शिवपूजन सहाय 

 

  • शिवपूजन सहाय का जन्म सन् 1893 में गाँव उनवाँस, ज़िला भोजपुर (बिहार) में हुआ।
  • उनके बचपन का नाम भोलानाथ था।
  • दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने बनारस की अदालत में नकलनवीस की नौकरी की।
  • बाद में वे हिंदी के अध्यापक बन गए ।
  • असहयोग आंदोलन के प्रभाव से उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
  • उन्होंने जागरण, हिमालय, माधुरी, बालक आदि कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया।
  • इसके साथ ही वे हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका मतवाला के संपादक – मंडल में थे।
  • सन् 1963 में उनका देहांत हो गया।
  • वे मुख्यतः गद्य के लेखक थे।
    • देहाती दुनिया
    • ग्राम सुधार
    • वे दिन वे लोग
    • स्मृतिशेष
  • शिवपूजन रचनावली के चार खंडों में उनकी संपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हैं।
  • उनकी रचनाओं में लोकजीवन और लोकसंस्कृति के प्रसंग सहज ही मिल जाते हैं।

मधु कांकरिया 

  • मधु कांकरिया का जन्म सन् 1957 में कोलकाता में हुआ । उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम. ए. किया, साथ ही कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा भी।
  • उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-
    • पत्ताखोर (उपन्यास), सलाम आखिरी, खुले गगन के लाल सितारे, बीतते हुए, अंत में ईशु (कहानी-संग्रह) ।

अज्ञेय 

  • सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म सन् 1911 में उ.प्र. के देवरिया जिले के कसिया (कुशीनगर) इलाके में हुआ।
  • प्रारंभिक शिक्षा जम्मू-कश्मीर में हुई और बी. एस. सी. लाहौर से की।
  • क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण अज्ञेय को जेल भी जाना पड़ा।
  • उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-
    • भग्नदूत, चिंता, अरी ओ करुणा प्रभामय, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, आँगन के पार द्वार ( काव्य-संग्रह),
    • शेखर : एक जीवनी, नदी के द्वीप (उपन्यास), विपथगा, शरणार्थी, जयदोल (कहानी-संग्रह), त्रिशंकु, आत्मनेपद (निबंध),
    • अरे यायावर रहेगा याद ( यात्रा – वृत्तांत) ।
  • अज्ञेय द्वारा संपादित तार सप्तक सहित चार सप्तकों का समकालीन हिंदी कविता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  • साहित्य अकादेमी एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अज्ञेय को अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी पुरस्कृत किया गया।
  • सन् 1987 में उनका देहावसान हो गया।
  • बौद्धिकता की छाप अज्ञेय के संपूर्ण लेखन में मिलती है। उनके लेखन के मूल में वैयक्तिकता की पहचान की समस्या है।

‘माता का अँचल’ (शिवपूजन सहाय) नामक इस संस्मरण/कहानी का सारांश

  • यह संस्मरण बालक तारकेश्वरनाथ (उपनाम ‘भोलानाथ’) के बचपन के दिनों का अत्यंत सजीव, मार्मिक और लोक-रंग से सराबोर चित्रण है। कहानी लेखक के बचपन के उन दिनों को याद करती है जब वह अपने पिता (बाबू जी) और माता (मइयाँ) के साथ बिताता था।
  • बालक का पिता से अत्यंत गहरा लगाव था – वह पिता के साथ सोता, उनके साथ उठता, उनके साथ पूजा में बैठता, उनके साथ गंगा जाता, और उनके साथ खाना खाता था। पिता उसे ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते, उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते, झूला झुलाते, उससे कुश्ती लड़ते, और मीठा-खट्टा चुम्मा लेकर उसे खिलाते-खिलाते उसके साथ खूब खेलते। बाबू जी की दिनचर्या में पूजा-पाठ, राम-नाम लिखना, गंगा में मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाना – सब शामिल था, और बालक हर क्रिया में उनके साथ रहता।
  • माता (मइयाँ) का रूप अलग है – वे बालक को अपने हाथ से ‘भर-मुँह कौर’ खिलाती हैं, उसके सिर में कड़वा तेल लगाती हैं, काजल की बिंदी लगाती हैं, चोटी गूँथती हैं, उसे ‘कन्हैया’ बना देती हैं। बालक माता के इस ‘पकड़े जाने’ से बचने के लिए भागता है, लेकिन जब डर या दुःख होता है, तो वह सबसे अंतिम शरण माता के आँचल में ही लेता है।
  • कहानी का सबसे रंगीन हिस्सा बालक और उसके साथियों (बैजू, गणेश आदि) के खेलों का वर्णन है – वे चबूतरे पर मिठाई की दुकान लगाते, घरौंदा बनाते, बरात निकालते, खेती करते (जोत-बो-काट-पटाई सब कुछ), और तमाशे करते। इन खेलों में बाबू जी भी शामिल होते हैं – मिठाई खरीदते, ज्योनार (भोज) में बैठते, दुलहिन का मुख निहारते – और बच्चे हँसकर भाग जाते।
  • एक दिन बरखा (बारिश) के बाद बाग में बिच्छू देखकर बच्चे डर जाते हैं, और बैजू की शरारत से वे मूसन तिवारी को चिढ़ा देते हैं, जिस पर तिवारी उन्हें खदेड़ते हैं और गुरु जी (पाठशाला के शिक्षक) के पास शिकायत करते हैं। बालक को गुरु जी द्वारा दंड मिलता है, पिता दौड़कर उसे गोद में लेकर घर लाते हैं। रास्ते में साथी मिलते हैं, बालक अपना रोना भूलकर फिर से खेल में मिल जाता है।
  • अंतिम घटना में बालक चूहों के बिल से पानी उलीचते समय एक साँप निकल आता है। सब भागते हैं, बालक गिर-पड़ता है, उसके पूरे शरीर पर चोटें आ जाती हैं, पैरों में काँटे चुभ जाते हैं। वह डर से काँपता हुआ सीधा माता के आँचल में छिप जाता है। माँ रोती है, हल्दी पीसकर घावों पर लगाती है, गले लगाती है। पिता आकर उसे अपनी गोद में लेना चाहते हैं, लेकिन बालक माता के आँचल की छाया नहीं छोड़ता – यह आँचल उसके लिए ‘प्रेम और शांति का चंदोवा’ है। इस भावपूर्ण चित्र के साथ कहानी समाप्त होती है।
  • मुख्य पात्र/व्यक्ति:
    • 1. तारकेश्वरनाथ (भोलानाथ) – कहानी का बाल-नायक, लेखक स्वयं बचपन में; जिसके इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती है।
    • 2. बाबू जी (पिता) – बालक के पिता, धार्मिक, स्नेही, बच्चे के साथ खेलने-हँसने वाले, उसे ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते हैं।
    • 3. मइयाँ (माता) – बालक की माँ, वात्सल्यमूर्ति, जो उसे खिलाती-पिलाती, सँवारती और सबसे बड़ी सुरक्षा (आँचल) उसे देती है।
    • 4. बैजू – बालक का साथी/मित्र, शरारती, ‘ढीठ’ स्वभाव का, जो मूसन तिवारी को चिढ़ाता है।
    • 5. मूसन तिवारी – गाँव के बुज़ुर्ग, जिन्हें बैजू और बच्चे ‘बुढ़वा बेईमान’ कहकर चिढ़ाते हैं, और वह उन्हें खदेड़ते हैं।
    • 6. गुरु जी (पाठशाला के शिक्षक) – जिनके पास तिवारी शिकायत करते हैं और जो बालक को दंड देते हैं।
    • 7. गणेश – (उल्लेख) – बालक का एक साथी (चूहों के बिल वाले खेल में)।
    • 8. गुरु जी के ‘सिपाही’ – (उल्लेख) – बालकों को पकड़ने के लिए भेजे गए लड़के।
    • 9. बूढ़ा वर (दूल्हा) – (उल्लेख) – जिसने बच्चों को ढेलों से मारा जब उन्होंने पालकी पर ताना कसा।
    • 10. गाँव के अन्य आदमी – (उल्लेख) – जो बच्चों के खेल का तमाशा देखते हैं और हँसते हैं।
    • 11. बटोही (राहगीर) – (उल्लेख) – जो बच्चों के तमाशे देखते हैं।
    • 12. ससुर (वर के ससुर) – (व्यंग्यात्मक उल्लेख) – जिसने बूढ़े दूल्हे की खोज की।

माता का अँचल  – शिवपूजन सहाय 

जहाँ लड़कों का संग, तहाँ बाजे मृदंग’

जहाँ बुड्ढों का संग, तहाँ खरचे का तंग

  • हमारे पिता तड़के उठकर, निबट – नहाकर पूजा करने बैठ जाते थे। हम बचपन से ही उनके अंग लग गए थे। माता से केवल दूध पीने तक का नाता था। इसलिए पिता के साथ ही हम भी बाहर की बैठक में ही सोया करते। वह अपने साथ ही हमें भी उठाते और साथ ही नहला – धुलाकर पूजा पर बिठा लेते। हम भभूत का तिलक लगा देने के लिए उनको दिक करने लगते थे। कुछ हँसकर, कुछ झुंझलाकर और कुछ डाँटकर वह हमारे चौड़े लिलार में त्रिपुंड कर देते थे। हमारे लिलार में भभूत खूब खुलती थी। सिर में लंबी-लंबी जटाएँ थीं । भभूत रमाने से हम खासे ‘बम – भोला’ बन जाते थे।
  • पिता जी हमें बड़े प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारा करते। पर असल में हमारा नाम था ‘तारकेश्वरनाथ’। हम भी उनको ‘बाबू जी’ कहकर पुकारा करते और माता को ‘मइयाँ’।
  • जब बाबू जी रामायण का पाठ करते तब हम उनकी बगल में बैठे-बैठे आइने में अपना मुँह निहारा करते थे। जब वह हमारी ओर देखते तब हम कुछ लजाकर और मुसकराकर आइना नीचे रख देते थे। वह भी मुसकरा पड़ते थे ।
  • पूजा-पाठ कर चुकने के बाद वह राम-राम लिखने लगते। अपनी एक ‘रामनामा बही’ पर हज़ार राम-नाम लिखकर वह उसे पाठ करने की पोथी के साथ बाँधकर रख देते। फिर पाँच सौ बार कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर राम-नाम लिखकर आटे की गोलियों में लपेटते और उन गोलियों को लेकर गंगा जी की ओर चल पड़ते थे।
  • उस समय भी हम उनके कंधे पर विराजमान रहते थे। जब वह गंगा में एक-एक आटे की गोलियाँ फेंककर मछलियों को खिलाने लगते तब भी हम उनके कंधे पर ही बैठे-बैठे हँसा करते थे। जब वह मछलियों को चारा देकर घर की ओर लौटने लगते तब बीच रास्ते में झुके हुए पेड़ों की डालों पर हमें बिठाकर झूला झुलाते थे।
  • कभी-कभी बाबू जी हमसे कुश्ती भी लड़ते । वह शिथिल होकर हमारे बल को बढ़ावा देते और हम उनको पछाड़ देते थे। यह उतान’ पड़ जाते और हम उनकी छाती पर चढ़ जाते थे। जब हम उनकी लंबी-लंबी मूँछें उखाड़ने लगते तब वह हँसते-हँसते हमारे हाथों को मूँछों से छुड़ाकर उन्हें चूम लेते थे। फिर जब हमसे खट्टा और मीठा चुम्मा माँगते तब हम बारी-बारी कर अपना बायाँ और दाहिना गाल उनके मुँह की ओर फेर देते थे। बाएँ का खट्टा चुम्मा लेकर जब वह दाहिने का मीठा चुम्मा लेने लगते तब अपनी दाढ़ी या मूँछ हमारे कोमल गालों पर गड़ा देते थे। हम झुंझलाकर फिर उनकी मूँछें नोचने लग जाते थे। इस पर वह बनावटी रोना रोने लगते और हम अलग खड़े-खड़े खिल-खिलाकर हँसने लग जाते थे।
  • उनके साथ हँसते-हँसते जब हम घर आते तब उनके साथ ही हम भी चौके पर खाने बैठते थे। वह हमें अपने ही हाथ से, फूल के एक कटोरे में गोरस और भात सानकर खिलाते थे। जब हम खाकर अफर’ जाते तब मइयाँ थोड़ा और खिलाने के लिए हठ करती थी। वह बाबू जी से कहने लगती – आप तो चार-चार दाने के कौर बच्चे के मुँह में देते जाते हैं; इससे वह थोड़ा खाने पर भी समझ लेता है कि हम बहुत खा गए; आप खिलाने का ढंग नहीं जानते-बच्चे को भर – मुँह कौर खिलाना चाहिए।
  • जब खाएगा बड़े – बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर ।
  • – देखिए, मैं खिलाती हूँ। मरदुए क्या जाने कि बच्चों को कैसे खिलाना चाहिए, और महतारी’ के हाथ से खाने पर बच्चों का पेट भी भरता है।
  • यह कह वह थाली में दही-भात सानती और अलग-अलग तोता, मैना, कबूतर, हंस, मोर आदि के बनावटी नाम से कौर बनाकर यह कहते हुए खिलाती जाती कि जल्दी खा लो, नहीं तो उड़ जाएँगे; पर हम उन्हें इतनी जल्दी उड़ा जाते थे कि उड़ने का मौका ही नहीं मिलता था।
  • जब हम सब बनावटी चिड़ियों को चट कर जाते थे तब बाबू जी कहने लगते – अच्छा, अब तुम ‘राजा’ हो, जाओ खेलो।
  • बस, हम उठकर उछलने-कूदने लगते थे। फिर रस्सी में बँधा हुआ काठ का घोड़ा लेकर नंग-धड़ंग बाहर गली में निकल जाते थे।
  • जब कभी मइयाँ हमें अचानक पकड़ पाती तब हमारे लाख छटपटाने पर भी एक चुल्लू कड़वा तेल” हमारे सिर पर डाल ही देती थी। हम रोने लगते और बाबू जी उस पर बिगड़ खड़े होते; पर वह हमारे सिर में तेल बोथकर” हमें उबटकर ही छोड़ती थी। फिर हमारी नाभी और लिलार में काजल की बिंदी लगाकर चोटी गूँथती और उसमें फूलदार लट्टू बाँधकर रंगीन कुरता – टोपी पहना देती थी। हम खासे ‘कन्हैया’ बनकर बाबू जी की गोद में सिसकते – सिसकते बाहर आते थे।
  • बाहर आते ही हमारी बाट जोहनेवाला बालकों का एक झुंड मिल जाता था। हम उन खेल के साथियों को देखते ही, सिसकना भूलकर, बाबू जी की गोद से उतर पड़ते और अपने हमजोलियों के दल में मिलकर तमाशे करने लग जाते थे।
  • तमाशे भी ऐसे-वैसे नहीं, तरह-तरह के नाटक ! चबूतरे का एक कोना ही नाटक- घर बनता था। बाबू जी जिस छोटी चौकी पर बैठकर नहाते थे, वही रंगमंच बनती। उसी पर सरकंडे के खंभों पर कागज़ का चंदोआ 12 तानकर, मिठाइयों की दुकान लगाई जाती। उसमें चिलम के खोंचे पर कपड़े के थालों में ढेले के लड्डू, पत्तों की पूरी – कचौरियाँ, गीली मिट्टी की जलेबियाँ, फूटे घड़े के टुकड़ों के बताशे आदि मिठाइयाँ सजाई जातीं। ठीकरों के बटखरे और जस्ते के छोटे-छोटे टुकड़ों के पैसे बनते। हमीं लोग खरीदार और हमीं लोग दुकानदार। बाबू जी भी दो-चार गोरखपुरिए पैसे खरीद लेते थे।
  • थोड़ी देर में मिठाई की दुकान बढ़ाकर हम लोग घरौंदा बनाते थे। धूल की मेड़ दीवार बनती और तिनकों का छप्पर । दातून के खंभे, दियासलाई की पेटियों के किवाड़, घड़े के मुँहड़े की चूल्हा-चक्की, दीए की कड़ाही और बाबू जी की पूजा वाली आचमनी कलछी बनती थी। पानी के घी, धूल के पिसान और बालू की चीनी से हम लोग ज्योनार 13 तैयार करते थे। हमीं लोग ज्योनार करते और हमीं लोगों की ज्योनार बैठती थी। जब पंगत बैठ जाती थी तब बाबू जी भी धीरे से आकर, पाँत के अंत में, जीमने 4 के लिए बैठ जाते थे। उनको बैठते देखते ही हम लोग हँसकर और घरौंदा बिगाड़कर भाग चलते थे। वह भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते और कहने लगते- फिर कब भोज होगा भोलानाथ ?
  • कभी-कभी हम लोग बरात का भी जुलूस निकालते थे। कनस्तर का तंबूरा बजता, अमोले'” को घिसकर शहनाई बजायी जाती, टूटी चूहेदानी की पालकी बनती, हम समधी बनकर बकरे पर चढ़ लेते और चबूतरे के एक कोने से चलकर बरात दूसरे कोने में जाकर दरवाज़े लगती थी। वहाँ काठ की पटरियों से घिरे, गोबर से लिपे, आम और केले की टहनियों से सजाए हुए छोटे आँगन में कुल्हिए का कलसा रखा रहता था। वहीं पहुँचकर बरात फिर लौट आती थी। लौटने के समय, खटोली पर लाल ओहार” डालकर, उसमें दुलहिन को चढ़ा लिया जाता था। लौट आने पर बाबू जी ज्यों ही ओहार उघारकर दुलहिन का मुख निरखने लगते, त्यों ही हम लोग हँसकर भाग जाते।
  • थोड़ी देर बाद फिर लड़कों की मंडली जुट जाती थी । इकट्ठा होते ही राय जमती कि खेती की जाए। बस, चबूतरे के छोर पर घिरनी गड़ जाती और उसके नीचे की गली कुआँ बन जाती थी। मूँज की बटी हुई पतली रस्सी में एक चुक्कड़ बाँध गराड़ी पर चढ़ाकर लटका दिया जाता और दो लड़के बैल बनकर ‘मोट’ खींचने लग जाते। चबूतरा खेत बनता, कंकड़ बीज और ठेंगा हल – जुआठा। बड़ी मेहनत से खेत जोते – बोए और पटाए जाते। फसल तैयार होते देर न लगती और हम हाथोंहाथ फसल काट लेते थे। काटते समय गाते थे-
  • ऊँच नीच में बई कियारी, जो उपजी सो भई हमारी ।
  • फसल को एक जगह रखकर उसे पैरों से रौंद डालते थे। कसोरे” का सूप बनाकर ओसाते और मिट्टी की दीए के तराजू पर तौलकर राशि तैयार कर देते थे। इसी बीच बाबू जी आकर पूछ बैठते थे- इस साल की खेती कैसी रही भोलानाथ ?
  • बस, फिर क्या, हम लोग ज्यों-का-त्यों खेत-खलिहान छोड़कर हँसते हुए भाग जाते थे। कैसी मौज की खेती थी।
  • ऐसे-ऐसे नाटक हम लोग बराबर खेला करते थे। बटोही भी कुछ देर ठिठककर हम लोगों के तमाशे देख लेते थे।
  • जब कभी हम लोग ददरी के मेले में जाने वाले आदमियों का झुंड देख पाते तब कूद-कूदकर चिल्लाने लगते थे- चलो भाइयो ददरी, सतू पिसान की मोटरी |
  • अगर किसी दूल्हे के आगे-आगे जाती हुई ओहारदार पालकी देख पाते, तब खूब ज़ोर से चिल्लाने लगते थे- रहरी ” में रहरी पुरान रहरी, डोला के कनिया हमार मेहरी ।
  • इसी पर एक बार बूढ़े वर ने हम लोगों को बड़ी दूर तक खदेड़कर ढेलों से मारा था। उस खसूट – खब्बीस की सूरत आज तक हमें याद है। न जाने किस ससुर ने वैसा जमाई ढूँढ़ निकाला था। वैसा घोड़ मुँहा आदमी हमने कभी नहीं देखा ।
  • आम की फसल में कभी-कभी खूब आँधी आती है । आँधी के कुछ दूर निकल जाने पर हम लोग बाग की ओर दौड़ पड़ते थे। वहाँ चुन-चुनकर घुले – घुले ‘गोपी’ आम चाबते थे।
  • एक दिन की बात है, आँधी आई और पट पड़ गयी । आकाश काले बादलों से ढक गया। मेघ गरजने लगे। बिजली कौंधने और ठंडी हवा सनसनाने लगी। पेड़ झूमने और ज़मीन चूमने लगे। हम लोग चिल्ला उठे- एक पइसा की लाई, बाज़ार में छितराई, बरखा उधरे बिलाई ।
  • लेकिन बरखा न रुकी; और भी मूसलाधार पानी होने लगा । हम लोग पेड़ों की जड़ से सट गए, जैसे कुत्ते के कान में अँठई” चिपक जाती है। मगर बरखा जमी नहीं, थम गई।
  • बरखा बंद होते ही बाग में बहुत-से बिच्छू नज़र आए। हम लोग डरकर भाग चले । हम लोगों में बैजू बड़ा ढीठ था। संयोग की बात, बीच में मूसन तिवारी मिल गए। बेचारे बूढ़े आदमी को सूझता कम था। बैजू उनको चिढ़ाकर बोला- बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा ।
  • हम लोगों ने भी, बैजू के सुर में सुर मिलाकर यही चिल्लाना शुरू किया। मूसन तिवारी ने बेतहाशा खदेड़ा। हम लोग तो बस अपने-अपने घर की ओर आँधी हो चले।
  • जब हम लोग न मिल सके तब तिवारी जी सीधे पाठशाला में चले गए। वहाँ से हमको और बैजू को पकड़ लाने के लिए चार लड़के ‘गिरफ्तारी वारंट’ लेकर छूटे। इधर ज्यों ही हम लोग घर पहुँचे, त्यों ही गुरु जी के सिपाही हम लोगों पर टूट पड़े। बैजू तो नौ-दो ग्यारह हो गया; हम पकड़े गए। फिर तो गुरु जी ने हमारी खूब खबर ली ।
  • बाबू जी ने यह हाल सुना। वह दौड़े हुए पाठशाला में आए। गोद में उठाकर हमें पुचकारने और फुसलाने लगे। पर हम दुलारने से चुप होनेवाले लड़के नहीं थे। रोते-रोते उनका कंधा आँसुओं से तर कर दिया। वह गुरु जी की चिरौरी करके हमें घर ले चले। रास्ते में फिर हमारे साथी लड़कों का झुंड मिला। वे ज़ोर से नाचते और गाते थे- माई पकाई गरर गरर पूआ, हम खाइब पूआ, ना खेलब जुआ ।
  • फिर क्या था, हमारा रोना-धोना भूल गया। हम हठ करके बाबू जी की गोद से उतर पड़े और लड़कों की मंडली में मिलकर लगे वही तान – सुर अलापने । तब तक सब लड़के सामनेवाले मकई के खेत में दौड़ पड़े। उसमें चिड़ियों का झुंड चर रहा था। वे दौड़-दौड़कर उन्हें पकड़ने लगे, पर एक भी हाथ न आई। हम खेत से अलग ही खड़े होकर गा रहे थे- राम जी की चिरई, राम जी का खेत, खा लो चिरई, भर-भर पेट |
  • हमसे कुछ दूर बाबू जी और हमारे गाँव के कई आदमी खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और यही कहकर हँसते थे कि ‘चिड़िया की जान जाए, लड़कों का खिलौना’। सचमुच ‘लड़के और बंदर पराई पीर नहीं समझते। ‘
  • एक टीले पर जाकर हम लोग चूहों के बिल से पानी उलीचने लगे।
  • नीचे से ऊपर पानी फेंकना था । हम सब थक गए। तब तक गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिव जी का साँप निकल आया। रोते-चिल्लाते हम लोग बेतहाशा भाग चले! कोई औंधा गिरा, कोई अंटाचिट । किसी का सिर फूटा, किसी के दाँत टूटे। सभी गिरते-पड़ते भागे। हमारी सारी देह लहूलुहान हो गई। पैरों के तलवे काँटों से छलनी हो गए।
  • हम एक सुर से दौड़े हुए आए और घर में घुस गए। उस समय बाबू जी बैठक के ओसारे2″ में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उन्होंने हमें बहुत पुकारा पर उनकी अनसुनी करके हम दौड़ते हुए मइयाँ के पास ही चले गए । जाकर उसी की गोद में शरण ली।
  • ‘मइयाँ’ चावल अमनिया  कर रही थी । हम उसी के आँचल में छिप गए। हमें डर से काँपते देखकर वह ज़ोर से रो पड़ी और सब काम छोड़ बैठी। अधीर होकर हमारे भय का कारण पूछने लगी। कभी हमें अंग भरकर दबाती और कभी हमारे अंगों को अपने आँचल से पोंछकर हमें चूम लेती। बड़े संकट में पड़ गई।
  • झटपट हल्दी पीसकर हमारे घावों पर थोपी गई । घर में कुहराम मच गया। हम केवल धीमे सुर से “साँ…स… साँ” कहते हुए मइयाँ के आँचल में लुके चले जाते थे। सारा शरीर थर-थर काँप रहा था। रोंगटे खड़े हो गए थे । हम आँखें खोलना चाहते थे; पर वे खुलती न थीं। हमारे काँपते हुए ओंठों को मइयाँ बार-बार निहारकर रोती और बड़े लाड़ से हमें गले लगा लेती थी।
  • इसी समय बाबू जी दौड़े आए। आकर झट हमें मइयाँ की गोद से अपनी गोद में लेने लगे। पर हमने मइयाँ के आँचल की – प्रेम और शांति के चंदोवे की – छाया न छोड़ी…।

1..माता का आँचल – शिवपूजन सहाय