विद्यापति
- विद्यापति (मैथिल कोकिल) पूरा नाम: विद्यापति ठाकुर
- उपनाम/उपाधि: मैथिल कोकिल, अभिनव जयदेव, कविशेखर, कविरंजन, दसावधान, पंचानन, खेलन कवि।
- जन्म: लगभग 1352 ई. (1380 ई. के आसपास भी माना जाता है)
- जन्म स्थान: बिसफी गाँव, मधुबनी जिला (बिहार)
- आश्रयदाता राजा: तिरहुत (मिथिला) के ओइनवार वंश के राजा कीर्ति सिंह और शिवसिंह
- संप्रदाय/विचारधारा: शैव परंपरा से संबंधित (भगवान शिव के अनन्य भक्त)
- निधन: लगभग 1448 ई.
- विद्यापति ने तीन प्रमुख भाषाओं में रचनाएँ की हैं:
-
- संस्कृत (शास्त्रीय एवं धार्मिक ग्रंथ)
- अवहट्ठ / अपभ्रंश (प्रशस्ति एवं ऐतिहासिक काव्य)
- मैथिली (गीत एवं एकांकी/नाटक)
- (A) अवहट्ठ रचनाएँ (अत्यंत महत्वपूर्ण)
- कीर्तिलता:
- राजा कीर्ति सिंह की वीरता और उदारता का वर्णन।
- इसे विद्यापति ने “भृंग-भृंगी संवाद” के रूप में लिखा है।
- इसमें उन्होंने अवहट्ठ को “देसिल बअना” कहा है (“देसिल बअना सब जन मिट्ठा, ते तं जंपओं अवहट्टा”।)
- कीर्तिपताका: राजा शिवसिंह की वीरता और प्रेम का वर्णन (अपूर्ण रचना)।
- कीर्तिलता:
- (B) मैथिली रचनाएँ
- पदावली:
- विद्यापति की प्रसिद्धि का मुख्य आधार यही ग्रंथ है।
- इसमें राधा और कृष्ण के प्रेम एवं सौंदर्य का अत्यंत सजीव वर्णन है।
- गोरक्षविजय:
- यह एक नाटक/रंगमंचीय कृति है।
- इसके गद्य भाग संस्कृत और प्राकृत में हैं, जबकि गीत मैथिली भाषा में हैं।
- पदावली:
- (C) संस्कृत रचनाएँ
- पुरुषपरीक्षा: नीतिशास्त्र और कथा साहित्य पर आधारित ग्रंथ।
- भूपरिक्रमा: राजा शिवसिंह के आदेश पर लिखी गई भौगोलिक/यात्रा संबंधी कृति।
- लिखनावली: पत्र-लेखन और प्रशासनिक शैली पर आधारित ग्रंथ।
- शैवसर्वस्वसार: शिव पूजा की विधियों पर आधारित।
- गंगावाक्यावली: गंगा नदी के महत्व और महात्म्य पर आधारित।
- दानवाक्यावली: दान के नियमों और महत्व पर।
- दुर्गाभक्तितरंगिणी: दुर्गा पूजा विधि पर।
- वर्षकृत्य: वर्ष भर के त्यौहारों और व्रत-विधानों का वर्णन।
- सम्मान एवं प्रमुख उपाधियाँ
- अभिनव जयदेव: राजा शिवसिंह द्वारा (जयदेव के ‘गीतगोविंद’ की शैली में ‘पदावली’ लिखने के कारण)।
- मैथिल कोकिल: मैथिली भाषा में मधुर और रसमय पदों की रचना करने के कारण।
- कवि कंठहार / कविशेखर: मिथिला दरबार और विद्वानों द्वारा प्रदत्त उपाधियाँ।
- पंचानन / दसावधान: शास्त्र ज्ञान और बहुमुखी प्रतिभा के कारण।
- महत्वपूर्ण तथ्य
- भक्ति या श्रृंगार कवि का विवाद:
- श्रृंगारी कवि मानने वाले विद्वान: रामचंद्र शुक्ल, रामकुमार वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, हरप्रसाद शास्त्री।
- भक्त कवि मानने वाले विद्वान: श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, ब्रजनंदन सहाय।
- रहस्यवादी कवि मानने वाले विद्वान: ग्रियर्सन, नागेंद्रनाथ गुप्त।
- भक्ति या श्रृंगार कवि का विवाद:
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन:
“आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं, उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने गीतगोविंद के पदों को आध्यात्मिक बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।”
- नचारी एवं महेशवाणी: विद्यापति द्वारा रचित शिव-विषयक पदों को मिथिला क्षेत्र में ‘नचारी’ और ‘महेशवाणी’ कहा जाता है।
- संधिकाल के कवि: विद्यापति को आदिकाल और भक्ति काल का संधि-कवि (संयोजक) माना जाता है।
कबीर
- संत कबीरदास का जन्म: संवत् 1455 (सन 1398 ई.)
- जन्म स्थान: लहरतारा ताल, काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
- माता-पिता (पालक): नीरू और नीमा (जुलाहा दंपति)
- पत्नी: लोई
- पुत्र एवं पुत्री: कमाल (पुत्र) एवं कमाली (पुत्री)
- गुरु:
- स्वामी रामानंद (वैष्णव संत)
- शेख तकी (मुस्लिम गुरु / सूफी संत)
- कबीरदास निरक्षर थे (जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा: “मसि कागद छूओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ”)। उनकी वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने किया।
- (A) मुख्य ग्रंथ: बीजक (संपादक: धर्मदास, सन 1464 ई.)
- ‘बीजक’ के तीन भाग:
- साखी: (संस्कृत ‘साक्षी’ से निर्मित) — इसमें दोहा छंद का प्रयोग है। इसमें कबीर के व्यावहारिक ज्ञान और सिद्धांतों का वर्णन है।
- सबद: इसमें गेय पद (संगीतबद्ध पद) हैं। इसमें कबीर के धार्मिक और दार्शनिक विचारों का वर्णन है।
- रमैनी: इसमें चौपाई और दोहा छंद का प्रयोग है। इसमें रहस्यवादी और दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
- ‘बीजक’ के तीन भाग:
- (B) अन्य संकलन
- गुरु ग्रंथ साहिब: सिख धर्म के इस पवित्र ग्रंथ में कबीरदास जी के 227 पद और 237 साखियाँ (दोहे) संकलित हैं।
- कबीर ग्रंथावली: संपादक – बाबू श्यामसुंदर दास।
- कबीर (समीक्षात्मक ग्रंथ): आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।
- भाषा, शैली एवं दार्शनिक विचार
- भाषा: सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) — इसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी, पंजाबी और पूर्वी हिंदी के शब्द सम्मिलित हैं।
- रामचंद्र शुक्ल ने इनकी भाषा को “सधुक्कड़ी” कहा।
- श्यामसुंदर दास ने इनकी भाषा को “पंचमेल खिचड़ी” कहा।
- उलटबासियाँ (Ulatbamsi): कबीर की अप्रत्यक्ष/रहस्यवादी शैली जिसमें अर्थ सामान्य से उल्टा प्रतीत होता है (जैसे: “एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावे गाई”)।
- विचारधारा:
- निराकार ब्रह्म की उपासना (निर्गुणवाद)।
- बाह्याडंबरों, जाति-पाति, मूर्तिपूजा और धार्मिक संकीर्णता का कड़ा विरोध।
- मानवतावाद और गुरु की महत्ता पर बल।
- भाषा: सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) — इसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी, पंजाबी और पूर्वी हिंदी के शब्द सम्मिलित हैं।
- सम्मान एवं उपाधियाँ
- “वाणी का डिक्टेटर” (Dictator of Language): आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीरदास जी को भाषा/वाणी का डिक्टेटर कहा, क्योंकि कबीर जैसा चाहते थे, भाषा से वैसा ही काम ले लेते थे।
- भक्ति काल के प्रमुख प्रतिनिधि कवि: निर्गुण संत काव्यधारा के शीर्ष कवि।
- सद्भाव और सामाजिक सुधार के प्रतीक: हिंदी साहित्य में उन्हें एक कवि से अधिक महान समाज सुधारक का दर्जा प्राप्त है।
- मृत्यु एवं महाप्रयाण
- मृत्यु (देहावसान): संवत् 1575 (सन 1518 ई.)
- मृत्यु स्थान: मगहर (संत कबीर नगर जिला, उत्तर प्रदेश)
- महत्वपूर्ण तथ्य: उस समय प्रचलित अंधविश्वास (कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मरने से नरक मिलता है) को तोड़ने के लिए कबीर अपने अंतिम समय में मगहर चले गए थे।
बिहारी
- बिहारी (बिहारीलाल) का जन्म: संवत् 1652 (सन 1595 ई. लगभग)
- जन्म स्थान: बसुआ गोविंदपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश)
- पिता: केशवराय (चौबे ब्राह्मण)
- गुरु: नरहरिदास
- आश्रयदाता राजा: जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह।
प्रसिद्ध प्रसंग: राजा जयसिंह अपनी नवोढ़ा पत्नी के प्रेम में राजकाज भूल गए थे, तब बिहारी ने एक दोहा लिखकर भेजा था:
“नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं कालि।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आगे कौन हवाल॥”इस दोहे ने राजा को कर्तव्यपथ पर ला खड़ा किया और प्रसन्न होकर राजा ने बिहारी को हर दोहे पर एक अशर्फी देने का वचन दिया।
- प्रमुख एवं एकमात्र रचना– बिहारी की अमर कीर्ति का आधार उनकी एकमात्र रचना है:
- ग्रंथ का नाम: ‘बिहारी सतसई’
- छंद व भाषा: दोहा छंद में रचित, शुद्ध ब्रजभाषा।
- कुल दोहे: इसमें 713 दोहे हैं (कुछ विद्वानों के अनुसार 719 या 726)।
- विषय-वस्तु: ‘सप्तशती’ परंपरा का ग्रंथ है। इसमें मुख्य रूप से श्रृंगार रस का वर्णन है, साथ ही भक्ति और नीति के दोहे भी प्रचुर मात्रा में हैं (त्रिवेणी संगम)।
- प्रेरणा स्रोत (उपजीव्य ग्रंथ):
- हाल की ‘गाथासप्तशती’
- गोवर्धनाचार्य की ‘आर्यासप्तशती’
- अमरु शतक
- भाषा, काव्यगत विशेषताएँ एवं शैली
- समास शक्ति एवं समाहार शक्ति: बिहारी के दोहों के बारे में कहा जाता है — “गागर में सागर भरना”। कम शब्दों में विस्तृत अर्थ व्यक्त करने में वे बेजोड़ हैं।
- प्रसिद्ध उक्ति:
“सतसैया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।
देखत में छोटे लगैं वेधैं गंभीर॥” - श्रृंगार रस के पारखी: संयोग और वियोग दोनों श्रृंगार का सजीव चित्रण किया है। उनके वियोग वर्णन में कहीं-कहीं अतिशयोक्ति (ऊहात्मकता) मिलती है।
- बहुज्ञता (बहुमुखी ज्ञान): बिहारी को ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, नीति, दर्शन और कामशास्त्र का गहरा ज्ञान था, जो उनके दोहों में झलकता है।
- प्रमुख आलोचनात्मक कथन एवं उपाधियाँ
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन:
- “यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता।”
- “बिहारी की भाषा रस-सिक्त और परिमार्जित ब्रजभाषा है।”
- “बिहारी के दोहे क्या हैं, रस के छोटे-छोटे छींटे हैं।”
- हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन:
- “बिहारी सतसई रसिकों के हृदय का हार है।”
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन:
- अन्य उपाधि:
- बिहारी को ‘रीतिसिद्ध धारा का सिरमौर कवि’ माना जाता है।
- मृत्यु: संवत् 1720 (सन 1663 ई. लगभग)
रसखान
- रसखान का मूल नाम: सैयद इब्राहिम
- जन्म: संवत् 1605 (सन 1548 ई. लगभग)
- जन्म स्थान: अमरोहा (कुछ विद्वानों के अनुसार हरदोई, उत्तर प्रदेश)
- धार्मिक पृष्ठभूमि: दिल्ली के पठान परिवार में जन्म, किंतु श्री कृष्ण के अनन्य भक्त बने।
- गुरु: गोस्वामी विट्ठलनाथ (वल्लभ संप्रदाय/पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक स्वामी वल्लभाचार्य के पुत्र)।
- रसखान ने गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर ब्रजभूमि (वृंदावन) को अपना निवास स्थान बनाया।
- रसखान की रचनाएँ मुख्य रूप से ब्रज भाषा और सवैया छंद में हैं:
- सुजान रसखान:
- यह उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है।
- इसमें कृष्ण-प्रेम, राधा-कृष्ण की लीलाओं, ब्रज-महिमा और रूप-सौंदर्य का वर्णन है।
- यह सवैया, कवित्त, दोहा और सोरठा छंदों में रचित है।
- प्रेमवाटिका:
- रचना काल: सन 1614 ई. (संवत् 1671)।
- यह मात्र 53 दोहों की लघु रचना है।
- इसमें ‘प्रेम के गूढ़ तत्त्व’ (प्रेम-निरूपण) का काव्यात्मक विवेचन किया गया है।
- दानलीला:
- राधा और कृष्ण के बीच दान-लीला के प्रसंग पर आधारित एक छोटा प्रबंध काव्य है।
- अष्टयाम:
- इसमें श्री कृष्ण के आठों पहरों की दिनचर्या और लीलाओं का वर्णन है।
- सुजान रसखान:
- भाषा, शैली एवं काव्यगत विशेषताएँ
- भाषा: अत्यंत मधुर, सरस और परिमार्जित ब्रजभाषा।
- छंद-सम्राट (सवैया): रसखान ‘सवैया’ छंद के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं। हिंदी साहित्य में “सवैया रसखान का” उक्ति प्रसिद्ध है।
- भक्ति का स्वरूप:
- इनकी भक्ति में माधुर्य भाव और कान्ता भाव (सख्य एवं अनुराग) की प्रधानता है।
- वे किसी संप्रदाय के कड़े नियमों में बंधकर नहीं, बल्कि सहज प्रेमी के रूप में भक्ति करते हैं।
- प्रसिद्ध पंक्तियाँ (परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाने वाली):
“मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।”
“या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।”
“धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।”
- उपाधियाँ, कथन एवं मूल्यांकन
- भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रसिद्ध कथन:
- रसखान जैसे कृष्णभक्त मुस्लिम कवियों की भक्ति से प्रभावित होकर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा था:
- “इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिंदू वारिये।”
- नामकरण का अर्थ: ‘रसखान’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘रस की खान’ (आनंद और प्रेम का भंडार)।
- सांस्कृतिक महत्व: रसखान धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर भक्ति और प्रेम के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक बने।
- भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रसिद्ध कथन:
- मृत्यु: सन 1628 ई. (संवत् 1685 लगभग)
- मृत्यु स्थान: वृंदावन (उत्तर प्रदेश) — इनकी समाधि वृंदावन में ही स्थित है।
भूषण
- कवि भूषण का जन्म: संवत् 1670 (सन 1613 ई. लगभग)
- जन्म स्थान: तिकवांपुर (कानपुर जिला, उत्तर प्रदेश)
- मूल नाम: ‘पतिराम’ या ‘मनिराम’ (विद्वानों में मतभेद है)।
- ‘भूषण’ उपाधि: इन्हें ‘भूषण’ की उपाधि चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रशाह ने प्रदान की थी। कालांतर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए।
- आश्रयदाता राजा:
- छत्रपति शिवाजी महाराज (महाराष्ट्र)
- महाराजा छत्रसाल बुंदेला (पन्ना)
- प्रसिद्ध प्रसंग:
कहा जाता है कि जब भूषण की पालखी को छत्रसाल बुंदेला ने अपना कंधा लगाया था, तब भूषण ने भावुक होकर कहा था — “शिवा को बखानौं कि बखानौं छत्रसाल को।”
- प्रमुख रचनाएँ
- शिवराज भूषण (1673 ई.):
- अलंकार निरूपक ग्रंथ: यह इनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है।
- इसमें 105 अलंकारों का सोदाहरण वर्णन है।
- इसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, दान और पराक्रम का वर्णन किया गया है।
- शिवा बावनी:
- इसमें शिवाजी महाराज के पराक्रम और चरित्र की प्रशंसा में 52 छप्पय/कवित्त रचे गए हैं।
- छत्रसाल दशक:
- इसमें पन्ना के राजा छत्रसाल बुंदेला की वीरता और दानशीलता का वर्णन 10 कवित्तों में किया गया है।
- अन्य रचनाएँ (अप्राप्य/गौण):
- भूषण उल्लास
- दूषण उल्लास
- भूषण हजारा
- शिवराज भूषण (1673 ई.):
- काव्यगत विशेषताएँ एवं शैली
- रीतिकाल में वीर रस के कवि: रीतिकाल के अधिकांश कवि जहाँ राजाओं की कामुकता और शृंगारिकता का वर्णन कर रहे थे, वहीं भूषण ने वीर रस और ओजगुण की कविताएँ लिखकर जनमानस में राष्ट्रभक्ति जगाई।
- रस एवं गुण: वीर रस, रौद्र रस और भयानक रस; ओजगुण की प्रधानता।
- भाषा: ओजस्वी एवं प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा (जिसमें अरबी, फारसी, बुंदेलखंडी और मराठी के शब्द भी घुले-मिलें हैं)।
- छंद: कवित्त (मनहरण) और सवैया छंद का बहुलता से प्रयोग।
- प्रमुख आलोचनात्मक कथन एवं पंक्तियाँ
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का प्रसिद्ध कथन:
- “भूषण के वीर रस के उद्गार सारे हिंदू समाज के हृदय के उद्गार थे। वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।”
- “रीतिकाल के कवियों में भूषण ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने लोक-संग्रह का कार्य किया।”
- प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाने वाली पंक्तियाँ:
“इन्द्र जिमि जम्भ पर बाढव सुअम्भ पर,
रावन सदम्भ पर रघुकुल राज हैं।…”
“सबन के ऊपर ही ठाढ़ो रहिबे के जोग,
ताहि खरो कियो जाइ जारिन के नियरे।”
“छतनि छत्रसाल महा बाहुबली,
काछि कौन परि कीजै बखान बली तेरो।”
- मृत्यु: संवत् 1772 (सन 1715 ई. लगभग)
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
- भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म: 9 सितंबर 1850
- जन्म स्थान: काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
- पिता: बाबू गोपालचंद्र ‘गिरिधरदास’ (जो स्वयं एक अच्छे कवि थे और ‘नहुष’ नाटक के रचयिता थे)।
- उपनाम/काव्य उपनाम: ‘रसामय’ / ‘रसा’ (उर्दू में ‘रसा’ उपनाम से कविताएँ लिखते थे)।
- उपाधि: 1880 में देश के विद्वानों द्वारा उन्हें ‘भारतेंदु’ (भारत का चंद्रमा) की उपाधि से विभूषित किया गया।
- विशेष योगदान: उन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह’ कहा जाता है। उन्होंने हिंदी गद्य, नाटक, और पत्रकारिता को नई दिशा दी।
- प्रमुख रचनाएँ
- (क) मौलिक नाटक (Original Plays)
- भारत दुर्दशा (1880 ई.): भारत की तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और अंग्रेजी शासन के कुचक्र का यथार्थ चित्रण। (UGC NET के पाठ्यक्रम में शामिल)
- अंधेर नगरी (1881 ई.): विवेकहीन और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा प्रहसन (व्यंग्य)।
- सत्य हरिश्चंद्र (1875 ई.)
- चंद्रावली (1876 ई.)
- विषस्य विषमौषधम् (1876 ई.)
- नीलदेवी (1881 ई.): ऐतिहासिक गीतिरूपक।
- प्रेमजोगिनी (1875 ई.)
- वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई.)
- (ख) अनूदित नाटक (Translated Plays)
- विद्यासुंदर (1868 ई.): (पहला अनूदित नाटक – संस्कृत/बांग्ला से)
- मुद्राराक्षस (संस्कृत से)
- कर्पूरमंजरी (प्राकृत से)
- धनंजय विजय
- रत्नावली
- भारत जननी
- (ग) प्रमुख काव्य कृतियाँ
- प्रेम मालिका (1871)
- प्रेम सरोवर (1873)
- प्रेम तरंग (1877)
- प्रेम प्रलाप (1877)
- प्रेम माधुरी (1875)
- वर्षा विनोद
- विजयायिनी विजय वैजयंती: (भारतीय सेना की मिस्र विजय पर रचित कविता)
- (घ) प्रसिद्ध निबंध एवं इतिहास ग्रंथ
- भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? (प्रसिद्ध व्याख्यान/निबंध)
- दिल्ली दरबार दर्पण
- कश्मीर कुसुम
- लेवी प्राण लेवी (व्यंग्य निबंध)
- पत्र-पत्रिकाएँ (Journalism )- भारतेंदु जी ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया:
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- कविवचनसुधा (1868 ई.): काशी से प्रकाशित (मासिक, पाक्षिक और बाद में साप्ताहिक)।
- हरिश्चंद्र मैगजीन (1873 ई.): (8 अंकों के बाद इसका नाम ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ हो गया)। इसे आधुनिक हिंदी गद्य के परिमार्जित रूप का श्रेय जाता है।
- बालबोधिनी (1874 ई.): विशेष रूप से स्त्रियों के लिए निकाली गई हिंदी की पहली पत्रिका।
- भाषा, शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- काव्य और गद्य की भाषा का भेद: भारतेंदु जी ने पद्य (कविता) के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग किया, जबकि गद्य के लिए परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया।
- राष्ट्रीय चेतना एवं नवजागरण: उन्होंने साहित्य में पहली बार देशप्रेम, समाज सुधार और स्वाधीनता की चेतना को प्रमुखता से उभारा।
- निज भाषा उन्नति का मूल: उन्होंने मातृभाषा की प्रगति पर विशेष बल दिया।
- प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाने वाली पंक्तियाँ
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”
“अंगरेजी राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी॥”
“रोअहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई।
हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई॥”
- मृत्यु: 6 जनवरी 1885 (मात्र 35 वर्ष की अल्पायु में), काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
धूमिल
- सुदामा प्रसाद पांडेय ‘धूमिल‘ का जन्म: 30 नवंबर 1936
- जन्म स्थान: खेवली गाँव (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
- मूल नाम: सुदामा प्रसाद पांडेय (साहित्यिक उपनाम: ‘धूमिल’)
- शिक्षा: वाराणसी से आईटीआई (ITI) में विद्युत डिप्लोमा।
- व्यावसायिक जीवन: आईटीआई में अनुदेशक (Instructor) के पद पर कार्यरत रहे।
- विशेष पहचान: स्वातंत्र्योत्तर (आजादी के बाद के) भारत के मोहभंग, राजनीतिक पाखंड, व्यवस्था के विरोध और आम आदमी की पीड़ा को बेबाक व आक्रामक भाषा में व्यक्त करने वाले कवि।
- प्रमुख काव्य संग्रह
- संसद से सड़क तक (1972 ई.):
- धूमिल के जीवनकाल में प्रकाशित एकमात्र काव्य संग्रह।
- इसमें आजादी के बाद के आम आदमी के मोहभंग और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का सशक्त चित्रण है।
- कल सुनना मुझे (1977 ई.):
- मरणोपरांत प्रकाशित संग्रह।
- इस काव्य संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
- सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र (1984 ई.):
- मरणोपरांत उनके पुत्र डॉ. रत्नशंकर पांडेय द्वारा संपादित एवं प्रकाशित।
- संसद से सड़क तक (1972 ई.):
- प्रमुख एवं प्रसिद्ध कविताएँ
- मोचीराम: श्रम की प्रतिष्ठा और सामाजिक विषमता पर आधारित प्रसिद्ध कविता।
- पटकथा: समकालीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का लंबा काव्यात्मक दस्तावेज़।
- रोटी और संसद: राजनीतिक व्यवस्था और आम जनता के शोषण पर करारा व्यंग्य।
- मुरदा शैली
- नक्सलबाड़ी
- अकाल दर्शन
- भाषा, शैली एवं काव्यगत विशेषताएँ
- आक्रामक एवं नुकीली भाषा: धूमिल की भाषा में कोई बनावटीपन या कूटनीतिक चिकनाहट नहीं है। उनकी भाषा सीधी, आक्रामक और कड़वे सच को उजागर करने वाली है।
- मोहभंग के कवि: आजादी के बाद नेताओं के झूठे वादों और आम जनता की बदहाली से उपजे असंतोष को उन्होंने अपनी कविताओं का मूल विषय बनाया।
- ‘अकविता’ आंदोलन: वे साठोत्तरी हिंदी कविता और अकविता आंदोलन के सबसे मुखर कवियों में गिने जाते हैं।
- प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाने वाली पंक्तियाँ
“एक आदमी रोटी बेलता है / एक आदमी रोटी खाता है / एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है / वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है / मैं पूछता हूँ – ‘वह तीसरा आदमी कौन है?’ / मेरे देश की संसद मौन है।”
“नाई की दुकान पर खड़ा शीशा / किसी का चरित्र नहीं बिगाड़ता…”
“क्या स्वतंत्रता तीन थके हुए रंगों का नाम है / जिन्हें एक पहिया खींचता है…”
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1979 ई.): मरणोपरांत, उनके काव्य संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ के लिए।
- मृत्यु: 10 फरवरी 1975 (मात्र 38 वर्ष की अल्पायु में ब्रेन ट्यूमर के कारण) , वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
श्रीलाल शुक्ल
- श्रीलाल शुक्ल का जन्म: 31 दिसंबर 1925
- जन्म स्थान: अतरौली (लखनऊ जिला, उत्तर प्रदेश)
- शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक (1947)।
- व्यावसायिक जीवन: वे प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी रहे।
- विशेष पहचान: ग्रामीण और महानगरीय व्यवस्था, नौकरशाही (Bureaucracy) तथा राजनीति के खोखलेपन पर तीखा, मारक एवं पैना व्यंग्य करने वाले कालजयी लेखक।
- (क) प्रसिद्ध उपन्यास (Novels)
- राग दरबारी (1968 ई.):
- हिंदी साहित्य की अमर कृति: यह उपन्यास ‘शिवपालगंज’ गाँव की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
- इसमें स्वतंत्रता के बाद भारत की शिक्षा व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, ग्रामीण राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य किया गया है।
- मुख्य पात्र: रंगनाथ, वैद्यजी, रूप्पम बाबू, बद्री पहलवान, लंगड़, छंगेलाल, और गयादीन।
- पुरस्कार: इस उपन्यास के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969) मिला।
- सूनी घाटी का सूरज (1957 ई.): (पहला उपन्यास)
- अज्ञातवास (1962 ई.)
- मकान (1976 ई.)
- पहला पड़ाव (1987 ई.): निर्माण क्षेत्र (Construction sites) के मजदूरों के जीवन और शोषण की कथा।
- विश्रामपुर का संत (1998 ई.):
- राजनीतिक ढोंग और दिखावटी भूदान आंदोलनों की पोल खोलता उपन्यास।
- पुरस्कार: इसके लिए इन्हें व्यास सम्मान (1999) मिला।
- उमरावनगर में कुछ दिन (1986 ई.)
- राग दरबारी (1968 ई.):
- (ख) व्यंग्य संग्रह (Satire Collections)
- अंगद का पाँव (1958)
- यहाँ से वहाँ (1970)
- मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ
- उमरावनगर में कुछ दिन
- आओ बैठ लें कुछ देर (1995)
- अगली शताब्दी का शहर
- (ग) कहानी संग्रह (Story Collections)
- यह मेरी जासूसी कहानी (1968)
- सुरक्षा तथा अन्य कहानियाँ (1979)
- दस प्रतिनिधि कहानियाँ
- 3. भाषा, शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- मारक व्यंग्य शैली: श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि पाठकों को सामाजिक-राजनीतिक विकृतियों के प्रति सचेत और सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है।
- ‘राग दरबारी’ का प्रसिद्ध कथन (परीक्षाओं में पूछा जाने वाला):
“भारतीय जीवन में शिक्षा व्यवस्था की हालत ऐसी है जैसे कोई सड़क पर पड़ी हो और हर आने-जाने वाला उस पर थूकता हुआ निकल जाए।”
- नौकरशाही का जीवंत अनुभव: एक प्रशासनिक अधिकारी होने के कारण उन्हें शासन-प्रशासन की कमियों, लालफीताशाही और ग्रामीण सत्ता-संरचना का गहरा और व्यावहारिक अनुभव था, जो उनकी कृतियों में स्पष्ट दिखता है।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (2011): (वर्ष 2009 के लिए, प्रसिद्ध अमरकांत के साथ संयुक्त रूप से)।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969): उनके कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ के लिए।
- पद्म भूषण (2008): भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
- व्यास सम्मान (1999): उपन्यास ‘विश्रामपुर का संत’ के लिए।
- मृत्यु: 28 अक्टूबर 2011 , लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
उषा प्रियंवदा
- उषा प्रियंवदा का जन्म: 24 दिसंबर 1930
- जन्म स्थान: कानपुर (उत्तर प्रदेश)
- शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. एवं पीएचडी।
- अकादमिक/प्रवासी जीवन: वे लंबे समय तक अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (मैडिसन) में दक्षिण एशियाई भाषा एवं साहित्य विभाग में प्राध्यापक/प्रोफेसर रहीं।
- विशेष पहचान: प्रवासी भारतीय/अमरीकी जीवन, आधुनिक बोध, अकेलेपन (Alienation), और टूटते पारिवारिक-स्त्री संबंधों की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं।
- (क) प्रसिद्ध कहानियाँ
- वापसी (1960 ई.):
- सबसे महत्वपूर्ण कहानी: यह कहानी सेवानिवृत्त (Retired) गजधर बाबू के अपने ही परिवार में बेगाने/अजनबी हो जाने की व्यथा को दर्शाती है। (UGC NET के पाठ्यक्रम में शामिल)।
- जिंदगी और गुलाब के फूल (1961 ई.)
- फिर वसंत आया
- सागर पार का संगीत
- वापसी (1960 ई.):
- (ख) कहानी संग्रह
- जिंदगी और गुलाब के फूल (1961)
- एक कोई दूसरा (1966)
- कितना बड़ा झूठ (1972)
- शून्य तथा अन्य कहानियाँ
- (ग) प्रमुख उपन्यास
- पचपन खंभे लाल दीवारें (1961 ई.):
- हॉस्टल की पृष्ठभूमि पर रचित। मुख्य पात्र ‘सुषमा’ के माध्यम से नौकरीपेशा स्त्री के त्याग, घुटन और निजी आकांक्षाओं के द्वंद्व का वर्णन।
- रुकोगी नहीं राधिका (1967 ई.):
- आधुनिक युवा स्त्री (राधिका) के भटकाव, पिता से संबंधों के तनाव और विदेशों में प्रवासी जीवन के अकेलेपन की कथा।
- शेष यात्रा (1984 ई.)
- अंतरवशी (2000 ई.)
- भया कबीर उदास (2007 ई.)
- अल्पविराम (2013 ई.)
- पचपन खंभे लाल दीवारें (1961 ई.):
- भाषा, शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- अकेलेपन और अलगाव की अभिव्यक्ति: उनकी रचनाओं में महानगरीय जीवन और विदेशी परिवेश में रहने वाले पात्रों की मानसिक वेदना, अकेलापन और संवादहीनता प्रमुख विषय हैं।
- स्त्री-विमर्श: पारंपरिक स्त्री छवि से इतर, शिक्षित, आत्मनिर्भर परंतु मानसिक द्वंद्वों से जूझती आधुनिक नारी के पात्रों का यथार्थ चित्रण किया है।
- भाषा-शैली: भाषा अत्यंत सहज, परिमार्जित, और आत्मीय गद्य-शैली (Conversational Style) से युक्त है।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- पद्मभूषण (2022): साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
- सूर पुरस्कार: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा।
- मिर्ज़ा ग़ालिब पुरस्कार
- उषा प्रियंवदा वर्तमान में अमेरिका में निवास कर रही हैं और समकालीन हिंदी साहित्य की वरिष्ठतम हस्ताक्षरों में से एक हैं।
मोहन राकेश
- मोहन राकेश का जन्म: 8 जनवरी 1925
- जन्म स्थान: अमृतसर (पंजाब)
- मूल नाम: मदनमोहन गुगलानी
- शिक्षा: ओरिएंटल कॉलेज, लाहौर से संस्कृत एवं हिंदी में एम.ए.।
- संपादक: उन्होंने प्रसिद्ध साहित्य पत्रिका ‘सारिका’ (1962-1963) का सफल संपादन किया।
- विशेष योगदान: मोहन राकेश को हिंदी में ‘आधुनिक नाटक के स्तंभ’ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने हिंदी रंगमंच को एक नई दिशा दी।
- (क) नाटक (हिंदी नाटक इतिहास के मील के पत्थर)
- आषाढ़ का एक दिन (1958 ई.):
- महाकवि कालिदास के जीवन और उनकी प्रेमिका मल्लिका के संबंधों पर आधारित।
- इसे आधुनिक हिंदी नाटक का पहला नाटक भी माना जाता है।
- वर्ष 1959 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक घोषित किया गया था।
- लहरों के राजहंस (1963 ई.):
- अश्वघोष के महाकाव्य ‘सौंदरनंद’ पर आधारित (नंद और सुंदरी की कथा)।
- इसमें भौतिक सुख और आध्यात्मिक शांति के बीच के द्वंद्व को दर्शाया गया है।
- आधे अधूरे (1969 ई.):
- मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन, संबंधों की टूटन और स्त्री-पुरुष के बीच के तनाव का जीवंत चित्रण।
- इसे ‘समकालीन जीवन का पहला सार्थक नाटक’ कहा जाता है।
- पैरों तले की जमीन (अधूरा नाटक):
- इसे बाद में कमलेश्वर ने पूरा किया।
- आषाढ़ का एक दिन (1958 ई.):
- (ख) एकांकी संग्रह
- अंडे के छिलके और अन्य एकांकी (1968)
- बीज नाटक
- (ग) कहानी संग्रह
- इंसान के खंडहर (1950) — (पहला कहानी संग्रह)
- नए बादल (1957)
- जानवर और जानवर (1958)
- एक और जिंदगी (1961)
- फौलाद का आकाश (1966)
- (घ) उपन्यास
- अंधेरे बंद कमरे (1961): दिल्ली के आधुनिक मध्यवर्गीय दंपत्ति (हरबंस और नीलिमा) के जीवन पर आधारित।
- न आने वाला कल (1968): बोर्डिंग स्कूल के जीवन की पृष्ठभूमि पर।
- अंतराल (1972)
- (ङ) यात्रा-वृत्तांत एवं निबंध
- आषाढ़ का एक दिन / आखिरी चट्टान तक (1953): (प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत — कन्याकुमारी की यात्रा पर आधारित)।
- परिवेश (निबंध संग्रह)
- बकलम खुद (निबंध संग्रह)
- 3. भाषा, शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- आधुनिक संवेदना के नाटककार: उन्होंने आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन, अजनबीपन, संबंधों के बिखराव और आकांक्षाओं के द्वंद्व को अपने नाटकों का मुख्य विषय बनाया।
- रंगमंचीय भाषा (Stage Language): मोहन राकेश ने हिंदी नाटक को किताबी भाषा से निकालकर जीवंत और अभिनय-योग्य (Performable) भाषा प्रदान की।
- नई कहानी के त्रयी: राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश को ‘नई कहानी आंदोलन की त्रयी’ (तीन मुख्य स्तंभ) माना जाता है।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1968 ई.): नाटक के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए।
- ‘आषाढ़ का एक दिन’ को वर्ष 1959 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक घोषित किया गया था।
- मृत्यु: 3 दिसंबर 1972 , नई दिल्ली
रामचंद्र शुक्ल
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म: 4 अक्टूबर 1884
- जन्म स्थान: अगौना गाँव (बस्ती जिला, उत्तर प्रदेश)
- पिता: चंद्रबली शुक्ल
- शिक्षा: मिर्जापुर से मिशन स्कूल से ‘इंट्रेंस’ की परीक्षा उत्तीर्ण की।
- कार्यक्षेत्र:
- ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ (काशी) का संपादन कार्य किया।
- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे।
- प्रमुख रचनाएँ एवं ग्रंथ
- (क) इतिहास ग्रंथ
- हिंदी साहित्य का इतिहास (1929 ई.):
- मूल रूप से नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी शब्दसागर’ की भूमिका के रूप में “हिंदी साहित्य का विकास” नाम से लिखा गया था।
- हिंदी साहित्य इतिहास लेखन में इसे सर्वाधिक प्रामाणिक एवं मील का पत्थर माना जाता है।
- इसमें उन्होंने कालविभाजन एवं नामकरण ‘लोकप्रवृत्ति’ और ‘ग्रंथों की प्रसिद्धि’ के आधार पर किया।
- हिंदी साहित्य का इतिहास (1929 ई.):
- (ख) आलोचनात्मक ग्रंथ
- चिंतामणि (भाग 1, 2, 3 एवं 4):
- निबंध एवं समीक्षात्मक निबंधों का संकलन। (मूल रूप से ‘विचार वीथी’ नाम से 1930 में प्रकाशित)।
- ‘चिंतामणि भाग-1’ पर इन्हें ‘देव पुरस्कार’ मिला।
- रसमीमांसा: सैद्धांतिक समीक्षा पर आधारित महत्वपूर्ण ग्रंथ।
- त्रिवेणी: इसमें तीन प्रमुख कवियों पर विस्तृत समीक्षा की गई है — जायसी, सूरदास और तुलसीदास।
- गोस्वामी तुलसीदास
- महाकवि सूरदास
- चिंतामणि (भाग 1, 2, 3 एवं 4):
- (ग) संपादित ग्रंथ
- हिंदी शब्दसागर
- नागरी प्रचारिणी पत्रिका
- भ्रमरगीत सार
- जायसी ग्रंथावली
- प्रमुख सिद्धांत एवं काव्यगत दृष्टिकोण
- रसवादी आलोचक: शुक्ल जी लोक मंगल की साधना अवस्था के रसवादी आलोचक माने जाते हैं।
- लोकमंगल की अवधारणा: उन्होंने साहित्य को “जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब” कहा।
- तुलसीदास के प्रति विशेष अनुराग: शुक्ल जी ने गोस्वामी तुलसीदास को हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि माना और ‘लोक-मंगल की साधना अवस्था’ का कवि कहा।
- प्रमुख कथन
- “हिंदी साहित्य का इतिहास जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।”
- “वैर क्रोध का आचार या मुरब्बा है।”
- “सच्चा प्रेम वही है जिसकी तृप्ति आत्मबलि पर निर्भर हो।”
- “श्रद्धा और भक्ति के योग का नाम श्रद्धा-भक्ति है।”
- “यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता।” (बिहारी सतसई के संदर्भ में)
- मृत्यु: 2 फरवरी 1941 , वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
सं० डॉ० नागेन्द्र
- डॉ० नगेंद्र का जन्म: 22 मार्च 1915
- जन्म स्थान: अतरौली (अलीगढ़, उत्तर प्रदेश)
- शिक्षा: लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी और हिंदी दोनों विषयों में एम.ए., तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से डी.लिट्.।
- अकादमिक पद: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे।
- साहित्यिक पहचान: हिंदी में रसवादी समीक्षा और आधुनिक रस सिद्धांत के सबसे प्रमुख स्तंभ।
- (क) आलोचनात्मक ग्रंथ
- सुमित्रानंदन पंत (1938): यह उनका पहला आलोचनात्मक ग्रंथ है।
- साकेत: एक अध्ययन (1939): मैथिलीशरण गुप्त के महाकाव्य पर आधारित उत्कृष्ट समीक्षा।
- विचार और अनुभूति (1949)
- रीति काव्य की भूमिका (1949)
- रस-सिद्धांत (1964): (डॉ० नगेंद्र की अक्षय कीर्ति का आधार ग्रंथ, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला)।
- नई समीक्षा: नए संदर्भ
- आधुनिक हिंदी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ
- भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका
- (ख) संपादित ग्रंथ
- हिंदी साहित्य का इतिहास (1973 ई.): डॉ० नगेंद्र द्वारा संपादित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य का प्रामाणिक इतिहास माना जाता है।
- भारतीय साहित्य कोश
- काव्यशास्त्र का इतिहास
- विचारप्रधान एवं निबंध संग्रह
- विचार और विवेचन (1944)
- विचार और विश्लेषण (1955)
- आलोचक के मुख से (1993)
- चेतना के बिंब (1967): (संस्मरण)
- साहित्यिक दृष्टिकोण एवं विशेषताएँ
- रसवादी आलोचक: डॉ० नगेंद्र मूलतः ‘रसवादी’ आलोचक हैं। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के प्राचीन ‘रस सिद्धांत’ की आधुनिक, वैज्ञानिक एवं मनोविज्ञान के आलोक में व्याख्या की।
- छायावाद के समर्थक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद उन्होंने छायावादी कविता की सहृदयतापूर्वक पुनर्व्याख्या की।
- छायावाद की परिभाषा (प्रसिद्ध कथन):
“छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।”
(प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे ज्यादा बार पूछा जाने वाला कथन)।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1965): उनके प्रसिद्ध शोध ग्रंथ ‘रस-सिद्धांत’ के लिए।
- साहित्य वाचस्पति: हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा।
- मृत्यु: 10 जून 1999 , नई दिल्ली
निर्मल वर्मा
- निर्मल वर्मा का जन्म: 3 अप्रैल 1929
- जन्म स्थान: शिमला (हिमाचल प्रदेश)
- शिक्षा: सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए.।
- विशेष योगदान: वे हिंदी साहित्य में आधुनिक चेतना, यूरोप-प्रवास के दौर के अनुभववादी तथा आत्मपरक निबंध शैली के लिए जाने जाते हैं।
- संपादक: उन्होंने ‘पर्याय’ और ‘आलोचना’ जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से जुड़कर कार्य किया।
- (क) कहानी संग्रह (Story Collections)
- परिंदे (1960): इसे नामवर सिंह ने ‘नई कहानी’ आंदोलन की पहली कृति/कहानी माना है।
- जलती झाड़ी (1965)
- पिछली गर्मियों में (1968)
- बीच बहस में (1973)
- कव्वे और काला पानी (1983): इस संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- सूखा तथा अन्य कहानियाँ (1995)
- (ख) उपन्यास (Novels)
- वे दिन (1964): चेकोस्लोवाकिया की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास।
- लाल टीन की छत (1974)
- एक चित्त सुख (1979)
- रात का रिपोर्टर (1989)
- अंतिम अरण्य (2000)
- (ग) निबंध संग्रह
- चीड़ों पर चांदनी (1962): (यात्रा-संस्मरण एवं निबंध)
- हर बारिश में (1970)
- शब्द और स्मृति (1976)
- कला का जोखिम (1981)
- ढलान से उतरते हुए (1985)
- भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र (1991)
- शताब्दी के ढलते वर्षों में (1995)
- भाषा, शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- नई कहानी के शिल्पकार: निर्मल वर्मा की कहानियों में अकेलापन, उदासी, अलगाव (Alienation) और स्मृतियों (Memories) का ताना-बाना मुख्य विषय रहा है।
- काव्यात्मक एवं संवेदनात्मक भाषा: उनकी गद्य-शैली में एक अनोखा काव्यात्मक खिंचाव और उदासी की परतें (Melancholy) देखने को मिलती हैं।
- भारतीयता एवं आधुनिकता का द्वंद्व: उन्होंने अपने निबंधों में पश्चिमी आधुनिकता और भारतीय परंपरा के द्वंद्व का गंभीर विश्लेषण किया।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999): संपूर्ण साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए (पंजाबी लेखक गुरदियाल सिंह के साथ संयुक्त रूप से)।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985): ‘कव्वे और काला पानी’ (कहानी संग्रह) के लिए।
- पद्म भूषण (2002): भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में।
- साहित्य अकादमी फेलोशिप (2005)
- मृत्यु: 25 अक्टूबर 2005 , नई दिल्ली
