‘जॉर्ज पंचम की नाक’ (कमलेश्वर) नामक इस व्यंग्य-कहानी का सारांश
- यह एक तीखी व्यंग्य-कहानी है, जो रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के भारत दौरे (1950 के दशक) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। रानी के आगमन पर पूरी दिल्ली उत्साहित है – सड़कें साफ़ हो रही हैं, इमारतें सज रही हैं, अखबारों में रानी के सूट, नौकरों, कुत्तों तक की खबरें छप रही हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या है – जॉर्ज पंचम (ब्रिटिश राजा) की प्रतिमा की नाक गायब है!
- कहानी पीछे जाती है – स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान जॉर्ज पंचम की नाक के लिए आंदोलन हुए थे, बहसें हुईं कि नाक रहे या हटे। कई जगहों पर तो लाटों की नाकें उतारकर अजायबघरों में रख दी गईं। एक बार इंडिया गेट के सामने वाली लाट की नाक भी गायब हो गई – हथियारबंद पहरेदार तैनात थे, फिर भी नाक चली गई।
- अब रानी आने वाली है और नाक नहीं है – यह ‘हमारी नाक कटने’ के समान है। उच्च-स्तरीय कमेटी बैठती है। एक मूर्तिकार (जो ‘पैसे से लाचार’ है) को बुलाया जाता है। वह कहता है कि नाक लगा तो सकता है, पर उसे मूल पत्थर की किस्म जाननी चाहिए। पुरातत्व विभाग की फाइलें खोजी जाती हैं, पर पता नहीं चलता। मूर्तिकार पूरे भारत की परिक्रमा करता है – बंबई, गुजरात, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास, पंजाब – सभी जगहों की मूर्तियों (दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, गांधी, सरदार पटेल, सुभाष, भगतसिंह, मोतीलाल नेहरू, मालवीय, लाजपतराय आदि) की नाकें नापता है, लेकिन सब नाकें जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ी निकलती हैं। बिहार में 1942 में शहीद हुए बच्चों की मूर्तियों की नाकें भी बड़ी पाई जाती हैं।
- अब मूर्तिकार एक ‘हैरतअंगेज़’ सुझाव देता है – “चूँकि नाक लगना एकदम ज़रूरी है, तो चालीस करोड़ (जनता) में से कोई एक ज़िंदा नाक काटकर लगा दी जाए।” कमेटी घबराती है, पर मूर्तिकार कहता है कि नाक चुनना उसका काम है, बस इजाज़त चाहिए। कमेटी इजाज़त दे देती है – लेकिन अखबारों में सिर्फ़ यह छपता है कि ‘नाक का मसला हल हो गया है और नाक लग रही है।’
- मूर्तिकार परेशान होता है – वह स्वयं अपने प्रस्ताव से परेशान है, लेकिन नाक लगानी ही है। तैयारियाँ होती हैं – तालाब सुखाकर साफ़ किया जाता है, ताज़ा पानी डाला जाता है, हथियारबंद पहरेदार तैनात किए जाते हैं, ताकि ज़िंदा नाक सूखने न पाए। और नाक लग जाती है। अखबारों में खबर आती है कि नाक ‘ज़िंदा’ (पत्थर की नहीं) लगी है।
- लेकिन कहानी का व्यंग्यात्मक अंत यह है – उस दिन के अखबारों में किसी भी उद्घाटन, फीता-कटाई, सार्वजनिक सभा, अभिनंदन, मानपत्र या स्वागत-समारोह की खबर नहीं थी। यानी यह ‘ज़िंदा नाक’ किसी जीवित व्यक्ति की काटी गई नाक थी – संभवतः किसी बड़े नेता या हस्ती की। कहानी उस “खामोशी” और भयानक सच पर व्यंग्य करके समाप्त होती है – ब्रिटिश राजा की नाक के लिए एक भारतीय की जिंदा नाक कुर्बान कर दी गई, और जनता (और अखबार) इस बात से अनजान रहे।
- मुख्य पात्र/व्यक्ति:
- 1. मूर्तिकार – कलाकार, ‘पैसे से लाचार’, जो जॉर्ज पंचम की नाक लगाने का जिम्मा लेता है और अंत में जिंदा नाक काटने का प्रस्ताव देता है।
- 2. सभापति (कमेटी के) – उच्च-स्तरीय कमेटी के प्रमुख, जो नाक-संकट का समाधान ढूँढ़ते हैं।
- 3. कमेटी के अन्य सदस्य – उच्च अधिकारी/हुक्काम, जो मूर्तिकार को इजाज़त देते हैं।
- 4. पुरातत्व विभाग का क्लर्क – जो फाइलें खोजता है, पर कुछ नहीं मिलता; वह कहता है – “मेरी खता माफ़ करो, फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं।”
- 5. रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय – (उल्लेख) – जिनके भारत दौरे की तैयारियाँ हो रही हैं।
- 6. प्रिंस फिलिप – (उल्लेख) – रानी के पति।
- 7. जॉर्ज पंचम (ब्रिटिश राजा) – (उल्लेख) – जिनकी प्रतिमा (लाट) की नाक गायब है।
- 8. दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी, कॉवसजी जहाँगीर – (उल्लेख) – मूर्तियाँ जिनकी नाकें नापी गईं (बंबई/गुजरात)।
- 9. गांधी, सरदार पटेल, विट्ठलभाई पटेल, महादेव देसाई – (उल्लेख) – गुजरात की मूर्तियाँ।
- 10. गुरुदेव रवींद्रनाथ, सुभाषचंद्र बोस, राजा राममोहन राय – (उल्लेख) – बंगाल की मूर्तियाँ।
- 11. चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय – (उल्लेख) – उत्तर प्रदेश की मूर्तियाँ।
- 12. सत्यमूर्ति – (उल्लेख) – मद्रास (तमिलनाडु) की मूर्ति।
- 13. लाला लाजपतराय, भगतसिंह – (उल्लेख) – पंजाब की मूर्तियाँ।
- 14. 1942 में शहीद बच्चे – (उल्लेख) – बिहार सेक्रेटरिएट के सामने स्थापित मूर्तियाँ, जिनकी नाकें भी बड़ी पाई गईं।
- 15. अखबार-संपादक / पत्रकार – (अप्रत्यक्ष) – जो ‘नाक का मसला हल’ वाली खबर छापते हैं, पर असली सच नहीं छापते।
- विशेष स्थान/शब्द:
- – इंडिया गेट – दिल्ली में स्थित स्मारक, जहाँ जॉर्ज पंचम की लाट स्थित थी।
- – नयी दिल्ली / राजपथ – रानी के दौरे की तैयारियों का केंद्र।
- – लाट – (Statue / प्रतिमा) – जॉर्ज पंचम की मूर्ति।
- – हिंदुस्तान के पहाड़ी प्रदेश / पत्थरों की खानें – जहाँ मूर्तिकार पत्थर खोजने गया।
- – पालम हवाई अड्डा – जहाँ रानी उतरने वाली थीं।
- – सेक्रेटरिएट (बिहार) – जहाँ 1942 के शहीद बच्चों की मूर्तियाँ स्थित हैं।
जॉर्ज पंचम की नाक – कमलेश्वर
यह बात उस समय की है जब इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय मय अपने पति के हिंदुस्तान पधारने वाली थीं। अखबारों में उनकी चर्चा हो रही थी। रोज़ लंदन के अखबारों से खबरें आ रही थीं कि शाही दौरे के लिए कैसी-कैसी तैयारियाँ हो रही हैं – रानी एलिज़ाबेथ का दरज़ी परेशान था कि पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर रानी कब क्या पहनेंगी? उनका सेक्रेटरी और शायद जासूस भी उनके पहले ही इस महाद्वीप का
तूफ़ानी दौरा करने वाला था । आखिर कोई मज़ाक तो था नहीं। ज़माना चूँकि नया था, फ़ौज – फाटे के साथ निकलने के दिन बीत चुके थे, इसलिए फ़ोटोग्राफ़रों की फ़ौज तैयार हो रही थी…
इंग्लैंड के अखबारों की कतरनें हिंदुस्तानी अखबारों में दूसरे दिन चिपकी नज़र आती थीं, कि रानी ने एक ऐसा हलके नीले रंग का सूट बनवाया है जिसका रेशमी कपड़ा हिंदुस्तान से मँगाया गया है… कि करीब चार सौ पौंड खरचा उस सूट पर आया है।
रानी एलिज़ाबेथ की जन्मपत्री भी छपी। प्रिंस फिलिप के कारनामे छपे। और तो और, उनके नौकरों, बावरचियों, खानसामों, अंगरक्षकों की पूरी की पूरी जीवनियाँ देखने में आईं। शाही महल में रहने और पलने वाले कुत्तों तक की तसवीरें अखबारों में छप गईं…
बड़ी धूम थी। बड़ा शोर-शराबा था। शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूँज हिंदुस्तान में आ रही थी।
इन खबरों से हिंदुस्तान में सनसनी फैल रही थी । राजधानी में तहलका मचा हुआ था। जो रानी पाँच हजार रुपए का रेशमी सूट पहनकर पालम के हवाई अड्डे पर उतरेगी, उसके लिए कुछ तो होना ही चाहिए। कुछ क्या, बहुत कुछ होना चाहिए। जिसके बावरची पहले महायुद्ध में जान हथेली पर लेकर लड़ चुके हैं, उसकी शान-शौकत के क्या कहने, और वही रानी दिल्ली आ रही है… नयी दिल्ली ने अपनी तरफ़ देखा और बेसाख्ता’ मुँह से निकल गया, “वह आए हमारे घर, खुदा की रहमत… कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं!” और देखते-देखते नयी दिल्ली का कायापलट होने लगा ।
और करिश्मा तो यह था कि किसी ने किसी से नहीं कहा, किसी ने किसी को नहीं देखा पर सड़कें जवान हो गईं, बुढ़ापे की धूल साफ़ हो गई । इमारतों ने नाज़नीनों की तरह शृंगार किया….
लेकिन एक बड़ी मुश्किल पेश थी – वह थी जॉर्ज पंचम की नाक !… नयी दिल्ली में सब कुछ था, सब कुछ होता जा रहा था, सब कुछ हो जाने की उम्मीद थी पर जॉर्ज पंचम की नाक बड़ी मुसीबत थी। नयी दिल्ली में सब था… सिर्फ़ नाक नहीं थी !
इस नाक की भी एक लंबी दास्तान है । इस नाक के लिए बड़े तहलके मचे थे किसी वक्त! आंदोलन हुए थे । राजनीतिक पार्टियों ने प्रस्ताव पास किए थे। चंदा जमा किया था। कुछ नेताओं ने भाषण भी दिए थे। गरमागरम बहसें भी हुई थीं। अखबारों के पन्ने रंग गए थे। बहस इस बात पर थी कि जॉर्ज पंचम की नाक रहने दी जाए या हटा दी जाए! और जैसा कि हर राजनीतिक आंदोलन में होता है, कुछ पक्ष में थे कुछ विपक्ष में और ज़्यादातर लोग खामोश थे। खामोश रहने वालों की ताकत दोनों तरफ़ थी…
यह आंदोलन चल रहा था। जॉर्ज पंचम की नाक के लिए हथियार बंद पहरेदार तैनात कर दिए गए थे, क्या मजाल कि कोई उनकी नाक तक पहुँच जाए। हिंदुस्तान में जगह-जगह ऐसी नाकें खड़ी थीं। और जिन तक लोगों के हाथ पहुँच गए उन्हें शानो-शौकत के साथ उतारकर अजायबघरों में पहुँचा दिया गया। कहीं-कहीं तो शाही लाटों की नाकों के लिए गुरिल्ला युद्ध होता रहा…
उसी जमाने में यह हादसा हुआ, इंडिया गेट के सामने वाली जॉर्ज पंचम की लाट की नाक एकाएक गायब हो गई ! हथियारबंद पहरेदार अपनी जगह तैनात रहे। गश्त लगती रही और लाट की नाक चली गई।
रानी आए और नाक न हो ! एकाएक परेशानी बढ़ी। बड़ी सरगरमी शुरू हुई। देश के खैरख्वाहों’ की एक मीटिंग बुलाई गई और मसला पेश किया गया कि क्या किया जाए? वहाँ सभी सहमत थे कि अगर यह नाक नहीं है तो हमारी भी नाक नहीं रह जाएगी…
उच्च स्तर पर मशवरे हुए, दिमाग खरोंचे गए और यह तय किया गया कि हर हालत में इस नाक का होना बहुत ज़रूरी है । यह तय होते ही एक मूर्तिकार को हुक्म दिया गया कि वह फ़ौरन दिल्ली में हाज़िर हो ।
मूर्तिकार यों तो कलाकार था पर ज़रा पैसे से लाचार था । आते ही, उसने हुक्कामों के चेहरे देखे, अजीब परेशानी थी उन चेहरों पर, कुछ लटके, कुछ उदास और कुछ बदहवास थे। उनकी हालत देखकर लाचार कलाकार की आँखों में आसूँ आ गए तभी एक आवाज़ सुनाई दी, “ मूर्तिकार ! जॉर्ज पंचम की नाक लगानी है ! ‘
मूर्तिकार ने सुना और जवाब दिया, “ नाक लग जाएगी। पर मुझे यह मालूम होना चाहिए कि यह लाट कब और कहाँ बनी थी। इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से लाया गया था?”
सब हुक्कामों ने एक दूसरे की तरफ़ ताका … एक की नज़र ने दूसरे से कहा कि यह बताने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। खैर, मसला हल हुआ। एक
और इस बात की पूरी छानबीन करने का काम सौंपक को फोन किया गया
दिया गया।… पुरातत्व विभाग की फाइलों के पेट चीरे गए पर कुछ भी पता नहीं चला। क्लर्क ने लौटकर कमेटी के सामने काँपते हुए बयान किया, “सर! मेरी खता माफ़ सब कुछ हज़म कर चुकी हैं। ”
हुक्कामों के चेहरों पर उदासी के बादल छा गए। एक खास कमेटी बनाई गई और उसके जिम्मे यह काम दे दिया गया कि जैसे भी हो, यह काम होना है और इस नाक का दारोमदार आप पर है।
आखिर मूर्तिकार को फिर बुलाया गया, उसने मसला हल कर दिया। वह बोला, ‘पत्थर की किस्म का ठीक पता नहीं चला तो परेशान मत होइए, मैं हिंदुस्तान के हर पहाड़ पर जाऊँगा और ऐसा ही पत्थर खोजकर लाऊँगा । ” कमेटी के सदस्यों की जान में जान आई। सभापति ने चलते-चलते गर्व से कहा, “ऐसी क्या चीज़ है जो हिंदुस्तान में मिलती नहीं। हर चीज़ इस देश के गर्भ में छिपी है, ज़रूरत खोज करने की है । खोज करने के लिए मेहनत करनी होगी, इस मेहनत का फल हमें मिलेगा… आने वाला ज़माना खुशहाल होगा । ”
यह छोटा-सा भाषण फ़ौरन अखबारों में छप गया।
मूर्तिकार हिंदुस्तान के पहाड़ी प्रदेशों और पत्थरों की खानों के कुछ दिन बाद वह हताश लौटा, उसके चेहरे पर लानत बरस रही थी, उसने सिर लटकाकर खबर दी, “ हिंदुस्तान का चप्पा-चप्पा खोज डाला पर इस किस्म का पत्थर कहीं नहीं मिला। यह पत्थर विदेशी है । ”
सभापति ने तैश में आकर कहा, “ लानत है अक्ल पर ! विदेशों की सारी चीजें हम अपना चुके हैं-दिल-दिमाग, तौर-तरीके और रहन-सहन, जब हिंदुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?”
मूर्तिकार चुप खड़ा था। सहसा उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने कहा, “एक बात मैं कहना चाहूँगा, लेकिन इस शर्त
सभापति की आँखों में भी पर कि यह बात अखबार वालों तक न पहुँचे… ‘
चमक आई । चपरासी को हुक्म हुआ और कमरे के सब दरवाज़े बंद कर दिए गए। तब मूर्तिकार ने कहा, “ देश में अपने नेताओं की मूर्तियाँ भी
हैं, अगर इजाज़त हो और आप लोग ठीक समझें तो… मेरा मतलब है तो… जिसकी नाक इस लाट पर ठीक बैठे, उसे उतार लाया जाए…
सबने सबकी तरफ़ देखा। सबकी आँखों में एक क्षण की बदहवासी के बाद खुशी तैरने लगी। सभापति ने धीमे से कहा, “ लेकिन बड़ी होशियारी से। ”
और मूर्तिकार फिर देश – दौरे पर निकल पड़ा। जॉर्ज पंचम की खोई हुई नाक का नाप उसके पास था। दिल्ली से वह बंबई पहुँचा । दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी, कॉवसजी जहाँगीर-सबकी नाकें उसने टटोलीं, नापीं और गुजरात की ओर भागा- गांधी जी, सरदार पटेल, विट्ठलभाई पटेल, महादेव देसाई की मूर्तियों को परखा और बंगाल की ओर चला – गुरुदेव रवींद्रनाथ, सुभाषचंद्र बोस, राजा राममोहन राय आदि को भी देखा, नाप-जोख की और बिहार की तरफ़ चला। बिहार होता हुआ उत्तर प्रदेश की ओर आया – चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय की लाटों के पास गया। घबराहट में मद्रास भी पहुँचा, सत्यमूर्ति को भी देखा और मैसूर – केरल आदि सभी प्रदेशों का दौरा करता हुआ पंजाब पहुँचा – लाला लाजपतराय और भगतसिंह की लाटों से भी सामना हुआ। आखिर दिल्ली पहुँचा और उसने अपनी मुश्किल बयान की, “ पूरे हिंदुस्तान की परिक्रमा कर आया, सब मूर्तियाँ देख आया । सबकी नाकों का नाप लिया पर जॉर्ज पंचम की इस नाक से सब बड़ी निकलीं ।
सुनकर सब हताश हो गए और झुंझलाने लगे। मूर्तिकार ने ढाढस बँधाते हुए आगे कहा, “ सुना है कि बिहार सेक्रेटरिएट के सामने सन् बयालीस में शहीद होने वाले बच्चों की मूर्तियाँ स्थापित हैं, शायद बच्चों की नाक ही फिट बैठ जाए, यह सोचकर वहाँ भी पहुँचा पर उन बच्चों की नाकें भी इससे कहीं बड़ी
पठती हैं। अब बताइए,
मैं क्या करूँ?”
राजधानी में सब तैयारियाँ थीं। जॉर्ज पंचम की लाट को मल-मलकर नहलाया गया था। रोगन लगाया गया था। सब कुछ हो था, सिर्फ़ नाक नहीं थी।
बात फिर बड़े हुक्कामों तक पहुँची। बड़ी खलबली मची- अगर जॉर्ज पंचम के नाक न लग पाई तो फिर रानी का स्वागत करने का मतलब? यह तो अपनी नाक कटाने वाली बात हुई।
लेकिन मूर्तिकार पैसे से लाचार था…
यानी हार मानने वाला कलाकार नहीं था। एक हैरतअंगेज़ खयाल उसके दिमाग में कौंधा और उसने पहली शर्त दोहराई। जिस कमरे में कमेटी बैठी हुई थी उसके दरवाज़े फिर बंद हुए और मूर्तिकार ने अपनी नयी योजना पेश की, “ चूँकि नाक लगना एकदम ज़रूरी है, इसलिए मेरी राय है कि चालीस करोड़ में से कोई एक जिंदा नाक काटकर लगा दी जाए…
बात के साथ ही सन्नाटा छा गया। कुछ मिनटों की खामोशी के बाद सभापति ने सबकी तरफ़ देखा। सबको परेशान देखकर मूर्तिकार कुछ अचकचाया और धीरे से बोला,
आप लोग क्यों घबराते हैं! यह काम मेरे ऊपर छोड़ दीजिए… नाक चुनना मेरा काम है, आपकी सिर्फ़ इजाज़त चाहिए। ”
कानाफूसी हुई और मूर्तिकार को इजाज़त दे दी गई।
अखबारों में सिर्फ़ इतना छपा कि नाक का मसला हल हो गया है और राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की लाट के नाक लग रही है।
नाक लगने से पहले फिर हथियारबंद पहरेदारों की तैनाती हुई । मूर्ति के आस-पास का तालाब सुखाकर साफ़ किया गया। उसकी रवाब निकाली गई और ताज़ा पानी डाला गया ताकि जो ज़िंदा नाक लगाई जाने वाली थी, वह सूखने न पाए। इस बात की खबर जनता को नहीं थी। यह सब तैयारियाँ भीतर – भीतर चल रही थीं। रानी के आने का दिन नज़दीक आता जा रहा था मूर्तिकार खुद अपने बताए हल से परेशान था । ज़िंदा नाक लाने के लिए उसने कमेटी वालों से कुछ और मदद माँगी। वह उसे दी गई। लेकिन इस हिदायत के साथ कि एक खास दिन हर हालत में नाक लग जानी चाहिए।
और वह दिन आया।
जॉर्ज पंचम के नाक लग गई।
सब अखबारों ने खबरें छापीं कि जॉर्ज पंचम के ज़िंदा नाक है .यानी ऐसी… नाक जो कतई पत्थर की नहीं लगती।
लेकिन उस दिन के अखबारों में एक बात गौर करने की थी । उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन की खबर नहीं थी। किसी ने कोई फीता नहीं काटा था। कोई सार्वजनिक सभा नहीं हुई थी। कहीं भी किसी का अभिनंदन नहीं हुआ था, कोई मानपत्र भेंट करने की नौबत नहीं आई थी। किसी हवाई अड्डे या स्टेशन पर स्वागत समारोह नहीं हुआ था। किसी का ताज़ा चित्र नहीं छपा था।
