- हरिवंश राय बच्चन
- पूरा नाम: हरिवंश राय श्रीवास्तव ‘बच्चन’
- जन्म: 27 नवंबर 1907 (प्रतापगढ़ / इलाहाबाद / प्रयागराज, उत्तर प्रदेश)
- साहित्यिक पहचान: हिंदी साहित्य में ‘हालावाद’ (Halavada) के जनक/प्रवर्तक।
- उपनाम/विशेषता: इन्हें “हिंदी का बायरोन” (Byron of Hindi) भी कहा जाता है।
- प्रमुख रचनाएँ:
- प्रसिद्ध ‘मधु-काव्य’ त्रयी (Trilogy)/काव्य-संग्रह
- मधुशाला (1935): इनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी रचना।
- मधुबाला (1938)
- मधुकलश (1938)
- प्रमुख काव्य रचनाएँ
- निशा निमंत्रण (1938)
- एकांत संगीत (1939)
- आकुल अंतर (1943)
- सतरंगिनी (1945)
- बंगाल का काल (1946)
- हलाहल (1946)
- खादी के फूल (1948): सुमित्रानंदन पंत के साथ मिलकर लिखा गया काव्य-संग्रह।
- सूत की माला (1948)
- मिलन यामिनी (1950)
- प्रणय पत्रिका (1955)
- धार के इधर-उधर (1957)
- त्रिभंगिमा (1961)
- चार खेमे चौंसठ खूँटे (1962)
- दो चट्टानें (1965)
- आर्ट और मंडप (1968)
- आरती और अंगारे,
- नए पुराने झरोखे,
- टूटी-फूटी कड़ियाँ
- प्रसिद्ध आत्मकथा (Autobiography – 4 Parts)- हिंदी साहित्य की सबसे बेहतरीन आत्मकथाओं में से एक, जो 4 खंडों में प्रकाशित हुई:
- क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969)
- नीड़ का निर्माण फिर (1970)
- बसेरे से दूर (1977)
- दशद्वार से सोपान तक (1985)
- अनुवादित एवं अन्य गद्य रचनाएँ
- अनुवाद:
- मैकबेथ (शेक्सपियर के नाटक हैमलेट का हिंदी अनुवाद)
- ओथेलो (शेक्सपियर के नाटक का हिंदी अनुवाद)
- भगवद्गीता (जनगीता नाम से अनुवाद)
- उमर ख़य्याम की रुबाइयाँ
- डायरी: प्रवास की डायरी (1971)
- प्रसिद्ध ‘मधु-काव्य’ त्रयी (Trilogy)/काव्य-संग्रह
- उनका पूरा वाङ्मय ‘बच्चन ग्रंथावली’ के नाम से दस खंडों में प्रकाशित।
- पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968): काव्य-संग्रह ‘दो चट्टानें‘ के लिए।
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1966): रूसी कविताओं के अनुवाद के लिए।
- पद्म भूषण (1976): भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए।
- सरस्वती सम्मान (1991): इनकी 4 खंडों वाली आत्मकथा के लिए (यह प्रथम सरस्वती सम्मान था)।
- निधन : 18 जनवरी 2003 (मुंबई, महाराष्ट्र)।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले
- 1942-1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबद्ध, फिर विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे।
- मध्ययुगीन फ़ारसी के कवि उमर खय्याम का मस्तानापन हरिवंश राय बच्चन की प्रारंभिक कविताओं विशेषकर मधुशाला में एक अद्भुत अर्थ विस्तार पाता है- जीवन एक तरह का मधुकलश है, दुनिया मधुशाला है, कल्पना साकी और कविता वह प्याला जिसमें ढालकर जीवन पाठक को पिलाया जाता है।
- कविता का एक घुट जीवन का एक घूँट है। पूरी तन्मयता से जीवन का घूँट भरें, कड़वा खट्टा भी सहज भाव से स्वीकार करें तो अंततः एक सूफियाना-सी बेखयाली मन पर छाएगी, एक के बहाने सारी दुनिया से इश्क हो जाएगा, और तेरा मेरा के समस्त झगड़े कापूर हो जाएँगे। इसे बच्चन का हालावादी दर्शन कहते हैं।
- बच्चन का कवि-रूप सबसे विख्यात है, पर उन्होंने कहानी, नाटक, डायरी आदि के साथ बेहतरीन आत्मकथा भी लिखी है-जो ईमानदार आत्मस्वीकृति और प्रांजल शैली के कारण निरंतर पठनीय बनी हुई है।
- यहाँ उनकी कविता आत्मपरिचय तथा गीत संग्रह निशा निमंत्रण का एक गीत दिया जा रहा है।
- अपने को जानना दुनिया को जानने से ज्यादा कठिन है।
- समाज से व्यक्ति का नाता खट्टा-मीठा तो होता ही है। जगजीवन से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं! दुनिया अपने व्यंग्य-बाण और शासन-प्रशासन से चाहे जितना कष्ट दे, पर दुनिया से कटकर मनुष्य रह भी नहीं पाता। क्योंकि उसकी अपनी अस्मिता, अपनी पहचान का उत्स, उसका परिवेश ही उसकी दुनिया है – अपना परिचय देते हुए वह लगातार दुनिया से अपनेद्विधात्मक और द्वंद्वात्मक संबंधों का मर्म ही उद्घाटित करता चलता है और पूरी कविता का सारांश एक पंक्ति में यह बनता है कि दुनिया से मेरा संबंध प्रीतिकलह का है, मेरा जीवन विरुद्धों का सामंजस्य है- उन्मादों में अवसाद, रोदन में राग, शीतल वाणी में आग, विरुद्धों का विरोधाभासमूलक सामंजस्य साधते-साधते ही वह बेखुदी, वह मस्ती, वह दीवानगी व्यक्तित्व में उतर आई है कि दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ जैसा कुछ कहने का ठस्सा पैदा हुआ है। यह ठस्सा ही छायावादोत्तर गीतिकाव्य का प्राण है। किसी असंभव आदर्श (यूटोपिया) की तलाश में सारी दुनियादारी ठुकराकर उस भाव से दुनिया से इन्हें कोई वास्ता नहीं है। प्रीति-कलह का यही वितान और विरोधाभास का यह विग्रह इन्हें दूर टिमटिमाते तारे की अबूझ रहस्यात्मकता से लहालोट रखता है।
- निशा निमंत्रण से उद्धृत गीत में प्रकृति के दैनिक परिवर्तनशीलता के संदर्भ में प्राणि वर्ग (विशेषकर मनुष्य) के धड़कते हृदय को सुनने की काव्यात्मक कोशिश है। बहुत ही सरल सर्वानुभूत बिंबों के ज़रिये किसी अगोचर सत्य की रूहानी छुअन महसूस करा देना बच्चन की जो अलग विशेषता है, यह गीत उसका एक बेहतर नमूना है। किसी प्रिय आलंबन या विषय से भावी साक्षात्कार का आश्वासन ही हमारे प्रयास के पगों की गति में चंचल तेजी भर सकता है- अन्यथा हम शिथिलता और फिर जड़ता को प्राप्त होने के अभिशिप्त हो जाते हैं। गीत इस बड़े सत्य के साथ समय के गुज़रते जाने के एहसास में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ कर गुज़रने का जज्बा भी लिए हुए है।
आत्मपरिचय
- मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
- कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर में सांसो के दो तार लिए फिरता है
- मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ, मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
- जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते, मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
- मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
- है यह अपूर्ण संसार न मुझको मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
- मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ, सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;
- जग भव-सागर तरने को नाव बनाए, मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!
- मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ, उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
- जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर, मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ।
- कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना ? नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना !
- फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना !
- मैं और, और जग और, कहाँ का नाता, मैं बना बना कितने जग रोज़ मिटाता;
- जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता !
- मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ, शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
- हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर, मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
- मैं रोया, मैं इसको तुम कहते हो गाना, फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
- क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए, मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
- मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ, मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;
- जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए, मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ।
एक गीत दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
- हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नहीं-
- यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
- बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झाँक रहे होंगे-
- यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
- मुझसे मिलने को कौन विकल ?
- मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
- यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
