विषय-वस्तु: भारतीय कृषक जीवन का संघर्ष, ऋणग्रस्तता, महाजनी सभ्यता द्वारा शोषण, जातिवाद और औद्योगिकीकरण/शहरीकरण का प्रभाव।
मुख्य पृष्ठभूमि: उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के दो गांव — बेलारी (ग्रामीण जीवन) और सेमरी (शहरी/ज़मींदारी जीवन)।
मुख्य पात्र
ग्रामीण पात्र (Rural Characters)
होरी: उपन्यास का केंद्रीय पात्र; एक सीधा-साधा, धर्मभीरु किसान जिसकी एकमात्र लालसा गाय पाने की (‘गोदान’) है।
धनिया: होरी की पत्नी; स्वाभिमानी, साहसी और शोषण के खिलाफ मुखर आवाज उठाने वाली स्त्री।
गोबर (गोवर्धन):होरी और धनिया का बेटा; नई पीढ़ी का प्रतीक जो परंपराओं और शोषण के खिलाफ विद्रोह करता है।
झुनिया: भोला (चरवाहे) की विधवा बेटी; गोबर से प्रेम और विवाह करती है।
रूपा और सोना: होरी की बेटियां।
भोला: पड़ोसी गांव का चरवाहा, जिससे होरी गाय लेता है।
हीरा और शोभा: होरी के भाई (हीरा जलन के कारण होरी की गाय को ज़हर दे देता है)।
शोषक / महाजनी वर्ग
दातादीन: गांव का शोषक ब्राह्मण/पंडित।
मातदीन: दातादीन का बेटा (सिलिया चमारिन से संबंध रखता है)।
पटेश्वरी: गांव का पटवारी।
नोखेराम: ज़मींदार का कारिंदा।
झिंगुरी सिंह: गांव का महाजन।
शहरी पात्र
राय साहेब अमरपाल सिंह: सेमरी के ज़मींदार; राष्ट्रवादी होने का नाटक करते हैं पर किसानों का शोषण करते हैं।
प्रोफ़ेसर मेहता: दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर; आदर्शवादी, प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति।
डॉ. मालती: इंग्लैंड से पढ़ी आधुनिक, स्वतंत्र विचारों वाली डॉक्टर; अंत में मेहता के प्रभाव से समाज सेवा में लगती हैं।
मिर्ज़ा ख़ुरशेद: एक उदार और विनोदी व्यक्ति जो मजदूरों/किसानों के प्रति हमदर्दी रखता है।
मिस्टर खन्ना: बैंक मैनेजर और चीनी मिल के मालिक; पूंजीवादी मानसिकता के प्रतीक।
गोविंद: मिस्टर खन्ना की पत्नी; भारतीय नारी के त्याग और गरिमा का प्रतीक।
कथानक का संक्षिप्त विवरण
गाय की लालसा: बेलारी गांव का किसान होरी एक गाय पाने की तीव्र इच्छा रखता है। वह पड़ोसी भोला से उधार पर एक गाय लाता है, जिससे गांव में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है।
पारिवारिक ईर्ष्या व संकट: होरी का भाई हीरा जलन के कारण गाय को ज़हर दे देता है और डरकर भाग जाता है। होरी पुलिस कार्रवाई से अपने भाई को बचाने के लिए खुद पर कर्ज़ ले लेता है।
गोबर और झुनिया का संबंध: होरी का बेटा गोबर, भोला की विधवा बेटी झुनिया को गर्भवती कर देता है और डरकर शहर (लखनऊ) भाग जाता है। धनिया झुनिया को अपने घर में शरण देती है, जिससे समाज और पंचायत उन पर भारी जुर्माना लगाती है।
ऋण का दुष्चक्र: पंचों का जुर्माना भरने और खेती का लगान चुकाने के लिए होरी दातादीन, मंगरू और नोखेराम से लगातार कर्ज़ लेता चला जाता है।
शहरी एवं ग्रामीण जीवन का अंतर समानांतर: एक तरफ ग्रामीण जीवन में होरी का आर्थिक और मानसिक शोषण होता है, वहीं दूसरी तरफ सेमरी/लखनऊ में राय साहेब, मेहता, मालती और खन्ना के माध्यम से उच्च वर्ग का पाखंड और पूंजीवादी संघर्ष दिखाया जाता है।
त्रासद अंत (गोदान): अत्यधिक परिश्रम, भुखमरी और कर्ज़ के बोझ तले दबकर होरी बीमार पड़ जाता है और सड़क पर काम करते हुए मूर्छित होकर गिर पड़ता है। मरते समय दातादीन धनिया से कहता है कि होरी की आत्मा की शांति के लिए ‘गोदान’ करो। धनिया के पास केवल बीस आने (1 रूपया 4 आना) होते हैं, जिसे वह पंडित के हाथ में रखकर फूट-फूटकर रो पड़ती है।
प्रमुख कथन/सूक्तियाँ:
“जब दूसरों के पाँव के तले अपनी गर्दन दबी हो, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।” — होरी
“नारी जीवन का सत्य है — सेवा, त्याग और समर्पण।” — प्रो. मेहता
“विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ और उसे तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।” — प्रो. मेहता
गोदान- प्रेमचन्द For JSSC Graduate Level Exams Paper -2 Hindi Notes