आलोक धन्वा
- आलोक धन्वा
- पूरा नाम: आलोक धन्वा
- जन्म: 2 जुलाई 1948 (बेलबिहमा, जिला-मुंगेर, बिहार)
- साहित्यिक युग / पहचान: सत्तर के दशक के प्रसिद्ध प्रगतिशील एवं जनवादी कवि (वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन से गहरे जुड़े कवि)।
- प्रथम प्रकाशित कविता: ‘जनता का आदमी’ (1972 ई.), जो ‘वाम’ पत्रिका में छपी थी।
- प्रमुख रचनाएँ :
- एकमात्र प्रकाशित काव्य-संग्रह
- दुनिया रोज़ बनती है (1998 ई.): यह इनका पहला और एकमात्र संग्रह है, जिसमें इनकी लगभग तीन दशकों की चर्चित कविताएँ संकलित हैं।
- प्रसिद्ध कविताएँ
- जनता का आदमी (1972): इनकी पहली कविता।
- गोली दागो पोस्टर (1972): ‘फ़िलहाल’ पत्रिका में प्रकाशित ऐतिहासिक जनवादी कविता।
- भारत-दर्शन
- भागी हुई लड़कियाँ (1972)
- ब्रूनो की बेटियाँ (1980)
- भारत-दर्शन
- पतंग: (NCERT कक्षा 12 की ‘आरोह भाग-2’ पाठ्यपुस्तक में शामिल अत्यंत प्रसिद्ध कविता)।
- कपड़े के जूते
- भारत-दर्शन
- प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
- पहल सम्मान
- नागार्जुन सम्मान
- फ़िराक गोरखपुरी सम्मान
- गिरिजा कुमार माथुर सम्मान
- भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान
- राहुल सम्मान
- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का विशेष साहित्य सम्मान
- बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान
- एकमात्र प्रकाशित काव्य-संग्रह
रघुवीर सहाय
- पूरा नाम: रघुवीर सहाय
- जन्म: 9 दिसंबर 1929 (लखनऊ, उत्तर प्रदेश)
- शिक्षा: लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. (1951)
- साहित्यिक धारा / मंडल: अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ (1951 ई.) के प्रमुख कवि।
- पत्रकारिता:
- ‘दिनमान‘ (साप्ताहिक पत्रिका) के प्रसिद्ध मुख्य संपादक (1969-1982) रहे।
- इसके अलावा ‘आकाशवाणी‘, ‘प्रतीक‘, ‘कल्पना‘ और ‘नवभारत टाइम्स‘ से भी जुड़े रहे।
- काव्य संग्रह
- सीढ़ियों पर धूप में (1960): इनका पहला स्वतंत्र काव्य-संग्रह (भूमिका अज्ञेय जी ने लिखी थी)।
- आत्महत्या के विरुद्ध (1967): अत्यंत विचार-प्रधान एवं राजनीतिक रूप से सजग काव्य-संग्रह।
- हँसो, हँसो जल्दी हँसो (1975): व्यंग्यात्मक एवं समकालीन राजनीतिक यथार्थ पर आधारित।
- लोग भूल गए हैं (1982): इनकी सबसे प्रसिद्ध और पुरस्कृत कृति।
- कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ (1989)
- एक समय था (1994): मरणोपरांत प्रकाशित संग्रह।
- कविताएँ
- रामदास: (व्यवस्था और आम आदमी की बेबसी पर तीखा व्यंग्य)
- अधिनायक: (NCERT कक्षा 12 की ‘आरोह भाग-2’ में संक्लित प्रसिद्ध व्यंग्य कविता)
- कैमरे में बंद अपाहिज (NCERT पाठ्यक्रम की अत्यंत चर्चित कविता)
- हँसो हँसो जल्दी हँसो
- पैदल आदमी
- कहानी संग्रह
- सीढ़ियों पर धूप में (1960)
- रास्ता इधर से है (1972)
- जो आदमी हम बना रहे हैं (1983)
- निबंध संग्रह
- दिल्ली मेरा परदेस (1976)
- लिखने का कारण (1978)
- ऊबे हुए सुखी
- वे और नहीं होंगे जो मारे जाएँगे
- भँवर लहरें और तरंग (1983)
- अनुवाद कार्य (Translations)
- मैकबेथ (शेक्सपियर): ‘बरनम वन’ नाम से हिंदी अनुवाद।
- 12 वीं रात (Twelve Night – शेक्सपियर): ‘रात्रिकथा‘ नाम से अनुवाद।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1984): काव्य-संग्रह ‘लोग भूल गए हैं’ के लिए।
- निधन: 30 दिसंबर 1990 (नई दिल्ली)।
- ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के कवि हैं।
- प्रसिद्ध पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक रहे।
- ‘अधिनायक’ और ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ इनकी प्रसिद्ध NCERT पाठ्यपुस्तक वाली कविताएँ हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध
- पूरा नाम: गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’
- जन्म: 13 नवंबर 1917 (श्योपुर, ग्वालियर, मध्य प्रदेश)
- साहित्यिक युग / काव्यधारा: प्रयोगवाद एवं प्रगतिवाद (अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ (1943 ई.) के पहले कवि)।
- विशेष पहचान: इन्हें हिंदी कविता में ‘फैंटेसी का कवि‘ तथा ‘तीव्र इंद्रियबोध का कवि’ कहा जाता है।
- काव्य संग्रह – मुक्तिबोध की अधिकांश रचनाएँ उनके जीवनकाल में अप्रकाशित रहीं और मरणोपरांत सामने आईं:
- चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964): इनका सबसे प्रसिद्ध काव्य-संग्रह (निधन के वर्ष ही प्रकाशित)।
- भूरी-भूरी खाक-धूल (1980): मरणोपरांत प्रकाशित द्वितीय मुख्य काव्य-संग्रह।
- कविताएँ
- अंधेरे में: (हिंदी साहित्य की सबसे प्रसिद्ध लंबी कविताओं में से एक, जो फैंटेसी पर आधारित है)।
- ब्रह्मराक्षस: (बौद्धिक मध्यवर्ग की त्रासदी और अंतर्द्वंद्व पर आधारित)।
- भूल गलती: (व्यवस्था विरोधी तीखी चेतना की कविता)।
- लकड़ी का रावण
- सहर्ष स्वीकारा है (NCERT कक्षा 12 में संकलित प्रसिद्ध कविता)।
- उपन्यास:
- विपात्र (1970)
- कहानी संग्रह:
- काठ का सपना (1967)
- सतह से उठता आदमी (1971)
- आलोचना एवं विचार-साहित्य
- कामायनी: एक पुनर्विचार (1961): जयशंकर प्रसाद की कामायनी का नया प्रगतिशील मूल्यांकन।
- नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध (1964)
- नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (1971)
- एक साहित्यिक की डायरी (1964)
- भारत: इतिहास और संस्कृति (1962): (मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंधित की गई पुस्तक)।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- जीवनकाल में उपेक्षा: मुक्तिबोध को उनके जीवनकाल में कोई बड़ा राजकीय/साहित्यिक पुरस्कार नहीं मिल सका; वे आजीवन आर्थिक तंगी और संघर्षों से जूझते रहे।
- मरणोपरांत सम्मान: मृत्यु के बाद उन्हें हिंदी के सबसे प्रभावशाली एवं महान आधुनिक कवियों में स्थान मिला।
- उनकी संपूर्ण रचनाएँ ‘मुक्तिबोध रचनावली’ (6 खंडों में, संपादक: नेमिचंद्र जैन) नाम से प्रकाशित हुईं।
- निधन: 11 सितंबर 1964 (नई दिल्ली – एम्स में लंबी बीमारी के बाद)।
- ‘तार सप्तक’ (1943) के प्रथम कवि हैं।
- कविता में ‘फैंटेसी’ के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हैं।
शमशेर बहादुर सिंह
- पूरा नाम: शमशेर बहादुर सिंह
- जन्म: 13 जनवरी 1911 (देहरादून, उत्तराखंड – तत्कालीन उत्तर प्रदेश)
- साहित्यिक मंडल: अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ (1951 ई.) के कवि।
- साहित्यिक पहचान:
- इन्हें ‘कवियों का कवि’ (अज्ञेय द्वारा प्रदत्त उपाधि) कहा जाता है।
- हिंदी कविता में ‘बिंबधर्मी कवि‘ तथा ‘प्रणय और सौंदर्य के कवि’ के रूप में प्रसिद्ध।
- “बात बोलेगी, हम नहीं / भेद खोलेगी बात ही” इनकी अत्यंत प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं।
- विशेष कार्य: दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘उर्दू-हिंदी कोश’ (Urdu-Hindi Dictionary) के संपादन कार्य से जुड़े रहे।
- काव्य संग्रह
- कुछ कविताएँ (1959)
- कुछ और कविताएँ (1961)
- चुका भी हूँ मैं नहीं (1975): इनकी सबसे प्रसिद्ध और साहित्य अकादमी पुरस्कृत कृति।
- इतने पास अपने (1980)
- बात बोलेगी (1981)
- काल मुझसे होड़ है मेरी (1988)
- टूटी हुई बिखरी हुई (1990)
- कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ (1995): मरणोपरांत प्रकाशित।
- सुकून की तलाश (1998): ग़ज़लों का संग्रह।
- कविताएँ
- उषा: (NCERT कक्षा 12 की ‘आरोह भाग-2’ में संकलित भोर के सौंदर्य और गतिशील बिंबों वाली अति-प्रसिद्ध कविता)।
- टूटी हुई बिखरी हुई
- अमन का राग: (प्रसिद्ध लंबी कविता)।
- एक पीली शाम
- दुआ
- गद्य एवं डायरी रचनाएँ
- निबंध / डायरी: दोआब (1948) – (काव्य-आलोचना और गद्य-चित्र)।
- कहानी: प्लाट का मोर्चा (1952) – (कहानी व स्केच संग्रह)।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977): काव्य-संग्रह ‘चुका भी हूँ मैं नहीं‘ के लिए।
- कबीर सम्मान (1989): मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान किया गया।
- मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (1987)
- निधन: 12 मई 1993 (अहमदाबाद, गुजरात)।
- ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के प्रमुख कवि हैं।
- उपाधि: ‘कवियों का कवि’ और ‘बिंबधर्मी कवि‘।
- ‘चुका भी हूँ मैं नहीं’ (साहित्य अकादमी 1977) तथा NCERT की कविता ‘उषा’
तुलसीदास
- गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) मूल नाम : रामबोला (Rambola)
- जन्म काल: 16वीं शताब्दी (विक्रम संवत 1589 / 1532 ई. के आसपास माना जाता है)
- जन्म स्थान: राजापुर गाँव, बांदा जिला (उत्तर प्रदेश) (कुछ विद्वान सूकरखेत/सोरो को भी मानते हैं)
- माता-पिता:
- माता: हुलसी
- पिता: आत्माराम दुबे
- पत्नी: रत्नावली (तुलसीदास जी के जीवन में वैराग्य का कारण इनकी पत्नी का ताना ही बना था)
- गुरु:
- दीक्षा गुरु: स्वामी नरहरियानंद (नरहरिदास)
- शिक्षा गुरु: शेष सनातन (काशी)
- भक्ति शाखा: सगुण भक्तिधारा की रामाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि
- समकालीन व्यक्तित्व: मुगल सम्राट अकबर, अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना, महाराजा मानसिंह, नाभादास
- प्रमुख रचनाएँ एवं पुस्तकें- तुलसीदास जी द्वारा रचित 12 प्रमुख प्रामाणिक ग्रंथ माने जाते हैं, जिन्हें भाषा के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:
- अवधी भाषा में रचित प्रमुख ग्रंथ:
- रामचरितमानस:
- तुलसीदास जी का सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य।
- रचना काल: 1574 ई. (संवत 1631) – अयोध्या में लेखन प्रारंभ हुआ, इसे पूरा करने में 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन लगे।
- कांड (Chapters): कुल 7 कांड हैं (क्रम: बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड, उत्तरकांड)।
- सबसे बड़ा कांड: बालकांड
- सबसे छोटा कांड: किष्किंधाकांड
- जानकी मंगल: सीता-राम विवाह का वर्णन।
- पार्वती मंगल: शिव-पार्वती विवाह का वर्णन।
- रामलला नहछू: संस्कार गीत और लोक शैली में रचित।
- बरवै रामायण: रहीम जी के आग्रह पर बरवै छंद में रचित।
- रामाज्ञा प्रश्न: ज्योतिष संबंधी ग्रंथ।
- रामचरितमानस:
- ब्रजभाषा में रचित प्रमुख ग्रंथ:
- विनय पत्रिका:
- कलिकाल (कलयुग) के कष्टों से मुक्ति के लिए श्रीराम के दरबार में भेजी गई प्रार्थना/अर्जी।
- शांत रस और विनय भाव का सर्वोच्च ग्रंथ।
- कवितावली: कवित्त और सवैया शैली में रचित (इसमें वाराणसी में फैली महामारी का भी वर्णन है)।
- गीतावली: संगीतात्मक पद (गेय पद शैली)।
- दोहावली: नीति और भक्ति संबंधी दोहों का संग्रह।
- कृष्ण गीतावली: श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन।
- वैराग्य संदीपनी: वैराग्य और संत महिमा पर आधारित।
- विनय पत्रिका:
- नोट: ‘हनुमान बाहुक‘ को कवितावली का ही एक भाग माना जाता है, जिसकी रचना तुलसीदास जी ने अपनी बाहु-पीड़ा (हाथ के दर्द) से मुक्ति के लिए की थी।
- उपाधियाँ, सम्मान एवं विद्वानों के कथन
- लोकनायक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘लोकनायक’ कहा।
- कलि काल का वाल्मीकि: नाभादास (भक्तमाल के रचयिता) ने इन्हें ‘कलिकाल का वाल्मीकि’ कहा।
- बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोकनायक: जॉर्ज ग्रियर्सन का प्रसिद्ध कथन।
- मुगल काल का सबसे बड़ा आदमी: प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ (V. A. Smith) का कथन।
- उत्प्रेक्षाओं का बादशाह: डॉ. उदयभानु सिंह के अनुसार।
- आनंदवन का वृक्ष: डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा प्रयुक्त शब्द।
- निधन वर्ष: 1623 ई. (विक्रम संवत 1680)
- स्थान: असी घाट, काशी (वाराणसी)
- प्रसिद्ध दोहा (निधन से संबंधित):
- “संंवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर।सावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर॥”
फिराक गोरखपुरी | रघुपति सहाय
- मूल नाम: रघुपति सहाय (Raghupati Sahay)
- तखल्लुस (उपनाम): फिराक़ (Firaq)
- जन्म तिथि: 28 अगस्त 1896
- जन्म स्थान: गोला बाज़ार, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
- पिता का नाम: मुंशी गोरख प्रसाद ‘इब्रत’ (जो स्वयं भी एक अच्छे वकील और शायर थे)
- शिक्षा व करियर:
- 1920 में ICS (भारतीय सिविल सेवा) में चयन हुआ, लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में आकर नौकरी छोड़ दी और 1.5 वर्ष की जेल भी काटी।
- बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध प्रोफेसर रहे।
- प्रमुख रचनाएँ, कविताएँ एवं पुस्तकें- फिराक़ गोरखपुरी उर्दू साहित्य और हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) के महानतम हस्ताक्षरों में से एक हैं।
- काव्य संग्रह एवं शायरी
- गुले-नग़मा (Gul-e-Naghma): इनका सबसे प्रसिद्ध काव्य संग्रह (1959 में प्रकाशित)।
- बज़्म-ए-जिंदगी रंग-ए-शायरी
- रूह-ए-कायनात
- नग़्म-ए-साज़
- ग़ज़लस्तान
- गुलिस्तान
- शेरिस्तान
- रुबाइयाँ (Rubaiyat) एवं कविताएँ:
- रुबाई (Rubai): फिराक़ जी ने उर्दू शायरी में लोक-जीवन और वात्सल्य (माँ और बच्चे के संबंध) को रुबाइयों के माध्यम से पिरोया। इनकी रुबाइयों पर ‘हिंदी’ और ‘अवधी’ लोक-संस्कृति का गहरा प्रभाव दिखता है।
- प्रसिद्ध कविता: ‘आधी रात को’ (उर्दू/हिंदी कविता)
- गद्य एवं आलोचनात्मक ग्रंथ
- उर्दू की इश्किया शायरी (उर्दू काव्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण ग्रंथ)
- मन आनम (पत्रों का संग्रह)
- हाशिया-ए-ख़याल
- पुरस्कार एवं सम्मान
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (Jnanpith Award):
- वर्ष: 1969
- कृति: ‘गुले-नग़मा‘ के लिए।
- विशेष तथ्य: उर्दू साहित्य का पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार फिराक़ गोरखपुरी को ही मिला था।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (Sahitya Akademi Award):
- वर्ष: 1960 (‘गुले-नग़मा’ के लिए)
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (Soviet Land Nehru Award):
- पद्म भूषण (Padma Bhushan): 1968 (भारत सरकार द्वारा देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान)
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (Jnanpith Award):
- विशेष तथ्य
- NCERT (कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2) में इनकी ‘रुबाइयाँ’ और ‘ग़ज़ल’ पाठ के रूप में शामिल हैं।
- इन्होंने उर्दू शायरी में क्लासिकी परंपरा और आधुनिक संवेदना का बेजोड़ संगम प्रस्तुत किया।
- प्रसिद्ध शेर:
- “आने वाली नस्लें तुम पर नाज़ करेंगी हम-असरो।” “जब उनको मालूम यह होगा तुमने फिराक़ को देखा था॥”
- निधन तिथि: 3 मार्च 1982
- स्थान: नई दिल्ली (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान – AIIMS)
उमाशंकर जोशी
- मूल नाम: उमाशंकर जेठालाल जोशी
- उपनाम (Pen Name): ‘वासुकी‘
- जन्म तिथि: 21 जुलाई 1911
- जन्म स्थान: बामणा गाँव, साबरकांठा जिला (गुजरात)
- शिक्षा व करियर:
- मुंबई विश्वविद्यालय से एम.ए. (M.A.) की उपाधि।
- गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) रहे।
- राज्यसभा सदस्य (1970–1976) के रूप में मनोनीत हुए।
- केंद्रीय साहित्य अकादमी के अध्यक्ष (1978–1983) रहे।
- साहित्यिक पहचान: मूलतः गुजराती भाषा के मूर्धन्य कवि, निबंधकार एवं एकांकीकार।
- काव्य संग्रह:
- निशीथ : इनका सबसे प्रसिद्ध काव्य संग्रह (1939 में प्रकाशित, जिसका अर्थ है ‘मध्य रात्रि’)।
- विश्वशांति: अहिंसा और गांधीवादी विचारों से प्रेरित प्रथम काव्य ग्रंथ।
- गंगोत्री
- महाप्रस्थान : पौराणिक प्रसंगों पर आधारित काव्य-नाटक (प्रबंध काव्य)।
- वसंत वर्षा
- अतिथि
- सप्तपर्णी
- धरा गुर्जर
- समग्र कविता: इनकी संपूर्ण कविताओं का एक विशाल संकलन।
- हिंदी पाठ्यपुस्तक (NCERT कक्षा 12 आरोह भाग-2) की प्रसिद्ध कविताएँ:
- छोटा मेरा खेत: खेती के रूपक के माध्यम से कविता-रचना की प्रक्रिया का सुंदर वर्णन।
- बगुलों के पंख : सुंदर प्राकृतिक दृश्य और सौन्दर्यानुभूति पर आधारित कविता।
- नोट: इन दोनों कविताओं का गुजराती से हिंदी अनुवाद रघुवीर सहाय जी ने किया है।)
- एकांकी : सापना भारा (सांप का भारा), शहीद
- कहानी संग्रह: श्रावणी मेळो (श्रावणी मेला), विशामो
- उपन्यास: पारका जण्या
- निबंध एवं आलोचना: गोष्ठी, उघाड़ी बारी, कवि नी साधना, शैलजा
- पुरस्कार एवं सम्मान
- भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (Jnanpith Award):
- वर्ष: 1967
- कृति: काव्य संग्रह ‘निशीथ‘ (Nishith) के लिए।
- विशेष तथ्य: यह पुरस्कार उन्हें कन्नड़ लेखक कुप्पली वेंकटप्पा पुटप्पा (कुवेंपु) के साथ संयुक्त रूप से मिला था।
- उमाशंकर जोशी ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले प्रथम गुजराती साहित्यकार हैं।
- रंजीतराम सुवर्ण चंद्रक (Ranjitram Suvarna Chandrak): 1939 (गुजराती साहित्य का सर्वोच्च सम्मान)।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार : 1973 (उनके आलोचनात्मक निबंध संग्रह के लिए)।
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार: साहित्यिक एवं सामाजिक योगदान के लिए।
- मानद उपाधियाँ: दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वभारती (शान्तिनिकेतन) द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि।
- भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (Jnanpith Award):
- साहित्य अकादमी के अध्यक्ष: उमाशंकर जोशी भारतीय साहित्य अकादमी (नई दिल्ली) के अध्यक्ष पद पर आसीन होने वाले गैर-हिंदी भाषी प्रमुख साहित्यकारों में से एक थे।
- गांधीवादी प्रभाव: इनकी रचनाओं में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीवादी दर्शन और मानवतावाद की स्पष्ट छाप दिखती है।
- संपादक: इन्होंने प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘संस्कृति’ (Sanskriti) का वर्षों तक सफल संपादन किया।
- निधन तिथि: 19 दिसंबर 1988 , मुंबई (कैंसर के इलाज के दौरान टाटा मेमोरियल अस्पताल में निधन)
जैनेन्द्र कुमार
- मूल/बचपन का नाम: आनंदी लाल
- जन्म तिथि: 2 जनवरी 1905
- जन्म स्थान: कौड़ियागंज, अलीगढ़ जिला (उत्तर प्रदेश)
- माता का नाम: रामदेवी
- पिता का नाम: प्यारेलाल
- शिक्षा व जीवन पथ:
- प्रारंभिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल में हुई।
- 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की पढ़ाई छोड़ दी।
- राजनीतिक आंदोलनों के कारण कई बार जेल गए।
- साहित्यिक पहचान: हिंदी साहित्य में ‘मनोवैज्ञानिक उपन्यास‘ तथा ‘आधुनिक हिंदी कहानी’ के प्रवर्तकों में शीर्ष स्थान। प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य के सबसे बड़े स्तंभ माने जाते हैं।
- उपन्यास — प्रकाशन वर्ष के साथ:
- परख (1929): इनका पहला उपन्यास (जिस पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला)।
- सुनीता (1936): क्रांतिकारी पृष्ठभूमि और स्त्री-पुरुष संबंधों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।
- त्यागपत्र (1937): जैनेन्द्र जी का सबसे प्रसिद्ध और कालजयी उपन्यास (मृणाल के जीवन-संघर्ष पर आधारित)।
- कल्याणी (1939)
- सुखदा (1952)
- विवर्त (1953)
- व्यतीत (1953)
- जयवर्धन (1956)
- मुक्तिबोध (1965): (इसी लघु उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला)।
- अनन्तर (1968)
- अनामस्वामी (1974)
- दशार्क (1985)
- कहानी संग्रह
- फांसी (1929): इनका पहला कहानी संग्रह।
- वातायन (1931)
- दो चिड़िया (1935)
- एक रात (1936)
- नीलम देश की राजकन्या (1938)
- ध्रुवयात्रा (1944)
- पाजेब (1948)
- जयसंधि (1949)
- NCERT (कक्षा 12 आरोह भाग-2) का प्रसिद्ध निबंध:
- बाजार दर्शन : उपभोक्तावाद, बाजारवाद और अर्थशास्त्र के मानवीय पहलुओं पर तीखा और सारगर्भित वैचारिक निबंध।
- निबंध संग्रह एवं वैचारिक ग्रंथ:
- प्रस्तुत प्रश्न (1936)
- जड़ की बात (1945)
- पूर्वोदय (1951)
- साहित्य का श्रेय और प्रेय (1953)
- मंथन (1953)
- सोच-विचार (1953)
- काम, प्रेम और परिवार (1953)
- समय और हम (1962)
- संस्मरण व अनूदित साहित्य:
- ये और वे: प्रसिद्ध संस्मरण।
- अनुवाद:
- मंदाकिनी (नाटक)
- पाप और प्रकाश (टॉलस्टॉय की रचनाओं का अनुवाद)।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (Sahitya Akademi Award):
- वर्ष: 1966
- कृति: उपन्यास ‘मुक्तिबोध’ के लिए।
- पद्म भूषण (Padma Bhushan): 1971
- मंगलाप्रसाद पारितोषिक: उपन्यास ‘परख’ के लिए मिला।
- साहित्य अकादमी फैलोशिप: 1979 में।
- मानद उपाधि: दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (Sahitya Akademi Award):
- भारत का गोर्की: मुंशी प्रेमचंद ने जैनेन्द्र कुमार को “भारत का गोर्की” (Russian writer Maxim Gorky) की उपाधि दी थी।
- मनोविश्लेषणवादी परंपरा: हिंदी उपन्यास साहित्य में मनोविश्लेषणवादी (Psychological) परंपरा की शुरुआत का श्रेय जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी को जाता है।
- गांधीवादी दर्शन: इनकी रचनाओं में जैन दर्शन के ‘अहिंसा’ और गांधीवादी विचारों की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है।
- व्यक्ति-परक कथा साहित्य: इन्होंने सामाजिक समस्याओं के स्थान पर व्यक्ति के अंतर्मन की उलझनों, आत्म-निरीक्षण और नैतिक प्रश्नों को साहित्य के केंद्र में रखा।
- निधन: 24 दिसंबर 1988 , नई दिल्ली
फणीश्वर नाथ रेणु
- मूल नाम: फणीश्वर नाथ मंडल
- उपनाम (Pen Name): रेणु
- जन्म तिथि: 4 मार्च 1921
- जन्म स्थान: औराही हिंगना गाँव, अररिया जिला (तत्कालीन पूर्णिया जिला), बिहार
- पिता का नाम: शिलानाथ मंडल
- शिक्षा व राजनीतिक जुड़ाव:
- प्रारंभिक शिक्षा भारत और नेपाल (विराटनगर) में हुई।
- 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भागीदारी निभाई।
- 1950 में नेपाल में राणाशाही के खिलाफ हुए सशस्त्र लोकतान्त्रिक क्रांति आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- जयप्रकाश नारायण (JP) के छात्र आंदोलन और ‘संपूर्ण क्रांति’ से भी जुड़े रहे।
- साहित्यिक पहचान: हिंदी साहित्य में ‘आंचलिक उपन्यास’ (Regional Novel) की नींव रखने वाले और अंचल (क्षेत्र विशेष) की संस्कृति, बोली, लोकगीतों व संवेदनाओं को कथा साहित्य में जीवंत करने वाले अग्रणी साहित्यकार।
- प्रसिद्ध उपन्यास (Novels):
- मैला आँचल (1954):
- हिंदी साहित्य का प्रथम और सबसे महान आंचलिक उपन्यास।
- पृष्ठभूमि: पूर्णिया जिले का ‘मेरीगंज‘ गाँव।
- मुख्य पात्र: डॉ. प्रशांत, कमली, बावनदास, विश्वनाथ प्रसाद, तहसीलदार।
- परती परिकथा (1957):
- पृष्ठभूमि: पूर्णिया का ‘परानपुर’ गाँव और कोसी नदी का तटीय क्षेत्र।
- दीर्घतपा (1961): पटना के एक वर्किंग विमेंस हॉस्टल की कहानी और महानगरीय विषमताओं का चित्रण।
- जुलूस (1965): पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए विस्थापित शरणार्थियों की समस्याओं पर आधारित।
- कितने चौराहे (1966): स्वतंत्रता आंदोलन और युवा वर्ग की आदर्शवादी मानसिकता पर आधारित।
- पलटू बाबू रोड (1979): मरणोपरांत प्रकाशित।
- मैला आँचल (1954):
- प्रसिद्ध कहानी संग्रह
- ठुमरी (1959): इनकी प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह (जिसमें ‘तीसरी कसम’ शामिल है)।
- आदिम रात्रि की महक (1967)
- अग्निखोर (1973)
- एक श्रावणी दोपहरी की धूप (1984)
- अच्छे आदमी (1986)
- NCERT पाठ्यपुस्तकों की प्रसिद्ध रचनाएँ:
- पहलवान की ढोलक: कक्षा 12 आरोह भाग-2 (व्यवस्था परिवर्तन और लोककला के लुप्त होने पर आधारित कहानी)।
- इस जल प्रलय में : कक्षा 9 कृतिका (1975 के पटना बाढ़ का सजीव रिपोर्ताज)।
- रिपोर्ताज एवं संस्मरण (Reportage & Memoirs): हिंदी साहित्य में रिपोर्ताज लेखन को विधागत पहचान दिलाने में रेणु जी का प्रमुख योगदान रहा है।
- ऋणजल-धनजल (1977): बाढ़ और सूखे पर लिखा गया ऐतिहासिक रिपोर्ताज।
- नेपाली क्रांति कथा (1977): नेपाल के जनक्रांति आंदोलन पर आधारित रिपोर्ताज।
- श्रुत-अश्रुत पूर्व (1984): संस्मरण।
- वनतुलसी की गंध (1984): संस्मरण।
- समय की शह पर: गद्य संकलन।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- पद्म श्री (Padma Shri): 1970
- भारत सरकार द्वारा इनके प्रथम उपन्यास ‘मैला आँचल’ की अभूतपूर्व सफलता और साहित्यिक योगदान के लिए दिया गया था।
- नोट: 1977 में देश में आपातकाल के विरोध में तथा जेपी आंदोलन के समर्थन में इन्होंने अपना पद्म श्री पुरस्कार सरकार को लौटा दिया था।)
- पद्म श्री (Padma Shri): 1970
- विशेष तथ्य
- आंचलिकता का जनक: हिंदी कथा साहित्य में आंचलिक शैली (ग्राम्य जीवन, स्थानीय बोलियाँ, रीति-रिवाज, लोकगीत) को केंद्रीय स्थान दिलाने का श्रेय रेणु जी को ही जाता है।
- ‘तीसरी कसम’ पर बनी फिल्म: इनकी प्रसिद्ध कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफ़ाम‘ पर इसी नाम से एक बेहद प्रसिद्ध फीचर फिल्म (तीसरी कसम) बनी, जिसका निर्माण शैलेन्द्र ने किया था और मुख्य भूमिका में राज कपूर व वहीदा रहमान थे।
- मैला आँचल और गोदान की तुलना: आलोचकों के अनुसार, मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद ग्रामीण भारत की सबसे प्रामाणिक सामाजिक-सांस्कृतिक तस्वीर ‘मैला आँचल’ में देखने को मिलती है।
- निधन तिथि: 11 अप्रैल 1977 , पटना (बिहार)
विष्णु खरे
- विष्णु खरे (Vishnu Khare) जन्म तिथि: 9 फरवरी 1940
- जन्म स्थान: छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश)
- शिक्षा व करियर:
- इंदौर (मध्य प्रदेश) से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. (M.A.)।
- प्रारंभिक दौर में नवभारत टाइम्स (लखनऊ व दिल्ली) में वरिष्ठ उप-संपादक और प्रभारी संपादक रहे।
- केंद्रीय साहित्य अकादमी के उप-सचिव (Deputy Secretary) पद पर रहे।
- जर्मनी में भारत के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भी कार्य किया।
- साहित्यिक पहचान: समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख स्तंभ, प्रखर पत्रकार, बेबाक आलोचक, अनुवादक और सिनेमा-समीक्षक (Film Critic)।
- प्रसिद्ध काव्य संग्रह
- एक गैर-रोमानी समय में (1970): इनका पहला स्वतंत्र काव्य संग्रह।
- खुद अपनी आँख से (1978)
- सबकी आवाज़ के पर्दे में (1994)
- पिछला बाक़ी (1998)
- काल और अवधि के दौरान (2003)
- टी-शर्ट (2007)
- रास्ता इधर से है
- NCERT (कक्षा 11 आरोह भाग-1) की प्रसिद्ध रचनाएँ:
- एक कम (Ek Kam): स्वतंत्रता-उत्तर भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य।
- सत्य (Satya): पौराणिक संदर्भ (महाभारत के युधिष्ठिर और विदुर) के माध्यम से सत्य के बदलते स्वरूप और उसकी अनिश्चितता का विश्लेषण।
- आलोचना, सिनेमा और गद्य साहित्य:
- आलोचना का पक्ष (1984): साहित्यिक समीक्षा और आलोचनात्मक ग्रंथ।
- सिनेमा पढ़ने के तरीके: भारतीय और विश्व सिनेमा पर उनकी गहरी और पैनी समीक्षाओं का संग्रह।
- डिक्लेरेशन (1965): हिंदी कविता का एक महत्वपूर्ण संकलन।
- प्रसिद्ध अनुवाद- विष्णु खरे जी विश्व साहित्य के महान अनुवादक माने जाते हैं:
- मरू प्रदेश (1960): टी. एस. एलियट (T. S. Eliot) की विश्वप्रसिद्ध कविता ‘द वेस्ट लैंड‘ (The Waste Land) का हिंदी अनुवाद।
- यह चाकू समय (1983): अत्तिला जोसेफ़ (हंगेरियाई कवि) की कविताओं का अनुवाद।
- यह अनंतर (1990): रोलां तोपोर (फ़्रांसीसी लेखक) की रचनाओं का अनुवाद।
- कालेवाला (Kalevala): फ़िनलैंड के प्रसिद्ध राष्ट्रीय महाकाव्य का हिंदी में पद्यानुवाद।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट रोज़ (Knight of the Order of the White Rose):
- प्रदाता: फ़िनलैंड सरकार (वर्ष 1999)।
- कारण: फ़िनिश महाकाव्य ‘कालेवाला’ का हिंदी में उत्कृष्ट अनुवाद करने के लिए।
- रघुवीर सहाय सम्मान: समकालीन हिंदी कविता में विशिष्ट योगदान के लिए।
- शिखर सम्मान: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च योगदान हेतु।
- मैथिलीशरण गुप्त सम्मान: मध्य प्रदेश शासन द्वारा।
- हिंदी अकादमी सम्मान: दिल्ली सरकार द्वारा।
- नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट रोज़ (Knight of the Order of the White Rose):
- विशेष तथ्य
- सिनेमा समीक्षा में अग्रणी: हिंदी साहित्य में गंभीर और शास्त्रीय स्तर पर सिनेमा समीक्षा (Film Criticism) को स्थापित करने वाले गिने-चुने लेखकों में विष्णु खरे जी प्रमुख हैं।
- स्पष्टवादी व बेबाक शैली: इनकी कविताओं में रोमानियत और भावुकता के बजाय ठोस यथार्थ, सामाजिक-राजनीतिक विद्रूपताओं पर सीधा प्रहार और आक्रामकता देखने को मिलती है।
- विश्व साहित्य से जुड़ाव: ये अनुवाद के माध्यम से यूरोपीय, फ़िनिश और हंगेरियाई साहित्य को हिंदी पाठकों तक लाने वाले प्रमुख सेतु बने।
- निधन: 19 सितंबर 2018 , नई दिल्ली (मस्तिष्क आघात / ब्रेन स्ट्रोक के कारण जीबी पंत अस्पताल में निधन)
रजिया सज्जाद जहीर
- पूरा नाम: रज़िया सज्जाद ज़हीर
- जन्म तिथि: 15 फरवरी 1917
- जन्म स्थान: अजमेर, राजस्थान
- शिक्षा:
- घर पर रहकर बी.ए. तक की शिक्षा।
- विवाह के पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
- पति का नाम: सज्जाद ज़हीर (ये एक प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के संस्थापकों में से एक थे)।
- कार्यक्षेत्र:
- 1947 में अजमेर से लखनऊ आईं और वहाँ ‘करामत हुसैन गर्ल्स कॉलेज‘ में प्राध्यापिका बनीं।
- बाद में 1965 में इनकी नियुक्ति ‘सोवियत सूचना विभाग’ में हुई।
- भाषा: मूलतः उर्दू की कथाकार थीं, लेकिन इनकी रचनाएँ हिंदी और अन्य भाषाओं में भी अत्यधिक लोकप्रिय हुईं।
- कहानी संग्रह:
- जर्द गुलाब (यह इनका सबसे प्रसिद्ध उर्दू कहानी संग्रह है, )।
- नोट: इनकी अधिकांश कहानियाँ देवनागरी (हिंदी) लिपि में भी प्रकाशित हो चुकी हैं।
- उपन्यास (Novels):
- सर-ए-शाम (1953)
- काँटे (1954)
- सुमन (1963)
- अल्लाह मेघ दे (1973)
- बाल साहित्य
- नेहरू का भतीजा (1954)
- सुल्तान ज़ैनुल आबिदीन बादशाह
- प्रसिद्ध कहानियाँ:
- नमक (NCERT सिलेबस की सबसे महत्वपूर्ण कहानी)
- मेहमान रहमत या जहमत
- अनुवाद कार्य:
- इन्होंने कई प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों का उर्दू में सफल अनुवाद भी किया (जैसे- ‘अल्लाह दे बंदा ले’)।
- कविता :
- रज़िया सज्जाद ज़हीर मुख्य रूप से एक गद्य लेखिका (कथाकार) थीं। साहित्य के इतिहास में इनका नाम कवयित्री के रूप में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में दर्ज है।
- सम्मान और पुरस्कार
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1966)
- उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार (1972)
- अखिल भारतीय लेखिका संघ अवार्ड
- मुसन्नाफीन अवार्ड
- निधन (Death) – 18 दिसंबर 1979 , दिल्ली
- विशेष तथ्य
- NCERT का ‘नमक’ अध्याय: कक्षा 12वीं (CBSE/NCERT) की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में इनकी कहानी ‘नमक’ संकलित है।
- कहानी का विषय: यह भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद विस्थापित लोगों के दिलों में अपने वतन के प्रति धड़कते प्रेम की मार्मिक कहानी है (जिसमें सफिया और सिख बीबी का किरदार प्रमुख है)।
- साहित्यिक विशेषता: इनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ, धार्मिक सहिष्णुता, और मानवीय गुणों का बहुत सहज सामंजस्य देखने को मिलता है। इनकी भाषा बहुत सरल, सहज और मुहावरेदार है।
- प्रगतिशील आंदोलन: अपने पति सज्जाद ज़हीर के साथ ये ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ (Progressive Writers Association) से गहरे स्तर पर जुड़ी रहीं और उर्दू साहित्य में महिलाओं के संघर्ष और उनकी आवाज़ को प्रमुखता दी।
- NCERT का ‘नमक’ अध्याय: कक्षा 12वीं (CBSE/NCERT) की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में इनकी कहानी ‘नमक’ संकलित है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी
- मूल नाम: वैद्यनाथ द्विवेदी
- जन्म तिथि: 19 अगस्त 1907
- जन्म स्थान: आरत दुबे का छपरा (आरत पुर), बलिया जिला (उत्तर प्रदेश)
- पिता का नाम: अनमोल द्विवेदी
- माता का नाम: ज्योतिष्मती
- उपाधि: ज्योतिषाचार्य (1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से)
- कार्यक्षेत्र:
- शान्तिनिकेतन (1930–1950 तक हिंदी भवन के अध्यक्ष)
- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़) में हिंदी विभागाध्यक्ष
- रचनाएँ एवं पुस्तकें – आचार्य द्विवेदी ने कविताएँ नहीं लिखीं; वे मुख्य रूप से निबंध, उपन्यास, और आलोचना के लिए जाने जाते हैं।
- प्रसिद्ध उपन्यास (Novels):
- बाणभट्ट की आत्मकथा (1946): संस्कृत कवि बाणभट्ट के जीवन पर आधारित कालजयी ऐतिहासिक उपन्यास।
- चारु चंद्रलेख (1963): मध्यकालीन पृष्ठभूमि पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास।
- पुनर्नवा (1973): पौराणिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
- अनामदास का पोथा (1976): उपनिषदिक (छान्दोग्य उपनिषद) पृष्ठभूमि पर आधारित।
- निबंध संग्रह
- अशोक के फूल (1948): ललित निबंधों का प्रसिद्ध संग्रह।
- कुटज (1964): जीविषा और जीवन-दर्शन पर आधारित प्रसिद्ध निबंध।
- आलोक पर्व (1972): निबंध संग्रह (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त)।
- कल्पलता (1951)
- विचार और वितर्क (1957)
- विचार-प्रवाह (1959)
- विष के दंत / साहित्य सहचर
- इतिहास ग्रंथ
- हिंदी साहित्य की भूमिका (1940)
- हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)
- हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास (1952)
- आलोचनात्मक ग्रंथ
- सूर साहित्य (1936): इनकी पहली व्यावहारिक आलोचनात्मक पुस्तक।
- कबीर (1942): कबीर पर ऐतिहासिक शोध और मूल्यांकन (कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ इसी ग्रंथ में कहा)।
- कालिदास की लालित्य योजना (1965)
- नाथ संप्रदाय (1950)
- मध्यकालीन धर्मसाधना
- सहज साधना
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार – वर्ष: 1973
- कृति: निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए।
- पद्म भूषण- 1957 (भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए)।
- डी.लिट. (D.Litt.) की मानद उपाधि:- 1957 में लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई।
- तगारे पुरस्कार: शान्तिनिकेतन में अध्यापन के दौरान प्रदान किया गया।
- मंगलाप्रसाद पारितोषिक: ‘कबीर’ ग्रंथ पर प्राप्त हुआ।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार – वर्ष: 1973
- कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ कहा: द्विवेदी जी ने कबीरदास जी की भाषा-शैली पर टिप्पणी करते हुए उन्हें “भाषा का डिक्टेटर” (Dictator of Language) कहा था।
- आदिकाल का नामकरण: रामचंद्र शुक्ल के ‘वीरगाथा काल’ का खंडन करते हुए इन्होंने ही इस काल को ‘आदिकालीन साहित्य’ / ‘आदिकाल’ नाम दिया, जो सर्वमान्य हुआ।
- भक्तिकवि कबीर का पुनर्मूल्यांकन: रामचंद्र शुक्ल द्वारा उपेक्षित कबीर को हिंदी साहित्य में शीर्ष स्थान दिलाने का श्रेय हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को ही जाता है।
- मानवतावादी दृष्टिकोण: इनका प्रसिद्ध कथन है— “मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ।”
- निधन तिथि: 19 मई 1979 , स्थान: दिल्ली
भीमराव अम्बेडकर
- जन्म : 14 अप्रैल, सन् 1891, मह्ू (मध्य प्रदेश)में
- प्रमुख रचनाएँ :
- दें कास्ट्स इन इंडिया, देयर मेकेिनज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (1917, प्रथम प्रकाशित कृति);
- द अनटचेबल्स, हू आर दे? (1948);
- हू आर द शूद्राज (1946);
- बुद्धा एंड हिज धम्मा (1957);
- थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेंट्स (1955);
- द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी(1923);
- द एबोलुशन ऑफ़ प्रोविशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया (पीएच.डी. की थीसिस, 1916);
- द राइज एंड फॉल ऑफ़ द हिंदू वीमैन (1965);
- एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट(1936);
- लेबर एंड पालिंग्यामेंट्री डैमोक्रेसी(1943);
- बुद्धिजम एंड कम्युनिक्स(1956), (पुस्तकें व भाषण);
- मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता (पत्रिका-संपादन);
- हिंदी में उनका संपूर्ण वाड़मय भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय से बाबा साहब ऑबेडकर संपूर्ण वाड़मय नाम से 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है
- निधन : दिसंबर, सन् 1956 दिल्ली में
- अगर इंसानों के अनुरूप जीनें की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है।
- मानव-मुक्ति के पुरोधा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अपने समय के सबसे सुपठित जनों में से एक थे। प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयाकं(अमेरिका)फिर वहाँ से लंदन गए। उन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक और पूरा वैदिक वाड़मय अनुवाद के जरिये पढ़ा और ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत की। सब मिलाकर वे इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बन कर उभरे। स्वदेश में कुछ समय उन्होंने वकालत भी की। समाज और राजनीति में बेहद सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने अछूतों, स्त्रियों और मजदूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया।
- उन्होंने जीवन भर दलितों की मुक्ति एवं सामाजिक समता के लिए संघर्ष किया।
- दलित जाति में जन्मे डॉ. ऑबेडकर को बचपन से ही जाति-आधारित उत्पीड़न-शोषण एवं अपमान से गुजरना पड़ा था। इसीलिए विद्यालय के दिनों में जब एक अध्यापक ने उनसे पूछा कि “तुम पढ़-लिख कर क्या बनोगे?” तो बालक भीमराव ने जवाब दिया था मैं पढ़-लिख कर वकील बनूँगा, अछूतों के लिए नया कानून बनाऊँगा और छुआछूत को खत्म कलूँगा।
- दासता का सबसे व्यापक व गहन रूप सामाजिक दासता है और उसके उन्मूलन के बिना कोई भी स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार रहेगी, इसलिए अधूरी होगी।
- उनके चिंतन व रचनात्मकता के मुख्यतः तीन प्रेरक व्यक्ति रहें–बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले।
- जातिवादी उत्पीड़न के कारण हिंदू समाज से मोहभंग होने के बाद वे बुद्ध के समतावादी दर्शन में आश्वस्त हुए और 14 अक्तूबर, सन् 1956 को 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध मतानुयायी बन गए।
- यहाँ प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के विश्व्यात भाषण एनीहिलेशन ऑफ कास्ट ( 1936 ) के ललई सिंह यादव द्वारा कृत हिंदी-रूपांतर जाति-भेद का उच्छेद के दो प्रकरणों के तौर पर है।
- यह भाषण जाति तोड़क मंडल (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन (सन् 1936) के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था; परंतु इसकी क्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्णतः सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और यह पढ़ा न जा सका। बाद में, आंबेडकर ने इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया, जो पर्याप्त लोकप्रिय हुई।
- उनके अनुसार समानता, स्वतंत्रता व बंधुता– ये तीन तत्त्व आदर्श समाज में अनिवार्यतः होने चाहिए, जिससे लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के अर्थ तक भी पहुँचे।
मनोहर श्याम जोशी
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जन्म – सन् 1935, कुमाऊँ में।
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हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार और टेलीविज़न धारावाहिक लेखक ।
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लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक ।
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दिनमान पत्रिका में सहायक संपादक और साप्ताहिक हिंदुस्तान में संपादक के रूप में कार्य ।
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सन् ’84 में भारतीय दूरदर्शन के प्रथम धारावाहिक हम लोग के लिए कथा-पटकथा लेखन शुरू करने के बाद से मृत्युपर्यंत स्वतंत्र लेखन ।
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प्रमुख रचनाएँ:
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कुरु कुरु स्वाहा,
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कसप,
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हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी,
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हमज़ाद,
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क्याप (कहानी संग्रह);
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एक दुर्लभ व्यक्तित्व,
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कैसे किस्सागो,
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मंदिर घाट की पौड़ियाँ,
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ट-टा प्रोफ़ेसर षष्ठी वल्लभ पंत,
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नेताजी कहिन,
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इस देश का यारों क्या कहना (व्यंग्य-संग्रह);
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बातों-बातों में, इक्कीसवीं सदी ( साक्षात्कार – लेख – संग्रह);
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लखनऊ मेरा लखनऊ,
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पश्चिमी जर्मनी पर एक उड़ती नज़र (संस्मरण-संग्रह);
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हम लोग,
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बुनियाद,
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मुंगेरी लाल के हसीन सपने (टेलीविज़न धारावाहिक)।
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क्याप के लिए 2005 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।
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निधन – सन् 2006, दिल्ली में ।
आनन्द यादव
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जन्म: 1935, कागल, कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में।
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पूरा नाम आनंद रतन यादव।
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पाठकों के बीच आनंद यादव के नाम से परिचित ।
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मराठी एवं संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर डॉ. आनंद यादव बहुत समय तक पुणे विश्वविद्यालय में मराठी विभाग में कार्यरत रहे।
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अब तक लगभग पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित।
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उपन्यास के अतिरिक्त कविता-संग्रह समालोचनात्मक निबंध आदि पुस्तकें भी प्रकाशित ।
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भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित नटरंग हिंदी – पाठकों के बीच भी चर्चित ।
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जूझ उपन्यास – 1990 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित है।
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निधन – सन् 2016 में।
ओम थानवी
- जन्म – सन् 1957 में।
- शिक्षा-दीक्षा बीकानेर में।
- राजस्थान विश्वविद्यालय से व्यावसायिक प्रशासन में MCom।
- एडीटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के महासचिव ।
- 1980 से 1989 तक नौ वर्ष ‘राजस्थान पत्रिका’ में रहे।
- ‘इतवारी पत्रिका’ के संपादन ने साप्ताहिक को विशेष प्रतिष्ठा दिलाई। सजग और बौद्धिक समाज में इतवारी पत्रिका ने अपने दौर में विशिष्ट स्थान बनाया।
- अपने सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों के लिए जाने जाते हैं। अभिनेता और निर्देशक के रूप में स्वयं रंगमंच पर सक्रिय रहे हैं। साहित्य, कला, सिनेमा, वास्तुकला, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहन दिलचस्पी रखते हैं।
- अस्सी के दशक में सेंटर फ़ॉर साइंस एनवायरमेंट (सीएसई) की फ़ेलोशिप पर राजस्थान के पारंपरिक जल स्रोतों पर खोजबीन कर विस्तार से लिखा ।
- पत्रकारिता के लिए अन्य पुरस्कारों के साथ गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार प्रदत्त ।
- 1999 से संपादक के नाते दैनिक जनसत्ता दिल्ली और कलकत्ता के संस्करणों का दायित्व सँभाला।
ऐन फ्रैंक
- ऐन फ्रैंक का जन्म 12 जून, 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफ़र्ट शहर में
- मृत्यु – नाज़ियों के यातनागृह में 1945 के फरवरी या मार्च महीने में।
- ऐन फ्रैंक की डायरी दुनिया की सबसे ज़्यादा पढ़ी गई किताबों में से एक है।
- मूलतः डच भाषा में 1947 में प्रकाशित यह कृति अंग्रेज़ी में दी डायरी ऑफ़ द यंग गर्ल शीर्षक से 1952 में प्रकाशित हुई।
- तब से इसके संपादित, असंपादित, आलोचनात्मक, विस्तृत-अनेक तरह के संस्करण आ चुके हैं, इस पर फ़िल्म, नाटक, धारावाहिक इत्यादि का निर्माण हो चुका है और यह डायरी किसी-न-किसी वजह से लगातार चर्चा में रही है।
