ कहा था।
    • प्रगतिशील चेतना: छायावादी होने के साथ-साथ निराला हिंदी के प्रथम सशक्त प्रगतिवादी कवि भी माने जाते हैं।
    • रामचंद्र शुक्ल का कथन: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निराला के संबंध में लिखा है— “निराला जी में बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा है।”
    • रामविलास शर्मा का योगदान: प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने ‘निराला की साहित्य साधना’ नाम से तीन खंडों में उनकी प्रामाणिक जीवनी और आलोचना लिखी है।
  • NCERT संदर्भ:
    • कक्षा 8 (वसंत): ‘ध्वनि’
    • कक्षा 10 (क्षितिज): ‘उत्साह’ और ‘अट नहीं रही है’
    • कक्षा 12 (आरोह): ‘बादल राग’ और ‘गीत गाने दो मुझे’
  • प्रसिद्ध पंक्ति: “अभी न होगा मेरा अंत,, अभी-अभी ही तो आया है,, मेरे वन में मृदुल वसंत— अभी न होगा मेरा अंत।”


सुमित्रानंदन पंत
  • सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।
  • उन्हें ‘प्रकृति का सुकुमार कवि’ कहा जाता है क्योंकि उनकी कविताओं में प्रकृति का जितना कोमल और सजीव चित्रण मिलता है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है।
  • पंत जी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गाँव में हुआ था, जिसकी प्राकृतिक सुंदरता का उनके काव्य पर गहरा प्रभाव पड़ा।
    • 1. काव्य यात्रा के तीन प्रमुख पड़ाव
    • पंत जी का साहित्य समय के साथ बदलता रहा, जिसे मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है:
    • छायावादी युग (प्रकृति प्रेम): शुरुआत में उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य और अलौकिक प्रेम पर लिखा।
      • प्रमुख कृतियाँ: वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन।
    • प्रगतिवादी युग (मानवतावाद): मध्यम काल में वे मार्क्सवाद और समाजवाद से प्रभावित हुए और शोषित वर्ग की पीड़ा पर लिखा।
      • प्रमुख कृतियाँ: युगांत, युगवाणी, ग्राम्या।
    • अध्यात्मवादी युग (अरविंद दर्शन): अंतिम चरण में वे महर्षि अरविंद के दर्शन से प्रभावित हुए और मानवता के आध्यात्मिक उत्थान की बात की।
      • प्रमुख कृतियाँ: स्वर्ण किरण, स्वर्ण धुलि, लोकायतन।
  • 2. प्रमुख उपलब्धियाँ और पुरस्कार
    • पंत जी हिंदी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान मिले:
    • ज्ञानपीठ पुरस्कार: उनकी कृति ‘चिदंबरा’ के लिए उन्हें 1968 में हिंदी का पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
    • साहित्य अकादमी पुरस्कार: ‘कला और बूढ़ा चाँद’ के लिए।
    • पद्म भूषण: साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार द्वारा सम्मानित।
    • लोकायतन: इस महाकाव्य पर उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  • 3. काव्यगत विशेषताएँ
    • प्रकृति का मानवीकरण: उन्होंने प्रकृति को एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव चेतना के रूप में देखा।
    • कोमल शब्दावली: उनकी भाषा अत्यंत मधुर, चित्रमयी और संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है।
    • नारी गरिमा: पंत जी ने नारी को ‘देवी’ और ‘माँ’ के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • 4. प्रसिद्ध पंक्तियाँ
    • प्रकृति के प्रति उनका मोह इतना गहरा था कि उन्होंने लिखा:
    • “छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,
    • बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?”
    • इसका अर्थ है कि प्रकृति के सौंदर्य को छोड़कर मैं किसी सांसारिक सुंदरी के मोहपाश में कैसे बँध सकता हूँ?

छायावाद के चार स्तंभों में पंत का स्थान

कवि संज्ञा / पहचान
जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक (ब्रह्मा)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ओज और विद्रोह के कवि (महेश)
सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि (विष्णु)
महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा (शक्ति)

पंत जी ने न केवल कविताएँ लिखीं, बल्कि ‘रूपाभ’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया, जिसने प्रगतिशील साहित्य को बढ़ावा दिया।


बदरीनारायण चौधरी | प्रेमघन
  • बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ (1855–1922) भारतेंदु मंडल के एक अत्यंत प्रभावशाली और गौरवशाली साहित्यकार थे।
  • जन्म: 1 सितंबर 1855, दत्तपुर (मिर्जापुर), उत्तर प्रदेश।

  • उपनाम: ‘अब्र’ (उर्दू में इसी नाम से कविताएँ लिखते थे) और ‘प्रेमघन’।

  • साहित्यिक पहचान: भारतेंदु हरिश्चंद्र के घनिष्ठ मित्र और भारतेंदु युग के प्रमुख कवि व गद्यकार।

  • पत्रकारिता (संपादन):

    • आनंद कादंबिनी (1881): मिर्जापुर से निकलने वाली मासिक पत्रिका।

    • नागरी नीरद (1893): साप्ताहिक पत्र।

  • काव्य कृतियाँ (प्रमुख कविताएँ):

    • जीर्ण जनपद (ग्रामीण जीवन पर आधारित)।

    • आनंद अरुणोदय।

    • हार्दिक हर्षादर्श।

    • मयंक महिमा (खड़ी बोली में रचित)।

    • अलौकिक लीला।

    • वर्षा बिंदु।

  • नाटक:

    • भारत सौभाग्य (1888)।

    • प्रयाग रामागमन।

    • वीरांगना रहस्य।

  • उपन्यास:

    • महाश्वेता (अपूर्ण)।

  • निबंध/आलोचना:

    • इन्होंने ‘संयोगिता स्वयंवर’ नाटक की विस्तृत और सच्ची समालोचना ‘आनंद कादंबिनी’ में की थी।

  • विशेष तथ्य:

    • प्रेमघन जी की भाषा कलात्मक, अलंकृत और गद्यात्मक चमत्कार से पूर्ण थी।

    • इन्होंने दादा भाई नौरोजी को विलायत में ‘काला’ कहे जाने पर क्षोभपूर्ण कविताएँ लिखी थीं।

    • इनकी समस्त रचनाओं का संकलन ‘प्रेमघन सर्वस्व’ नाम से दो भागों में प्रकाशित है।

    • ये कलात्मक एवं लंबी शब्दावली वाले गद्य लिखने के लिए प्रसिद्ध थे (आचार्य शुक्ल ने इन्हें ‘गद्य काव्य का लेखक’ कहा है)।

प्रतापनारायण मिश्र
जगमोहन सिंह
अंबिकादत्त व्यास
राधाचरण गोस्वामी
महावीर प्रसाद द्विवेदी
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
मैथिलीशरण गुप्त
  • मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) , जिन्हें महात्मा गांधी ने ‘राष्ट्रकवि‘ की उपाधि दी थी।
  • जन्म: 3 अगस्त 1886, चिरगाँव (झाँसी), उत्तर प्रदेश।
  • उपनाम:
    • राष्ट्रकवि (गांधीजी द्वारा)
    • दद्दा‘ (साहित्यिक जगत में)
    • मधुप (उर्दू/शुरुआती रचनाओं हेतु)।
  • गुरु: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (इन्हीं के मार्गदर्शन में ‘सरस्वती’ पत्रिका में लेखन शुरू किया)।
  • साहित्यिक पहचान: द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि, खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महत्वपूर्ण कवि।
  • प्रमुख महाकाव्य:
    • साकेत (1931): राम कथा पर आधारित, जिसमें ‘उर्मिला’ के विरह का मार्मिक वर्णन है।
    • यशोधरा (1932): गौतम बुद्ध की पत्नी के त्याग पर केंद्रित (प्रसिद्ध पंक्ति: “सखि, वे मुझसे कहकर जाते”)।
  • प्रमुख खंडकाव्य:
    • भारत-भारती (1912): देशप्रेम से ओत-प्रोत रचना जिसने इन्हें राष्ट्रकवि बनाया।
    • जयद्रथ वध (1910)
    • पंचवटी (1925): लक्ष्मण और शूर्पणखा प्रसंग।
    • सिद्धराज, नहुष, अंजली और अर्घ्य।
  • प्रमुख कविताएँ: ‘मनुष्यता’, ‘मातृभूमि’, ‘मैथिलीशरण’, ‘आर्य’।
  • नाटक (अनूदित एवं मौलिक):
    • अनघ (बौद्ध दर्शन पर आधारित), तिलोत्तमा, चंद्रहास, विजया
    • स्वप्नवासवदत्ता (अनुवाद)।
  • कहानी/उपन्यास: गुप्त जी मुख्य रूप से कवि थे, उनकी पहचान कथाकार के रूप में गौण है। उन्होंने ‘पत्रावली’ जैसी कुछ गद्य रचनाएँ कीं।
  • अनुवाद कार्य: ‘मधुसूदन दत्त’ की रचनाओं का ‘मधुप’ उपनाम से बंगला से हिंदी में अनुवाद (जैसे: मेघनाद वध)।
  • विशेष उपलब्धियाँ:
    • 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित।
    • राज्यसभा के मनोनीत सदस्य (1952 से 1964 तक)।
    • ‘साकेत’ पर ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त।
  • काव्यगत विशेषता: भारतीय संस्कृति, इतिहास, नारी गरिमा (उपेक्षित पात्रों का उद्धार) और राष्ट्रीय जागरण का स्वर।
रामचरित उपाध्याय
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’
श्रीधर पाठक (स्वच्छंदतावाद के प्रवर्तक)
जयशंकर प्रसाद
महादेवी वर्मा
  • महादेवी वर्मा (1907–1987) हिंदी साहित्य के छायावादी युग की एक प्रमुख कवयित्री और गद्यकार हैं।
  • जन्म: 26 मार्च, 1907 (फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश)।
  • उपनाम:
    • ‘आधुनिक मीरा’
    • ‘वेदना की कवयित्री’
    • ‘विशाल मंदिर की वीणापाणि’
  • काव्य संग्रह (कविता):
    • नीहार (प्रथम काव्य संग्रह – 1930)
    • रश्मि (आत्मा-परमात्मा का आध्यात्मिक मिलन)
    • नीरजा
    • सांध्यगीत
    • दीपशिखा
    • सप्तपर्णा (ऋग्वेद के मंत्रों का हिंदी अनुवाद)
    • यामा (नीहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत का संकलन)।
  • रेखाचित्र एवं संस्मरण (गद्य):
    • अतीत के चलचित्र
    • स्मृति की रेखाएँ
    • पथ के साथी (समकालीन साहित्यकारों के संस्मरण)
    • मेरा परिवार (पशु-पक्षियों जैसे गिल्लू, गौरा पर आधारित संस्मरण)।
  • निबंध संग्रह:
    • श्रृंखला की कड़ियाँ (नारी विमर्श पर आधारित महत्वपूर्ण ग्रंथ)
    • क्षणदा
  • नाटक/उपन्यास: महादेवी वर्मा ने पारंपरिक रूप से कोई नाटक या उपन्यास नहीं लिखा; वे मुख्य रूप से कवयित्री और संस्मरण लेखिका थीं।
  • पत्रकारिता: उन्होंने प्रसिद्ध महिला पत्रिका ‘चाँद’ का संपादन किया।
  • प्रमुख पुरस्कार:
    •  ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982):यामा‘ के लिए (हिंदी की पहली महिला जिन्हें यह मिला)।
    • पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित।
    • सेकसरिया पुरस्कार (‘नीरजा’ के लिए)।
    • विशेष तथ्य: वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की कुलपति रहीं। उनकी कविताओं में ‘करुणा‘ और ‘रहस्यवाद‘ की प्रधानता है।
डॉ. रामकुमार वर्मा
माखनलाल चतुर्वेदी (एक भारतीय आत्मा)
नागार्जुन
  • नागार्जुन (1911–1998) 
  • जन्म: 30 जून 1911 को ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा (बिहार) में हुआ।
  • वास्तविक नाम: वैद्यनाथ मिश्र।
  • उपनाम व पहचान: ‘नागार्जुन’ (हिंदी), ‘यात्री’ (मैथिली), ‘जनता के कवि’, ‘आधुनिक कबीर’ और ‘बाबा’।
  • दर्शन व विचारधारा: प्रगतिवादी विचारधारा के कवि, बौद्ध धर्म से प्रभावित (1936 में श्रीलंका में दीक्षा ली)।
  • काव्य कृतियाँ (Kavita): युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, चंदना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बाँहों वाली।
  • प्रसिद्ध कविताएँ: अकाल और उसके बाद, बादल को घिरते देखा है, सिंदूर तिलकित भाल, शासन की बंदूक, हरिजन गाथा, कालिदास।
  • उपन्यास (Upnyas): रतिनाथ की चाची, बलचनमा (प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास), नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे, दुखमोचन, कुंभीपाक, हीरक जयंती।
  • मैथिली रचनाएँ: पत्रहीन नग्न गाछ (साहित्य अकादमी पुरस्कृत), चित्रा।
  • कहानी व अन्य: ‘आसमान में चंदा तैरे’ (कहानी संग्रह), ‘अन्नहीनम क्रियाहीनम’ (निबंध)।
  • पत्रकारिता: ‘दीपक’ (मैथिली) और ‘विश्वबंधु’ पत्रिकाओं का संपादन किया।
  • पुरस्कार: साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968), भारत भारती सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, राजेंद्र शिखर सम्मान।
  • विशेष तथ्य: वे अपनी कविताओं में तीखे व्यंग्य और लोक संस्कृति के चित्रण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मैथिली और हिंदी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से साहित्य सृजन किया।
केदारनाथ अग्रवाल
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
त्रिलोचन शास्त्री
रांगेय राघव
अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)
गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’
धर्मवीर भारती
गिरिजाकुमार माथुर
भवानी प्रसाद मिश्र
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
कुँवर नारायण
  • कुँवर नारायण जन्म : 19 सितंबर 1927
    • (फ़ैज़ाबाद / अयोध्या, उत्तर प्रदेश)
  • साहित्यिक युग / काव्यधारा: नई कविता / ‘तीसरा सप्तक’ (1959 ई. – अज्ञेय द्वारा संपादित) के प्रमुख कवि।
  • प्रमुख रचनाएँ :
    • प्रमुख काव्य रचना
      • चक्रव्यूह (1956),
      • परिवेश : हम-तुम (1961)
      • अपने सामने (1979)
      • कोई दूसरा नहीं (1993)
      • इन दिनों (2002)
      • हाशिए का गवाह (2009)
    • प्रबंध काव्य / खंडकाव्य
      • आत्मजयी (1965):
        • कठोपनिषद के ‘नचिकेता’ प्रसंग पर आधारित अत्यंत प्रसिद्ध विचार-प्रधान प्रबंध काव्य।
      • वाजश्रवा के बहाने (2008): ‘आत्मजयी’ का ही अगला वैचारिक विस्तार (नचिकेता के पिता वाजश्रवा के दृष्टिकोण से)।
    • गद्य एवं कहानी रचना
      • कहानी संग्रह: आकारों के आसपास (1973)
      • समीक्षा / विचार-प्रबंध: आज और आज से पहले (1998)
      • साक्षात्कार संग्रह: मेरे साक्षात्कार (1999)
  • प्रमुख पुरस्कार :
    • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1995): काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं‘ के लिए।
    • व्यास सम्मान (1995): ‘आत्मजयी‘ के लिए।
    • कबीर सम्मान (1997)
    • ज्ञानपीठ पुरस्कार (2005): हिंदी साहित्य में उनके संपूर्ण योगदान के लिए (यह भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है)।
    • पद्म भूषण (2009): भारत सरकार द्वारा नागरिक सम्मान।
    • अन्य सम्मान:
      • शलाका सम्मान
      • लोहिया सम्मान
      • प्रेमचंद पुरस्कार
      • कुमारन आशान पुरस्कार
  • निधन – 15 नवंबर 2017 (नई दिल्ली)।
दुष्यंत कुमार
  • दुष्यंत कुमार (1933–1975) हिंदी गजल के प्रवर्तक और एक क्रांतिकारी कवि थे। 
  • पूरा नाम: दुष्यंत कुमार त्यागी
  • जन्म: 1 सितंबर 1933, ग्राम-नवादा, बिजनौर (उत्तर प्रदेश)।
  • उपनाम: उन्हें ‘हिंदी गजल का सम्राट’ और ‘परंपरा भंजक’ कवि कहा जाता है।
  • प्रसिद्ध गजल संग्रह: साये में धूप (सबसे महत्वपूर्ण कृति, जिसने हिंदी गजल को नई पहचान दी)।
  • काव्य संग्रह: सूर्य का स्वागत, आवाजों के घेरे, जलते हुए वन का वसंत।
  • गीति-नाट्य: एक कंठ विषपायी (शिव-सती प्रसंग पर आधारित कालजयी रचना)।
  • नाटक: मसीहा मर गया।
  • उपन्यास: छोटे-छोटे सवाल, आंगन में एक वृक्ष, दोहरी जिंदगी।
  • कहानी संग्रह: मन के कोण।
  • पत्रकारिता: ‘कल्पना’ पत्रिका और ‘आकाशवाणी’ (भोपाल) से जुड़े रहे।
  • साहित्यिक विशेषता: उन्होंने गजल को दरबारी विलासिता से निकालकर आम आदमी की समस्याओं और राजनीतिक विद्रोह का माध्यम बनाया।
  • प्रसिद्ध पंक्तियाँ:
    • “हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
    • “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
    • “कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।”
  • निधन: 30 दिसंबर 1975 (मात्र 42 वर्ष की आयु में)।
रामधारी सिंह | दिनकर
  • रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (1908–1974)
  • जन्म: 23 सितंबर 1908, सिमरिया (बेगूसराय, बिहार)।
  • उपनाम:
    • राष्ट्रकवि
    • ‘अधैर्य का कवि’
    • ‘समय सूर्य’
    • ‘ओज और विद्रोह के कवि’।
  • प्रमुख काव्य (Kavita):
    • रेणुका (1935): प्रथम काव्य संग्रह।
    • हुंकार: ओजपूर्ण कविताएँ।
    • कुरुक्षेत्र (1946): आधुनिक युग का ‘गीता’ (युद्ध और शांति पर आधारित)।
    • रश्मिरथी (1952): कर्ण के जीवन पर आधारित खंडकाव्य।
    • उर्वशी (1961): कामध्यात्म पर आधारित काव्य-नाटक (ज्ञानपीठ पुरस्कृत)।
    • परशुराम की प्रतीक्षा: चीनी आक्रमण (1962) की पृष्ठभूमि पर।
    • अन्य: रसवंती, द्वंद्वगीत, सामेधनी, नील कुसुम, कोयला और कवित्व।
  • गद्य रचनाएँ (Gady/Prose):
    • संस्कृति के चार अध्याय: भारतीय इतिहास और संस्कृति का विश्लेषण (साहित्य अकादमी पुरस्कृत)।
    • मिट्टी की ओर: निबंध संग्रह।
    • अर्धनारीश्वर: प्रमुख निबंध।
    • रेती के फूल: वैचारिक निबंध।
  • उपन्यास/कहानी/नाटक: दिनकर मुख्य रूप से कवि और निबंधकार थे; उन्होंने स्वतंत्र उपन्यास या कहानी संग्रह नहीं लिखे, परंतु ‘उर्वशी’ को काव्य-नाटक की श्रेणी में रखा जाता है।
  • पत्रकारिता: ‘साप्ताहिक हुंकार’ का संपादन किया; वे राज्यसभा सदस्य और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।
  • प्रमुख सम्मान:
    • ज्ञानपीठ पुरस्कार (1972): ‘उर्वशी’ के लिए।
    • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1959): ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए।
    • पद्म भूषण (1959): भारत सरकार द्वारा सम्मानित।
  • काव्य विशेषता: इनकी कविताओं में ‘वीर रस’ और ‘श्रृंगार रस’ का अनूठा समन्वय है। इन्होंने प्रगतिवाद और छायावाद के बीच एक सेतु का कार्य किया।
  • प्रसिद्ध पंक्ति: “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” (जनतंत्र का जन्म)।
हरिवंश राय बच्चन
  • हरिवंश राय बच्चन (1907–2003) हिंदी साहित्य के ‘हालावाद’ के प्रवर्तक और एक प्रख्यात कवि थे।
  • जन्म: 27 नवंबर, 1907 को बाबूपट्टी (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश में।
  • उपनाम:
    • ‘बच्चन’ (बचपन का नाम जो बाद में प्रसिद्ध हुआ)
    • ‘हालावाद के प्रवर्तक’।
  • भाषा: सरल और शुद्ध खड़ी बोली (आम बोलचाल के करीब)।
  • प्रमुख कविता संग्रह (हालावाद):
    • मधुशाला (1935)
    • मधुबाला (1936)
    • मधुकलश (1937)।
  • अन्य काव्य रचनाएँ: निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर, सतरंगिनी, मिलन यामिनी, प्रणय पत्रिका, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा।
  • प्रसिद्ध कविताएँ: ‘अग्निपथ’, ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ (अक्सर उन्हें श्रेय दिया जाता है), ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’, ‘जो बीत गई सो बात गई’।
  • आत्मकथा (चार खंड): क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
  • अनुवाद (Transcreation): खैयाम की मधुशाला (उमर खैयाम की रूबाइयों का अनुवाद), हैमलेट, मैकबेथ (शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद)।
  • डायरी: प्रवासी की डायरी।
  • संपादन/पत्रकारिता: ‘नीड़’ पत्रिका का संपादन किया; इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक और आकाशवाणी से भी जुड़े रहे।
  • पुरस्कार: साहित्य अकादमी पुरस्कार (‘दो चट्टानें’ के लिए), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, सरस्वती सम्मान (आत्मकथा के लिए), और पद्म भूषण (1976)।
  • विशेष तथ्य: वे प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता थे और विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में भी सेवा दी।
सुभद्रा कुमारी चौहान
  • जन्म: 16 अगस्त, 1904 (निहालपुर, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश)।
  • मृत्यु: 15 फरवरी, 1948 (एक कार दुर्घटना में)।
  • उपनाम/पहचान:
    • राष्ट्रीय चेतना की कवयित्री
    • ‘वीर रस’ की एकमात्र प्रमुख कवयित्री।
  • राजनैतिक सक्रियता: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (असहयोग आंदोलन) में जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही
  • काव्य संग्रह (Poetry):
    • मुकुल (प्रथम काव्य संग्रह, 1930)।
    • त्रिधारा (इसमें उनकी प्रसिद्ध कविताएँ संकलित हैं)।
  • प्रसिद्ध कविताएँ (Famous Poems):
    • झाँसी की रानी (हिंदी की सबसे प्रसिद्ध वीर रस की कविता)।
    • वीरों का कैसा हो वसंत
    • जलियाँवाला बाग में वसंत
    • यह कदम्ब का पेड़
    • बालिका का परिचय
  • कहानी संग्रह (Story Collections):
    • बिखरे मोती (प्रथम कहानी संग्रह, 1932)।
    • उन्मादिनी (1934)।
    • सीधे-सादे चित्र (1947)।
  • लेखन शैली: सरल, स्पष्ट और ओजपूर्ण खड़ी बोली; घरेलू जीवन और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संगम।
  • पुरस्कार: ‘मुकुल’ और ‘बिखरे मोती’ के लिए प्रतिष्ठित ‘सेकसरिया पुरस्कार’ से सम्मानित।
  • विशेष तथ्य: उन्होंने कोई उपन्यास या नाटक नहीं लिखा; उनका मुख्य योगदान कविता और कहानियों में ही रहा।
  • पारिवारिक संदर्भ: प्रसिद्ध साहित्यकार लक्ष्मण सिंह चौहान इनके पति थे और अमृत राय (प्रेमचंद के पुत्र) इनके दामाद थे।
  • जीवनी: उनकी पुत्री सुधा चौहान ने उनकी जीवनी ‘मिला तेज से तेज’ नाम से लिखी।
हिंदी साहित्य – आधुनिक काल