- कुँवर नारायण जन्म : 19 सितंबर 1927
- (फ़ैज़ाबाद / अयोध्या, उत्तर प्रदेश)
- साहित्यिक युग / काव्यधारा: नई कविता / ‘तीसरा सप्तक’ (1959 ई. – अज्ञेय द्वारा संपादित) के प्रमुख कवि।
- प्रमुख रचनाएँ :
- प्रमुख काव्य रचना
- चक्रव्यूह (1956),
- परिवेश : हम-तुम (1961)
- अपने सामने (1979)
- कोई दूसरा नहीं (1993)
- इन दिनों (2002)
- हाशिए का गवाह (2009)
- प्रबंध काव्य / खंडकाव्य
- आत्मजयी (1965):
- कठोपनिषद के ‘नचिकेता’ प्रसंग पर आधारित अत्यंत प्रसिद्ध विचार-प्रधान प्रबंध काव्य।
- वाजश्रवा के बहाने (2008): ‘आत्मजयी’ का ही अगला वैचारिक विस्तार (नचिकेता के पिता वाजश्रवा के दृष्टिकोण से)।
- आत्मजयी (1965):
- गद्य एवं कहानी रचना
- कहानी संग्रह: आकारों के आसपास (1973)
- समीक्षा / विचार-प्रबंध: आज और आज से पहले (1998)
- साक्षात्कार संग्रह: मेरे साक्षात्कार (1999)
- प्रमुख काव्य रचना
- प्रमुख पुरस्कार :
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1995): काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं‘ के लिए।
- व्यास सम्मान (1995): ‘आत्मजयी‘ के लिए।
- कबीर सम्मान (1997)
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (2005): हिंदी साहित्य में उनके संपूर्ण योगदान के लिए (यह भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है)।
- पद्म भूषण (2009): भारत सरकार द्वारा नागरिक सम्मान।
- अन्य सम्मान:
- शलाका सम्मान
- लोहिया सम्मान
- प्रेमचंद पुरस्कार
- कुमारन आशान पुरस्कार
- निधन – 15 नवंबर 2017 (नई दिल्ली)।
- हिंदी साहित्य की ‘नई कविता’ और ‘प्रयोगवाद‘ के इतिहास में ‘तीसरा सप्तक’ एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव है। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से इससे संबंधित मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
- संपादक: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
- प्रकाशन वर्ष:1959 ई.
- प्रकाशन संस्थान: भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
- विशेषता: अज्ञेय द्वारा संपादित ‘सप्तक’ श्रृंखला (तार सप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक, चौथा सप्तक) का यह तीसरा काव्य-संग्रह है, जिसमें 7 प्रयोगवादी/नई कविता के कवियों की रचनाएँ संकलित हैं।
- सप्तक क्रम
- 1. तार सप्तक: 1943 ई.
- 2. दूसरा सप्तक: 1951 ई.
- 3. तीसरा सप्तक: 1959 ई.
- 4. चौथा सप्तक: 1979 ई.
- ‘तीसरा सप्तक’ के 7 कवि
- 1. कुँवर नारायण
- 2. केदारनाथ सिंह
- 3. कीर्ति चौधरी (सप्तक परंपरा की दूसरी महिला कवयित्री)
- 4. प्रयाग नारायण त्रिपाठी
- 5. मदन वात्स्यायन
- 6. विजयदेव नारायण साही
- 7. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
- कवियों को याद रखने की आसान ट्रिक (Shortcut Trick)
- “कु के की प्र म वि स” या “प्रयाग के कुँवर केदार, विजय सर्वेश्वर कीर्ति मदन”
- प्र – प्रयाग नारायण त्रिपाठी
- कुँ – कुँवर नारायण
- के – केदारनाथ सिंह
- वि – विजयदेव नारायण साही
- स – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
- की – कीर्ति चौधरी
- म – मदन वात्स्यायन
- प्रमुख कवि व रचनाएँ:
- कुँवर नारायण का प्रथम काव्य संग्रह *’चक्रव्यूह’* (1956) इसी दौर का है।
- केदारनाथ सिंह को *’अकाल में सारस’* के लिए साहित्य अकादमी और बाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ‘काठ की घंटियाँ’ और ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ के लिए जाने जाते हैं।
न जाने कब से बंद / एक दिन इस तरह खुला घर का दरवाज़ा /
जैसे गर्द से ढकी / एक पुरानी किताब
- कुँवर नारायण ने सन् 1950 के आस-पास काव्य-लेखन की शुरुआत की।
- उन्होंने कविता के अलावा चिंतनपरक लेख, कहानियाँ और सिनेमा तथा अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखीं हैं, किंतु कविता की विधा को उनके सृजन कर्म में हमेशा प्राथमिकता प्राप्त रही।
- नयी कविता के दौर में, जब प्रबंध काव्य का स्थान प्रबंधत्व की दावेदार लंबी कविताएँ लेने लगीं तब कुँवर नारायण ने आत्मजयी जैसा प्रबंध काव्य रचकर भरपूर प्रतिष्ठा प्राप्त की।
- आलोचक मानते हैं कि उनकी “कविता में व्यर्थ का उलझाव, अखबारी सतहीपन और वैचारिक धुंध के बजाय संयम, परिष्कार और साफ़-सुथरापन है।” भाषा और विषय की विविधता उनकी कविताओं के विशेष गुण माने जाते हैं। उनमें यथार्थ का खुरदरापन भी मिलता है और उसका सहज सौंदर्य भी।
- सीधी घोषणाएँ और फ़ैसले उनकी कविताओं में नहीं मिलते क्योंकि जीवन को मुकम्मल तौर पर समझने वाला एक खुलापन उनके कवि-स्वभाव की मूल विशेषता है। इसीलिए संशय, संभ्रम प्रश्नाकुलता उनकी कविता के बीज शब्द हैं।
- कुँवर जी पूरी तरह नागर संवेदना के कवि हैं।
- विवरण उनके यहाँ नहीं के बराबर है, पर वैयक्तिक और सामाजिक ऊहापोह का तनाव पूरी व्यंजकता में सामने आता है। एक पंक्ति में कहें तो इनकी तटस्थ वीतराग दृष्टि नोच खसोट, हिंसा प्रतिहिंसा से सहमे हुए एक संवेदनशील मन के आलोड़नों के रूप में पढ़ी जा सकती है।
- यहाँ पर कुँवर नारायण की दो कविताएँ ली गई हैं। पहली कविता है- कविता के बहाने जो इन दिनों संग्रह से ली गई है। आज का समय कविता के वजूद को लेकर आशंकित है। शक है कि यांत्रिकता के दबाव से कविता का अस्तिव नहीं रहेगा। ऐसे में यह कविता-कविता की अपार संभावनाओं को टटोलने का एक अवसर देती है।
- कविता के बहाने यह एक यात्रा है जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। एक ओर प्रकृति है दूसरी ओर भविष्य की ओर कदम बढ़ाता बच्चा। कहने की आवश्यकता नहीं कि चिड़िया की उड़ान की सीमा है, फूल के खिलने के साथ उसकी परिणति निश्चित है, लेकिन बच्चे के सपने असीम है। बच्चों के खेल में किसी प्रकार की सीमा का कोई स्थान नहीं होता। कविता भी शब्दों का खेल है और शब्दों के इस खेल में जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी उपकरण मात्र हैं। इसीलिए जहाँ कहीं रचनात्मक ऊर्जा होगी वहाँ सीमाओं के बंधन खुद-ब-खुद टूट जाते हैं। वो चाहें घर की सीमा हो, भाषा की सीमा हो या फिर समय की ही क्यों न हो।
- दूसरी कविता है बात सीधी थी पर जो कोई दूसरा नहीं संग्रह में संकलित है। कविता में कथ्य और माध्यम के द्वंद्व उकेरते हुए भाषा की सहजता की बात की गई है। हर बात के लिए कुछ खास शब्द नियत होते हैं ठीक वैसे ही जैसे हर पेंच के लिए एक निश्चित खाँचा होता है
- । अब तक जिन शब्दों को हम एक-दूसरे के पर्याय के रूप में जानते रहे हैं उन सब के भी अपने विशेष अर्थ होते हैं। अच्छी बात या अच्छी कविता का बनना सही बात का सही शब्द से जुड़ना होता है और जब ऐसा होता है तो किसी दबाव या अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं होती वह सहूलियत के साथ हो जाता है।
कविता के बहाने
कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर इस घर, उस घर
कविता के पंख लगा उड़ने के माने चिड़िया क्या जाने?
कविता एक खिलना है फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने !
बाहर भीतर इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने फूल क्या जाने ?
कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने बच्चा ही जाने।
बात सीधी थी पर
बात सीधी थी पर एक बार भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई।
उसे पाने की कोशिश में भाषा को उलटा पलटा तोड़ा मरोड़ा घुमाया फिराया
कि बात या तो बने या फिर भासा से बाहर आये
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।
सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।
आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था जोर ज़बरदस्ती से , बात की चूड़ी मर गई और वह भाषा में बेकार घूमने लगी !
हार कर मैंने उसे कील की तरह उसी जगह ठोंक दिया।
ऊपर से ठीकठाक पर अंदर से न तो उसमें कसाव था न ताकत ! बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह मुझसे खेल रही थी, मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा-
“क्या तुमने भाषा को सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”
