• यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर ‘प्रदेश) में हुआ।
  • उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए. किया।
  • वे आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्द्धवार्षिक सहित पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। सन् 1999 में साहित्य और कलाओं के संवर्द्धन और अनुशीलन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन भी कर रहे हैं। 
  • यतींद्र मिश्र के तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं- यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप। इसके अलावा शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक गिरिजा लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि द्विजदेव की ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन किया। कुँवर नारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों के अलावा स्पिक मैके के लिए विरासत-2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित थाती का संपादन भी किया। युवा रचनाकार यतींद्र मिश्र को भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान आदि कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं के साथ-साथ समाज और संस्कृति के विविध क्षेत्रों में भी उनकी गहरी रुचि है। 
  • नौबतखाने में इबादत प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर रोचक शैली में लिखा गया व्यक्ति – चित्र है । यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ का परिचय तो दिया ही है, साथ ही उनकी रुचियों, उनके अंतर्मन की बुनावट, संगीत की साधना और लगन को संवेदनशील भाषा में व्यक्त किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि संगीत एक आराधना है। इसका विधि-विधान है। इसका शास्त्र है, इस शास्त्र से परिचय आवश्यक है, सिर्फ़ परिचय ही नहीं उसका अभ्यास ज़रूरी है और अभ्यास के लिए गुरु-शिष्य परंपरा ज़रूरी है, पूर्ण तन्मयता ज़रूरी है, धैर्य ज़रूरी है, मंथन ज़रूरी है। वह लगन और धैर्य बिस्मिल्ला खाँ में रहा है। तभी 80 वर्ष की उम्र में भी उनकी साधना चलती रही है। यतींद्र मिश्र संगीत की शास्त्रीय परंपरा के गहरे जानकार हैं, इस पाठ में इसकी कई अनुगूँजें हैं जो पाठ को बार-बार पढ़ने के लिए आमंत्रित करती हैं। भाषा सहज, प्रवाहमयी तथा प्रसंगों और संदर्भों से भरी हुई है। 

 ‘नौबतखाने में इबादत’ (नामक इस आलेख/संस्मरण) का सारांश

  • यह आलेख महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन) के जीवन, संगीत-साधना, काशी से प्रेम, और उनकी कला-यात्रा का मार्मिक एवं सजीव चित्रण है। लेखिका उनके बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के संघर्ष, रियाज़, आस्था और विनम्रता को रेखांकित करती है।
  • कहानी 1916-22 के आसपास की काशी में शुरू होती है – बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर नौबतखाना है, जहाँ अलीबख्श और सादिक हुसैन (बिस्मिल्ला खाँ के मामा/उस्ताद) शहनाई बजाते हैं। छः वर्षीय अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) अपने बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ इसी मंदिर में रियाज़ के लिए आता है। उसे रसूलनबाई और बतूलनबाई के गायन के माध्यम से संगीत-प्रेरणा मिलती है। उसका जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ, जो शहनाई की रीड (नरकट) के लिए प्रसिद्ध है – यहीं से शहनाई और डुमराँव का अटूट संबंध है।
  • लेखिका शहनाई के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी प्रकाश डालती है – यह एक ‘सुषिर-वाद्य’ है, जिसे अरब देश में ‘शाहेनय’ (शहनाई) कहा गया है। तानसेन के समय (16वीं शताब्दी) में भी इसका उल्लेख मिलता है। यह मांगलिक वाद्य है – शादी-विवाह, प्रभाती, मंदिर-मस्जिदों में मंगलध्वनि के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • बिस्मिल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर की तलाश में हैं। वे कहते हैं – ‘मेरे मालिक एक सुर बख्श दे, सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह आँसू निकल आएँ।’ वे अपनी हर नमाज़ और सज़दे में यही प्रार्थना करते हैं। वे मानते हैं कि सुर ईश्वरीय उपहार है, जो कभी उन्हें मिलेगा।
  • बिस्मिल्ला खाँ मुहर्रम के प्रति अत्यंत श्रद्धालु हैं – इस दस दिनों के शोक-काल में वे न तो शहनाई बजाते हैं और न ही किसी संगीत-कार्यक्रम में जाते हैं। आठवीं तारीख को वे दालमंडी में 8 किलोमीटर पैदल रोते-रोते नौहा (शोक-गीत) बजाते हैं। उस दिन कोई राग नहीं बजता, केवल अज़ादारी होती है।
  • लेखिका बिस्मिल्ला खाँ के बाल-सुलभ संस्मरणों को भी जीवंत करती है – बचपन में वे नाना (अलीबख्श) की शहनाई चुराकर बजाते थे, सम पर पत्थर पटककर ताल सिखाते थे, फिल्मों (सुलोचना) और कुलसुम हलवाइन की देशी घी वाली कचौड़ी के शौकीन थे। काशी में पक्का महाल से लेकर मलाई बरफ़, कजरी-चैती – सब उनकी यादों में बसे हैं।
  • काशी के प्रति खाँ साहब का प्रेम अद्वितीय है – वे कहते हैं, ‘शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर।’ काशी आनंदकानन है – यहाँ गंगा, विश्वनाथ, बालाजी, संगीत, होली-अबीर और मुहर्रम-ताजिया – सब एक-दूसरे के पूरक हैं। यह गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। काशी संगीत की पाठशाला है – जहाँ बिस्मिल्ला खाँ, कंठे महाराज, बड़े रामदास, मौजुद्दीन खाँ जैसे कलाकार रहे हैं।
  • एक शिष्या ने खाँ साहब से कहा कि भारतरत्न मिलने के बाद भी आप फटी तहमद (लुंगी) क्यों पहनते हैं? खाँ साहब ने मुस्कुराकर कहा – ‘भारतरत्न शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं।’ उनकी प्रार्थना है – ‘फटा सुर न बख्शें, लुंगिया का क्या, आज फटी है तो कल सी जाएगी।’
  • 21 अगस्त 2006 को बिस्मिल्ला खाँ ने 90 वर्ष की आयु में संगीत-जगत को विदा किया। लेखिका कहती है कि भारतरत्न, पद्मविभूषण, संगीत नाटक अकादमी – ये सब सम्मान हैं, पर उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि अस्सी बरस तक उन्होंने संगीत को संपूर्णता से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जीवित रखा।
  • मुख्य पात्र/व्यक्ति:
    • 1. अमीरुद्दीन (उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ) – कहानी के नायक, महान शहनाई वादक; बचपन में ‘अमीरुद्दीन’, बाद में ‘बिस्मिल्ला खाँ’ के नाम से विख्यात।
    • 2. शम्सुद्दीन – अमीरुद्दीन के बड़े भाई, जो नौ साल के हैं।
    • 3. सादिक हुसैन (मामूजान) – अमीरुद्दीन के मामा/उस्ताद, शहनाई वादक, बालाजी मंदिर के नौबतखाने में बजाते थे।
    • 4. अलीबख्श खाँ (मामू/नाना) – अमीरुद्दीन के दूसरे मामा/उस्ताद, जो उनके पहले गुरु भी थे; बालाजी मंदिर में प्रतिष्ठित शहनाईवाज़।
    • 5. रसूलनबाई और बतूलनबाई – गायिका बहिनें, जिन्होंने बचपन में अमीरुद्दीन को संगीत-प्रेरणा दी (ठुमरी, टप्पा, दादरा)।
    • 6. कुलसुम हलवाइन – पक्का महाल में देशी घी वाली कचौड़ी की दुकानदार; खाँ साहब को बचपन से पसंद थी।
    • 7. सुलोचना – खाँ साहब की पसंदीदा फ़िल्मी हीरोइन, जिनकी फ़िल्में वे देखने जाते थे।
    • 8. गीताबाली – (उल्लेख) – एक अन्य अभिनेत्री/गायिका, जिनका नाम याद किया जाता है।
    • 9. पैगंबरबख्श खाँ (अब्बाजान) – बिस्मिल्ला खाँ के पिता।
    • 10. मिट्ठन – बिस्मिल्ला खाँ की माँ।
    • 11. उस्ताद सलार हुसैन खाँ – बिस्मिल्ला खाँ के परदादा (परदादा), डुमराँव निवासी।
    • 12. तानसेन – (ऐतिहासिक उल्लेख) – 16वीं शताब्दी के संगीत सम्राट, जिनके समय शहनाई का उल्लेख मिलता है।
    • 13. हज़रत इमाम हुसैन – (धार्मिक उल्लेख) – जिनकी शहादत पर मुहर्रम में शोक मनाया जाता है।
    • 14. कंठे महाराज, विद्याधरी, बड़े रामदास, मौजुद्दीन खाँ – (उल्लेख) – काशी के अन्य विख्यात कलाकार/रसिक।
    • 15. खाँ साहब की शिष्या (अनाम) – जिसने भारतरत्न मिलने पर फटी लुंगी पहनने पर टिप्पणी की।
    • 16. वह फकीर (अनाम) – जिसने अमीरुद्दीन को ‘बजा, बजा’ कहकर आशीर्वाद दिया।
  • विशेष स्थान/शब्द:
    • काशी (वाराणसी) – कहानी का केंद्रीय स्थान, संगीत, संस्कृति और आस्था का केंद्र।
    • बालाजी मंदिर, पंचगंगा घाट – जहाँ नौबतखाना था और बिस्मिल्ला खाँ ने रियाज़ किया।
    • डुमराँव (बिहार) – बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान, शहनाई की रीड (नरकट) के लिए प्रसिद्ध।
    • नौबतखाना – मंदिर/मस्जिद में संगीत-स्थल, जहाँ मंगलध्वनि बजती है।
    • संकटमोचन मंदिर – काशी में हनुमान जयंती पर संगीत-समारोह का स्थल।
    • पक्का महाल – काशी का एक क्षेत्र, जो खाँ साहब की यादों से जुड़ा है।
    • शहनाई – मुख्य वाद्य, ‘सुषिर-वाद्य’, मांगलिक वाद्य।
    • रीड (नरकट) – शहनाई का मुख्य हिस्सा, जो डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाया जाता है।

 

नौबतखाने में इबादत 

सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी । पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी । ड्योढ़ी का नौबतखाना और नौबतखाने से निकलने वाली मंगलध्वनि। 

अमीरुद्दीन अभी सिर्फ़ छ: साल का है और बड़ा भाई शम्सुद्दीन नौ साल का। अमीरुद्दीन को पता नहीं है कि राग किस चिड़िया को कहते हैं। और ये लोग हैं मामूजान वगैरह जो बात-बात पर भीमपलासी और मुलतानी कहते रहते हैं। क्या वाज़िब मतलब हो सकता है इन शब्दों का, इस लिहाज से अभी उम्र नहीं है अमीरुद्दीन की, जान सके इन भारी शब्दों का वजन कितना होगा। गोया, इतना ज़रूर है कि अमीरुद्दीन व शम्सुद्दीन के मामाद्वय सादिक हुसैन तथा अलीबख्श देश के जाने-माने शहनाई वादक हैं। विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने जाते रहते हैं। रोज़नामचे में बालाजी का मंदिर सबसे ऊपर आता है। हर दिन की शुरुआत वहीं ड्योढ़ी पर होती है। मंदिर के विग्रहों को पता नहीं कितनी समझ है, जो रोज़ बदल-बदलकर मुलतानी, कल्याण, ललित और कभी भैरव रागों को सुनते रहते हैं। ये खानदानी पेशा है अलीबख्श के घर का । उनके अब्बाजान भी यहीं ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते रहते हैं। 

अमीरुद्दीन का जन्म डुमराँव, बिहार के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ है। 5-6 वर्ष डुमराँव में बिताकर वह नाना के घर, ननिहाल काशी में आ गया है। डुमराँव का इतिहास में कोई स्थान बनता हो, ऐसा नहीं लगा कभी भी । पर यह ज़रूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। रीड, नरकट (एक प्रकार की घास) से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। इतनी ही महत्ता है इस समय डुमराँव की जिसके कारण शहनाई जैसा वाद्य बजता है। फिर अमीरुद्दीन जो हम सबके प्रिय हैं, अपने उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ साहब हैं। उनका जन्म-स्थान भी डुमराँव ही है। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव निवासी थे। बिस्मिल्ला खाँ उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ और मिट्ठन के छोटे साहबजादे हैं। 

अमीरुद्दीन की उम्र अभी 14 साल है। मसलन बिस्मिल्ला खाँ की उम्र अभी 14 साल है। वही काशी है। वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्मिल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदिर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह के बोल – बनाव कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मार्फत ड्योढ़ी तक पहुँचते रहते हैं । रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्मिल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरंभिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलनबाई और बतूलनबाई ने उकेरी है। 

वैदिक इतिहास में शहनाई का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसे संगीत शास्त्रांतर्गत ‘सुषिर-वाद्यों’ में गिना जाता है। अरब देश में फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य जिसमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है, को ‘नय’ बोलते हैं। शहनाई को ‘शाहेनय’ अर्थात् ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि दी गई है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तानसेन के द्वारा रची बंदिश, जो संगीत राग कल्पद्रुम से प्राप्त होती है, में शहनाई, मुरली, वंशी, श्रृंगी एवं मुरछंग आदि का वर्णन आया है। 

अवधी पारंपरिक लोकगीतों एवं चैती में शहनाई का उल्लेख बार – बार मिलता है। मंगल का परिवेश प्रतिष्ठित करने वाला यह वाद्य इन जगहों पर मांगलिक विधि-विधानों के अवसर पर ही प्रयुक्त हुआ है। दक्षिण भारत के मंगल वाद्य ‘नागस्वरम्’ की तरह शहनाई, प्रभाती की मंगलध्वनि का संपूरक है। 

शहनाई के इसी मंगलध्वनि के नायक बिस्मिल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर माँग रहे हैं। सच्चे सुर की नेमत । अस्सी बरस की पाँचों वक्त वाली नमाज़ इसी सुर को पाने की प्रार्थना में खर्च हो जाती है। लाखों सज़दे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते हैं। वे नमाज़ के बाद सज़दे में गिड़गिड़ाते हैं – ‘ मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ ।’ उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा, फिर कहेगा, ले जा अमीरुद्दीन इसको खा ले और कर ले अपनी मुराद पूरी। 

अपने ऊहापोहों से बचने के लिए हम स्वयं किसी शरण, किसी गुफ़ा को खोजते हैं जहाँ अपनी दुश्चिताओं, दुर्बलताओं को छोड़ सकें और वहाँ से फिर अपने लिए एक नया तिलिस्म गढ़ सकें। हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी 

गमक उसी में समाई है । अस्सी बरस से बिस्मिल्ला खाँ यही सोचते आए हैं कि सातों सुरों को बरतने की तमीज़ उन्हें सलीके से अभी तक क्यों नहीं आई। 

बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई के साथ जिस एक मुस्लिम पर्व का नाम जुड़ा हुआ है, वह मुहर्रम है। मुहर्रम का महीना वह होता है जिसमें शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन एवं उनके कुछ वंशजों के प्रति अज़ादारी ( शोक मनाना) मनाते हैं। पूरे दस दिनों का शोक । वे बताते हैं कि उनके खानदान का कोई व्यक्ति मुहर्रम के दिनों में न तो शहनाई बजाता है, न ही किसी संगीत के कार्यक्रम में शिरकत ही करता है। आठवीं तारीख उनके लिए खास महत्त्व की है। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते हैं व दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते हैं। इस दिन कोई राग नहीं बजता। राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध है इस दिन । 

उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती हैं। अज़ादारी होती है । हज़ारों आँखें नम । हज़ार बरस की परंपरा पुनर्जीवित | मुहर्रम संपन्न होता है। एक बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप ऐसे अवसर पर आसानी से दिख जाता है। 

मुहर्रम के गमज़दा माहौल से अलग, कभी-कभी सुकून के क्षणों में वे अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं। वे अपने रियाज़ को कम, उन दिनों के अपने जुनून को अधिक याद करते हैं। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान व गीताबाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं। कैसे सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन रही थीं, बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट के साथ गालों पर चमक आ जाती है। खाँ साहब की अनुभवी आँखें और जल्दी ही खिस्स से हँस देने की ईश्वरीय कृपा आज भी बदस्तूर कायम है। 

इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं। वे जब उनका ज़िक्र करते हैं तब फिर उसी नैसर्गिक आनंद में आँखें चमक उठती हैं। अमीरुद्दीन तब सिर्फ़ चार साल का रहा होगा। छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनता था, रियाज़ के बाद जब अपनी जगह से उठकर चले जाएँ तब जाकर ढेरों छोटी-बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाई ढूँढ़ता और एक-एक शहनाई को फेंक कर खारिज़ करता जाता, सोचता – ‘ लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं।’ जब मामू अलीबख्श खाँ (जो उस्ताद भी थे ) शहनाई बजाते हुए सम पर आएँ, तब धड़ से एक पत्थर ज़मीन पर मारता था। सम पर आने की तमीज़ उन्हें बचपन में ही आ गई थी, मगर बच्चे को यह नहीं मालूम था कि दाद वाह करके दी जाती है, सिर हिलाकर दी जाती है, पत्थर पटक कर नहीं । और बचपन के समय फ़िल्मों बुखार के बारे में तो पूछना ही क्या? उस समय थर्ड क्लास के लिए छ: पैसे का टिकट मिलता था। अमीरुद्दीन दो पैसे मामू से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नानी से लेता था फिर घंटों लाइन में लगकर टिकट हासिल करता था। 

इधर सुलोचना की नयी फ़िल्म सिनेमाहाल में आई और उधर अमीरुद्दीन अपनी कमाई लेकर चला फ़िल्म देखने जो बालाजी मंदिर पर रोज़ शहनाई बजाने से उसे मिलती थी। एक अठन्नी मेहनताना। उस पर यह शौक ज़बरदस्त कि सुलोचना की कोई नयी फ़िल्म न छूटे और कुलसुम की देशी घी वाली दुकान। वहाँ की संगीतमय कचौड़ी । संगीतमय कचौड़ी इस तरह क्योंकि कुलसुम जब कलकलाते घी में कचौड़ी डालती थी, उस समय छन्न से उठने वाली आवाज़ में उन्हें सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे। राम जाने, कितनों ने ऐसी कचौड़ी खाई होंगी। मगर इतना तय है कि अपने खाँ साहब रियाज़ी और स्वादी दोनों रहे हैं और इस बात में कोई शक नहीं कि दादा की मीठी शहनाई उनके हाथ लग चुकी है। 

काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है। यह आयोजन पिछले कई बरसों से संकटमोचन मंदिर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है व हनुमान जयंती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायन-वादन की उत्कृष्ट सभा होती है। इसमें बिस्मिल्ला खाँ अवश्य रहते हैं। अपने मजहब के प्रति अत्यधिक समर्पित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है । वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता है और भीतर की आस्था रीड के माध्यम से बजती है। खाँ साहब की एक रीड 15 से 20 मिनट के अंदर गीली हो जाती है तब वे दूसरी रीड का इस्तेमाल कर लिया करते हैं। 

 

अक्सर कहते हैं-‘क्या करें मियाँ, ई काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ, यहाँ हमारे खानदान की कई पुश्तों ने शहनाई बजाई है, हमारे नाना तो वहीं बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्ठित शहनाईवाज़ रह चुके हैं। अब हम क्या करें, मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी । जिस ज़मीन ने हमें तालीम दी, जहाँ से अदब पाई, वो कहाँ और मिलेगी? शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर हमारे लिए । ‘ 

काशी संस्कृति की पाठशाला है। शास्त्रों में आनंदकानन के नाम से प्रतिष्ठित । काशी में कलाधर हनुमान व नृत्य – विश्वनाथ हैं। काशी में बिस्मिल्ला खाँ हैं । काशी में हज़ारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज हैं, विद्याधरी हैं, बड़े रामदास जी हैं, मौजुद्दीन खाँ हैं व इन रसिकों से उपकृत होने वाला अपार जन समूह है। यह एक अलग काशी है जिसकी अलग तहज़ीब है, अपनी बोली और अपने विशिष्ट लोग हैं। इनके अपने उत्सव हैं, अपना गम। अपना सेहरा – बन्ना और अपना नौहा । आप यहाँ संगीत को भक्ति से भक्ति को किसी भी धर्म के कलाकार से, कजरी को चैती से, विश्वनाथ को विशालाक्षी से, बिस्मिल्ला खाँ को गंगाद्वार से अलग करके नहीं देख सकते। 

अकसर समारोहों एवं उत्सवों में दुनिया कहती है ये बिस्मिल्ला खाँ हैं । बिस्मिल्ला खाँ का मतलब-बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई। शहनाई का तात्पर्य- बिस्मिल्ला खाँ का हाथ। हाथ से आशय इतना भर कि बिस्मिल्ला खाँ की फूँक और शहनाई की जादुई आवाज़ का असर हमारे सिर चढ़कर बोलने लगता है। शहनाई में सरगम भरा है। खाँ साहब को ताल मालूम है, राग मालूम है। ऐसा नहीं कि बेताले जाएँगे। शहनाई में सात सुर लेकर निकल पड़े। शहनाई में परवरदिगार, गंगा मइया, उस्ताद की नसीहत लेकर उतर पड़े। दुनिया कहती – सुबहान अल्लाह, तिस पर बिस्मिल्ला खाँ कहते हैं – अलहम्दुलिल्लाह । छोटी-छोटी उपज से मिलकर एक बड़ा आकार बनता है। शहनाई का करतब शुरू होने लगता है। बिस्मिल्ला खाँ का संसार सुरीला होना शुरू हुआ। फूँक में अजान की तासीर उतरती चली आई। देखते-देखते शहनाई डेढ़ सतक के साज से दो सतक का साज बन, साजों की कतार में सरताज हो गई। अमीरुद्दीन की शहनाई गूँज उठी। उस फकीर की दुआ लगी जिसने अमीरुद्दीन से कहा था – ” बजा, बजा । ” 

किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, “बाबा ! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी । अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं । ” खाँ साहब मुसकराए । लाड़ से भरकर बोले, “धत् ! पगली ई भारतरत्न हमको शहनाईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं । तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई । ” तब क्या खाक रियाज़ हो पाता । ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर 

 

इतना बताए देते हैं कि मालिक से यही दुआ है, “ फटा सुर न बख्शें । लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी। ” 

सन् 2000 की बात है। पक्का महाल (काशी विश्वनाथ से लगा हुआ अधिकतम इलाका) से मलाई बरफ़ बेचने वाले जा चुके हैं। खाँ साहब को इसकी कमी खलती है। अब देशी घी में वह बात कहाँ और कहाँ वह कचौड़ी – जलेबी । खाँ साहब को बड़ी शिद्दत से कमी खलती है। अब संगतियों के लिए गायकों के मन में कोई आदर नहीं रहा । खाँ साहब अफसोस जताते हैं । अब घंटों रियाज़ को कौन पूछता है? हैरान हैं बिस्मिल्ला खाँ । कहाँ वह कजली, चैती और अदब का जमाना ? 

सचमुच हैरान करती है काशी – पक्का महाल से जैसे मलाई बरफ़ गया, संगीत, साहित्य और अदब की बहुत 

एक सच्चे सुर साधक और सामाजिक की भाँति सारी परंपराएँ लुप्त हो गईं। बिस्मिल्ला खाँ साहब को इन सबकी कमी खलती है। काशी में जिस तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्मिला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, उसी तरह मुहर्रम – ताजिया और होली – अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। अभी जल्दी ही बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। अभी आगे बहुत कुछ इतिहास बन जाएगा। फिर भी कुछ बचा है जो सिर्फ़ काशी में है। काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा। 

भारतरत्न से लेकर इस देश के ढेरों विश्वविद्यालयों की मानद उपाधियों से अलंकृत व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार एवं पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नहीं, बल्कि अपनी अजेय संगीतयात्रा के लिए बिस्मिल्ला खाँ साहब भविष्य में हमेशा संगीत के नायक बने रहेंगे। नब्बे वर्ष की भरी-पूरी आयु में 21 अगस्त 2006 को संगीत रसिकों की हार्दिक सभा से विदा हुए खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा। 

7.नौबतखाने में इबादत – यतीन्द्र मिश्र