• फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा रचित ‘मैला आँचल‘ (1954) हिंदी साहित्य का पहला और सबसे प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास (Regional Novel) है।
  • इसमें बिहार के पूर्णिया जिले के ‘मेरीगंजगांव की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति का जीवंत चित्रण किया गया है।
    • रचनाकार: फणीश्वर नाथ ‘रेणु’
    • प्रकाशन वर्ष: 1954 ई.
    • विधा: आंचलिक उपन्यास (हिंदी का प्रथम आंचलिक उपन्यास माना जाता है)
  • विषय-वस्तु: स्वतंत्रता के आस-पास का ग्रामीण समाज, गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास, राजनीति (कांग्रेस, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट) का प्रवेश और आंचलिक संस्कृति/लोकजीवन।
  • मुख्य पृष्ठभूमि: बिहार के पूर्णिया जिले का ‘मेरीगंजगांव (इस गांव का नाम एक अंग्रेज मार्टिन की पत्नी ‘मेरी’ के नाम पर रखा गया था)।
  • विशेषता: इस उपन्यास का कोई एक अकेला नायक नहीं है, बल्कि ‘मेरीगंज’ गांव ही इसका मुख्य नायक है।
  • मुख्य पात्र 
  • केंद्रीय एवं प्रमुख पात्र
    • डॉ. प्रशांत: एक युवा और आदर्शवादी डॉक्टर;
      • पटना से मेरीगंज में मलेरिया और काला-आज़ार पर रिसर्च करने आता है। वह गांव की भलाई के लिए समर्पित रहता है।
    • कमली: मेरीगंज के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की बेटी;
      • डॉ. प्रशांत से प्रेम करती है और बाद में उनकी पत्नी बनती है।
    • बावनदास: एक सच्चा और निष्ठावान गांधीवादी कार्यकर्ता;
      • उपन्यास के अंत में तस्करों द्वारा नदी में बहाकर मार दिया जाता है (गांधीवादी आदर्शों के पतन का प्रतीक)।
    • बालदेव: कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता; मठ की साधु आश्रम परंपरा से जुड़ा हुआ, जो बाद में लछमी का संरक्षण लेता है।
    • विश्वनाथ प्रसाद: मेरीगंज के कायस्थ टोले के तहसीलदार; शोषक और अवसरवादी प्रकृति के व्यक्ति, जो अंत में बदल जाते हैं।
  • गांव के अन्य प्रमुख पात्र व टोलों से जुड़े पात्र
    • लछमी (लक्ष्मी): मठ की दासी/कोठारिन; रामदास की सेविका और बालदेव की आश्रयदाता।
    • कालीचरन: सोशलिस्ट पार्टी का युवा नेता; जुझारू और शोषितों के हक के लिए लड़ने वाला।
    • जोथई काका: गांव के बुजुर्ग जो भविष्यवाणियां और टोना-टोटका में विश्वास रखते हैं।
    • प्यारू, मंगला, रामकिरपाल: ग्रामीण राजनीति और विभिन्न टोलों से जुड़े पात्र।
    • सुमित्री (मंगला देवी): सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय।
  • उपन्यास के प्रमुख टोले 
    • मेरीगंज गांव विभिन्न जातियों और टोलों में बंटा हुआ है, जो उपन्यास की सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं:
    • कायस्थ टोला: मालिक/तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का वर्चस्व।
    • राजपूत टोला: ठाकुर रामकृपाल सिंह का प्रभाव।
    • यादव (यादव/ग्वाला) टोला: खेलवन यादव का प्रभाव।
    • तत्मा/तांती टोला: बावनदास और अन्य शोषित वर्ग।
    • संथाल टोला: गांव के सबसे पिछड़े और शोषित वर्ग के लोग जो भूमि के लिए संघर्ष करते हैं।

कथानक का संक्षिप्त विवरण

  • 1. डॉ. प्रशांत का आगमन: डॉ. प्रशांत मलेरिया और काला-आज़ार पर शोध करने मेरीगंज गांव में एक डिस्पेंसरी खोलते हैं। वह गांव के पिछड़ेपन, गरीबी और बीमारी को देखकर सेवा भावना में जुट जाते हैं।
  • 2. गांव की गुटबाजी व राजनीति: मेरीगंज में जातिवादी टोलों की अपनी गुटबाजी है। देश की आजादी (1947) के आसपास गांव में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों (कांग्रेस, सोशलिस्ट) का प्रवेश होता है, लेकिन नेताओं का मुख्य ध्येय समाज सेवा न होकर अपना स्वार्थ साधना बन जाता है।
  • 3. डॉ. प्रशांत और कमली का प्रेम: इलाज के दौरान डॉ. प्रशांत और तहसीलदार की बेटी कमली एक-दूसरे के करीब आते हैं।
  • 4. संथाल-विवाद और सामाजिक तनाव: गांव के ज़मींदार और प्रभावशाली लोग संथालों की जमीन हड़पने की कोशिश करते हैं, जिससे संथालों और ग्रामीणों में हिंसक झड़प होती है।
  • 5. प्रशांत की गिरफ्तारी: गांव के षड्यंत्रकारी लोग डॉ. प्रशांत पर कम्युनिस्टों/क्रांतिकारियों की मदद करने का झूठा आरोप लगाकर उन्हें पुलिस से गिरफ्तार करवा देते हैं।
  • 6. बावनदास की शहादत: बावनदास (गांधीवादी) आजादी के बाद नेताओं के भ्रष्टाचार और भारत-पाकिस्तान सीमा पर हो रही तस्करी का विरोध करते हुए अपनी जान गंवा देते हैं।
  • 7. सुखांत अंत: जेल से छूटने के बाद डॉ. प्रशांत पुनः मेरीगंज लौटते हैं। कमली उनके बच्चे (प्यारू) को जन्म दे चुकी होती है। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का हृदय परिवर्तन होता है और डॉ. प्रशांत कमली को अपनाकर गांव के विकास और सेवा में समर्पित हो जाते हैं।
  • प्रमुख उद्धरण/सूक्तियाँ:
    • “मैला आँचल में धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, कमल भी। मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” — फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ (भूमिका से)
    • “जहाँ प्यार है, वहाँ राह है।”* — डॉ. प्रशांत
    • “काली थान में बलि चढ़ाने से मलेरिया नहीं भागता, दवाई से भागता है।”* — डॉ. प्रशांत
  • उपन्यास की भाषा-शैली: आंचलिक शब्दावली, स्थानीय बोलियों (मैथिली-भोजपुरी का प्रभाव), लोकगीतों और मुहावरों का अत्यधिक प्रयोग।
  • मुख्य समस्याएँ: जातिवाद, अंधविश्वास, महाजनी शोषण, भ्रष्ट राजनीति, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और संथालों का भूमि-संघर्ष।
मैला आँचल – फणीश्वर नाथ रेणु JSSC Graduate Level Exams Paper -2 Hindi Notes