(ग) डिडांक डोआनी– लेखक– वंशी लाल वंशी
- डिडांक डोआनी– खोरठा काव्य
- लेखक– वंशी लाल वंशी
- प्रथम संस्करण – 8 मार्च 1992
- दूसरा संस्करण – 2019
- प्रकाशक – पृथ्वी प्रकाशन
- कथा वस्तु लेखक – दिनेश दिनमणि
- इसमें 6 भाग /सर्ग है।
- पात्र
- जगन
- जगन की बेटी महुआ
- करमा – मुँह बोला भाई
- विधवा सुगिया
| 1. डीड़ा | Read |
| 2. सपुन | Read |
| 3. डहर | Read |
| 4. हुलुस्थूल | Read |
| 5. पोहा | Read |
| 6. खँधार | Read |
झारखंड की प्राकृतिक छटा और यहाँ के खनिज संपदा का वर्णन। यहाँ के लोग सरल, प्रेमी और मेहनती हैं, जो अपनी संस्कृति में मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं। आज़ादी के आंदोलन के दौरान जगन और उसकी पत्नी के घर महुआ नाम की बेटी का जन्म होता है।
महुआ बड़ी होकर जंगल-पशुओं के बीच रहती है और अपने पिता की मृत्यु के बाद पत्तों के दोने बेचकर गुज़ारा करती है। शहर की सुख-सुविधाएँ देखकर वह गाँव-शहर के अंतर और गाँववालों की दुर्दशा पर सोचती है। समय बदलता है, गाँव में कारखाने आते हैं, जंगल कटते हैं, गाँववाले अपनी जमीन से बेदखल होते हैं। जगन की मृत्यु हो जाती है और महुआ अकेली पड़ जाती है।
महुआ शोषण और अत्याचार देखकर विद्रोह की भावना से भर जाती है। एक दिन उस पर पत्थर फेंका जाता है, तब करमा नाम का युवक उसे बचाता है। दोनों भाई-बहन की तरह शोषण के खिलाफ लड़ने का संकल्प लेते हैं।
करमा को नदी के किनारे सुगिया मिलती है, जो एक जमींदार के घर की बहू है और अत्याचार सहकर आत्महत्या करने आई थी – दामोदर नदी में कूदी , करमा उसे बचाता है । करमा उसे समझाता है कि मानव जीवन का महत्व है, हार नहीं माननी चाहिए, बल्कि अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए। सुगिया उसकी बात मान लेती है। महुआ की मदद से बाद में दोनों कोर्ट में शादी कर लेते है
तीनों मिलकर गाँववालों को जागरूक करते हैं। जमींदार उनका विरोध करता है और उनके घर जलाकर महुआ की माँ को भी जला कर मार डालता है। इस अत्याचार से तीनों और भी दृढ़ हो जाते हैं।
गाँव में विद्रोह की लहर दौड़ती है। किसान और मजदूर एक होकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करते हैं, जमींदार और ठेकेदारों का काम ठप हो जाता है।
महुआ जमीन वापसी का ऐलान करती है, जिससे जमींदार क्रोधित होता है। एक दिन जमीन पर कब्जा करते समय जमींदार के गुंडे महुआ पर हमला कर देते हैं और वह वहीं शहीद हो जाती है। इस दौरान सुगिया एक बेटी को जन्म देती है, जिसे करमा को सौंप दिया जाता है। सभी संकल्प लेते हैं कि महुआ के सपनों को पूरा करेंगे और अत्याचार के खिलाफ लड़ते रहेंगे।
आज भी लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और महुआ के बताए रास्ते पर चलते हुए एक नए सवेरे की ओर अग्रसर हैं।
(1) डीड़ा
- परकीरतिक छटा से भोरल झारखंडेक धरती। जकर आपन जगजीतवा परिचइ हइ। एकर हरिहर आँचराक भीतर पहार, बोन-झार, नदी-नाला झरना पसरल हइ। हियाँक बोने बाघ भालू, सियार, खेरहा,कोइल, मेंजुर, तितिर पाँड़ नियर पसु- इखी प्रेमभावें एके संगे रह हथ।
- सोबले बोड़ बात जे हिंयाँक माटिक भीतर चोपताइल खनिज के अनठेकान भाँडार भोरल ह । खनिज बनज के ई भाँडारेक ऊपर गोटे दुनियाँइक नजर हइ। तकरे खातिर चाइरो बाट प्रेमेक हवा आर माटिक सोंधेक संग संगीतेक लहर उठ ह । तइसने ई डड़ाक मानुस। परकीरतीए रखम मधु माखल निरमल बेबहार, हियाँक मानुस सुधे-खटे जानथ।ई सभेक संस्कीरति मानववादी। हाड़तोरवा मेहनइतेक बादें सभे नर-नारी आखरा तरें नाचथ झींकाझोइर। मांदइर आर बाँसिक सुरें सभइताक लउतन पोहा सरगताइ उठे। बोनेक दूगो फूल रकम हियाँक सदान आर आदिवासी एके संगे करथ सुन्दर जिनगिक साधना।
- समइ-सिरें उलगुलानेक उनमाइद आकास छुवे लागेहे आर भारत देस आजादिक सवादें माइत उठेहे। जगन, जे उलगुलानेक एगो चकचकिया तरंगिन लागे, आजादिक उमंगे गोटे बोन-तुरियाक संगे माइत उठेहे। सइये संजोगे ओकर घारें एगो धानरोपनिक जनम भेलइ। जगनेक घारें झींकझोइर झुमइर लागलइ। गाँवेक सभे लोक खुसी मनउला। सोभिन बिचार करल बाद लउतन बेटी छउवाक नाँव राखल गेलइ महुआ।
- पुरबें सोनइली सुरुज उगे खातिर बेहाल भइ उठला तकर संगे जगन देखे लागल ई धरतिक मानुसेक खातिर कते रखम मधुर सपुन। हाँ, अबरी हतइ लउतन बिहान। मलिन मुंहें फुटतइ उमंगेक अविकल हाँसी। भावें भोरल जगन हेराइ जाहे सइ सपुनेक संसारें।
(2) सपुन (सपना)
- चाइरो बाट पसरल बोन झारेक मांझे महुआ करमें कर बोड़ भेली। बोनेक पसु-पॅइखिक संगें रइहके महुआ आपन खेमोता बढ़वली। आपन बापेक का करे लागली उसास । पतरी दोना बनाइके बाजारें बेंचे लागली। सहरेक सुख-सुविधा देख महुआ भेली चकित। काँचा मने उठलइ बात जे गाँव आर सहरें एते तोफात काहे। बोन झारें आर खेत-खरिहाने बिहान ले सांइझ तक खटवइया गाँवेक लोकेक अइसन दुरदासा काहे। कथियो कि हामनियोक जिनगी में सुखेक दिन आवत !
- समयेक चाँक घुरते गेल । गाँवेक धारी बिसपिपरी रकम सहरेक लोक आवे लागला। जमीनेक नाप-जोख हवे लागलइ। नाँवा रकमेक घार-दुआइर बने लागल । जगन बुझल जे अबरी हियाँ कइरखाना बनत । हियाँक लोक काम पइता। अभाभेक जिनगी सेंस हत । मने कते रखम आसाक फूल फूटे लागल । बोन-झार काटाइ लागलइ। अनठेकान गाँव के कइरखानाक नावें उठवल जाइ लागल । गाँवेक लोक पुरखाक डींड़ा ले उजरवल गेला। आँखिक भीतर टापल बदरी के भला के अनुमान लगवे पारे। सभेक छातीं नदिक ढेव उठे लागलइ। बेचारा जगन मनेक बिसाद सम्हरवे नाइ पारल आर साधेक महुआ के जिनगिक अनंत डहरें छोइड़कें एकदिन सिराइ गेला।
- महुआ टुअर भइ गेली। मनेक साथ आर जिनगिक सपुन सभे हेराइ गेल। कामेक आसें गाँवक लोकेक संगे हिन्दे हुन्दे बोंडाइ लागली। मानुसेक सउसन देखकें महुआ सिहइर उठली। अइसनो कि मानुस हवे जे आपन सवारथ खातिर मानुसेक लहू चूसे। तबे कि मानुस पसुओ ले गिरल हवे।
- सउसन आर अतियाचार देइख महुआक मने उलगुलानेक उनमाइद उठे लागलइ। महुआ सुधे एगो जनी नाइ, बिच्कुन लउतन परियाक एगो चनफनियाँ चेठा लागी। ऊ सभे सहे पारे, मेंतुक, मानुसेक ऊपर मानुसेक अतियाचार देखलें ओकर आँखी आइग लहइक उठे। सउसनेक निमराझार करे खातिर महुआ किरिया खड्ली आर आपन धरतिक मानुसेक हितें उलगुलानेक डहर धरली।
- एक दिन आपन गाँवेक कमियाँ लोक के लड़ेक गुर सिखवेक समइ केव महुआक ऊपर एगो पथर चलाइ देलइ। अबरी महुआ गिरतली ताव तक एगो चेठगर जुआन लोक अगुवाइके महुआ के सहारा देल । ओकर नाँव करमा। करमा महुआ के उठाइके आपन झोपरी में आनलइ आर ओकर दवाइ विरो करल । जखन महुआक चेठा घुरलइ तो करमाइ ओकरों आपन परिचइ देलइ। तखन दुइओ झने भाइ बहिन रुपें सउसनेक बिरोधे लड़ेक किरिया खइला।
(3) डहर
- लउतन कइरखाना बने लागलइ । कामेक टावाने कते-कते लोक पालबंदी रुपें आवे लागला। हिन्दे बापेक ठाँव ले बेदखल गाँवेक लोक कइरखानाक धारी कुरिया बनाइकें रहे लागला। तकरे भीतर करमा आर महुआव एगो कुरिया बनाइ रहे लागला। दूइयों झन उलगुलानेक दीया बारे लागला। महुआ आपन भासन से गरीब दुखी लोक के सउसनेक बिरोधें गोठवे लागली तो करमा आपन गीत से लोक के मगज घुरवे लागला।
- एहे लेताइरे करमा एक दिन नदी पारेक गाँव गेल। आपन गीतें गाँवेक लोक के जगवेक चेस्टा करे लागला ताव तक आंधारेक चादइरे गोटे धरतीं ढाँपाइ गेली। करमा दामुदरेक डहरें घार घुरे लागल तखने दामुदरेक धारी ओकर काने कोन्हों नारिक काँदइक साड़ा अइलइ आर ऊ हुवें ठठइक गेला देखइत देखइत एगो नारी नदिक बानें झाँप दइ देलइ आर ओकरा बँचवेक गरजें करमाव नदिक पानी झाँप दइ तनिये देरी में करमा सइ नारिक लइकें धारी उठल आर ओकर चेठा घुरवेक चेस्टा करे लागला।
- कुइछ देरी बादें ओकर चेठा पुरलइाऊ आपन जिनगिक कहनी करमा के सुनाइ देलइ, जे ओकर नाँव सुगिया लागइ आर ऊ एगो जमींदार घारेक पुतहिया लागी। कुछेक दिन आगु सुगिया रॉड भइ गेल हली। तकर बाद ओकर ऊपर दुखेक पहार गिर उठल । जमीदार घारें ओकर ऊपर बहुत अतियाचार भेल हलइ। ससुर घार ओकर एगो कुचकुचिया अँधरिया राइत बइनकें रइह गेल हलइ । तकरे खातिर ऊ आपन जिनगीक अंत करे ले दामुदरें झाँप देल हल ।
- करमा सुगियाक दुख सुइनकें दुखी भइ उठला करमाइ ओकरों मानुस जिनगिक महिमा बतवे लागलइ, जे मानुस के दुख से लड़ेक चाही। जिनगी से हारल मानुस जोदि आपन जान दइ दे तो एकदिन ई धरतिक अरथे मोइर जाइत । तकरे खातिर आपन खेमोता भइर समाजेक फेचांगेक बिरोधें लड़ेक चाही। करमाक बात सुइनकें सुगियाक मनेक धांधा मेइट जाहइ आर ऊ करमाक डहरें अगुवाइक किरिया खाही।
- बिहाने चाइरो बाट बोनेक आइग रखम ई बात सुनाइ जाहे। जमीदार ई बिबरन सुनइकें खेपाइ उठेहे आर आपन संगी-साथिक संगे करमाक घार चहइट जाहे। ताव तक महुआ, करमा आर सुगिया के लइकें कचहरी आइ सुगियाक बिहा भइ जाहइ।
- कचहरी से रातीं जखन तीनों झन आपन घार घुरला तो घारेक दसा देखके ठठक गेला। ऊसभेक घारेक संगे कइगो कुरिया पोइड़के छाइ भइ गेल हल। महुआक बूढ़ी मायो सइ आग पोइड़के सिराइ गेल हलइ । जमीदारेक लोकेक ई करतइब सुइनके रागें करमा आर महुआ काँप लागला । मेंतुक, उसोब सोंचला जे ताताताही कोन्हों करलें तो सउसनेक संसार तो सेंस नाइ होवे पारे। तकरे खारित अइसन अतियाचारेक विरोध संगिया रूपें करेक चाही। एकर खातिर तीनो झन किरिया खइला।
(4) हुलुस्थुल
- समाजें छोट-बोड़ के भेद, काना-पतियार, सउसन, अतियाचार, पोंगा-पंथिक कुटिल बिचार, अगियान रखम कते-कते दोस हइ। जाउ तक मानुसेक मनेक चेतना नाँइ जागे, ताव तक ई आँधारेक समाधान असंभव ह । तो मानुसेक ओहे चेतना के जगवे खातिर महुआ, करमा आर सुगिया राइत दिन लाइग पोरल हथ।
- उलगुलानेक आलो के सउसनेक बदरीं बेसी दिन ढाँप नाइ पारे। तकरे खातिर गरीब-दुखी नर-नारी महुआ, करमा आर सुगियाक बारल आलो से जाइग उठहथ आर चाइरो बाट ठीकादार आर जमीदारेक विरोधें हुलुस्थलेक हुइलमाइल हवो ह । आपन हक आर अधिकार खातिर किसान आर मजदुर एक संगें घार से बाहराइ गेला। कम कुरइयें खेतेक काम आर कम पइसाइ ठीकादारेक काम बंद भइ जाह ।
- हुलुस्थुलेक ई सँगिया परताप से जमींदार आर ठीकादार चकित भइ उठला। उसोब ई काम खातिर महुआ, करमा आर सुगिया के दोसी मानल्थिन। तीनों झन के खतम करे खातिर मतामत करे लागला । ताव तक करम परब मोहाइ गेल। सोभीन करम मनवे खातिर एके आख इ जुटला। मेंतुक, सुधे नाचे आर गावेले नाँइ, बिच्कुन, अवइया दिने कि रखम लड़ेक चाही, तकर संगिया मत करेले।
(5) पोहा
- गाँवे आगुवे रखम मानुस एखनो हथ। मेंतुक, आगुक आर एखनेक मानुसें एगो फरक हइ। आगुक मानुस अतियाचार सहियो चुप रह-हला आर एखन सोभीन लड़े खातिर राइत दिन तइयार। एखन गाँवेक छोट-छोट बेबसाइ कर हथ। उसभेक जनी-छउवा अग्रियानेक आंधार मेटवे खातिर आखरेक दीया बार हथा गाँवेक लोक करमा, सुगिया आर महुआक जय जयकार कर हथ, जेसमेक तपसियाक फलें आइझ गाँव सउसन आर अतियाचारेक बिरोधें एक संगे लड़ेले सिखल है।
- तकरे खातिर तो सइदिन करमा बेजारें पोरल आर ओकर ओसरवल काम के पुरा करेले महुआ सरकारी औपिस जाही आर आंधारे घुरइक समइ जमींदारेक लोके ओकरों मारेक चेस्टा करल्थिना मेंतुक, बाघिनेक खेमोता राखेवाली महुआ से उसोब हाइर गेला। तखन उसोब हुलुस्थुलेक ई जीत नारी के चिन्हें पारन्थिन आर ओकर गोड़ तरे आपन डांग-टांगी धइर देल्थिन।
- घुइर दिने महुआँइ ऐलान कइर देलइ जे जकर खेत जमींदारें छिनल हइ, काइल से ऊ खेतेक मालिक ओहे हतइ। ई ऐलान सुइनकें जमींदार काँइप उठल आर महुआक जिनगी सेंस करइक उपाइ सोंचे लागला
- घुइर दिने-आस-पासेक गँवइया डुगडुगिक रावें जोड़ा महुआक टाँड़ी खेत दखल करेले जोहड़े लागला। महुआ आपन मत सभेक मइ राखली। सोभीन एक रंगे आर एक उमंगे महुआक संगे अगुवइला, जहाँ माघा-बाघा आपन खेत दखल करता। हेनोसंजोगे जमींदारेक गुंडा हुवाँ पोहँइच गेला आर तड़ातड़ महुआक माथाँइ डांग मारे लागला। रकतें झोरोबोर भइके महुआ भुँइएँ गिर पोरली आर धरतिक दुलरवा बेटी धरतीक खातिर सिराइ गेली।
- चाइरो बाट हाहाकार भइ उठल । करमा ई खभइर सुइनके बेहाल भइ गेल। जखन ऊ महुआक लास उठाइकें आखरा तर आनल तखन ओकर आँखिक आगु आँधार बुझाइ लागल । गाँवक सभे नर-नारी बिलाप करे लागला। हुँदै सुगियाँइ एगो लउतन बेटी के जनम देलइ। करमाक आँइख से लोर गिरे लागलाइ
- तखने आखरा ठिन हाँथे आपन नाँवा बेटी के लइकें सुगिया आइ जाही। सोभीन एक संगे किरिया खाहथ ये एगो महुआक बदलीं हामनी हजार हजार महुआ बनवब आर महुआक अधपुरवा काम के पूरा करब। एतनाक बाद सुगिया आपन बेटी के करमाक हाँथें दइ देह । करमाक आँखी एगो लउतन विस्वास के जनम हवोहइ, जे विस्वासेक आलो सोभिन आपन जिनगिक बिहान देखे पाव-हथ।
- आखरा तरें एगो सारा सजवल जाहइ। जकर में महुआ के पोड़वल जाह । साराक आग जे उलगुलानेक लहर उठलइ, ओकर से गोटे डींड़ा भभकाल भइ गेल। सभेक मनें, माटी आर मानुसेक मान रइखा खातिर एगो जी त संकलप हिलोर मारे लागल
(6) खाँधार
- आदिक माँड़ल ठाँव कइरखाना खुजल से पुरना डींड़ा खाँधार भइ गेल । कुइछ लोक तो तलिआइ गेला आर माटिक बेटा-बेटी एखनो आपन अधिकार खातिर फिफिआइ बुल-हथा। तावो, आपन सभइता संस्कीरति खातिर हियाँक नर-नारी लउतन डहरेक टावाने अगुवाइ आइल हथा। आपन माटी खातिर सोभीन जान दिएले तइयार। सोभीन एक संगे गावे लागल हथ।- हुलुस्थुलेक गीत।
- महुआक बतवल डहरें आइझ ने तो काइल हतइ लउतन बिहान, पूरा हतइ सभेक सपुन आर लउतन सुरुजेक आलो सिराइ जितइ-डींड़ाक डोंआनी।
Didank Doani – Author – Vanshi Lal Vanshi
